अहले बैत अतहार की मुहब्बत वाजिब है


अल्लाह तआला हमारा खालिक व मालिक है जिसने हमें अशरफुल मख़लूकात बनाया और हुजूर सल्लल्लाहु अलैह वसल्लम की उम्मत में पैदा फरमाया और हमें दीने इस्लाम अता किया जो कायनात की तमाम नेअमतों में सबसे अफ़ज़ल नेअमत है जिसने हमें बेशुमार नेअमतों बरकतों से नवाज़ा जिसने हम मुसलमानों के लिये जन्नत को आरास्ता किया जिसने हमारी दुन्यावी ज़रूरियात व हाजात की तकमील की और दुनियाँ में इन्सान की इब्दिता से इख़्तिताम तक और कब्र से कयामत तक और कयामत से दाखिले जन्नत तक हमें अल्लाह तआला की रहमत निहायत ज़रूरी है और अल्लाह तआला की रहमत के लिये उसकी इंतिहाई मुहब्बत ज़रूरी है।

और अल्लाह तआला की मुहब्बत हासिल करने के लिये उसके महबूब हुजूर सल्लल्लाहु अलैह वसल्लम की मुहब्बत ज़रूरी है जिनके ज़रिये हमें कुरान व सुन्नत और अहकामे शरीअत व राहे हिदायत मिली और जिनके तुफैल हमें दुनियाँ में बे शुमार नेअमतें मिलीं और इन्हीं के वसीले और शफाअत से अल्लाह तआला हमें जन्नत अता करेगा और हुजूर सल्लल्लाहु अलैह वसल्लम से मुहब्बत करना गोया अल्लाह तआला से मुहब्बत करना है और हुजूर सल्लल्लाहु अलैह वसल्लम की मुहब्बत के लिये अहले बैत से मुहब्बत ज़रूरी है और अहले बैत अतहार हुजूर सल्लल्लाहु अलैह वसल्लम की सुन्नतों व कमालात का ज़ाहिरी व बातिनी आइनादार बेहतरीन नमूना हैं औरकी कश्ती में सवार न हो सके और तूफाने नूह में ग़र्क होकर हलाक हो गये और जो लोग कश्ती में सवार हो गये थे वो निजात पा गये थे।

इसी तरह जिनके दिल अहले बैत अतहार की मुहब्बत से लबरेज़ हैं वो निजात पा जायेंगे और आख़िरत में अज्रे अज़ीम के मुस्तहिक और अल्लाह तआला की रहमत से बहरेयाब होंगे और जन्नत में दाखिल होंगे और जिनके दिल अहले बैत अतहार की मुहब्बत से खाली हैं उनके लिये हलाकत है और वो लोग अहले बैत अतहार से बुग्ज़ व कीना से बाइस नारे जहन्नुम में तूफ़ाने नूह की तरह ग़र्क हो जायेंगे और जहन्नुम के मुख्तलिफ अज़ाब में मुब्तिला किये जायेंगे ।

हर मामलात में एतदाल बेहतर शैः है लेकिन मुहब्बत के मामले एतदाल नहीं क्योंकि मुहब्बत की कोई हद नहीं होती अल्लाह तआला और उसके महबूब रहमते दो आलम सल्लल्लाहु अलैह वसल्लम और अहले बैत अतहार से हमें जिस कदर मुहब्बत होती है उस मिकदार से कई गुना ज़्यादा हमें उनकी कुरबत हासिल होती है मज़ीद हमारी बख़्शिश और अच्छे हश्र व अल्लाह तआला की रहमत व खुशनूदी का सबब बनती है और मुहब्बत व अकीदत पर ही ईमान की बुनियाद और बख़्शिश का इन्हिसार है यानी सही उल अकीदा और सच्ची मुहब्बत से ही हमारी मग़फिरत और अच्छे हश्र उम्मीद बनती है।

अल्लाह तआला हमारा खालिक व मालिक है जिसने हमें अशरफुल मख़लूकात बनाया और हुजूर सल्लल्लाहु अलैह वसल्लम की उम्मत में पैदा फरमाया और हमें दीने इस्लाम अता किया जो कायनात की तमाम नेअमतों में सबसे अफ़ज़ल नेअमत है जिसने हमें बेशुमार नेअमतों बरकतों से नवाज़ा जिसने हम मुसलमानों के लिये जन्नत को आरास्ता किया जिसने हमारी दुन्यावी ज़रूरियात व हाजात की तकमील की और दुनियाँ में इन्सान की इब्दिता से इख़्तिताम तक और कब्र से कयामत तक और कयामत से दाखिले जन्नत तक हमें अल्लाह तआला की रहमत निहायत ज़रूरी है और अल्लाह तआला की रहमत के लिये उसकी इंतिहाई मुहब्बत ज़रूरी है।

और अल्लाह तआला की मुहब्बत हासिल करने के लिये उसके महबूब हुजूर सल्लल्लाहु अलैह वसल्लम की मुहब्बत ज़रूरी है जिनके ज़रिये हमें कुरान व सुन्नत और अहकामे शरीअत व राहे हिदायत मिली और जिनके तुफैल हमें दुनियाँ में बे शुमार नेअमतें मिलीं और इन्हीं के वसीले और शफाअत से अल्लाह तआला हमें जन्नत अता करेगा और हुजूर सल्लल्लाहु अलैह वसल्लम से मुहब्बत करना गोया अल्लाह तआला से मुहब्बत करना है और हुजूर सल्लल्लाहु अलैह वसल्लम की मुहब्बत के लिये अहले बैत से मुहब्बत ज़रूरी है और अहले बैत अतहार हुजूर सल्लल्लाहु अलैह वसल्लम की सुन्नतों व कमालात का ज़ाहिरी व बातिनी आइनादार बेहतरीन नमूना हैं औरइस्लाम की बका के ज़ाहिरी मुहाफिज़ अहले बैत अतहार हैं जिनसे आज इस्लाम ज़िन्दा व ताबिन्दा है।



हज़रत मौला अली करमल्लाहु वजहुल करीम से रिवायत है सरकारे दो आलम सल्लल्लाहु अलैह वसल्लम ने फरमाया मेरी उम्मत में से उसके लिये मेरी शफाअत है जिसने मेरे अहले बैत से मुहब्बत की।
(तारीख बग़दाद-2/146)

हज़रत अब्दुल्ला बिन अब्बास (रजिअल्लाहु तआला अन्हु) से रिवायत है नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैह वसल्लम ने फ़रमाया- अल्लाह तआला से मुहब्बत करो कि वो तुम्हें नेअमतों से नवाज़ता है और अल्लाह तआला के लिये मुझसे मुहब्बत करो और मेरे सबब से मेरे अहले बैत से मुहब्बत करो।
(तिर्मिज़ी-2/737) (मुअजम कबीर- तबरानी-3/46)

हज़रत इब्ने अब्बास (रजिअल्लाहु तआला अन्हु) से रिवायत है सरवरे कायनात सल्लल्लाहु अलैह वसल्लम ने फरमाया- आदमी कयामत के दिन कब्र से उठकर इधर उधर हरकत न कर सकेगा जब तक उससे चार बातों का जवाब न ले लिया जाये उम्र के बारे में कि किस काम में गुज़ारी और जिस्म की ताकत के बारे में कि कहाँ खर्च की और माल के बारे में कि कहाँ खर्च किया और मेरे अहले बैत से मुहब्बत के
के बारे में। (मुअजम कबीर- तबरानी-11/83)
(मजमउज़्ज़वाइद-10/346)

हज़रत मौला अली मुर्तज़ा करमल्लाहु वजहुल करीम से रिवायत है नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैह वसल्लम ने
फ़रमाया कि अपनी औलाद को तीन बातें सिखाओ अपने नबी की मुहब्बत और अपने नबी के अहले बैत की मुहब्बत और कुरान पढ़ना तो बेशक कुरान के इल्म वाले कयामत के दिन जिस दिन अल्लाह तआला की रहमत के साये के सिवा कोई साया न होगा अल्लाह की रहमत के साये में ये लोग अम्बिया और नेक बन्दों के साथ होंगे। (कुंजुल उम्माल-16/456)

रसूले अकरम सल्लल्लाहु अलैह वसल्लम ने हज़रत मौला अली (रजिअल्लाहु तआला अन्हु) से फ़रमाया-ऐ अली बेशक अल्लाह तआला ने तुझे और तेरी औलाद को और तेरे घर वालों को और तेरे मददगारों को और तेरे चाहने वालों को बख़्श दिया है पस तुझे ये खुशखबरी मुबारक हो । (अल फिरदौस-5/329)

हज़रत अबूजर (रज़िअल्लाहु तआला अन्हु) ने काबे का दरवाज़ा पकड़े हुये फ़रमाया-कि मैंने हुजूर सल्लल्लाहु अलैह वसल्लम को फ़रमाते हुये सुना है कि तुममें मेरे अहले बैत की मिसाल नूह अलैहससलाम की कश्ती के मानिन्द है कि जो इसमें सवार हो गया वो निजात पा गया और जो पीछे रहा (यानी जो चढ़ न पाया) वो हलाक हो गया। (मिश्कात-3/264)

वज़ाहतः- अहले बैत को कश्ती-ए-नूह (अलैहस्सलाम) कहने का माना और मफहूम ये है कि वो लोग जो नूह (अलैहस्सलाम) के मुन्किर थे और अल्लाह व रसूल की नाफरमानी करते और कुफ़्फ़ व शरकशी में मुब्तिला रहते थे और उनमें से बाज़ ने नूह (अलैहस्सलाम) को बुग्ज़ व कीना के सबब मुख्तलिफ अज़ियतें पहुँचायीं थीं वो तमाम सरकश लोग हज़रत नूह (अलैहस्सलाम)की कश्ती में सवार न हो सके और तूफाने नूह में ग़र्क होकर हलाक हो गये और जो लोग कश्ती में सवार हो गये थे वो निजात पा गये थे।

इसी तरह जिनके दिल अहले बैत अतहार की मुहब्बत से लबरेज़ हैं वो निजात पा जायेंगे और आख़िरत में अज्रे अज़ीम के मुस्तहिक और अल्लाह तआला की रहमत से बहरेयाब होंगे और जन्नत में दाखिल होंगे और जिनके दिल अहले बैत अतहार की मुहब्बत से खाली हैं उनके लिये हलाकत है और वो लोग अहले बैत अतहार से बुग्ज़ व कीना से बाइस नारे जहन्नुम में तूफ़ाने नूह की तरह ग़र्क हो जायेंगे और जहन्नुम के मुख्तलिफ अज़ाब में मुब्तिला किये जायेंगे ।

हर मामलात में एतदाल बेहतर शैः है लेकिन मुहब्बत के मामले एतदाल नहीं क्योंकि मुहब्बत की कोई हद नहीं होती अल्लाह तआला और उसके महबूब रहमते दो आलम सल्लल्लाहु अलैह वसल्लम और अहले बैत अतहार से हमें जिस कदर मुहब्बत होती है उस मिकदार से कई गुना ज़्यादा हमें उनकी कुरबत हासिल होती है मज़ीद हमारी बख़्शिश और अच्छे हश्र व अल्लाह तआला की रहमत व खुशनूदी का सबब बनती है और मुहब्बत व अकीदत पर ही ईमान की बुनियाद और बख़्शिश का इन्हिसार है यानी सही उल अकीदा और सच्ची मुहब्बत से ही हमारी मग़फिरत और अच्छे हश्र उम्मीद बनती है।

हज़रत अब्बास बिन अब्दुल मुत्तलिब (रजिअल्लाहु तआला अन्हुम) ने हुजूर सल्लल्लाहु अलैहवसल्लम से शिकायत की कि कुरैश जब आपस में गुफ़्तगू कर रहे होते हैं और हम (इस दरमियान) जब उनसे मिलते तो वो गुफ़्तगू बन्द कर देते और ख़ामोश हो जाते तो आप सल्लल्लाहु अलैह वसल्लम ने फ़रमाया उस ज़ात की कसम जिसके कब्ज़े कुदरत में मेरी जान है कि किसी शख़्स के दिल में उस वक़्त तक ईमान दाखिल नही हो सकता जब तक कि अल्लाह तआला के लिये और मेरी कराबत की वजह से मेरे अहले बैत से मुहब्बत न करे।
(इब्ने माजा-1/80) (तिर्मिज़ी-2/727)

हज़रत इब्ने उमर (रज़िअल्लाहु तआला अन्हु) का बयान है कि हज़रत अबूबक्र सिद्दीक (रज़िअल्लाहु तआला अन्हु) फ़रमाते हैं कि रहमते दो आलम सल्लल्लाहु अलैह वसल्लम की रज़ा मन्दी और खुशनूदी अहले बैत की मुहब्बत में है।
(सही बुखारी-2/424,433)

नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैह ने फरमाया-कोई बन्दा उस वक़्त तक मोमिन नहीं हो सकता जब तक कि मैं उसके नज़दीक उसकी जान से ज़्यादा महबूब तर न हो जाऊँ और मेरे अहले बैत उसे उसके अहले खाना से ज़्यादा महबूब तर न हो जाँयें और मेरी औलाद उसे अपनी औलाद से ज़्यादा महबूब न हो जाये और मेरी ज़ात उसे अपनी ज़ात से ज्यादा महबूब तर हो जाये। (मुअजम कबीर- तबरानी-7/70) (शुअबुल ईमान-2/189) (मजमउज़्ज़वाइद-1/88)
(अल फिरदौस-5/154)

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