
ब्रिटिश हुकूमत के दौर की बात है एक दीवाना, मलंग, दरवेश, क़लन्दर, आशिक़-ए-रसूल दिल्लूराम बाजार में
महबूब-ए-खुदा (सल्लल्लाहु व अलैही वसल्लम) की नाते कहता फिरता था उसके हम-मज़हब उसे कोई पत्थर मरता कोई थप्पड़ मरता मगर वो दीवाना जिसका दिल इश्क़-ए-रसूल की चाशनी में डूबा हुआ था उसे न कोई परवाह थी न फ़िक़्र कोई उसके बारे में क्या कहता है वो बस इश्क़-ए-मुस्तफा में मस्त था
जिसे उसके आखिरी वक्त में हुजूर की ज़ियारत नसीब हुई और उसको कलिमा हुजूर ने पढ़ाया और “कौसरी” नाम रखा~

