अर-रहीकुल मख़्तूम  पार्ट 87 मक्का की विजय पार्ट 06

मक्का में नबी सल्ल० का निवास और काम

मक्का में अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने 19 दिन निवास किया। उस बीच आप इस्लामी चिह्नों को नवीन करते रहे और लोगों को हिदायत व तक़्वा की रहनुमाई करते रहे। उन्हीं दिनों आपके हुक्म से हज़रत अबू उसैद खुज़ाई ने नए सिरे से हरम-सीमाओं के खम्बे गाड़े। आपने इस्लाम की दावत और मक्का के आस-पास बुतों को तोड़ने के लिए बहुत से सराया भी रवाना किए और इस तरह सारे बुत तोड़ डाले गए। आपके मुनादी ने मक्का में एलान किया कि जो व्यक्ति अल्लाह और आखिरत के दिन पर ईमान रखता हो, वह अपने घर में कोई बुत न छोड़े, बल्कि उसे तोड़ डाले।

सराया और मुहिमें

1. मक्का विजय से यकसू होने जाने के बाद अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने 25 रमज़ान सन् 08 हि० को हज़रत खालिद बिन वलीद की

1. देखिए मदारिकुत्तंज़ील, लेख नसफ़ी, तफ्सीर आयत बैअत 2. सहीह बुखारी मय फ़हुल बारी 7/175, 13/148, हदीस न० 3825

रहनुमाई में उज़्ज़ा को ढा देने के लिए एक सरीया रवाना फ़रमाया। उज्जा नखला में था। कुरैश और सारे बनू कनाना उसकी पूजा करते थे और यह उनका सबसे बड़ा बुत था । बनू शैबान उनके मुजाविर थे। हज़रत खालिद रज़ियल्लाहु अन्हु ने तीस सवारों के साथ नखला जाकर उसे ढा दिया। वापसी पर अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने मालूम किया कि तुमने कुछ देखा भी था ? हज़रत खालिद रजि० ने कहा, नहीं। आपने फ़रमाया, तब तो तुमने हक़ीक़त में उसे ढाया ही नहीं, फिर से जाओ और उसे ढा दो। हज़रत खालिद रज़ि० बिफरे और तलवार सौते हुए दोबारा तशरीफ़ ले गए। अब की बार उनकी ओर एक नंगी, काली, बिखरे बालों वाली औरत निकली। मुजाविर उसे चीख-चीख कर पुकारने लगा, लेकिन इतने में हज़रत खालिद ने इतने ज़ोर की तलवार मारी कि उस औरत के दो टुकड़े हो गए। इसके बाद वापस आकर अल्लाह के रसूल सल्ल० को ख़बर दी।


आपने फ़रमाया, हां, वही उज़्ज़ा थी। अब वह मायूस हो चुकी है कि तुम्हारे देश में कभी भी उसकी पूजा की जाएगी।

2. इसके बाद आपने अम्रे बिन आस रज़ि० को इसी महीने सुवाअ नामी बुत ढाने के लिए रवाना किया। यह मक्का से तीन मील की दूरी पर रबात में बनू हुज़ैल का एक बुत था । जब हज़रत अम्र रजि० वहां पहुंचे तो पुजारी ने पूछा, तुम क्या चाहते हो ?

उन्होंने कहा, मुझे अल्लाह के रसूल सल्ल० ने इसे ढाने का हुक्म दिया है।

उसने कहा, तुम उस पर क़ादिर नहीं हो सकते।

हज़रत अम्र ने कहा, क्यों ?

उसने कहा, (स्वाभाविक रूप से) रोक दिए जाओगे ।


हज़रत अम्र रज़ि० ने कहा, तुम अब तक असत्य पर हो ? तुम पर अफ़सोस, क्या यह सुनता या देखता है? इसके बाद बुत के पास जाकर उसे तोड़ डाला और अपने साथियों को हुक्म दिया कि वे उसके खज़ाने वाला मकान ढा दें, लेकिन उसमें कुछ न मिला। फिर पुजारी से फ़रमाया, कहो, कैसा रहा?

उसने कहा,

मैं अल्लाह के लिए इस्लाम ले आया।

3. इसी माह हज़रत साद बिन ज़ैद अशहली को बीस सवार देकर मनात की ओर रवाना किया गया। यह कुदैद के पास मुसल्लल में औस व खज़रज और ग़स्सान वग़ैरह का बुत था। जब हज़रत साद वहां पहुंचे तो उसके पुजारी ने उनसे कहा, तुम क्या चाहते हो ?

उन्होंने कहा, मनात को ढाना चाहता हूं।

उसने कहा, तुम जानो और तुम्हारा काम जाने । 1

हज़रत साद रज़ि० मनात की ओर बढ़े तो एक काली, नंगी, बिखरे सर वाली औरत निकली (वह अपना सीना पीट-पीटकर हाय-हाय कर रही थी ।

उससे पुजारी ने कहा, मनात ! अपने कुछ नाफ़रमानों को पकड़ ले, लेकिन इतने में हज़रत साद ने तलवार मारकर उसका काम तमाम कर दिया। फिर लपककर बुत ढा दिया और उसे तोड़-फोड़ डाला। खजाने में कुछ न मिला

4. उज़्ज़ा को ढाकर हज़रत खालिद बिन वलीद रजि० वापस आए, तो उन्हें अल्लाह के रसूल सल्ल० ने उसी माह रमज़ान सन् 08 हि० में बनू जज़ीमा के पास रवाना फ़रमाया, लेकिन मक्सूद हमला नहीं, बल्कि इस्लाम का प्रचार था । हज़रत खालिद रजि० मुहाजिरीन व अंसार और बनू सुलैम के साढ़े तीन सौ लोगों को लेकर रवाना हुए और बनू जुज़ैमा के पास पहुंचकर इस्लाम की दावत दी। उन्होंने ‘असलमना’ (हम इस्लाम लाए) के बजाए ‘सबाना, सबाना’ (हमने अपना दीन छोड़ा, हमने अपना दीन छोड़ा) कहा।

इस पर हज़रत खालिद रजि० ने उनका क़त्ल और उनकी गिरफ़्तारी शुरू कर दी और एक-एक क़ैदी अपने हर-हर साथी के हवाले किया। फिर एक दिन हुक्म दिया कि हर आदमी अपने क़ैदी को क़त्ल कर दे, लेकिन हज़रत इब्ने उमर रज़ि० और उनके साथियों ने इस हुक्म के पूरा करने से इंकार कर दिया और जब नबी सल्ल० के पास आए, तो आपसे उसका ज़िक्र किया। आपने अपने दोनों हाथ उठाए और दोबार फ़रमाया, ऐ अल्लाह ! खालिद ने जो कुछ किया, मैं उससे तेरी तरफ छूट अपनाता हूं।’

इस मौक़े पर सिर्फ़ बनू सुलैम के लोगों ने अपने क़ैदियों को क़त्ल किया था, अंसार व मुहाजिरीन ने क़त्ल नहीं किया था। अल्लाह के रसूल सल्ल० ने हज़रत अली रज़ि० को भेजकर उनके क़त्ल किए गए लोगों की दियत और उनके नुक्सानों का मुआवज़ा अदा फ़रमाया। इस मामले में हज़रत खालिद और हज़रत अब्दुर्रहमान बिन औफ़ रज़ि० के बीच कुछ सख्त कलामी और बुराई भी हो गई थी ।

इसकी ख़बर रसूलुल्लाह सल्ल० को हुई तो आपने फ़रमाया, खालिद ! ठहर जाओ मेरे साथियों को कुछ कहने से बाज़ रहो। खुदा की क़सम ! अगर उहुद

1. सहीह बुखारी 1/450, 2/622

पहाड़ सोना हो जाए और वह सारे का सारा तुम अल्लाह की राह में खर्च कर दो, तब भी मेरे साथियों में से किसी एक आदमी की एक सुबह की इबादत या एक शाम की इबादत को नहीं पहुंच सकते।’

यह है मक्का विजय की लड़ाई, यही वह निर्णायक लड़ाई और महान विजय है जिसने बुतपरस्ती की ताक़त पूरे तौर पर तोड़कर रख दी और उसका काम इस तरह तमाम कर दिया कि अरब प्रायद्वीप में उसके बाक़ी रहने की कोई गुंजाइश और जायज़ करने की कोई वजह बाक़ी न रह गई, क्योंकि आम क़बीले इस इन्तिज़ार में थे कि मुसलमानों और बुतपरस्तों में जो लड़ाई चल रही है, देखें उसका अंजाम क्या होता है ?

इन क़बीलों को यह बात भी अच्छी तरह मालूम थी कि हरम पर वही मुसल्लत हो सकता है, जो हक़ पर हो। उनके इस पक्के एतक़ाद में पक्कापन उस वक़्त और पैदा हो गया, जब आधी सदी पहले हाथी वाले अबरहा और उसके साथियों के वाक़िए से आ गया था, क्योंकि अरब वालों ने देख लिया था कि अबरहा और उसके साथियों ने बैतुल्लाह का रुख किया, तो अल्लाह ने उन्हें हलाक करके भुस बना दिया ।

याद रहे हुदैबिया इस महान विजय की प्रस्तावना था। इसकी वजह से अम्न व अमान का दौर-दौरा हो गया था। लोग खुलकर एक दूसरे से बातें करते थे । इस्लाम के बारे में विचार-विमर्श और वाद-विवाद किया करते थे ।

मक्का के जो लोग परदे के पीछे मुसलमान थे, उन्हें भी इस समझौते के बाद अपने दीन के ज़ाहिर करने, उसका प्रचार करने और उस पर वाद-विवाद करने का मौक़ा मिला। इन हालात के नतीजे में बहुत से लोग मुसलमान हो गए, यहां तक कि इस्लामी फ़ौज की जो तायदाद पिछली किसी लड़ाई में तीन हज़ार से ज़्यादा न हो सकी थी, इस मक्का विजय की लड़ाई में दस हज़ार तक जा पहुंची।

इस निर्णायक लड़ाई ने लोगों की आंखें खोल दीं और उन पर पड़ा हुआ वह आखिरी परदा हटा दिया जो इस्लाम कुबूल करने के रास्ते में रोक बना हुआ था। इस विजय के बाद पूरे अरब प्रायद्वीप के राजनीतिक और धार्मिक क्षितिज पर मुसलमानों का सूरज चमक रहा था और अब धार्मिक नेतृत्व और सांसारिक

1. इस ग़ज़वे का विवेचन निम्न स्रोतों से लिया गया है-

इब्ने हिशाम 2/389-437, सहीह बुखारी 1/किताबुल जिहाद और किताबुल मनासिक 2/612-615, 622, फत्हुल बारी 8/3-27 सहीह मुस्लिम 1/437, 438439, 2/102, 103, 130, ज़ादुल मआद 2/160-168, मुख्तसरुस्सीरः, शेख अब्दुल्लाह, पृ० 322-351

सरदारी की बागडोर उनके हाथ में आ चुकी थी।

मानो हुदैबिया समझौता के बाद मुसलमानों के हक़ में जो फ़ायदेमंद तब्दीली शुरू हुई थी, इस विजय से पूरी हो गई और इसके बाद एक दूसरा दौर शुरू हुआ जो पूरे तौर पर मुसलमानों के हक़ में था और जिसमें पूरी स्थिति मुसलमानों के क़ाबू में थी और अरब क़ौमों के सामने केवल एक ही रास्ता था कि वे प्रतिनिधिमंडलों की शक्ल में रसूलुल्लाह सल्ल० की खिदमत में हाज़िर होकर इस्लाम अपना लें और आपकी दावत लेकर पूरी दुनिया में फैल जाएं। अगले दो वर्षों में इसी की तैयारी की गई।

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