माविया के कातिबे-वही नहीं हैं



✍️ माविया के चाहने वाले अक्सर माविया के कातिबे-वही होने पर इमाम बैहकी की किताब ‘दलाऐल उन नबुवत’ का हवाला पेश करते हैं जबकि आगे दिए गए लिंक पर यह बात साबित हो गया है कि बैहकी ने लफ्फ वही का इजाफा किया है..👇
https://youtu.be/iE766INrQek?si=RYYRtE2BLYe6nFPF
अगर माविया का कातिबे-वही होना दुरुस्त होता तो-
1) हमारे अहले सुन्नत वल जमाआत के मशहूर मुहद्दिस ‘हजरत शाह अब्दुल हक़ मुहददिस देहलवी रह०’ माविया के कातिबे-वही होने से इंकार नहीं करते बल्कि अब्दुल हक़ मुहददिस देहलवी ने ‘उसतुल लिमात फी सरह मिसकात शरीफ’ के सातवीं जिल्द के सफा नंबर 577 पर हदीस नंबर 5982 की सरह में ये ना लिखते कि ‘वही की किताबत साबित नही है।’
क्या हम या आप इन मुहददिस से ज्यादा हदीस के सेहत को जानते हैं.??
आप खुद भी देखें सफा 577 पर उर्दू तर्जुमा..  👇
https://archive.org/details/03_20200604/%D8%A7%D8%B4%D8%B9%DB%83%20%D8%A7%D9%84%D9%84%D9%85%D8%B9%D8%A7%D8%AA%20%D8%A7%D8%B1%D8%AF%D9%88%2007%20/page/n575/mode/1up?view=theater

इसके अलावा फारसी जुबान में इसी किताब की चौथी जिल्द में सफा नंबर 405 पर देखें 👇
https://archive.org/details/ashatul-lumat-fi-sharah-al-mishkat-vol-1/Ashatul%20Lumat%20fi%20Sharah%20al%20Mishkat%20Vol%204/page/n407/mode/1up?view=theater

2) इमाम मुस्लिम ने सही मुस्लिम शरीफ में फजाएल-ए-सहाबा में ‘फजाएल ए अबी सुफियान’ में हदीस (नंबर 6409) नकल किया है कि अबू सुफियान के ईमान लाने के बाद भी मुसलमान अबू सुफियान से नाखुश थे तो एक दिन अबू सुफियान ने नबी करीम सल्ल० से कहा कि आप मेरी तीन ख्वाहिश पूरा कर दें। पहला ये कि मेरी बेटी उम्मे हबीबा बहुत खूबसूरत है और आप मेरी बेटी से शादी कर लें और दूसरा ये कि मेरे बेटे को आप अपने लिए कातिब बना लें तीसरा ये कि आप हमें हुक्म दें कि मैं कुफ्फार से लड़ता रहूं जिस तरह पहले मुसलमानों से लड़ता था।
सही मुस्लिम में यह हदीस इस तरह से है👇
حَدَّثَنِي عَبَّاسُ بْنُ عَبْدِ الْعَظِيمِ الْعَنْبَرِيُّ وَأَحْمَدُ بْنُ جَعْفَرٍ الْمَعْقِرِيُّ قَالَا حَدَّثَنَا النَّضْرُ وَهُوَ ابْنُ مُحَمَّدٍ الْيَمَامِيُّ حَدَّثَنَا عِکْرِمَةُ حَدَّثَنَا أَبُو زُمَيْلٍ حَدَّثَنِي ابْنُ عَبَّاسٍ قَالَ کَانَ الْمُسْلِمُونَ لَا يَنْظُرُونَ إِلَی أَبِي سُفْيَانَ وَلَا يُقَاعِدُونَهُ فَقَالَ لِلنَّبِيِّ صَلَّی اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ يَا نَبِيَّ اللَّهِ ثَلَاثٌ أَعْطِنِيهِنَّ قَالَ نَعَمْ قَالَ عِنْدِي أَحْسَنُ الْعَرَبِ وَأَجْمَلُهُ أُمُّ حَبِيبَةَ بِنْتُ أَبِي سُفْيَانَ أُزَوِّجُکَهَا قَالَ نَعَمْ قَالَ وَمُعَاوِيَةُ تَجْعَلُهُ کَاتِبًا بَيْنَ يَدَيْکَ قَالَ نَعَمْ قَالَ وَتُؤَمِّرُنِي حَتَّی أُقَاتِلَ الْکُفَّارَ کَمَا کُنْتُ أُقَاتِلُ الْمُسْلِمِينَ قَالَ نَعَمْ قَالَ أَبُو زُمَيْلٍ وَلَوْلَا أَنَّهُ طَلَبَ ذَلِکَ مِنْ النَّبِيِّ صَلَّی اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ مَا أَعْطَاهُ ذَلِکَ لِأَنَّهُ لَمْ يَکُنْ يُسْأَلُ شَيْئًا إِلَّا قَالَ نَعَمْ.
पहली बात इसमें लफ्ज कातिबन [کَاتِبًا] आया है ना कि इसके बाद लफ्ज़ वही है, दूसरी बात सही मुस्लिम शरीफ की सबसे बड़ी और सबसे मशहूर सरह इमाम नूवी की है और इमाम नूवी ने इस हदीस की सरह में इस हदीस को मौजू यानि गढ़ी हुई हदीस कहा है और मतन के लिहाज से भी यह हदीस बातिल है क्योंकि हजरत उम्मे हबीबा का निकाह नबी करीम सल्ल० के साथ फत्ह मक्का से पहले हो गया था जबकि अबू सुफियान ईमान भी ना लाया था।
आप खुद भी सही मुस्लिम सरह नूवी की जिल्द नंबर 16 में सफा नं 62 और 63 देखें👇
https://archive.org/details/alhelawy05/shsm16/page/n62/mode/1up?view=theater

3) इमाम शमशुद्दीन ज़हबी ने मीजान उल ऐतेदलाल की पांचवी जिल्द में सफा नंबर 136 पर ‘अकरमा बिन अम्मार’ के हालात में सही मुस्लिम की इसी हदीस को नकल करते हुए इस हदीस को मुन्किर हदीस करार दिया है, आप खुद भी सफा 136 पर देखें 👇
https://archive.org/details/MeezanUlAitedalUrdu/Meezan-ul-Aitedal-Urdu-Vol-5/page/n136/mode/1up?view=theater