
Day: January 19, 2022
मुहम्मद बिन मूसा अलखवारज़मी (780 ई० 850 ई.)

मुहम्मद बिन मूसा अलखवारज़मी (780 ई० 850 ई.)
मध्य एशिया का एक क्षेत्र खवारज़म कहलाता था। आज इसका नाम खिव है। इसी शहर में इस्लामी युग के प्रसिद्ध गणित शास्त्री मुहम्मद मूसा अलखवारज़मी 780 ई० में पैदा हुए।
मुहम्मद बिन ममा अलखबारजी उन्होंने प्रारम्भिक शिक्षा अपने देश में ही प्राप्त की। उस ज़माने के मशहूर विद्वान आपके गुरु रहे और आपकी विद्या की चर्चा दूर तक होने लगी। अब्बासी खलीफ़ा मामून रशीद ने जब विद्या और ज्ञान की उन्नति के लिए एक संस्था बैतुल हिकमत स्थापित की तो उसका नाम सुनकर खवारज़मी बग़दाद आ गये। यहाँ उन्होंने खगोल विद्या पर एक पुस्तक लिखी। इस अनुसंधानात्मक पुस्तक को बहुत पसंद किया गया और उन्हें इस संस्था का सदस्य बना लिया गया।
गणित शास्त्र पर उनकी दो पुस्तकें गणित और अलजबरा पर अद्वितीय पुस्तकें हैं। यूरोपीय शोधकर्ताओं ने उनकी इन पुस्तकों से बहुत कुछ सीखा। ख़वारज़मी पहले विद्वान हैं जिन्होंने गणना के लिए रोमनविधि के बजाए अरबी विधि का प्रयोग किया और जोड़ना, घटाना, गुणा करना व भाग देना आसान हो गया। गिनती की यही विधि आज पूरे संसार में प्रचलित है। यूरोप वाले शताब्दियों से इस विधि को अरबी विधि कहते हैं।
अलजबरा पर मुहम्मद बिन मूसा ख़वारज़मी की पुस्तक ‘अलजबरो अलमुक़ाबला’ अपने विषय पर संसार की प्रथम पुस्तक है। उन्होंने ट्रिग्नोमैट्री (त्रिकोणमिति) पर भी कई पुस्तकें लिखीं। एक पुस्तिका धप घड़ी पर लिखी। उनके अलजबरा की एक विशेषता यह है किउसमें अलजबरा के कई प्रश्नों को ज्योमेटरी की रेखाओं से बनी आकृति की सहायता से हल किया गया है।
खवारज़मी की अलजबरे का सबसे पहले लातीनी भाषा में अनुवाद हुआ उसके बाद एक व्यक्ति रोज़न ने 1831 ई० में उसका अंग्रेजी में अनुवाद किया।
तक़ीउद्दीन

तक़ीउद्दीन
( 1526 1585 ई.) तक़ीउद्दीन सोलहवीं शताब्दी के महान जीनीयस माने जाते हैं। सुनहरे इस्लामी युग के वह अंतिम वैज्ञानिक हैं जिन्होंने भौतिकी और भूगोल में परीक्षणों के साथ ऐसी-ऐसी चीज़ों का अविष्कार किया कि सुनकर विश्वास करना मुश्किल होता है। उनका जन्म 1526 ई० में सीरिया की राजधानी दमिश्क़ में हुआ। तकीउद्दीन द्वारा निर्मित एक यंत्र प्रारम्भिक शिक्षा वहीं प्राप्त की। वह संसार के प्रथम वैज्ञानिक हैं जिन्होंने स्टीम टर्बाइन (Steam Turbine) और भाप का इंजन (Steam Engine) बनाया जिसका श्रेय आज जेम्स वॉट को दिया जाता है। वह स्प्रिंग के प्रयोग से अच्छी तरह परिचित थे इसलिए पहली जेब घड़ी के अलावा अलार्म घड़ी और बड़े स्प्रिंग से स्वचालित खगोलिक घड़ी भी बनाई। उन्होंने पहली बार ऐसी घडियों का अविष्कार किया जिनमें मिनट के अलावा सेकण्ड का भी पता चलता था।
भौतिकी में अपने परीक्षणों द्वारा उन्होंने छाया (Reflection) को सिद्ध किया और प्रकाश की गति का पता लगाया। खगोल विद्या के परीक्षणों के लिए उन्होंने तुर्की की राजधानी इस्तम्बूल में अलदीन वैद्यशाला बनाई जहाँ उन्होंने कोण की दूरी नापने का यंत्र (Sextant) बनाया, वहाँ उन्होंने खगोल विद्या सम्बंधी कई यंत्र तैयार किये। उन्होंने सोलहवीं शताब्दी की में बिल्कुल सही जंत्री भी बनाई। 1585 ई. में तुर्की की राजधानी इस्तम्बूल इस महान वैज्ञानिक ने आखिरी सांस ली। )
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जाबिर बिन हैयान (Geber)

जाबिर बिन हैयान (Geber) (721 ई. 815 ई.) जाबिर बिन हैयान का जन्म इराक़ के कूफ़ा शहर में हुआ। जाबिर बिन हैयान को रसायन विज्ञान का बाबा आदम कहा जाता है। आपने कुफ़ा में अपनी प्रयोगशाला बनाई और रसायन विज्ञान में ऐसे-ऐसे शोध किये कि दुनिया आपको संसार का प्रथम रसायन वैज्ञानिक कहने लगी। बिन हैयान
जाबिर जाबिर बिन हैयान जब छोटे थे तो उनके पिता को विद्रोह के आरोप में क़त्ल कर दिया गया। अत: उनकी पढ़ाई और पालन-पोषण की ज़िम्मेदारी उनकी माता पर आ पड़ी। उनकी साहसिक माता अपने पुत्र को अच्छी से अच्छी शिक्षा दिलाने के लिए प्रयासरत रहीं। जाबिर ने अन्थक परिश्रम और बुद्धी के बल पर विज्ञान के क्षेत्र में उच्च स्थान प्राप्त कर लिया। उन्होंने यूनानी भाषा सीखी और उसके पंडित बन गए। जाबिर ने यूनानी भाषा की कई कृतियों का अरबी भाषा में अनुवाद किया। परन्तु उन्हें रसायन शास्त्र से लगाव था। उन्होंने दूसरी विद्याओं पर भी पुस्तकें लिखीं जिनमें तर्कशास्त्र, खगोल शास्त्र, दर्शन शास्त्र, भूविज्ञान, प्रतिछाया (Reflection) आदि शामिल हैं।
जिस समय अब्बासी ख़लीफ़ा हारून रशीद ने सिंहासन संभाला तो जाबिर बिन हैयान की कीर्ति शिखर पर थी। हारून रशीद ज्ञानियों को बड़ा सम्मान देता और संरक्षकता प्रदान करता था। उसके दोनों मंत्री माविया बरमकी और जाफ़र बरमकी भी विद्या और ज्ञान को प्रोत्साहन देते थे। अत: वह युग इस्लामी दुनिया में विद्या, ज्ञान और नये विचारों की प्रगति का सुनहरा युग समझा जाता है। जाबिर को बग़दाद बुलाकर हारून रशीद से मिलवाया गया। उन्होंने रसायन विज्ञान पर अपनी पुस्तक हारून रशीद के
नाम अर्पित की। 803 ई० में जाफ़र बरमकी की हत्या हो गई। तब जाबिर बग़दाद छोड़कर कूफ़ा लौट आए और पुस्तक लेखन का कार्य शुरू कर दिया।
जाबिर बिन हैयान का नाम उस युग के महान वैज्ञानिकों में गिना जाता है। आप शोध में प्रयोगों को अनिवार्य समझते थे। अत: एक जगह लिखते हैं, “रसायन विज्ञान में सबसे आवश्यक वस्तु प्रयोग है। जो व्यक्ति अपनी विद्या का आधार प्रयोग पर नहीं रखता वह सदा ग़लती करता है। अगर तुम रसायन शास्त्र का सही ज्ञान प्राप्त करना चाहते हो तो प्रयोगों को आधार बनाओ और उसी विद्या को सही जानो जो प्रयोग से सिद्ध हो जाए।”
जाबिर के युग में रसायन शास्त्र “महूसी” तक सीमित था। महूसी वह विद्या थी जिसके द्वारा सस्ती धातुओं जैसे पारे, तांबे या चाँदी को सोने में परिवर्तित करने का प्रयास किया जाता था। परन्तु आपने अपने प्रयोगों द्वारा रसायन शास्त्र को नया रूप प्रदान किया। आप धातुओं को गलाने, अर्क निकालने, विधिपूर्वक दवाओं के सत बनाने और पदार्थों का स्वरूप बदलने के अनगिनत प्रयोग करते थे। धातुओं के बारे में उनका विचार था कि समस्त धातुएं गंधक और पारे से बनी हैं। जब दोनों पदार्थ शुद्ध रूप में एक दूसरे से रसायनिक मिश्रण के रूप में मिलते हैं तो सोना बनता है। उन्होंने रसविद्या (Alchemy) में नए शोध और विभिन्न विद्याओं का प्रयोग शुरू किया जो आज भी Distillation (आसवन) और Crystallisation (रवा) बनाने में इस्तेमाल की जा रही है। उनके काफ़ी शोध तो और कूटलिखित हैं।
जाबिर बिन हैयान ने अपनी पुस्तकों में स्टील बनाने, चमड़ा रंगने, धातुओं को शुद्ध करने, लोहे को जंग से बचाने के लिए उस पर वार्निश करने, ख़िज़ाब और इसी प्रकार की सैकड़ों वस्तुएं बनाने के तरीके बताए हैं। उन्होंने अपनी प्रयोगशाला के लिए कई यंत्र भी बनाए।
जाबिर बिन हैयान ने एक ऐसा तेजाब भी बनाया जो शोरे के तेजाब से भी अधिक शक्तिशाली था। आपके कई आविष्कार ऐसे हैं जिनसे यूरोप के वैज्ञानिकों ने लाभ उठाया।
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