Author: aal-e-qutub
Syeda Fatima Kay Ghar Hazrat Zubair Ki Talwar Tootny Ka Waqiya | Mufti Fazal Hamdard
Azmat-E-Ghaus-ul-Azam رضی اللہ عنہ Wabastagi Ki Ahmiyyat Aur Tareeqekar.

Imam Jafar e Sadiq , Oxygen or Hydrogen | امام جعفر صادق ، آکسیجن اور ہا…
चौदह सितारे इमामे जाफ़रे सादिक़ (अ.स) पार्ट- 2

बादशाहाने वक़्त
आपकी विलादत 83 हिजरी में हुई है इस वक़्त अब्दुल मलिक बिन मरवान बादशाहे वक़्त था फिर वलीद सुलेमान उमर बिन अब्दुल यज़ीद बिन अब्दुल मलिक , यज़ीद अल नाक़िस , इब्राहीम इब्ने वलीद और मरवान अल हेमार , अल्ल तरतीब ख़लीफ़ा मुक़र्रर हुए। मरवान अल हेमार के बाद सलतनते बनी उमय्या का चिराग़ गुल हो गया और बनी अब्बास का पहला बादशाह अबुल अब्बास , सफ़ाह और दूसरा मन्सूर दवानक़ी हुआ है। मुलाहेज़ा हो ,(आलाम अल वरा , तारीख़ इब्ने अलवरी व तारीख़े आइम्मा पृष्ठ 336 ) इसी मन्सूर ने अपनी हुकूमत के दो साल गुज़रने के बाद इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) को ज़हर से शहीद कर दिया। (अनवारूल हुसैनिया जिल्द पृष्ठ 50)
अब्दुल मलिक बिन मरवान के अहद में आपका एक मनाज़िरा
हज़रत इमाम जाफ़र सादिक़ (अ.स.) ने बे शुमार इल्मी मनाज़िरे फ़रमाए हैं आपने दहिरयों , क़दरियों काफ़िर और यहूदी व नसारा को हमेशा शिकस्ते फ़ाश दी है। किसी एक मनाज़िरे में भी आप पर कोई ग़लबा हासिल न कर सका। अहदे अब्दुल मलिक इब्ने मरवान का ज़िक्र है कि एक क़दरिया मज़हब का मनाज़िर इसके दरबार में आ कर उलमा से मनाज़िरे का ख़्वाहिश मन्द हुआ। बादशाह ने हसबे आदत अपने उलमा को तलब किया और उनसे कहा कि इस क़दरिये मनाज़िर से मनाज़िरा करो। उलमा ने उस से काफ़ी ज़ोर आज़माई की मगर वह मैदाने मनाज़िरे का खिलाड़ी इन से न हार सका और तमाम उलमा आजिज़ आ गए। इस्लाम की शिकस्त होते हुए देख कर अब्दुल मलिक इब्ने मरवान ने फ़ौरन एक ख़त इमाम मोहम्मद बाक़र (अ.स.) की खि़दमत में मदीना रवाना कर दिया और उसमें ताकीद की कि आप ज़रूर तशरीफ़ लायें। हज़रत मोहम्मद बाक़र (अ.स.) की खि़दमत में जब इसका ख़त पहुँचा तो आपने अपने फ़रज़न्द हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) से फ़रमाया कि बेटा मैं ज़ईफ़ हो चुका हूँ तुम मनाज़िरे के लिये शाम चले जाओ। हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) अपने पदरे बुर्ज़ुगवार के हस्ब उल हुक्म मदीना से रवाना हो कर शाम पहुँच गए। अब्दुल मलिक इब्ने मरवान ने जब इमाम मोहम्मद बाक़र (अ.स.) के बजाए इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) को देखा तो कहने लगा कि आप अभी कमसिन हैं और वह बड़ा पुराना मनाज़िर है , हो सकता है कि आप भी और उलमा की तरह शिकस्त खांए इस लिये मुनासिब नहीं कि मजालिसे मनाज़िरा फिर मुन्अक़िद की जाए। हज़रत ने फ़रमाया , बादशाह नू घबरा नहीं , अगर ख़ुदा ने चाहा तो मैं सिर्फ़ चन्द मिनट में मनाज़िरा ख़त्म कर दूंगा। आपके इरशाद की ताईद दरबारियों ने भी की और मौक़ा ए मनाज़िरे पर फ़रीक़ैन आ गए। चूंकि क़दरियों का एतेक़ाद है कि बन्दा ही सब कुछ है। ख़ुदा को बन्दों के मामले में कोई दख़ल नहीं है , और न ख़ुदा कुछ कर सकता है। यानी ख़ुदा के हुक्म और क़ज़ा व क़द्र व इरादों को बन्दों के किसी अमर में दख़ल नहीं। लेहाज़ा हज़रत ने इसकी पहल करने की ख़्वाहिश पर फ़रमाया कि मैं तुम से सिर्फ़ एक बात कहना चाहता हूँ और वह यह है कि तुम ‘‘ सूरा ए हम्द पढ़ो ’’ उसने पढ़ना शुरू किया। ज बवह ‘‘ इय्या का नाब्दो व इय्याका तस्तेईन ’’ पर पहुँचा , जिसका तरजुमा यह है कि ‘‘ मैं सिर्फ़ तेरी इबादत करता हूँ और बस तुझी से मद्द चाहता हूँ ’’ तो आपने फ़रमाया , ठहर जाओ और मुझे इसका जवाब दो कि जब ख़ुदा को तुम्हारे एतेक़ाद के मुताबिक़ तुम्हारे किसी मामले में दख़्ल देने का हक़ नही तो फिर तुम उससे मद्द क्यों मांगते हो। यह सुन कर वह ख़ामोश हो गया और कोई जवाब न दे सका। बिल आखि़र मजलिसे मनाज़ेरा बरख़्वास्त हो गई और बादशाह बेहद ख़ुश हुआ।(तफ़सीरे बुरहान जिल्द 1 पृष्ठ 33 )
अबु शाकिर देसानी का जवाब अबु शाकिर देसानी जो ला मज़हब था। हज़रत से कहने लगा कि क्या आप ख़ुदा का ताअर्रूफ़ करा सकते हैं और उसकी तरफ़ मेरी रहबरी फ़रमा सकते हैं। आपने एक ताऊस का अन्डा हाथ में ले कर फ़रमाया देखो इसकी बाहरी बनावट पर ग़ौर करो , और अन्दर की बहती हुई ज़र्दी और सफ़ैदी को बहुत ग़ौर से देखो और उस पर तवज्जो दो कि इसमें रंग बिरंग के तायर (पक्षी) क्यों कर पैदा हो जाते हैं। क्या तुम्हारी अक़्ले सलीम इसको तसलीम नहीं करती कि इस अंडे को अछूते अन्दाज़ में बनाने वाला और उससे पैदा करने वाला कोई है। यह सुन कर वह ख़ामोश हो गया और दहरियत से बाज़ आया। इसी देसानी का ज़िक्र है कि उसने एक दफ़ा आपके साहबी हश्शाम बिन हकम के ज़रिये से सवाल किया कि क्या यह मुम्किन है कि ख़ुदा सारी दुनिया को एक अंडे में समो दे और अंडा बढे न दुनिया घटे ? आपने फ़रमाया बेशक वह हर चीज़ पर क़ादिर है। उसने कहा कोई मिसाल ? फ़रमाया मिसाल के लिये आंख की छोटी पुतली काफ़ी है। इसमें सारी दुनियां समा जाती है न पुतली बढ़ती है न दुनिया घटती है।(उसूले काफ़ी पृष्ठ 433 जामए उल अख़बार)
इमामे जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) और हकीम इब्ने अयाश कल्बी
हश्शाम बिन अब्दुल मलिक बिन मरवान के अहदे हयात का एक वाक़ेया है कि हज़रत इमाम जाफ़र सादिक़ (अ.स.) की खि़दमत में एक शख़्स ने हाज़िर हो कर अर्ज़ किया कि हकीम बिन अयाश कल्बी आप लोगों की हजो किया करता है। हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) ने फ़रमाया कि अगर तुझ को उसका कुछ कलाम याद हो तो बयान कर। उसने दो शेर सुनाये , जिसका हासिल यह है कि हमने ज़ैद को शाख़े दरख़्ते ख़ुरमा पर सूली दे दी , हालां कि हम ने नहीं देखा कोई मेहदी दार पर चढ़ाया गया हो और तुम ने अपनी बे वकूफ़ी से अली (अ.स.) को उस्मान के साथ क़यास कर लिया हालां कि अली (अ.स.) उस्मान से बेहतर और पाकीज़ा थे। यह सुन कर इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) ने दुआ की बारे इलाहा अगर यह हकीम कल्बी झूठा है तो इस पर अपनी मख़्लूक़ में से किसी दरिन्दे को मुसल्लत फ़रमा। चुनान्चे उनकी दुआ क़ुबूल हुई और हकिम कल्बी को राह में शेर ने हलाक कर दिया।(असाबा इब्ने हजर , असक़लानी जिल्द 2 पृष्ठ 80 )
मुल्ला जामी तहरीर फ़रमाते हैं कि जब हकीम कल्बी के हलाक होने की ख़बर इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) को पहुँची तो उन्होंने सजदे में जा कर कहा कि उस ख़ुदा ए बरतर का शुकरिया है कि जिसने हम से जो वायदा फ़रमाया उसे पूरा किया।(शवाहेदुन नबूवत सवाएक़े मोहर्रेक़ा पृष्ठ 121 व नूरूल अबसार पृष्ठ 147 )
113, हिजरी में इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) का हज अल्लामा इब्ने हजर मक्की लिखते हैं कि आपने 113 हिजरी में हज किया और वहां ख़ुदा से दुआ की , ख़ुदा ने बिला फ़स्ल अंगूर और दो बेहतरीन रिदायें भिजवाईं। आपने अंगूर ख़ुद भी खाया और लोगों को भी खिलाया और रिदायें एक साएल को दे दीं।
इस वाक़िये की मुख़्तसर अल्फ़ाज़ में तफ़सील यह है कि बअस बिन सअद उसी सन् में हज के लिये गये। वह नमाज़े अस्र पढ़ कर एक दिन कोहे अबू क़बीस पर गए , वहां पहुँच कर देखा कि एक निहायत मुक़द्दस शख़्स मशग़ूले नमाज़ है। फिर नमाज़ के बाद वह सज्दे में गया और या रब या रब कह कर ख़ामोश हो गया। फिर या हय्यो या हय्यो कहा और चुप हो गया। फिर या अर रहमान निर्रहीम कह कर चुप हो गया। फिर बोला ख़ुदा मुझे अंगूर चाहिये और मेरी रिदा बोसिदा हो गई है , दो रिदाए चाहिये हैं। रावी ए हदीस बाअस कहता है कि यह अल्फ़ाज़ अभी तमाम न होने पाए थे कि एक ताज़ा अंगूरों से भरी हुई ज़म्बील(बहुत बड़ा टोकरा) आ मौजूद हुई और उस पर दो बेहतरीन चादरें रखी हुई थीं। उस आबिद ने जब अंगूर खाना चाहा तो मैंने अर्ज़ कि हुज़ूर मैं आमीन कह रहा था मुझे भी खिलाईये। उन्होंने हुक्म दिया , मैंने खाना शुरू किया। ख़ुदा की क़सम ऐसे अंगूर सारी उम्र ख़्वाब में भी नज़र न आये थे। फिर आपने एक चादर मुझे दी। मैंने कहा मुझे ज़रूरत नहीं है। उसके बाद आपने एक चादर पहन ली और एक ओढ़ ली , फिर पहाड़ से उतर कर मक़ामे सई की तरफ़ गये। मैं उनके साथ था। रास्ते में एक सायल ने कहा , मौला ! मुझे चादर दे दीजिये , ख़ुदा आपको जन्नत के लिबास से आरास्ता करेगा। आपने फ़ौरन दोनों चादरें उसके हवाले कर दीं। मैंने उस सायल से पूछा यह कौन हैं ? उसने कहा इमाम ज़माना हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ स )। यह सुन कर मैं उनके पीछे दौड़ा कि उन से मिल कर कुछ इस्तेफ़ादा करूं लेकिन फिर वह मुझे न मिल सके।(सवाएक़े मोहर्रेक़ा पृष्ठ 121 व कशफ़ुल ग़म्मा पृष्ठ 66, मतालेबुस सूऊल पृष्ठ 277 )

