बीबी ज़ैनब सलामुल्लाह अलैह जिनके बिना इमाम हुसैन की कुर्बानी कोई नहीं जान पाता

इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम और उनके घराने के मर्द तो कर्बला में शहीद हो गए थे, लेकिन ज़ैनब सलामुल्लाह अलैह के खुत्बा और अक्वाल ही थे जिन्होंने इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की कुर्बानी को लोगों के बीच पहुंचाया था.

मुहर्रम के मौके पर अक्सर इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम को याद किया जाता है. लगभग हर कोई इमाम हुसैन की शहादत की बात करता है लेकिन कर्बला की लड़ाई जो याजिद और उसकी सोच के खिलाफ लड़ी गई उसमे इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के खानदान के कई लोग कुर्बान हुए थे. उस लड़ाई में हिस्सा लिया था एक ऐसी शख्सियत ने जिसका नाम बा-अफसोस लोगो के दरमियान में उतना मश्हूर नहीं है.

ये नाम है इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की बहन जनाबे ज़ैनब सलामुल्लाह अलैह का. ये वही बीबी ज़ैनब हैं जो कर्बला के मारके मे एक लीडर बनकर उभरी थीं. अगर बीबी ज़ैनब न होतीं तो इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम को शायद सिर्फ एक ऐसे गाज़ी के रूप में याद किया जाता जिसने वक़्त के ज़ालिम राजा के खिलाफ जिहाद छेड़ा था.

इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम और उनके घराने के जवान तो कर्बला में शहीद हो गए थे, लेकिन बीबी ज़ैनब सलामुल्लाह अलैह के खिताब और अक्वाल ही थे जिन्होंने इमाम हुसैन की कुर्बानी को लोगों के बीच पहुंचाया था.

इमाम हुसैन अल की शहादत तो कर्बला के युद्ध में 680AD या 61 हिजरी (इस्लामिक कैलेंडर) के दसवें मुहर्रम में ही हो गई थी. इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने अपनी लड़ाई लड़ ली थी अब बीबी ज़ैनब सलामुल्लाह अलैह की बारी थी.

कौन थीं ज़ैनब?

सयैदा ज़ैनब बिन्त अली असल में पैगंबर मोहम्मद सलल्लाहू अलैही व सल्लम की नवासी थीं. पैगंबर अलैहिस्सलाम की बेटी फातिमा अलैहिस्सलाम की बेटी ज़ैनब. यानी इमाम हुसैन और इमाम हसन की हक़िक़ी बहन. अपने घराने के बाकी अफराद की तरह ही बीबी ज़ैनब सलामुल्लाह अलैह ने भी इस्लामिक इतिहास में अहम हिस्सा निभाया था. हज़रते ज़ैनब की शादी अब्दुल्लाह इब्न जाफर (मौला आली के भतीजे) से हुई थी और जब इमाम हुसैन अल ने याजिद-पलीद के खिलाफ लड़ाई छेड़ी थी तब बीबी ज़ैनब ने उनका साथ दिया था. बीबी ज़ैनब ही वो थीं जिन्होंने कर्बला में इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के एक बेटे ज़ैनुल अबीदिन अलैहिस्सलाम (Zain-ul Abidin) की जान बचाई थी और ऐसे इस्लामी इतिहास में इमाम हुसैन की नस्ल को जिंदा रखा था. बीबी ज़ैनब की शहादत के बाद उनका रौज़ा सीरिया के दमास्कस में बनाया गया.

इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की बहन बीबी सलामुल्लाह अलैह जैनब ने ही लोगों तक ये बात पहुंचाई थी कि कैसे याजिद के खिलाफ इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम को शहादत मिली और क्यों वो कोई गद्दार नहीं थे

कुफा में ज़ैनब के खुत्बात..

11वें मुहर्रम के दिन औरते, बच्चे और इमाम हुसैन का बेटे जैन उल अबीदिन याजिदी फौज ने कैद कर लिए गए थे और कुफा के गवर्नर इब्न ज़ियाद की अदालत में पेश किए जाने थे. कुफा वो शहर था जहां ज़ैनब और उनकी बहन उम्मे कुलसुम ने औरतों को कुरान की तालीम दी थी. पैगंबरे इस्लाम अलैहिस्सलाम की नवासी ज़ैनब अपने बाबा अली और भाई-बहनों के साथ इसी शहर में रही थीं.

इसी शहर में बंदी बनाकर जनाबे ज़ैनब को लाया गया. जैसे ही कारवां कुफा में पहुंचा वहां लोगों की भीड़ लग गई उन लोगों को देखने के लिए जिन्हें वक़्त की हुकुमत ने गद्दार साबित कर दिया था. कहा जाता है कि जिनकी मौत हुई थी कर्बला के युद्ध में उनका सिर लाने को कहा गया था और उस समय इमाम हुसैन और अली अब्बास (अलैहिमुस्सलाम) का सिर लिए ज़ैनब चली आ रही थीं.

उसी समय ज़ैनब ने अपना पहला खुत्बा दिया जब लोग उन्हें गद्दार समझ रहे थे. ज़ैनब की आवाज़ से लोगों की आवाज़ दब गई और ज़ैनब ने जोर से दहाड़ कर लोगों के बीच अपनी बात पहुंचाई. तब कुफ़ा के लोगो ने मह्सूस किया के ये लह्ज़ा मौला अली पाक का है जो उनकी बेटी की जुबां से निकल रहा है।

जो लोग गद्दारों की सज़ा का जश्न मना रहे थे वो भी ज़ारो क़तार अश्क बहाने लगे जब ज़ैनब ने अपना खिताब दिया और इमाम हुसैन की बात बताई.

क्या हुआ था गवर्नर की अदालत में?

जब अगले दिन गवर्नर की अदालत में पैगंबर का परिवार पहुंचा तो गवर्नर इब्न जियाद ने ज़ैनब को नहीं पहचाना. उनकी बदहवास हालत में भी वो बुलन्द हौसलों से भरी हुई थीं. उनके सामने इमाम हुसैन का कटा हुआ सिर रखा था. ज़ैनब की पहचान जानकर जब गवर्नर ने उनका मजाक उड़ाया तो ज़ैनब ने कहा कि गवर्नर ने खुद अपने पापों के कारण लानत ली है और उन्हें जल्द ही इसका पता चल जाएगा. ज़ैनब ने कहा कि वो खुशकिस्मत हैं कि वो मौला अली की बेटी हैं और रसूले पाक की नवासी और इमाम हुसैन की बहन जिसने शहादत हासिल की थी.

बीबी ज़ैनब का सफर

जब ज़ैनब और उनके कारवां को दमास्कस जाना पड़ा तब 750 मील की वो सर्दियों का सफर उन लोगों पर काफी भारी पड़ी. उन लोगों को लंबा रास्ता लेना पड़ा ताकि गद्दारों से बचा जा सके. तब ज़ैनब उनकी बहन और हुसैन के बेटे जैन उल अबीदिन पर कारवां में मरने वाले बच्चों को दफनाने और रोती बिलखती मांओं को संभालने की जिम्मेदारी थी.

उस दौर में ज़ैनब के भाषण लोगों में जज्बा भर देते थे और उनकी बहन और फातिमा कुब्रा (हुसैन की बेटी) भी लोगों को जागरुक करते थे. ज़ैनब ने हुसैन की कुर्बानी की कहानी लोगों तक पहुंचाई, वो जहां भी जाती लोगों को अपने दादा, पिता और भाई की कहानी सुनाती और साथ ही इब्न ज़ियाद की ज़ूल्म की दासताँ की भी बतातीं.

दमास्कस में पहुंचने के बाद उन्हें 72 घंटों तक बाज़ार के चौराहे पर खड़ा रखा गया. तब भी ज़ैनब ने दर्द भरा खुत्बा दिया और लोगों को बताया कि इमाम हुसैन ने किस तरह अपना कुर्बानी दी. और लोगों को ये बताया कि वो गद्दारों की जीत का जश्न नहीं मना रहे हैं वो तो इस्लाम असल पाक घराना है।

याजिद की अदालत..

कुफा से दमास्कस के रास्ते के बीच बीबी ज़ैनब और बाकी लोग कर्बला में अपने परिवार के शहीद लोगों का सिर देख रहे थे तो उन्हें बहुत रन्ज हो रहा था. उस समय जंग में जीतने वाली फौज हारने वाली फौज के लोगों का कटा हुआ सिर लेकर जाती थी और अपनी जीत का जश्न मनाती थी. याजिद की अदालत में भी इमाम हुसैन का कटा हुआ सिर ज़ैनब के सामने रखा था.

याजिद ने कई बड़े लोगों को बुलाया था ये देखने के लिए. सभी बंदी रस्सियों से बंधे हुए याजिद के सामने पहुंच रहे थे. उन्हें सिंहासन के सामने एक तख्त पर खड़ा किया गया और याजिद तब भी अपनी जीत का जश्न मना रहा था.

उस समय बीबी ज़ैनब ने पूरी ताकत लगाकर खड़े होकर कुरान की बातें बताईं और कर्बला के जंग को लेकर अपना खुत्बा दिया. उस समय वहां मौजूद हर शख्स चौंक गया था. यहां तक कि याजिद भी. बीबी ज़ैनब ने सबको रास्ता दिखाया था. उसके बाद बंदियों को एक साल तक टूटे घर में रखा गया और फिर याजिद ने सबको रिहा कर दिया. इमाम ज़ैनउल आबीदीन ने अपनी बुआ से मश्वरा किया और याजिद-पलीद को कहा गया कि सभी शहीदों के सिर लौटा दिए जाएं और उन्हें एक घर दिया जाए तब बीबी ज़ैनब सलामुल्लाह अलैह ने अपनी पहली मिजलिस की थी और इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम पर गुजरे ज़ूल्म लोगो को बयाँ की. बीबी ज़ैनब इस पूरे दौर में इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की शहादत के बारे में लोगों को बेदार करती रहीं और असिरों (कैदियों) का हौसला बढ़ाती रहीं.

बीबी ज़ैनब बुढ़ापे में मदीना वापस आई थीं और वहां भी अपने भाई के कुर्बानियों की कहानी सुनाई थी. ज़ैनब की असली जीत यही थी कि उनके भाई की शहादत की कहानी आज भी लोगों द्वारा याद की जाती है और अगर ज़ैनब न होतीं तो शायद इमाम हुसैन एक गद्दार की तरह देखे जाते. बीबी ज़ैनब ने ही शहादत का असली मतलब लोगों को समझाया था.

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