✿मक्का से गारे सौर तक *
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( हिस्सा 1)
★__ अब हुजूर सल्लल्लाहू अलैही वसल्लम को हिजरत के सफर पर रवाना होना था, उन्होंने हजरत जिब्राइल अलैहिस्सलाम से पूछा :- मेरे साथ दूसरा हिजरत करने वाला कौन होगा ?
जवाब में हजरत जिब्राइल अलैहिस्सलाम ने कहा- अबू बकर सिद्दीक होंगे ।
★_ हुजूर सल्लल्लाहु अलेही वसल्लम उस वक्त तक चादर ओढ़े हुए थे इसी हालत में हजरत अबू बकर सिद्दीक रजियल्लाहु अन्हु के घर पहुंचे ,दरवाजे पर दस्तक दी तो हजरत असमा रज़ियल्लाहु अन्हा ने दरवाज़ा खोला और हुजूर सल्लल्लाहू अलेही वसल्लम को देखकर अपने वालिद हजरत अबू बकर सिद्दीक रजियल्लाहु अन्हु को बताया कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलेही वसल्लम आए हैं वो चादर ओढ़े हुए हैं। यह सुनते ही अबू बकर सिद्दीक रजियल्लाहु अन्हु बोल उठे :- अल्लाह की क़सम ! इस वक़्त आप सल्लल्लाहु अलेही वसल्लम यक़ीनन किसी खास काम से तशरीफ लाए हैं _,”
फिर उन्होंने आप सल्लल्लाहू अलैही वसल्लम को अपनी चारपाई पर बिठाया, आप सल्लल्लाहु अलेही वसल्लम ने इरशाद फरमाया :- दूसरे लोगों को यहां से उठा दो _,”
हजरत अबू बकर सिद्दीक रजियल्लाहु अन्हु ने हैरान हो कर अर्ज़ किया :- ऐ अल्लाह के रसूल ! यह तो सब मेरे घरवाले हैं ।
इस पर आप सल्लल्लाहु अलेही वसल्लम ने फरमाया:- मुझे हिजरत की इजाज़त मिल गई है। हजरत अबू बकर सिद्दीक रजियल्लाहु अन्हु फौरन बोल उठे :- मेरे मां-बाप आप पर कुर्बान ! क्या मैं आपके साथ जाऊंगा?
जवाब में हुजूर सल्लल्लाहू अलेही वसल्लम ने इरशाद फरमाया :- हां , तुम मेरे साथ जाओगे _,”
★_ यह सुनते ही मारे खुशी के हजरत अबु बकर सिद्दीक रजियल्लाहु अन्हु रोने लगे । हजरत आयशा सिद्दीका रजियल्लाहु अन्हा फरमाती हैं -मैंने अपने वालिद को रोते देखा तो हैरान हुई … इसलिए कि मैं उस वक्त तक नहीं जानती थी कि इंसान खुशी की वजह से भी रो सकता है ।
फिर हजरत अबू बकर सिद्दीक रजियल्लाहु अन्हु ने अर्ज़ किया :- ऐ अल्लाह के रसूल ! आप पर मेरे मां-बाप कुर्बान ! आप इन दोनों ऊंटनियों में से एक ले लें , मैंने इन्हें इसी सफर के लिए तैयार किया है_,”
इस पर हुजूर सल्लल्लाहु अलेही वसल्लम ने फ़रमाया :- मैं यह क़ीमत देकर ले सकता हूं ।
यह सुनकर हजरत अबू बकर सिद्दीक रजियल्लाहु अन्हु रोने लगे और अर्ज़ किया :- ऐ अल्लाह के रसूल ! आप पर मेरे मां-बाप क़ुर्बान ! मैं और मेरा सब माल तो आप ही का है _,”
हुजूर सल्लल्लाहू अलैही वसल्लम ने एक ऊंटनी ले ली ।
★_ बाज़ रिवायात में आता है कि और हुजूर सल्लल्लाहू अलेही वसल्लम ने ऊंटनी की क़ीमत दी थी । उस ऊंटनी का नाम क़सवा था । यह आप सल्लल्लाहु अलेही वसल्लम की वफात तक आपके पास हीं रही , हजरत अबू बकर सिद्दीक रजियल्लाहु अन्हु की खिलाफत मे उसकी मौत वाक़े हुई ।
★_ सैयदा आयशा सिद्दीका रजियल्लाहु अन्हा फरमाती हैं कि हमने उन दोनों ऊंटनियों को जल्दी-जल्दी सफर के लिए तैयार किया ,चमड़े की एक थैली में खाने-पीने का सामान रख दिया। हजरत समा रज़ियल्लाहु अन्हा ने अपनी चादर फाड़कर उसके एक हिस्से से नाश्ते की थैली बांध दी दूसरे हिस्से से उन्होंने पानी के बर्तन का मुंह बंद कर दिया । इस पर आन’हजरत सल्लल्लाहु अलेही वसल्लम ने इरशाद फरमाया :- अल्लाह ताला तुम्हारी इस ओढ़नी के बदले जन्नत में दो ओढनियां देगा ।
★_ओढ़नी को फाड़ कर दो करने के अमल की बुनियाद पर हजरत असमा रज़ियल्लाहु अन्हा को जातुल नताक़ीन का लक़ब मिला, यानी दो ओढ़नी वाली। याद रखें कि नताक़ उस दुपट्टे को कहा जाता है जिसे अरब की औरतें काम के दौरान कमर के गिर्द बांध लेती है।
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