हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम शहादत की शोहरत


بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ
اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ

हज़रत अनस रज़ियल्लाहु तआला अन्हु से रिवायत हैं कि बारिश के फिरिश्ते ने हुजूर अनवर सल्लल्लाहु तआला अलैहि व सल्लम की खिदमत में हाज़िरी देने के लिये खुदावन्दे कुद्दुस से इंजाज़त तलब की ,जब वह फिरिश्ता इजाज़त मिलने पर बारगाहे नुबुव्वत में हाज़िर हुआ तो उस वक्त हज़रत हुसैन रज़ियल्लाहु तआला अन्हु आए और हुजूर की गोद में बैठ गए ,तो आप उनको चूमने और प्यार करने लगे,फिरिश्ते ने अर्ज़ किया या रसूलल्लाह!
क्या आप हुसैन से प्यार करते हैं ? हुजूर ने फरमाया हां ,उस ने फरमायां :- आप की उम्मत हुसैन को कत्ल कर देगी अगर आप चाहें तो मैं उन की कत्लगाह (की मिट्टी) आप को दिखा दूं। फिर वह फिरिश्ता सुर्ख मिट्टी लाया जिसे उम्मुल मोमिनीन हज़रत उम्मे सलमह रज़ियल्लाहु तआला अन्हा ने अपने कपड़े में ले लिया। और एक रिवायत में है कि हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि व सल्लम ने फरमाया ऐ उम्मे सलमह! जब यह मिट्टी खून बन जाए तो समझ लेना कि मेरा बेटा हुसैन शहीद कर दिया गया।
हज़रत उम्मे सलमह रज़ियल्लाहु तआला अन्हा फरमाती हैं कि मैं ने उस मिट्टी को शीशी में बन्द कर लिया जो हज़रत हुसैन रज़ियल्लाहु तआला अन्हु की शहादत के दिन खून हो गई।
📓सवाइके मुहर्रिकाः 118
और इब्ने सअ्द हज़रत शअ्बी से रिवायत करते हैं कि हज़रत अली रज़ियल्लाहु तआला अन्हु जंगे सिफ्फीन के मौके पर करबला से गुज़र रहे थे कि ठहर गए और उस ज़मीन का नाम दरियाफ्त फरमाया,लोगों ने कहा कि इस जमीन का नाम करबला है ,करबला का नाम सुनते ही आप इस क़द्र रोए कि ज़मीन आंसुओं से तर हो गई ,फिर फरमाया कि मैं हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि व सल्लम की ख़िदमत में एक रोज़ हाज़िर हुआ तो देखा कि आप रो रहे हैं ,मैं ने अर्ज किया या रसूलल्लाह! आप क्यों रो रहे हैं ?
फरमाया अभी मेरे पास जिब्रील आए थे ,उन्हों ने मुझे ख़बर दी :- मेरा बेटा हुसैन दरियाए फुरात के किनारे उस जगह पर शहीद किया जाएगा जिस को करबला कहते हैं।
📓सवाइके मुहर्रिकाः 118
अबू नईम अस्बग बिन नबाता रिवायत करते हैं उन्हों ने फरमाया कि हम हज़रत अली रज़ियल्लाहु तआला अन्हु के साथ हज़रत हुसैन की कब्रगाह से गुज़रे तो आप ने फरमाया कि यह शहीदों के ऊंट बिठाने की जगह है और इस मकाम पर उन के कजावे रखे जायेंगे और यहां उन के खून बहाए जायेंगे। आले मुहम्मद सल्लल्लाहु तआला अलैहि व सल्लम के बहुत से जवान इस मैदान में शहीद किये जायेंगे और ज़मीन व आसमान उन पर रोएंगे।
📓खसाइसे कुब्ररा 2/126
इन अहादीसे करीमा से वाज़ेह तौर पर मालूम हुआ कि हुजूर पुर नूर सैयिदे आलम सल्लल्लाहु तआला अलैहि व सल्लम को हज़रत इमाम हुसैन रज़ियल्लाहु तआला अन्हु के शहीद होने की बार-बार इत्तिला दी गई और हुजूर ने भी इस का बारहा ज़िक फरमाया और यह शहादत हज़रत इमाम हुसैन की अहदे तिफ्ली ही में खूब मशहूर हो चुकी थी और सब को मालूम हो गया था कि आप के शहीद होने की जगह करबला है बल्कि उस के चप्पे-चप्पे को पहचानते थे और उन्हें खूब मालूम था कि शुहदाए करबला के ऊंट कहा बांधे जायेंगे,उन का समान कहां रखा जायगा और उन के खून कहां बहेगे..?
लेकिन नबीए अकरम सल्लल्लाहु तआला अलैहि व सल्लम,हां वह नबी कि खुदावन्दे कुद्दूस जिन की रज़ा जोई फरमाता है :- जिन का हुक्म बहरो-बर में नाफिज़ है ,जिन्हें शजरो-हजर सलाम करते हैं ,चांदा जिन के इशारों पर चला करता है ,जिन के हुक्म से डूंबा हुआ सूरज पलट आता है बल्कि बहुक्मे इलाही कौनैन के ज़र्रा-ज़र्रा पर जिन की हुकूमत है ,वह नबी प्यारे नवासे के शहीद होने की ख़बर पाकर आंखों से आंसू तो बहाते हैं मगर नवासे को बचाने के लिये बारगाहे इलाही में दुआ नहीं फरमाते और न हज़रत अली व हज़रत फातिमा रज़ियल्लाहु तआला अन्हुमा अर्ज करते हैं कि या रसूलल्लाह!
हुसैन की ख़बरे शहादत ने दिलो-जिगर पारा-पारा कर दिया ,आप दुआ फरमाएं कि खुदाए अज्ज़व जल्ल हुसैन को उस हादिसे से महफूज़ रखे। और अहले बैत,अज़्वाजे मुतहरात और सहाबए किराम सब लोग हज़रत इमाम हुसैन के शहीद होने की खबर सुनते हैं मगर अल्लाह के महबूब प्यारे मुस्तफा सल्लल्लाहु तआला अलैहि व सल्लम की बारगाह में कोई दुआ की दरख्वास्त पेश नहीं करते जबकि आप की दुआ का हाल यह है किः-
इजाबत का सेहरा इनायत का जोड़ा
दुल्हन बन के निकली दुआए मुहम्मद ﷺ
झुक कर गले से लगाया
बढ़ी नाज़ से जब दुआ-ए-मुहम्मद ﷺ
हुजूरे अक्दस सल्लल्लाहु तआला अलैहि व सल्लम ने हज़रत इमाम हुसैन रज़ियल्लाहु तआला अन्हु को बचाने के लिये दुआ नहीं फरमाई और न हुजूर से इस के बारे में किसी ने दुआ की दरख्वास्त पेश की सिर्फ इस लिये कि हुसैन का इम्तिहान हो,उन पर तकालीफ व मसाइब के पहाड़ टूटें और वह इम्तिहान में कामयाब होकर अल्लाह के प्यारे हों कि अब नबी कोई हो नहीं सकता तो नवासए रसूल का दर्जा इसी तरह बुलंद से बुलंद तर हो जाए और रजाए इलाही हासिल होने के साथ दुनिया व आखिरत में उन की अज़मत व रिफ्अत का बोल-बाला भी हो जाए।

कर्बला के वह आंकड़े जो शायद आप को न पता हों…

➡ यज़ीद की बैअत से इन्कार से लेकर आशूर तक इमाम हुसैन का आंदोलन 175 दिनों तक चला।

1) – 12 दिन मदीने में,
2) – 4 महीने 10 दिन मक्के में,
3) – 23 दिन मक्के और कर्बला के रास्ते में
4) – और 8 दिन कर्बला में।

➡ कूफे से इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम को 12000 खत लिखे गये थे।

➡ कूफे में इमाम हुसैन के दूत मुस्लिम बिन अक़ील की बैअत करने वालों की तादाद 18000 या 25000 या 40000 बतायी गयी है।

➡ अबू तालिब की नस्ल से कर्बला में शहीद होने वालों की संख्या 30 है, 17 का नाम “ज़ेयारत नाहिया” में आया है 13 का नहीं।

➡ इमाम हुसैन की मदद की वजह से शहीद होने वाले कूफियों की संख्या 138 थी जिनमें से 15 ग़ुलाम थे।

➡ शहादत के वक्त इमाम हुसैन अलैहिस्सलमा की उम्र 57 साल थी।

➡ शहादत के बाद उनके बदन पर भाले के 33 घाव और तलवार के 34 घाव थे। तीरों की संख्या अनगिनत बताया गया है कि शहादत तक इमाम हुसैन के बदन पर कुल 1900 तक घाव थे।

➡ इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की लाश पर दस घुड़सवारों ने घोड़े दौड़ाए थे।

➡ कूफे से इमाम हुसैन के खिलाफ जंग के लिए कर्बला जाने वाले सिपाहियों की तादाद 33 हज़ार थी। कुछ लोगों ने संख्या और अधिक बतायी है।

➡ दसवीं मुहर्रम को इमाम हुसैन ने 10 शहीदों के लिए मर्सिया पढ़ा, उनके बारे में बात की और दुआ की – हज़रत अली अकबर, हज़रत अब्बास, हज़रत क़ासिम, अब्दुल्लाह इब्ने हसन, अब्दुल्लाह, मुस्लिम बिन औसजा, हबीब इब्ने मज़ाहिर, हुर बिन यज़ीद रियाही, ज़ुहैर बिन क़ैन और जौन।

➡ इमाम हुसैन कर्बला के 7 शहीदों के सिरहाने पैदल और दौड़ते हुए गये – मुस्लिम बिन औसजा, हुर, वासेह रूमी, जौन, हज़रत अब्बास, हज़रत अली अकबर और हज़रत क़ासिम।

➡ दसवी मुहर्रम को यज़ीद के सिपाहियों ने तीन शहीदों के सिर काट कर इमाम हुसैन की तरफ फेंका – अब्दुल्लाह बिन उमैर कलबी, उमर बिन जनादा, आस बिन अबी शबीब शाकेरी।

➡ दसवी मुहर्रम को 3 लोगों को यज़ीदी सिपाहियों ने टुकड़े – टुकड़े कर दिया – हज़रत अली अकबर, हज़रत अब्बास और अब्दुर्रहमान बिन उमैर

➡ कर्बला के 9 शहीदों की माओं ने अपनी आंख से अपने बच्चों को शहीद होते देखा

➡ कर्बला में 5 नाबालिग बच्चों को शहीद किया गया – अब्दुल्लाह इब्ने हुसैन, अब्दुल्लाह बिन हसन, मुहम्मद बिन अबी सईद बिन अकील, कासिम बिन हसन, अम्र बिन जुनादा अन्सारी

➡ कर्बला में शहीद होने वाले 5 लोग पैग़म्बरे इस्लाम के सहाबी थे – अनस बिन हर्स काहेली, हबीब इब्ने मज़ाहिर, मुस्लिम बिन औसजा, हानी बिन उरवा और अब्दुल्लाह बिन बक़तर उमैरी

➡ दसवी मुहर्रम को इमाम हुसैन के 2 साथियों को गिरफ्तार करने के बाद शहीद किया गया – सवार बिन मुनइम और मौक़े बिन समामा सैदावी।

➡ कर्बला में 4 लोग इमाम हुसैन की शहादत के बाद शहीद किये गये – सअद बिन हर्स, उनके भाई अबू अलखनूफ, सुवैद बिन अबी मुताअ और मुहम्मद बिन अबी सअद बिन अक़ील, सुवैद बिन अबी मुताअ घायल होकर बेहोश हो गये तो, होश आया तो इमाम शहीद हो चुके थे, यह देख कर उन्होंने सिपाहियों पर हमला कर दिया और शहीद हो गये।

➡ सअद बिन हर्स, उनके भाई अबू अलखनूफ यज़ीदी सिपाही थे, इमाम हुसैन की शहादत देख कर उनसे बर्दाश्त न हुआ और तौबा करके यज़ीदी सिपाहियों पर हमला कर दिया और शहीद हो गये।

➡ मुहम्मद बिन अबी सअद बच्चे थे इमाम हुसैन की शहादत के बाद जब बीबियां रोने लगीं तो वह खेमे के दरवाज़े पर खड़े हो गये और एक यज़ीदी सिपाही ने उन्हें शहीद कर दिया।

➡ कर्बला के 7 शहीद अपने बाप के सामने शहीद हुए।

➡ कर्बला में 5 महिलाओं ने खैमों से निकल कर दुश्मनों पर हमला किया और उन्हें बुरा भला कहा।

➡ कर्बला में शहीद होने वाले महिला, अदुल्लाह बिन उमैर कलबी की पत्नी और वहब की मां थीं।

➡ आबिस बिन शबीब, को यज़ीदी सिपाहियों ने पत्थर मार – मार कर शहीद किया।

➡ नाफे बिन हिलाह को कूफियों ने पकड़ लिया और बंदी बनाने के बाद शहीद कर दिया।

➡ इमाम हुसैन के हाथों मारे जाने वाले यज़ीदी सिपाहियों की तादाद 1800 से 1950 तक बतायी गयी है।

➡ बनी हाशिम के पहले शहीद हज़रत अली अकबर

➡ सहाबियों में पहले शहीद मुस्लिम बिन औसजा

➡ उबैदुल्लाह हुर जाफी को इमाम हुसैन की क़ब्र का पहला ज़ायर कहा जाता है।

➡ पहली बार अब्बासी शासन काल में हारुन रशीद के आदेश पर इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की क़ब्र का निशान मिटा दिया गया और वहां की ज़मीन की जुताई कर दी गयी।

➡ मामून के ज़माने में इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की क़ब्र पर उनका रौज़ा बनाया गया।

➡ अब्बासी खलीफा, मुतवक्किल के काल में इमाम हुसैन की क़ब्र और आस – पास के घरों को ध्वस्त कर दिया गया और वहां की ज़मीन की जुताई करा दी गयी और फिर नदी का पानी बहा दिया गया लेकिन क़ब्र पर पानी नहीं चढ़ा।

➡ इमाम हुसैन के रौज़े को तबाह करने की ज़िम्मेदारी, नये नये मुसलमान बने इब्राहीम दीज़ज नाम के यहूदी को दी गयी थी।

➡ बसरा और कूफे के लोगों ने फिर से रौज़ा बनाया लेकिन सन 247 हिजरी में मुतवक्किल ने फि
र से रौज़ा ध्वस्त कराके जुताई करा दी लेकिन उसके बेटे मुन्तसिर के दौर में रौज़ा दोबारा बनाया गया।

Quran Aur Hadees Mein Koi Bhi Aisi Misaal Nai Hai Jo Taziya Shareef Ke Khilaf

Quran Aur Hadees Mein Koi Bhi Aisi Misaal Nai Hai Jo Taziya Shareef Ke Khilaf Jaye Balki Taziyadari Ke Haq Mein Misaal Maujood Hein. “Beshaq Safa Aur Marwa Allah Ki Nishaniyon Mein Se Hein” ( Para-02)

Is Aayat-e-Kareema Main Allah Ta’ala Ne Safa Aur Marwa Do Pahadiyo Ko Apni Nishani Qarar Diya Hai Is liye Ki Ek Waliyah Ke Qadamo Se Inhein Nisbat Ho Gayi Hai Aur Allah Ta’ala Ki Nishani Ho Jati Hai, Azmat Aur Nisbat Waali Cheez Ki Tazim Wa Tauqeer Deen Mein Shaamil Hai. Imam-e-Hussainع Se Nisbat Ki Wajah Se Taziya Shareef Banaya Jata Hai Upar Humne Jana Ki Safa Aur Marwa Sirf Do Pahadiya Thi Lekin Ek Waliyah Ke Qadam Se In Pahadiyon Ko Nisbat Ho Gai Hai, Toh Ye Allah Ta’ala Ki Nishani Ban Gayi Azmat Wali Pahadiyan Ho Gai, Ussi Tarah Taziya Shareef Ko Imam Hussainع Ki Taraf Nisbat Di Jaati Hai Isliye Taziya Shareef Laaik-e-Tazeem Ban Jata Hai Aaj Kuch Lailm Log Ye Kehte Hein Ki Shiya Bhi Taziyadari Karte Hai Isliye Taziyadari Nahi Karna Chahiye Unlogo Ko Mera Seedha Jawab Hai Woh Imam Hussainع Ko Mante Hein Toh Tum Ab Imam Hussainع Ko Mat Maano Woh bhi Roza Namaz Hajj Karte Hein Tum Ab Ye Bhi Mat Karo Jis Tarah Namaz Roza Hajj Ye Deen Ki Buniyaad Hein Ussi Tarah “Muhabbate Ahle Bait Muhabbate Imame Hussainع Tamam Musalmanon Par Wajib Hai” Ye Koi Shiya Sunni Ka Masla Nahi Hai Muhabbate Imam Hussainع Imaan Ka Hissa Hai Chand Mashur Aur Maruf Buzurgon Ka Hawala Jinse Taziya Shareef Ki Ziyarat Sabit Hai Waise Toh Beshumar Auliya Allah Se Ziyarate Taziya Shareef Sabit Hai Lekin Yaha Chand Mashur Aur Maruf Auliyah Ka Hawala Jinke Naam e Paak Se Sabhi Waqif Hein.

Hazrat Qiblae Aalam Janasheene Gauso Khwaja Huzoor Shah Niyaz Beniyaz Rahimahullahu Ta’ala Jo Zabardast Aalime Deen Waliye Kameel Buzurg Hein Zamana Jinke Buzurgi Shan O Azmat Ka Qaail Hai Aap Se Ek Azeem Karamat Zahir Huye Aap Shabe Aashura 2 Baje Taziyon Ki Ziyarat Ko Tashreef Le Jate Aur 5 Ya 7 Taziyon Ki Ziyarat Farma Kar Wapas Khanqah Shareef Mein Roonaq Afroz Hote Akheeri Umar Mein Jab Zaheri Jismani Taqat Zaeefi Ki Wajah Se Kam Huye Aur Ziyarat Ko Nahi Ja Sake Aur Aap khamosh Baithe Thae Ussi Waqt Bibi Sayyedaس Jalwagar Huye Aur Farmaya Ke Niyaz Aaj Hamare Baccho Ki Ziyarat Ko Na Uthoge? Is Irshade Bibi Sayyedaس Sunna Tha Ke Aapko Ek Kaifiyat Taari Huyi Aapne Khuddamo Ko Huqm Diya Ke Humko Le Chalo Khadimo Ne Arz Kiya Ke Huzoor Ko Chaarpayi Pe Le Chale Aap Ne Farmaya Nahi Balki Paidal He Le Chalo Lehaza Dono Janib Khuddam Ne Pakda Aur Aap Paidal Ziyarate Taziya Shareef Ko Tashreef Lae Gaye. Reference-[Makhzanul khazain] [Karamaate Nizamiya] maula_parast
Hazrat Shah Niyaz Beniyaz Rahimahullahu Ta’ala Aap Paabandi Se Taziya Ki Ziyarat Karte Thae, Ek Baar Kisi Molvi Sahab Ne Huzoor Shah Niyaz Beniyaz Se Is Mamul Par Kuch Aitraaz Kiya Aap Ko Jalal Aagaya Chunanche Aapne Uski Gardan Pakad Kar Ek Taziye Ki Taraf Ishara Karte Huye Khas Jazbe Ke Saath Farmaya Maulvi Dekh Kya Nazar Aata Hai? Maulvi Dekhte He Behosh Ho Kar Gir Pada Der Tak Usi Halat Mein Raha Hosh Aane Par Riqqat Taari Ho Gayi Jab Halat Durust Huyi Toh Logon Ke Daryaft Karne Par Bataya Ke Mujhe “Hasnain Kareemain” Ki Ziyarat Huyi Jis Se Mujh Par Behoshi Taari Ho Gayi Main Bayaan Nahi Kar Sakta Ke Maine Kya Nazara Dekha Hai. Reference-[Riyaz Ul Fazail Safa No-229, 230]

Aale Rasool Syed Abdul Razzak Rahimahullahu Ta’ala Jis Waqt Taziya Uthta Toh Khade Rehte Aur Jab Taziya Rukhsat Hota Toh Nange Paao Taziya Shareef Ke Saath Jaate Thae Aap Aale Rasool Waliye Kamil Buzurg Thae Jinki Nasal Se Hazrat Warise Paak Rahimahullahu Ta’ala Tashreef laye. [Reference Razzakiya Safa No-15]

Hazrat Syed Shah Abdul Razzak Bosvi Rahimahullahu Ta’ala Farmate Hein Ki Taziya Shareef Ko Koi Yeh Na Jane Ki Ye khaali Kaagaz Ya Panni Hai Balki Saheedane Karbala Ki Muqaddas Ruh Hai Is Taraf Mutawajje Hoti Hai. Reference [Karamate Razzakiya 15]

Hazrat Waris-e-Paak Rahimahullahu Ta’ala Taziya Waale Gharo Par Tashreef Lae Jate Thae Hazrat Warise Paak Jab Taziya Shareef Ki Taraf Dekhte Toh Aap Par Ek kaifiyat Taari Ho Jaati Thi Aap Taziya Shareef Ke Saath Saath Chalte Aur Kandha Dete Thae. Reference- [Miskaat-e-Haqqaniya]

इमाम हुसैन (as) के क़त्ल में शामिल प्रमुख लोग और उनका हसब नसब

इमाम हुसैन (as) के क़त्ल में शामिल प्रमुख लोग और उनका हसब नसब

• यज़ीद इब्ने माविया इब्ने अबु सूफियान। मां मैसून इब्ने बहदल सीरिया के कल्ब बद्दू क़बीले से थी और ईसाई थी।(H.U. Rahman, A Chronology Of Islamic History 570-1000 CE (1999), p. 72)। इसका दादा अबू सूफियान नबी सअ ने ख़िलाफ उहद और ख़ंदक की लड़ाई में मुशरिकों का सरदार जिसने फतह मक्का के वक़्त माफी मांगी (Donner, Fred M. (1981). The Early Islamic Conquests )। दादी हिंदा ने उहद की जंग में नबी सअ के चचा हज़रत हमज़ा का कलेजा चबाया (Ibn Ishaq/Guillaume p. 371.), और उनके नाक कान काट कर अपने गले में हार बना कर पहन लिए।(Ibn Ishaq/Guillaume p. 375. — The Life of Muhammad, Oxford University Press, 1955

• मरवान इब्ने हाकम इब्ने अबु अल आस इब्ने उमैया। (Kennedy, Hugh N. (2016). The Prophet and the Age of the Caliphates: The Islamic Near East from the 6th to the 11th Century (Third ed.). Oxford and New York: Routledge.) हज़रत उस्मान रअ के दौरे ख़िलाफत में उनका प्रमुख सलाहकार और मदीना का गवर्नर रहा।(Kennedy 2016, p. 79.) कर्बला के तीन साल बाद यानि 64 हिजरी में उमया वंश का चौथा ख़लीफा बना। हालांकि रसूल अस ने मरवान और हाकम को तड़ीपार किया था। हज़रत उस्मान रअ के ज़माने में माफी मांगकर मदीने वापस लौटा। मदीना से इमाम हुसैन से यज़ीद बैयत लेने के लिए तत्कालीन गवर्नर वलीद इब्ने उत्बा पर दबाव बनाया। (Ibn Qutayba al-Dīnawarī, al-Imāma wa l-sīyāsa, vol. 1, p. 227.)

• वलीद इब्ने उत्बा इब्ने राबिया। इसकी बहन हिंद बिंते उत्बा अबु सूफियान की पत्नी और माविया की मां थी। 61 हिजरी में मदीना में यज़ीद का गवर्नर।(The Encyclopaedia of Islam, New Edition, Volume III: H–Iram. Leiden: E. J. Brill. pp. 607–615.) इमाम हुसैन अस से मदीना में बैयत लेने की ज़िम्मेदारी दी गई लेकिन कामयाब न हो पाया।( The History of al-Ṭabarī, Volume 19: The Caliphate of Yazīd ibn Muʿāwiyah, A.D. 680–683/A.H. 60–64)

• उबैदुल्लाह इब्ने ज़ियाद इब्ने अबु सूफियान ( चूकि ज़ियाद इब्ने अबु सूफियान और मरजाना की आधिकारिक शादी नहीं हुई थी इसलिए अक्सर मां के नाम से से यानि उबैदुल्लाह इब्ने मरजाना के तौर पर भी पहचाना जाता है)।(Robinson, C. F. (2000). “ʿUbayd Allāh b. Ziyād”. In Bearman, P. J.; Bianquis, Th.; Bosworth, C. E.; van Donzel, E. & Heinrichs, W. P. (eds.). The Encyclopaedia of Islam, New Edition, Volume X: T–U. Leiden: E. J. Brill. pp. 763–764.)
इब्ने ज़ियाद बसरा, कूफा और ख़ुरासान प्रांत का गवर्नर रहा। कर्बला की जंग के वक़्त कूफा प्रांत का गवर्नर था और यज़ीद के दिशानिर्देश लागू कराने के लिए ज़िम्मेदार था। कूफा में इमाम हुसैन के चचेरे भाई मुस्लिम इब्ने अक़ील और उनके दो बच्चों की हत्या कराई। उमर इब्ने साद को फरमान भेजकर कहा कि हुसैन या उनके बच्चों तक पानी की एक बूंद न पहुंचने पाए (Tarikh-e-Tabari vol. 6, p. 334)

• अम्र या उमर इब्ने साद इब्ने अब्द वक़ास- कर्बला में यजीद की फौज का कमांडर। इमाम हुसैन पर पहला तीर चलाने वाला। कूफे का निवासी और नबी सअ के प्रमुख सहाबी रहे साद इब्ने अब्द वक़ास का बेटा। जनाब साद इब्ने अब्द वक़ास का नाम अशरा मुबश्शेरा के दस लोगों में है। इनकी मां हामना अबू सूफियान की बेटी थीं। (Short Biography of the Prophet & His Ten Companions. Darussalam. 2004. p. 80.)

• शिम्र इब्ने ज़िलजौशन अबु सबीग़ा अज़ ज़बयानी- कर्बला में 4 हज़ार सिपाहियों का सालार। आख़िरी वक़्त में इमाम हुसैन का सिर क़लम किया। ख़ेमों में आग लगाने और लूटपाट करने वालों में प्रमुख। बनु क़ल्ब क़बीले का था। इब्ने ज़ियाद के लश्कर में शामिल होने से पहले ख़ारजी रहा है। हज़रत हुज्र बिन अदी की गिरफ्तारी के बाद उनके ख़िलाफ गवाही देने वालों में था। इसके बाप शूराहबिल बिन आवर बिन अम्र उन लोगों में थे जिन्होंने फतह-मक्का के वक़्त नबी अस के सामने इस्लाम क़बूल किया।
• हुसैन इब्ने नुमैर या हसीन इब्ने नमीर अल सकुनी- किंदा क़बीले का इब्ने नुमैर सिफ्फीन ती जंग में माविया की फौज में लड़ा। कूफे में रहता था और कर्बला में इब्ने ज़ियादा ने 4 हज़ार सिपाहियों की कमान देकर भेजा।(Lammens & Cremonesi, “Al-Ḥuṣayn ibn Numayr”, (1971), pp. 620–621) जनाबे हुर इब्ने नमीर के लश्कर में थे और आशूरा के दिन इमाम हुसैन के साथ आ गए। कर्बला के बाद इब्ने ज़ुबैर की बग़ावत कुचलने के लिए मक्का और मदीना भेजे गए लश्कर में था। (Tarikh-e-Tabari, circa 63 A.H.) ) कमांडर की मौत के बाद लश्कर का सिपाहसालार हुआ। यहां ख़ाना ए काबा में आग लगाने और मस्जिदे नबवी में घोड़ा बंधवाने के अलावा लूटपाट और अस्मतज़नी का भी गुनहगार है((Murooj-uz-Zahab of Masoodi,Vol 2, Pg 70))। सहाबी ए रसूल सअ है और इससे मंसूब कई हदीस सही बुखारी, तिरमिज़ी, सनान अबु दाउद और इब्ने नसाई में शामिल की गई हैं।

• मुहम्मद बिन अशत बिन क़ैस- अशत बिन क़ैस अल किंदी का बेटा और हज़रत अबु बक्र रअ का सगा भांजा। इमाम हसन अस को ज़हर देने वाली उनकी पत्नी जुदा इब्ने अशत का भाई। कर्बला में 4 हज़ार सिपाहियों का प्रमुख। कूफा का निवासी। कई हदीसों का रावी। हज़रत उमर रअ, हज़रत उस्मान रअ, इब्ने मसूद और उम्मुल मौमिनीन आयशा रअ की हदीस इससे मंसूब हैं (Hayatul Haiwan, Vol. 2, Pg. 48)। इसका भाई मुहम्मद बिन अशत इमाम हुसैन अस को ख़त भेजने वालों और हज़रत मुस्लिम इब्ने अक़ील को गिरफ्तार करने वालों में शामिल।

• शबत इब्ने रबी बिन हुसैन अल तिमीमी अल यरबु- हज़रत उस्मान रअ के क़त्ल में शरीक। बाद में ख़ारिजियों के लश्कर में शामिल फिर माविया की फौज में सिपहसालार। कूफे का निवासी और इमाम हुसैन अस को ख़त लिखने वालों में शामिल। हज़रत हुज्र बिन अदी के ख़िलाफ गवाही देने वालों में नाम। सहाबिए रसूल अस। अबु दाउद और इमान नसाई ने इससे मंसूब कई हदीस अपने सनान में शामिल की हैं।

• समरा इब्ने जुंदाब- सहाबिए रसूल सअ, और समरा का गवर्नर रहा और इब्ने ज़ियाद की सिविल पुलिस का प्रभारी ( Abu’l-ʿAbbas Ahmad b. Jabir al-Baladhuri, KITAB FUTUH AL-BULDAN transl. Francis Clark Murgotten (1924)। इब्ने ज़ियाद ने कूफा से लोगों को इमाम हुसैन के ख़िलाफ लड़ने के लिए लोगों को भेजने की ज़िम्मेदारी समरा इब्ने जुंदाब को दी।(Waṣâyâ al-ʿUlamâ’ (Beirut: Dâr Ibn Kathîr, 1985)) कई सही हदीसों का रावी है (Al-Istiab fi marifat al-ashab (Cairo: Maktabah Nahdah, 1960), v.1, 197; )

• काब इब्ने जाबिर इब्ने मलिक। कूफा निवासी। इसके पिता जाबिर इब्ने मलिक नबी सअ के प्रमुख सहाबियों में शुमार। काब माविया इब्ने अबु सूफियान के क़रीबियों में शामिल रहा और कर्बला में उमर इब्ने साद के लश्कर में था। जंग में हज़रत बुरैर इब्ने ख़ुज़ैर का क़ातिल (Tarikh-e-Tabari vol. 6, p. 247-248)।

• मुज़ाहिम इब्ने हारिस। कूफा का निवासी। जंग में नाफे इब्ने हिलाल जमाली का क़ातिल 9 (Tarikh-e-Tabari vol 6, p 229)। हज़रत उस्मान रअ का पूर्व सैनिक।

• अम्र बिन हज्जाज अल ज़ुबैदी- कूफा से इमाम हुसैन को ख़त लिखने वालों में शामिल। उमर इब्ने साद के लश्कर में दाईं कमान का प्रभारी। 7 मुहर्रम को 500 सिपाहियों के साथ फरात पर पहरेदारी के लिए नियुक्त। 10 मुहर्रम को लोगों को इमाम हुसैन के ख़िलाफ लड़ने के लिए बार-बार ललकार रहा था। (Tarikh-e-Tabari vol. 6, p. 249)। सहाबिए रसूल सअ। कर्बला से इमाम हुसैन के सहाबियों का सिर नेज़ों पर ले जाने वालों में शामिल।

Suggested reading-
Ibn al-Athir, Al-Kamil,
al-Tabari, Tarikh
Ibn Kathir, Al-Bidaya
al-Tabarsi, I’lam al-Wara