अर-रहीकुल मख़्तूम  पार्ट 81 पार्ट 02

इस्लामी फ़ौज ख़ैबर के दामन में

मुसलमानों ने आखिरी रात, जिसकी सुबह लड़ाई शुरू हुई, ख़ैबर के क़रीब गुज़ारी, लेकिन यहूदियों को कानों कान खबर न हुई ।
नबी सल्ल० का क़ायदा था कि जब रात के वक़्त किसी क़ौम के पोस पहुंचते, तो सुबह हुए बग़ैर उनके क़रीब न जाते। चुनांचे उस रात जब सुबह हुई तो आपने अंधेरे में फज्र की नमाज़ अदा फ़रमाई। इसके बाद मुसलमान सवार होकर ख़ैबर की ओर बढ़े। उधर ख़ैबर वाले बेख़बरी में अपने फावड़े और खांची वग़ैरह लेकर अपनी खेती-बाड़ी के लिए निकले, तो अचानक फ़ौज देखकर चीखते हुए शहर की ओर भागे कि अल्लाह की क़सम ! मुहम्मद फ़ौज समेत आ गए हैं। नबी सल्ल० ने (यह दृश्य देखकर) फ़रमाया, अल्लाहु अक्बर ! खैबर तबाह हुआ, अल्लाहु अक्बर, खैबर तबाह हुआ। जब हम किसी क़ौम के मैदान में उतर पड़ते हैं, तो इन डराए हुए लोगों की सुबह बुरी हो जाती है।’

3. साथ ही जब आप ख़ैबर के इतने क़रीब पहुंच गए कि शहर दिखाई पड़ने लगा, तो आपने फ़रमाया, ठहर जाओ। फ़ौज ठहर गई और आपने यह दुआ फ़रमाई-

‘ऐ अल्लाह ! सातों आसमान और जिन पर वे साया डाले हुए हैं, उनके पालनहार ! और सातों ज़मीन और जिनको वे उठाए हुए हैं, उनके पालनहार ! और शैतानों और जिनको उन्होंने गुमराह किया, उनके पालनहार ! हम तुझसे इस बस्ती की भलाई, इसके रहने वालों की भलाई और इसमें जो कुछ है, उसकी भलाई का सवाल करते हैं और इस बस्ती के शर से और इसके रहने वालों के शर से और इसमें जो कुछ है उसके शर से तेरी पनाह मांगते हैं।’

(इसके बाद फ़रमाया, चलो) अल्लाह के नाम से आगे बढ़ो 12

ख़ैबर के क़िले

ख़ैबर की आबादी दो मंडलों में बंटी हुई थी। एक मंडल में नीचे लिखे पांच क़िले थे-

1. हिस्ने नाइम, 2, हिस्न साब बिन मुआज़, 3. हिस्न क़िला जुबैर, 4. हिस्न उबई, 5. हिस्ने नज़ार ।

इनमें से पहले तीन क़िलों पर आधारित इलाक़ा नुज़रात कहलाता था और बाक़ी दो क़िलों पर आधारित इलाक़ा शक़ के नाम से मशहूर था।

ख़ैबर की आबादी का दूसरा मंडल कतीबा कहलाता था। इसमें सिर्फ़ तीन क़िले थे ।

1. सहीह बुखारी, बाब ग़ज़वा ख़ैबर 2/603, 604 2. इब्ने हिशाम 2/329

1. हिस्न क़मूस, (यह क़बीला बनू नज़ीर के खानदान अबुल हुक़ैक़ का क़िला था, 2. हिस्ने वतीह, 3. हिस्ने सलालिम ।

इन आठ क़िलों के अलावा खैबर में कुछ और क़िले और गढ़ियां भी थीं, पर वे छोटी थीं, और ताक़त और हिफ़ाज़त में इन क़िलों जैसी न थीं

जहां तक लड़ाई का ताल्लुक़ है, तो वह सिर्फ़ पहले मंडल में हुई। दूसरे मंडल के तीनों क़िले लड़ने वालों के ज़्यादा होने के बावजूद लड़ाई के बिना ही मुसलमानों के हवाले कर दिए गए।

नबी सल्ल० ने फ़ौज के पड़ाव के लिए एक जगह चुनी। इस पर हुबाब बिन मुंज़िर रज़ि० ने आकर अर्ज़ किया, ऐ अल्लाह के रसूल सल्ल० ! यह बताइए कि इस जगह अल्लाह ने आपको पड़ाव डालने का हुक्म दिया है या यह सिर्फ़ आपकी लड़ाई की कोई तदबीर और राय है?

आपने फ़रमाया, नहीं, यह सिर्फ़ एक राय और तदबीर है।

उन्होंने कहा, ऐ अल्लाह के रसूल सल्ल० ! यह जगह क़िला नज़ात से बहुत ही क़रीब है और ख़बर के सारे योद्धा इसी क़िले में हैं। उन्हें हमारे हालात का पूरा-पूरा पता रहेगा और हमें उनके हालात की खबर न होगी। उनके तीर हम तक पहुंच जाएंगे और हमारे तीर उन तक न पहुंच सकेंगे। हम उनकी छापमारी से भी न बचे रहेंगे, फिर यह जगह खजूरों के बीच में है, नीचे के हिस्से में है और यहां की धरती भी महामारी वाली है, इसलिए मुनासिब होगा कि आप किसी ऐसी जगह पड़ाव डालने का हुक्म फरमाएं, जो इन खतरों से खाली हों और हम उस जगह जाकर पड़ाव डालें।

अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया, तुमने जो राय दी, बिल्कुल दुरुस्त है। इसके बाद दूसरी जगह चले गए।

लड़ाई की तैयारी और विजय की शुभ-सूचना

जिस रात ख़ैबर की सीमाओं में अल्लाह के रसूल सल्ल० दाखिल हुए, फ़रमाया, मैं कल एक ऐसे आदमी को भेज दूंगा जो अल्लाह और उसके रसूल से मुहब्बत करता है और जिससे अल्लाह और उसके रसूल मुहब्बत करते हैं। सुबह हुई तो सहाबा किराम नबी सल्ल० की खिदमत में हाज़िर हुए। हर एक यही आरज़ू बांधे और आस लगाए खड़ा था कि झंडा उसे मिल जाएगा। अल्लाह के रसूल सल्ल० ने फ़रमाया, अली बिन अबी तालिब कहां है ?

सहाबा ने कहा, ऐ अल्लाह के रसूल ! उनकी तो आंख आई हुई है।’

1. इसी बीमारी की वजह से पहले पहल आप पीछे रह गए थे, फिर फ़ौज से जा मिले।

फ़रमाया, उन्हें लाओ बुला । वह लाए गए। अल्लाह के रसूल सल्ल० ने उनकी आंखों में होंठों का राल लगा दिया और दुआ फ़रमाई। वह स्वस्थ हो गये, मानो उन्हें तक्लीफ़ थी ही नहीं। फिर उन्हें झंडा अता फरमाया।

उन्होंने अर्ज़ किया, ऐ अल्लाह के रसूल! मैं उनसे उस वक़्त तक लडूं कि वे हमारे जैसे हो जाएं।

आपने फ़रमाया, इत्मीनान से जाओ, यहां तक कि उनके मैदान में उतरो, फिर उन्हें सलाम की दावत दो और इस्लाम में अल्लाह के जो हक़ उन पर वाजिब होते हैं, उनसे सचेत करो। खुदा की क़सम ! तुम्हारे ज़रिए अल्लाह एक आदमी को भी हिदायत दे दे, तो यह तुम्हारे लिए लाल ऊंटों से बेहतर है।’

लड़ाई की शुरूआत और क़िला नाइम की जीत

बहरहाल यहूदियों ने जब फ़ौज़ देखी तो सीधे शहर में भागे और अपने क़िलों में क़िलाबन्द हो गए और यह बिल्कुल स्वाभाविक था कि लड़ाई के लिए तैयार हो जाएं। मुसलमानों ने सबसे पहले नाइम क़िले पर हमला किया, क्योंकि यह किला अपनी स्थिति की नज़ाकत और रणनीति की दृष्टि से यहूदियों की पहली रक्षा पंक्ति की हैसियत रखता था और यही क़िला मरहब नामी शहज़ोर और जांबाज़ यहूदी का क़िला था, जिसे एक हज़ार मर्दों के बराबर जाना जाता था ।

हज़रत अली बिन अबी तालिब रज़ियल्लाहु अन्हु मुसलमानों की फ़ौज लेकर उस क़िले के सामने पहुंचे और यहूदियों को इस्लाम की दावत दी, तो उन्होंने यह दावत ठुकरा दी और अपने बादशाह मरहब की कमान में मुसलमानों के मुक़ाबले में आ खड़े हुए।

लड़ाई के मैदान में उतरकर पहले मरहब ने लड़ने की दावत दी, जिसकी दशा सलमा बिन अकवअ ने यों बयान की है कि जब हम लोग ख़ैबर पहुंचे तो उनका बादशाह मरहब अपनी तलवार लेकर घमंड में चूर इठलाता और यह कहता हुआ सामने आया—

ख़ैबर को मालूम है, मैं मरहब हूं, हथियारबन्द बहादुर और तजुर्बेकार, जब

1. सहीह बुखारी बाब ग़ज़वा खैबर 2/605, 606। कुछ रिवायतों से मालूम होता है कि ख़ैबर के एक क़िले की जीत में कई कोशिशों की नाकामी के बाद हज़रत अली को झंडा दिया गया था, लेकिन शोधकों के नज़दीक तर्जीह के क़ाबिल वही है जिसका ऊपर ज़िक्र किया गया।

लड़ाई की आग भड़क उठे ।

इसके मुक़ाबले में मेरे चचा आमिर सामने आए और फ़रमाया-

‘ख़ैबर जानता है मैं आमिर हूं, हथियारबन्द वीर और योद्धा ।’ फिर दोनों ने एक दूसरे पर वार किया। मरहब की तलवार मेरे चचा आमिर की ढाल में जा छिपी और आमिर ने उसे नीचे से मारना चाहा, लेकिन उसकी तलवार छोटी थी। उन्होंने यहूदी की पिंडली पर हमला किया तो तलवार का सिर पलटकर उनके घुटने पर आ लगा और आखिरकार उसी घाव से उनकी मौत हो गई। नबी सल्ल० ने अपनी दो उंगलियां इकट्ठा करके उनके बारे में फ़रमाया कि उनके लिए दोहरा बदला है। वह बड़े जांबाज़ मुजाहिद थे, कम ही उन जैसा कोई अरब भू-भाग पर चला होगा।

बहरहाल हज़रत आमिर के घायल होने के बाद मरहब के मुक़ाबले के लिए हज़रत अली तशरीफ़ ले गए। हज़रत सलमा बिन अकवअ का बयान है कि उस वक़्त हज़रत अली ने ये पद कहे-

‘मैं वह व्यक्ति हूं कि मेरी मां ने मेरा नाम हैदर (शेर) रखा है, जंगल के शेर की तरह भयावह । मैं उन्हें साअ के बदले नेज़े की नाप पूरी करूंगा।’ इसके बाद मरहब के सर पर ऐसी तलवार मारी कि वहीं ढेर हो गया। फिर हज़रत अली ही के हाथों जीत मिली 12

लड़ाई के दौरान हज़रत अली रज़ि० यहूदियों के क़रीब पहुंचे, तो एक यहूदी ने क़िले की चोटी से झांककर कहा, तुम कौन हो ?

हज़रत अली ने कहा, मैं अली बिन अबू तालिब हूं ।

यहूदियों ने कहा, उस किताब की क़सम जो मूसा पर उतारी गई, तुम बुलंद हुए। लोग

इसके बाद मरहब का भाई यासिर यह कहते हुए निकला कि कौन है जो मेरा मुक़ाबला करेगा। उसकी इस चुनौती पर हज़रत ज़ुबैर रज़ियल्लाहु अन्हु मैदान में उतरे। इस पर उनकी मां हज़रत सफ़िया रज़ि० ने कहा, ऐ अल्लाह के रसूल

1. सहीह मुस्लिम, बाब ग़ज़वा ख़ैबर 2/142, बाब ग़ज़वा जीक़िरद वग़ैरह 2/115, सहीह

बुखारी, बाब ग़ज़वा खैबर 2/602 2. मरहब के क़ातिल के बारे में स्रोतों में बड़ा मतभेद है और इसमें भी बड़ा मतभेद है। कि वह किस दिन मारा गया और किस दिन यह किला जीता गया। बुखारी व मुस्लिम की रिवायतों में किसी हद तक मतभेद पाया जाता है। हमने ऊपर जो कुछ बताया है, वह सहीह बुखारी की रिवायत को तर्जीह देने की वजह से है।
आपने फ़रमाया, बल्कि, तुम्हारा बेटा उसे क़त्ल करेगा। चुनांचे हज़रत ज़ुबैर ने यासिर को क़त्ल कर दिया।

इसके बाद हिस्ने नाइम के पास ज़ोरदार लड़ाई हुई, जिसमें कई बड़े यहूदी सरदार मारे गए और बाक़ी यहूदियों में मुक़ाबले की ताक़त न रही, चुनांचे वे मुसलमानों का हमला न रोक सके। कुछ सूत्रों से मालूम होता है कि यह लड़ाई कई दिन जारी रही और इसमें ज़बरदस्त मुक़ाबला करना पड़ा, फिर भी यहूदी मुसलमानों को हराने से निराश हो चुके थे, इसलिए चुपके चुपके इस क़िले से निकलकर क़िला साब में चले गए और मुसलमानों ने क़िला नाइम पर क़ब्ज़ा कर लिया।

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