Ita’ate Ali Ita’ate Khuda Kee Zamaanat

Ita’ate Ali Ita’ate Khuda Kee Zamaanat

عن ابی ذر رضی اﷲ عنه قال قال رسول اﷲ صلى الله تعالى عليه وآله وسلم من اطاعنی فقد اطاع اﷲ ومن عصانی فقد عصی اﷲ ومن اطاع علیا فقد اطاعنیومن عصی علیاً فقد عصانی

“Hazrat Aboo Dhar RadiyAllahu Ta’ala ‘Anhu Se Marwi Hai Kaha Ki Huzoor SallAllahu Ta’ala Alayka Wa Sallam Ne Farmaya Jis Ne Meri Ita’at Kee Us Ne Allah Kee Ita’at Kee Aur Jis Ne Meri Naa Farmani Kee Us Ne Allah Kee Naa Farmaani Kee Jis Ne (Hazrat) Ali Kee Ita’at Ke Tehqeeq Us Ne Meri Ita’at Kee Aur Jis Ne (Hazrat) Ali Kee Naa Farmaani Kee Us Ne Meri Naa Farmaani Kee.”

[Hakim Fi Al-Mustadrak, 03/121.]

Huzoor Nabiyye Akram SallAllahu Ta’ala ‘Alayhi Wa Aalihi Wa Sallam Ali Kee Naa Farmaani Ko Apni Naa Farmaani Bata Rahe Hain. Mudda’a Yeh Tha Ki Yeh Baat Tay Paa Jaae Aur Is Me Koi Ib’haam Na Rahe Ki Wilaayate Mustafa SallAllahu Ta’ala Alayka Wa Sallam Ka Faiz Hazrat Ali KarramAllahu Ta’ala Waj’hah-ul-Karim Se Chala Hai Aur Ali Kee Ita’at Chunki Rasool Kee Ita’at Hai Aur Rasool Kee Ita’at Allah Kee Ita’at Kee Zaamin Hai Lihaza Ali Kee Ita’at Ita’ate Ilaahi Ka Zari’a Hai.

[Dhib’he ‘Azeem(Dhib’he Isma’il ‘Alayh-is-Salam Se Dhib’he Husayn RadiyAllahu Ta’ala ‘Anhu Tak)/56_57.]
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इमामत और उम्मत

इमामत और उम्मत

रब ए कायनात ने सारी कायनात के लिए रसूल बनाकर हुजूर ए पाक को भेजा और वो ही अशरफुल अंबिया खातिमुल नबी थे उनके बाद कोई नबी नही आने वाला था तो वो पूरी उम्मत को राह दिखाने के लिए खुद के बाद किसी एक को मुंतखीब करते तो उन्होंने हज़रत अली अलैहिस्सलाम को अपना नायब बनाया और पूरी उम्मत को ये हुक्म दिया की मैं जिसका मौला हु अली उसका मौला है यही से इमामत शुरू ऐलानिया हो जाती है।
खिलाफत ए बरहक हम सभी सुन्नी तस्लीम करते है की हज़रत अबू बक्र सद्दीक हज़रत उमर फारूक हज़रत उस्मान गनी रज़ी खलीफा ए बरहक है ये हमारा ईमान है।
हज़रत अली खलीफा ए बरहक भी है और साथ ही इमामे बरहक भी है।
हज़रत अली ने यही सिलसिला यूं ही जारी रखा और हज़रत इमाम हसन और हज़रत इमाम हुसैन को इमामत मुंतखिल की हज़रत इमाम हुसैन ने ये इमामत हजरत इमाम जैनुल आबेदीन को मुंतखील की और इन्होंने हज़रत इमाम मोहम्मद बाकिर को इमामत अता की और इन्होंने हज़रत इमाम जाफर सादिक को इमामत मुंतखिल की और इन्होंने हज़रत इमाम मुसी ए काजीम को इमामत अता की और इन्होंने हज़रत इमाम अली रजा को इमाम बनाया और इन्होंने हज़रत इमाम तकी को इमामत अता की इन्होंने हज़रत इमाम नकी को और इन्होंने इमामत हजरत इमाम हसन असकरी को और इन्होंने हज़रत इमाम मेहंदी अलैहिस्सलाम को मुंतखिब किया जो पैदा हो चुके है लेकिन रूह पोश है बाद में वक्त आने पर जाहिर होंगे जो हदीस से साबित है।
चारो फिकाह के इमाम हजरत इमाम अबू हनीफा हजरत इमाम मालिक हज़रत इमाम शाफई हजरत इमाम अहमद बिन हंबल इन सब इमामों ने इन बारह इमामों को माना है हालांकि कुछ इमाम इन फीकाह के इमामों के बाद पैदा हुवे है।
हज़रत इमाम अबू हनीफा रह ने हज़रत इमाम जाफर सादिक रज़ी को अपना पीर माना और उनका कोल मशहूर है की नोमान हलाक हो जाता अगर ढाई साल हज़रत इमाम जाफर सादिक की सोहबत में नही रहता तो।
किसी ने इमाम अबू हनीफा से पूछा की आपकी उम्र कितनी है तो उन्होंने फरमाया कि ढाई साल ये वो ही ढाई साल है जो मैंने उनकी खिदमत में गुजारे।
एक मर्तबा वक्त के खलीफा बादशाह ने उनको पूरी हुकूमत के लिए इमामत के ओहदे पर मुंतखिब करने की पेशकश की लेकिन इमाम अबू हनीफा ने ये पेशकश ठुकरा दी तो बादशाह ने उन पर सख्ती की लेकिन आपने पेशकश कुबूल नही की तब उनके खास शागिर्द हज़रत यूसुफ़ ने उनसे अर्ज की के आप इमामत का ओहदा क्यों नही कुबूल करते आप इसके काबिल है तो हज़रत इमाम अबू हनीफा ने फरमाया की इस वक्त वक्त के इमाम हजरत इमाम जाफर सादिक है अल्लाह के रसूल और इमामेन के जरिये इमामत उन तक पहुंची है मैं इमामत का ओहदा लेना उनकी शान मे बेअदबी समझता हू लिहाज़ा मैं कतई ही नही लूंगा उनकी इस अकीदत और अदब की वजह से अल्लाह ने उनको पूरी दुनिया में इमाम अबू हनीफा मशहूर कर दिया।
मुसलमानो ने इन बारह इमामों को शियाओ का इमाम समझ लिया जबकि ये असल में सुन्नियों के इमाम है।
जितने भी सुन्नियों में मसलक है उन सब के मौलवी हजरात ने अपने अपने मसलक के बानीयो को इतना ज्यादा हाईलाइट किया की उम्मत के लोग बारह इमामों को एक तरह से भूल से गए जिसका नतीजा है की हम असल इस्लाम से दूर हो गए।
बारह इमाम की मुहोब्बत ऐन इस्लाम है।
जब तक उम्मते मुस्लिमा इन बारह इमामों से अकीदत मुहोब्बत रखती थी तब तक मुसलमान सुर्ख रू था आज हम इन मुकद्दस हस्तियों को भूल गए तो हम अपना हश्र खुद देख रहे है।
अफसोस होता है जब मुसलमान ये पूछता है की ये अहलेबैत कौन है कोई बच्चा पूछे तो समझ में आ जाता है लेकिन हाजी नमाजी उमर रसीदा मुसलमान जब ये पूछता है की मैं तो नही जानता की ये अहलेबैत कौन है ये गलती उस मुसलमान की नही जो नही जानता है बल्कि उन मसलको के मौलवी साहब की है जो अपने मसलक को तो इस्लाम की आड़ में मजबूत करने में लगे है लेकिन असल इस्लाम कमजोर कर रहे है।
अल्लाह हम सबको अहलेबैत खलीफा ए राशेदीन सहाबा किराम बारह इमाम और औलिया अल्लाह इन सबकी मुहोब्बत अकीदत और अदब ताजीम करने की तौफिक नसीब करे।
आमीन।

इमामत एक अल्लाह की अता करदा वो पावर है जो पूरी कायनात में सबसे बड़ा सबसे ताकतवर बाइख्तियार शख्स होता है जो वारिस ए नबी सरापा नूर होता है जो जाहिर में इंसान होता है लेकिन उसकी शान नूर है सिर्फ नूर, पूरी उम्मत वक्त के इमाम के ताबेह होती है। बाकी आप जितनी इनसे अकीदत मुहोब्बत रखोगे उतनी आपके समझ में आती जायेगी।

Gham e Husain AlahisSalam aur Hazrat Nizamuddin Auliya aur Baba Fariduddin Ganjsshakar Rehmatullah alaih..

Sultan-ul-Awliya’ Hazrat Khwaja Nizam-ud-Deen Mehboob e Ilahi Quddis Sirruh-ul-Aziz Farmate Hain Ki Mein Maahe Muharram Sharif 656 Hijri Me Sultan-ul-Masa’ikh, Shaykh-ush-Shuyookh-ul-Aalam, Burhan-ul-Haqiqah, Saiyad-ul-Aabidin, Badr-ul-Aarifin, Umdat-ul-Abara Qudrat-ul-Akhyar, Taj-us-Sufiya’, Siraj-ul-Awliya’, Burhan-ush-Shara’ Walidain, Shaykh-ul-Islam Wa’l-Muslimin Hazrat Baaba Farid-ud-Deen Mas’ood Ganj Shakar RadiyAllahu Ta’ala Anhu Kee Khidmate Aqdas Me Haazir Huwe Aap Ne Aashurah Ke Garrah Mutabarrakah Ki Fazilat Me Farmaya :

“Is Ashrah(Mahine Ke Daswe’n Hisse) Me Kisi Aur Kaam Mashghool Nahin Hona Chaahi’e Siwaa’e Itaa’at, Tilawat, Du’a Wa Namaaz Waghairah Ke, Is Waaste Ki Is Ashrah Me Qahre Ilaahi Bhi Huwa Hai Aur Bohat Rahmate Ilahi Bhi Naazil Hoti Hai. Phir Farmaaya Ki Is Ashre Me Bohat Se Tabqaate Masha’ikh Ne Girya-o-Zaari Wa Niyaaz Apne uppar Laazim Kiya Hai.

Baad Aza’n Farmaya Ki Kya Tujhe Ma’loom Nahin Ki Is Ashrah Me Huzoor Sarware Aalam SallAllahu Ta’ala wa’ala aale hi Wasallam Par Kyaa Guzari ? Aur Aap Ke Farzandon Ko Kis Tarah Be Rehmi Se Shaheed Kiya Gaya, Baaz Pyaas Ki Haalat Me Shaheed Hue Ki Un Bad-Bakhton Ne Un Allah Ke Pyaaron Ko Paani Ka ek Qatra Tak Na Diya.
Jab Shaykh-ul-Islam Ne Yeh Baat Farmayi To ek Na’rah Maar Kar Be-Hosh Ho Kar Gir Pade, Jab Hosh Me Aaye To Farmaya Ki Kaise Sang Dil, Kafir Be-Aaqibat, Be-Sa’aadat Aur Na-Maherbaan They Haala’n Ki Unhein Khoob Ma’loom Tha Ki Yeh Deen Wa Dunya Aur Aakhirat Ke Baadshah Ke Farzand Hain Phir Bhi Unhien Badi Be-Rehmi Se Shahid Kiya Aur Unhein Yeh Khayaal Na Aaya Ki Ka Qayaamat Ke Din Hazrat Khwaja e Aalam SallAllahu Ta’ala wa’ala aale hi Wasallam Ko Kyaa Muh Dikhayenge.”

[Rahat-ul-Quloob, Safha-57.]

اللَّهُمَّ صَلِّ عَلَى سَيِّدِنَا مُحَمَّدٍ وَعَلَى آلِ سَيِّدِنَا مُحَمَّد