
हुआ कि सारा प्रचार कमज़ोर और भोले-भाले मुसलमानों के अन्दर इतना प्रभावी आखिरकार कुरआन मजीद में इसके बारे में स्पष्ट आयतें उतरीं, जिनमें छिपे सन्देहों की बीमारी का पूरा-पूरा इलाज था। इस प्रकार के फैलाव का अन्दाज़ा इससे किया जा सकता है कि सूरः अहज़ाब का आरंभ ही इस आयत से हुआ—
‘ऐ नबी सल्ल० ! अल्लाह से डरो और काफ़िरों और मुनाफ़िक़ों से न दबो, बेशक अल्लाह जानने वाला हिक्मत वाला है।’ (33: 1)
यह मुनाफ़िक़ों की हरकतों और कार्रवाइयों की ओर एक उचटता-सा इशारा और उनकी एक छोटी-सी रूपरेखा है। नबी सल्ल० ये सारी हरकतें सब्र नम और मुरव्वत के साथ सहन कर रहे थे, कयोंकि उन्हें तजुर्बा था कि मुनाफ़िक़ क़ुदरत की ओर से रह-रहकर रुसवा किए जाते रहेंगे, चुनांचे इर्शाद है—
‘वे देखते नहीं कि उन्हें हर साल एक बार या दो बार फ़िने में डाला जाता है, फिर न तो वे तौबा करते हैं और न नसीहत पकड़ते हैं।’ (9:126)
ग़ज़वा बनू मुस्तलिक़ में मुनाफ़िक़ों की भूमिका
जब ग़ज़वा बनू मुस्तलिक़ पेश आया और मुनाफ़िक़ भी उसमें शरीक हुए, तो उन्होंने ठीक वही किया जो अल्लाह ने इस आयत में फ़रमाया है— “अगर वे तुम्हारे अन्दर निकलते, तो तुम्हें और ज़्यादा बिगाड़ ही से दोचार करते और फ़िने की खोज में तुम्हारे अन्दर दौड़-भाग करते ।’ (9:47)
चुनांचे इस ग़ज़वे में उन्हें भड़ास निकालने के दो अवसर मिले, जिससे फ़ायदा उठाकर उन्होंने मुसलमानों की सफ़ों में खाली बेचैनी और बिखराव पैदा कर दिया और नबी सल्ल० के खिलाफ़ सबसे गन्दा प्रचार किया। इन दोनों मौक़ों का कुछ विवेचन इस तरह है-
1. मदीना से सबसे ज़्यादा ज़लील आदमी को निकालने की बात
अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ग़ज़वा बनू मुस्तलिक़ से फ़ारिस होकर अभी मरीसीअ सोते पर ठहरे ही थे कि कुछ लोग पानी लेने गए। उन्हीं में हज़त उमर बिन खत्ताब रज़ियल्लाहु अन्हु का एक मज़दूर भी था, जिसका नाम जहजाह ग़िफ़ारी था। पानी पर एक और व्यक्ति सनान बिन वब्र जोहनी से उसकी धक्कम-धक्का हो गई और दोनों लड़ पड़े, फिर जोहनी ने पुकारा-
‘ऐ अंसार के लोगो ! मदद को पहुंचो।’
और जहजाह ने आवाज़ दी, ‘ऐ मुहाजिरो ! मदद को आओ।’
अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम (ख़बर पाते ही वहां तश्रीफ़
ले गए और फ़रमाया मैं तुम्हारे अन्दर मौजूद हूं और जाहिलियत की पुकार पुकारी जा रही है ? इसे छोड़ दो, यह बदबूदार है।
इस घटना की ख़बर अब्दुल्लाह बिन उबई बिन सलूल को हुई, तो गुस्से से भडक उठा, और बोला, क्या इन लोगों ने ऐसी हरकत की है ? ये हमारे इलाक़े में आकर अब हमारे ही विरोधी और दुश्मन बन गए हैं। ख़ुदा की क़सम, हमारी और उनकी हालत पर वही कहावत सही उतरती है, जो पहलों ने कही हैं कि अपने कुत्तों को पाल-पोसकर मोटा-ताज़ा करो, ताकि वह तुमको फाड़ खाए। सुनो, खुदा की क़सम ! अगर हम मदीना वापस हुए, तो हममें का सबसे इज़्ज़तदार आदमी सबसे ज़लील आदमी को निकाल बाहर करेगा, फिर हाज़िर लोगों की तरफ़ तवज्जोह करके बोला-
‘यह मुसीबत तुमने खुद मोल ली है। तुमने इन्हें अपने शहर में उतारा और अपने माल बांट कर दिए। देखो, तुम्हारे हाथों में जो कुछ है अगर उसे देना बन्द कर दो, तो ये तुम्हारा शहर छोड़कर कहीं और चलते बनेंगे।’
उस वक़्त मज्लिस में एक नवजवान सहाबी हज़रत ज़ैद बिन अरक़म भी मौजूद थे। उन्होंने आकर अपने चचा को पूरी बात कह सुनाई। उनके चचा ने अल्लाह के रसूल सल्ल० को खबर दी।
उस वक़्त हज़रत उमर रज़ि० भी मौजूद थे, बोले, हुज़ूर सल्ल० ! अब्बास बिन बिन से कहिए कि उसे क़त्ल कर दें।
आपने फ़रमाया, उमर ! यह कैसे मुनासिब रहेगा, लोग कहेंगे कि मुहम्मद अपने साथियों को क़त्ल कर रहा है। नहीं, बल्कि तुम कूच का एलान कर दो।
यह ऐसा वक़्त था जिसमें आप कूच नहीं फ़रमाया करते थे। लोग चल पड़े तो हज़रत उसैद बिन हुज़ैर रज़ि० खिदमत में हाज़िर हुए और सलाम करके अर्ज़ किया कि आज आपने बे-वक़्त कूच फ़रमाया है ।
आपने फ़रमाया, क्या तुम्हारे साहब (यानी इब्ने उबई) ने जो कुछ कहा है, तुम्हें उसकी ख़बर नहीं हुई ?
उन्होंने मालूम किया कि उसने क्या कहा है?
आपने फ़रमाया, उसका ख्याल है कि अगर वह मदीना वापस हुआ तो सबसे इज्ज़तदार आदमी सबसे ज़लील आदमी को मदीना से निकाल बाहर करेगा।
उन्होंने कहा, ऐ अल्लाह के रसूल सल्ल० ! आप अगर चाहें तो उसे मदीने से निकाल बाहर करें। ख़ुदा की क़सम ! वह ज़लील है और आप इज़्ज़तदार हैं। इसके बाद उन्होंने कहा, ऐ अल्लाह के रसूल सल्ल० ! उसके साथ नर्मी बरतिए, क्योंकि
ख़ुदा की क़सम ! अल्लाह आपको हमारे पास उस वक़्त ले आया, जब उसकी क़ौम उसकी ताजपोशी के लिए मूंगों का ताज तैयार कर रही थी। इसलिए अब वह समझता है कि आपने उससे उसकी बादशाही छीन ली है।
फिर आप शाम तक पूरा दिन और सुबह तक पूरी रात चलते रहे, बल्कि अगले दिन के आरंभिक समयों में इतनी देर तक सफ़र जारी रखा कि धूप से तक्लीफ़ होने लगी। इसके बाद उतरकर पड़ाव डाला गया तो लोग धरती पर देह रखते ही बेखबर सो गए। आपका मक्सद भी यही था कि लोगों को सुकून के साथ बैठकर गप लड़ाने का मौक़ा न मिले।
इधर अब्दुल्लाह बिन उबई को जब पता चला कि जैद बिन अरक़म ने भांड़ा फोड़ दिया है तो वह अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की सेवा में आया और अल्लाह की क़सम खाकर कहने लगा कि उसने जो बात आपको बताई है, वह बात मैंने नहीं कही है और न उसे ज़ुबान पर लाया हूं।
उस वक़्त वहां अंसार के जो लोग मौजूद थे, उन्होंने भी कहा, ऐ अल्लाह के रसूल सल्ल० ! अभी वह लड़का है, मुम्किन है उसे भ्रम हो गया हो और उस व्यक्ति ने जो कुछ कहा था, उसे ठीक-ठीक याद न रख सका हो। इसलिए आपने इब्ने उबई की बात सच मान ली ।
हज़रत ज़ैद का बयान है कि इस पर मुझे ऐसा दुख हुआ कि ऐसा दुख मुझे कभी न हुआ होगा। मुझे ऐसा सदमा पहुंचा कि मैं अपने घर में बैठा रहा, यहां तक कि अल्लाह ने सूरः मुनाफ़िक़ीन उतारी, जिसमें दोनों बातों का उल्लेख है-
‘ये मुनाफ़िक़ वही हैं जो कहते हैं कि जो लोग अल्लाह के रसूल के पास हैं, उन पर खर्च न करो, यहां तक कि वे चलते बनें ।’
‘और ये मुनाफ़िक़ कहते हैं कि अगर हम मदीना वापस हुए तो उससे इज़्ज़त वाला ज़िल्लत वाले को निकाल बाहर करेगा।’
हज़रत ज़ैद रज़ि० कहते हैं कि (इसके बाद) अल्लाह के रसूल सल्ल० ने मुझे बुलवाया, और ये आयतें पढ़कर सुनाई, फिर फ़रमाया, ‘अल्लाह ने तुम्हारी पुष्टि कर दी। “
इस मुनाफ़िक़ के बेटे, जिनका नाम अब्दुल्लाह ही था, इसके बिल्कुल विपरीत बहुत ही नेक और बेहतर सहाबा में से थे। उन्होंने अपने बाप से अलगाव अपना
1. देखिए सहीह बुखारी 1/499, 2/227, 228 229, सहीह मुस्लिम हदीस न० 2584, तिर्मिज़ी, हदीस न० 3312, इब्ने हिशाम 2/290, 291, 292
लिया और मदीना के दरवाज़े पर तलवार सौंत कर खड़े हो गए। जब उनका बाप अब्दुल्लाह बिन उबई वहां पहुंचा, तो उससे बोले, खुदा की कसम ! आप यहां से आगे नहीं बढ़ सकते, यहां तक कि अल्लाह के रसूल सल्ल० इजाज़त दे दें, क्योंकि हुजूर सल्ल० इज़्ज़त वाले हैं और आप ज़लील हैं।
इसके बाद जब नबी सल्ल० वहां तशरीफ़ लाए तो आपने उसको मदीना में दाखिल होने की इजाज़त दी और तब बेटे ने बाप का रास्ता छोड़ा।
अब्दुल्लाह बिन उबई के उन्हीं बेटे हज़रत अब्दुल्लाह ने आपसे यह भी अर्ज़ किया था कि ऐ अल्लाह के रसूल सल्ल० ! आप इसे क़त्ल करने का इरादा रखते हों, तो मुझे फ़रमाइए, खुदा की क़सम ! मैं उसका सर आपकी सेवा में हाजिर कर दूंगा।”
2. इफ़्क की घटना
इस ग़ज़वे की दूसरी महत्वपूर्ण घटना इफ्क की घटना है। इस घटना का सार यह है कि है .
अल्लाह के रसूल सल्ल० का चलन यह था कि सफ़र में जाते हुए पाक बीवियों के बीच कुरआ डालते, जिसका कुरआ निकल आता, उसे साथ ले जाते। इस ग़ज़वे में हज़रत आइशा रज़ि० का नाम निकला और आप उन्हें साथ ले गए।
* ग़ज़वे से वापसी में एक जगह पड़ाव डाला गया, हज़रत आइशा रज़ि० अपनी ज़रूरत के लिए गईं और अपनी बहन का हार, जिसे मांगकर ले गई थी, खो बैठीं । एहसास होते ही तुरन्त वहां वापस गईं, जहां हार ग़ायब हुआ था।
इसी बीच वे लोग आए जो आपका हौदज ऊंट पर लादा करते थे। उन्होंने समझा आप हौदज के भीतर मौजूद हैं, इसलिए उसे ऊंट पर लाद दिया और हौदज के हल्केपन पर न चौंके, क्योंकि हज़रत आइशा रज़ि० अभी नव उम्र थीं। बदन मोटा और बोझल न था। साथ ही यह बात भी थी कि कई आदमियों ने मिलकर हौदज उठाया था, इसलिए भी हल्केपन पर ताज्जुब न हुआ। अगर सिर्फ़ एक या दो आदमी उठाते, तो उन्हें ज़रूर महसूस हो जाता।
बहरहाल हज़रत आइशा रज़ि० हार ढूंढकर पड़ाव पर पहुंची, तो पूरी फ़ौज जा चुकी थी और मैदान खाली पड़ा था, न कोई पुकारने वाला था, न जवाब देनेवाला । वे इस ख्याल से वहीं बैठ गई कि लोग उन्हें न पाएंगे, तो पलटकर वहीं खोजने आएंगे, लेकिन अल्लाह की कुदरत हर जगह ग़ालिब है, वह अर्श से
1. इब्ने हिशाम, वही, मुख्तसरुस्सीरः, शेख अब्दुल्लाह, पृ० 277

