अजमेर शरीफ के गरदेज़ी सादात का एक मुख्तसर तार्रुफ

अजमेर शरीफ के गरदेज़ी सादात का एक मुख्तसर तार्रुफ
बा मौका ए 800 वा उर्स मुबारक हज़रत ख़्वाजा सैयद फखरुद्दीन गरदेज़ी चिश्ती र.अ.

अजमेर शरीफ के कादीम बाशिंदों में इस सैयद ओ सादात खानदाने गरदेज़ी का शुमार होता है इस खानदाने गरदेज़ी सादात को सैयद ज़ादगान साहिब ज़ादगान खादिम हुज़ूर ख़्वाजा गरीब नवाज़ र अ के नाम से मशहूर और मारूफ है
इस खानदान की तारीख बहुत क़ादीम ही नहीं बल्कि अहम है वैसे तो हिंदुस्तान में कई सादात खानदान वारिद हिन्द हुए मगर जिन में शीराजी, बुखारी, तिरमिज़ी, वगैरह हैं ज़िक्र करदा खानदान मुस्लिम हुकूमत के कयाम के बाद में आबाद हुए थे मगर ये गरदेज़ी सादात खानदान के मुरिस आला मुस्लिम हुकूमत के कयाम से पहले हज़रत ख़्वाजा सैयद मुईनुद्दीन हसन चिश्ती र अ के साथ तशरीफ लाए थे हिन्दुस्तान में कुछ सादात खानदान में से एक ऐसा सैयद खानदान है जो एक ही जगह आबाद हुए और आज भी एक ही जगह अपनी बिरादरी में रहते हैं

अजमेर शरीफ के गरदेज़ी सादात के मुरिस आला का नाम हजरत ख्वाजा सैयद फखरुद्दीन गरदेज़ी र अ है जिनकी पैदाइश 549 हिजरी में गरदेज़ के एक सैयद घराने में हुई। गरदेज़ अफगानिस्तान की कदीम विलायत है जो हिंदू कुश के पहाड़ों और रेगिस्तान से घिरा हुआ है। गरदेज़ के सादात में अक्सर काज़मी, जाफरी और ज़ैदी सादात हैं जो मुख्तलिफ ज़माने में वारीदे हिन्द हुए हैं और आज भी हिंदुस्तान मैं उन सादात घरानों कि औलाद बाक़ी है
हज़रत ख्वाजा सैयद फखरुद्दीन गरदेज़ी र अ के वालिद का नाम अहमद था जो सैयद हुसैन बिन हज़रत इमाम मूसा काज़िम अलैहिस्सलाम की औलाद यानी नसब से हुसैनी काज़मी सैयद थे
हजरत ख्वाजा सैयद फखरुद्दीन गरदेज़ी र अ कि जब 20 साल कि उम्र हुई यानी 569 हिजरी में हजरत ख्वाजा उस्मान हरूनी र.अ. से बेआत हुए और सिलसिले चिश्तिया में दाखिल हुए और हज़रत ख़्वाजा उस्मान हरुनी र अ कि खिदमत और तसव्वुफ और सुलूक के मराहिल तय कर रहे थे तरीक़त का ये उसूल है कि जो कुछ भी मुरीद पाता है वो अपने पीर कि खिदमत करने से पाता है जहां-जहां हजरत ख्वाजा उस्मान हरूनी र अ तशरीफ ले जाते वहां-वहां आप भी उनके साथ हम रकाब होते थे
जब हज़रत ख़्वाजा सैयद मुईनुद्दीन हसन चिश्ती र.अ. को जब उनके पीरो मुर्शीद ने रुखसत किया उस वक्त हज़रत ख़्वाजा सैयद फखरुद्दीन गरदेज़ी को भी साथ कर दिया और आप हज़रत ख़्वाजा सैयद मुईनुद्दीन हसन चिश्ती र अ की खिदमत में उसी वक्त से मसरूफ हो गए थे

हिंदुस्तान में जब मुस्लिम हुकूमत का कयाम हुआ उसके चंद साल पहले जब ख़्वाजा सैयद फखरुद्दीन गरदेज़ी र अ कि उम्र 40 साल थी यानी 589 हिजरी में अजमेर शरीफ ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती के काफिले के साथ तशरीफ लाये थे
जब हज़रत ख़्वाजा सैयद मुईनुद्दीन हसन चिश्ती अजमेर शरीफ पहुंचे उस वक्त आपने हजरत ख्वाजा सैयद फखरुद्दीन गरदेज़ी र अ को हुक्म दिया की अजमेर में मुस्तकिल कयाम के वास्ते जगह का इंतखाब करो लिहाजा आपने उसी जगह का इंतखाब किया जहां आज आपका मजार ए अक्दस है और गुंबद मुबारक वाके है
सूफिया के ताजकिरो कि किताबों के मुतआले से ये पाता चलता है कि
हजरत ख्वाजा सैयद फखरुद्दीन गरदेज़ी र.अ. को हज़रत ख़्वाजा सैयद मुईनुद्दीन हसन चिश्ती र अ की खिदमत से ये शरफ हासिल था और खुद यानी (ख़्वाजा गरीब नवाज़ र अ) ख़्वाजा सैयद फखरुद्दीन गरदेज़ी के लिए अपनी ज़ुबान मुबारक से फरमाते थे ‘फख्ररूना बे फखरुद्दीन’ तर्जुमा ‘मेरा यानी मुईनुद्दीन का फख्र, फखरुद्दीन है’ इस बात से ये अंदाज़ा लगाया जा सकता है की ख़्वाजा सैयद फखरुद्दीन गरदेज़ी र अ को कितना कुब्र और नजदीकी हासिल थी
वैसे तो हज़रत ख़्वाजा सैयद फखरुद्दीन गरदेज़ी र अ को हज़रत ख़्वाजा सैयद मुईनुद्दीन हसन चिश्ती र अ के खादिमे ख़ास होने का शरफ़ तो हासिल है ही इस के अलावा आपको ख़्वाजा गरीब नवाज़ रअ के हम नसब यानी हज़रत इमाम मूसा काज़िम अलैहिस्सलाम की औलाद,पीर भाई और ख़लीफा ए मिजाज़ होने का भी शरफ़ हासिल है
हज़रत ख़्वाजा फरीदुद्दिन गंज ए शकर र अ ने अपने पीरो मुर्शीद हज़रत ख़्वाजा कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी र अ से सुना कि खुद हज़रत ख़्वाजा कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी र अ फरमाते हैं कि मैं हज़रत ख़्वाजा सैयद मुईनुद्दीन हसन चिश्ती र अ की सोहबत में 20 साल रहा मैंने हमेशा आपके खादिम यानी हज़रत ख़्वाजा सैयद फखरुद्दीन गरदेज़ी र अ को क़रीब पाया जब भी लंगर खाने में रक्म की कमी होती आपके खादिम यानी ख़्वाजा सैयद फखरुद्दीन गरदेज़ी र अ तशरीफ लाते उस वक्त ख़्वाजा सैयद मुईनुद्दीन हसन चिश्ती र.अ. अपना मुसल्ला उठाते और कहते फखरुद्दीन आपके खादिम को कि जितनी रक्म की ज़रूरत आज और कल के लिए ज़रूरत हो उठा लो आप उनके कहने के मुताबिक़ मुसल्ले से रक्म लेते थे ये नज़दीकी हासिल थी आपको जिसका ज़िक्र हज़रत ख़्वाजा कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी रअ ने किया है

हज़रत ख़्वाजा सैयद मुईनुद्दीन हसन चिश्ती र.अ. के मुताहिल होने के बाद आपने ख़्वाजा सैयद फखरुद्दीन गरदेज़ी र.अ को भी मुताहिल होने का हुक्म फरमाया लिहाज़ा 610 हिजरी में आपने निकाह किया जिनका नाम मुरादी बीबी है( आपका मज़ार मुबारक गुंबद मुबारक के तोषे खाने में है) उनसे निकाह किया और उस निकाह की वजह से आपके तीन साहिबज़ादे तव्वलुद हुए जिनके नाम हसबे ज़ैल है
1.हजरत मौलाना सैयद मसूद र.अ.
2.हजरत सैयद बेह्लोल र.अ.
3.हजरत सैयद इब्राहिम र.अ.
(इन तीनो साहिबज़ादो की क़ब्र ए अनवार आज मौजूदा बेगमी दालान में हैं)

हज़रत ख़्वाजा सैयद फखरुद्दीन गरदेज़ी र.अ. ख़िदमत करने के साथ -साथ हज़रत ख़्वाजा सैयद मुईनुद्दीन हसन चिश्ती र.अ. के मल्फुज़ात को भी अपने क़लम से जो तसव्वुफ व सुलूक के असरार व रमुज़ कि हिकायतो और गुफ्तुगु को तहरीर कर लिया करते थे उन मल्फुज़ात में से एक मल्फुज़ा हसबे ज़ैल है
हाक़िकी तौबा गुनाहों को तर्क करना है और हर किस्म के बेहूदा और फुजूल अक्वाल और अफ़ाल को छोड़ना और नफ़्स को फजुलियत और माद्दी लज्ज़त्तो से आज़ाद करना हैं और हक के सिवा हर काम को छोड़ना है और नफ़्सानी बुराईयो और कुव्वाते नफ़्स को लाहोल वाला कुव्वाता इल्लह बिल्लाह कह कर छोड़ना है और गैर की तरफ़ (खुदा के अलावा)तवाज्जुह को खत्म करना है
इल्मी ला मकानी से इल्म हक ताआला और सिफात हक ताआला कि तरफ रुजू करना है और खुद को मेहबूब के सिवा किसी और तसव्वुर से आज़ाद करना है
नूर बख्श और मुशाहीदा हैरत और बका सियाना के गम से अपने हाल की हिफाज़त करना है
जो कोई भी तौबा के उन आला मदारिज पर फायीज़ हो जाए वो मेराज को पा लेता है

हज़रत ख़्वाजा सैयद फखरुद्दीन गरदेज़ी र.अ. का विसाल ख़्वाजा गरीब नवाज़ र.अ. के विसाल के10 साल बाद 26 रजब 642 हिजरी में 93 साल की उम्र में हुआ आपकी तदफीन भी ख़्वाजा गरीब नवाज़ र.अ. के मज़ार मुबारक के क़रीब हुई आज आपका मज़ार मुबारक गुंबद मुबारक के तोषे खाने में है
हज़रत ख़्वाजा सैयद फखरुद्दीन गरदेज़ी र.अ. के विसाल के बाद आपकी औलादों ने ख़्वाजा गरीब नवाज़ के मज़ार मुबारक की खिदमत और देख रेख करी और अपनी झोपड़िया दरगाह शरीफ के अहाते के क़रीब बनाई जो आज पक्के मकानों की सूरत इख्तियार कर चुकी है
तकरीबन 900 सालो से ये गरदेज़ी सादात खानदान की औलाद ए पाक बा खूबी मौरुसी हैसियत से खिदमत कर रही है और जो जायरीन आते है उनकी रहनुमाई करती है और उनको तमाम मरासिम ए ज़ियारत के साथ ज़ियारत कराती है
हर वक्त के बादशाह उमरा सलातीन उलेमा सूफिया माशाईख और अवाम उन नास उनकी इज्ज़त और अज़मत करती है

अजमेर शरीफ के गरदेज़ी सादात खानदान के पास बादशाहो के शाही फरामीन,अस्नाद,वकालत नामे और दीगर दस्तावेज़ आज भी मौजूद हैं जिस में उनको तक्वा शियार, सालेह आसार, माशीखत माब, आले नबी, सादात ए अज़ीम, साहिबजादा, वगैरह के अकलाब से याद किया है, और पूरे हिन्दुस्तान में एक खानदान के पास शाही दस्तावेज़ इस कद्र ना होंगे जितने इस गरदेज़ी सादात खानदान के पास हैं
अजमेर शरीफ के गरदेज़ी सादात खानदान दीन ए इस्लाम की तरवीज के लिए काफी कोशिशें करी है काफ़ी कुर्बानियां दी हैं और ख़्वाजा गरीब नवाज़ र.अ. की सवानेह हयात, तलीमत, करामात और मल्फुज़ात को अवाम उन नास तक हमेशा पहुंचाने की कोशिश करी है और आज भी कोशा हैं

अजमेर शरीफ से हिन्दुस्तान की आज़ादी के लिए और 1947 में अजमेर शरीफ से कांग्रेस की सोच को आगे बढ़ाया और टू नेशन नज़रिये की मुखालिफ रहे जिसकी वज़ह से आज भी एक जगह मुताहिद हैं । इस गरदेज़ी सादात खानदान में हर ज़माने मे उलेमा शोअरा मुहकिक गुज़रे हैं और आज के ज़माने में आला तालीम याफता और आला औहदो पर भी फायेज़ हैं

✍🏻 मुसन्निफ
सैयद आतिफ हुसैन काज़मी चिश्ती
अजमेर शरीफ

Hazrat Shaykh Syed Daniyal urf Syed Daan Sahib

Hazrat Shaykh Syed Daniyal urf Syed Daan Sahib

Aap ek mumtaz buzurg Khuddam Sahibzadgaan Jamat main hue hain, jinki Azmat ka sabab unka Taqwa parhezgari Khashiyat e ilahi tha, aur isi bina par apne zamane ke Mashaikh e Uzzam se bhi Mumtaz the.

Hazrat ki urfiyat Daan thi aur shahi farameen wa asnad main Syed Daan naam tehrir hai ek taqseem nama badshah Shahjahan ke zamane aapki jayedad ki taqseem ke mutaliq meri nazar se guzar chuka hai

Hazrat Shaykh Syed Daniyal urf Syed Daan Sahib ka Shijra e Nasab 7 Wasto se Khwaja Syed Fakhruddin Gardezi R.A se Ja Milta hai.

Aapka Shijra e Nasab is tarah hai Shaykh Syed Daniyal urf Syed Daan bin Dawood bin Syed Hussain bin Syed Ishaq bin Syed Yakub bin Syed Idrees bin Syed Mehbub Ahmad bin Khwaja Syed Behlol bin Khwaja Syed Fakhruddin Gardezi Chishty (Rehamat ullah alaihim)

Hazrat Shaykh Syed Daniyal Urf Syed Daan Sahib ka Zikr Akbar badshah ke zamane se talluq rakhne wali ki 5 kitabe aur badshah Jahangir ki autobiography ( khud navishta Sawneh) Tuzk e Jahangiri main bhi hai
Tuzuk e jahangiri main jahangir badshah apne bhai ka Zikr aur hazrat Shaykh Daniyal Sahib ka Zikr kiya hai

Jis tarah hazrat Shaykh Salim chishti ke ghar main badshah Jahangir paida hua tha hazrat Shaykh Salim chishti ki naam ki nisbat wa barkat ki wajah se Jahangir ka Naam salim rakha tha (note Badshah Jahangir ka original naam ‘Salim’ hai aur Jahangir Takht e Badshahi naam hai )

Theek isi tarah Hazrat Shaykh Daniyal urf Syed Daan Sahib ke ghar main badshah Akbar ka ek aur beta paida hua hazrat ke ghar main badshah apni begam ko chor gaya tha kyuki badshah Akbar ko hukumati kaam ki wajeh se ajmer se jana parha to badshah ne apni begam jinka zachki(pregnancy) ka zamana Kareeb tha to sabse mehfuz jagah par Hazrat ke Daulat kade par begum ko rakha gaya jab badshah wapis Ajmer lauta to Hazrat Shaykh Syed Daniyal urf Syed Daan Sahib ki nisbat par apne is nau maulud(newly born) bete ka Hazrat ki naam ki barkat ki wajah se Daniyal naam rakha

“Aur Akbar ke zamane ki kitabo main Hazrat Shaykh Syed Daniyal urf Syed Daan Sahib ko apni zahiri salahiyat aur taqwe ki buniyad par apne waqt ke mashaikh e uzaam se bhi mumtaz likha hai “

Mazeed is tarah bhi Ahad e Akbari ki kitabo main likha hai ki

“Aap ki peshani se Salahiyat ka noor Chamakta tha”
” Aap taqwa yani parehzgari ki buniyad par apne waqt ke Mashaikh se mumtaz the “

Hazrat ka Mazar Astane Sharif ke Payti Taraf bahar ke hisse main jo chota Mazar hai wo Hazrat Shaykh Syed Daniyal urf Syed Daan Sahib ka Mazar hai

Ye bhi ek haqiqat hai ki jo qurb bahasiyat Khadim Khwaja Sahib hone ki wajah se aapko Khwaja sahib R.A se tha aur taqwa aur parehzgari se aap apne waqt ke Shaykh bhi the lijaza in dono wajuhat ki bina par aapki tadfeen ka amal Khwaja Sahib R.A ke Mazar ke Qareeb hua ye is baat ki nishan dehi karti hai jo Taqwa aur Khashiyat e Ilahi ke sabab aapko unsiyat thi, isi bina par aapko Khwaja Sahib ke mazar ke pass supurd e Khak kiya gaya tha ye azmat bhi bht kam ashkhas ko mayasser hui(Alhamdulillah)

Kuch log Kam ilmi ki buniyad par keh dete hain ki jo masuf ka mazar hai wo Mazar Badashah Abkar ke bête Daniyal ka mazar hai ye galat hai kyuki Shehzada Daniyal ka inteqal Deccan Burhanpur main hua hai.

Ye Mazar Hazrat ka hi hai jo Astane ke bahar Chota Mazar hai pehle is Mazar ke Charu taraf chote qad ki white Marble se boundary bhi thi
Kyuki qul Syedzadgaan Sahibzadgaan ke Shijra record main 350 saal tak koi naam Daniyal nahi hai ye sirf Hazrat mausuf hi hai jinka mazar hai jisko kuch logo ne galat samajh kar shehzda Daniyal ( badshah Akbar ke bete) ka mazar bataya hai

Aap ke daulat kade ko pehle “Daulat Kada e Daniyal” kha Jata tha ab usko Shahi Mahal Kha jata hai

Ye tamam Mahal Shahi Khuddam Sahibzadgaan Syedzadgaan ke Akbar Badshah ke zamane ke buzurg hain tamam Mahal Shahi Hazraat ka Shijra e nasab in se hi aage barhta hai Abkar ke daur ke baad

Aaj Mahal Shahi Hazraat sirf Shahi Mahal main hi nahi balqe Shahi Mahal ke bahar bhi, tadad barhne ki wajah se rehte hain un sab ka shijra e nasab bhi Akbar badshah ke zamane main in hi mumtaz buruzg se milta hai

Hazrat ke do Sahibzade the

1.Syed Abda

2. Syed Kamal

Syed Abda ki aulad ki tadad zayada hai aur is faqeer ka shijra e nasab bhi Syed Abda bin Shaykh Syed Daniyal urf Syed Daan Sahib se 14 wasto se milta hai

Hazrat ki auladon main kafi mumtaz buzurg bhi guzre hain jin main abhi sirf do Shakhsiyat jinka talluq badshah Shahjahan aur Aurangzeb 2 daum ke zamane se hai
1. Syed Abul Maali
Inko badshah ShahJahan ke zamane main Ulama wa Mashaikh ka auhada aur Shahi mehfil ki nashisht jo bichti hai aaj bhi us main badshah shahjahan ke zamane se Syed Abul Maali se jaari hua tha aaj us nashisht ko gadela kha jata hai us main aapki bhi ek nashisht thi Mutawwali Dargah ki nashisht ke pass lagti thi
Hazrat Syed Abul Maali ka shijra e nasab 3 wasto se hazrat Shaykh Syed Daniyal urf Syed Daan Sahib se ja milta hai
Ajmer shehar main urdu zuban ki ibteda main jo likhi hui gazal ka sabut milti hai wo inhi ki gazal ka hi milti hai is se pata chalta hai ki aap shayar bhi the aur urdu zuban ke alfaz ka istemal bhi kiya hai apni gazal main aur sakht hindi zuban ka istemal bhi kiya hai

2 . Maulvi Syed Akram Ali
Maulvi Akram Ali ek Alim buzurg the aur Syed Abul Maali Sahib ke parh pote hain Syed Abul Maali Sahib ki aulad main tawatur ke sath auhada e mudarris bhi tawatur ke sath chalata raha aur aur Dargah Sharif ke Madarsa main deeni taleem ki tadrees dete the aur us zamane main khuddam jamat ke mashur alim e Deen the aur unki mohar kuch shahi dastaweezat par bhi lagi hui hai
Baad main Alamgir (2)daum ke zamane main aapke walid Syed Hayatullah sahib ke inteqal ke baad aapko Dargah Sharif main Madasra main mudarris ki hasiyat se Abdullah khan sadar us sudoor ki jari karda shahi Sanad se muqarar kiya aur kuch Zameen jo inko apne dada Syed Wali Muhammad Sahib se ba Hasiyat e mudarris mili thi us main bhi izafa kiya gaya tha aapke dada Syed Wali Muhammad ke zamane main Jo Alamgir badshah ka zamana tha.
Aapki koi aulad nahi hui lihaza aap la walad guzre hain

Hadith Ali se momin hi Mohabbat karega

سیدنا علی کرم اﷲ وجھہ الکریم کا ذکرِ جمیل

٩۔ عَنْ عَلِيٍّ رَضِيَ اﷲ عَنْهُ قَالَ: لَقَدْ عَهِدَ إِلَيَّ النَّبِيُّ الْأُمِّيُّ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَآلِهِ وَسَلَّمَ أَنَّهُ لَا يُحِبُّکَ إِلاَّ مُؤْمِنٌ وَلَا يُبْغِضُکَ إِلاَّ مُنَافِقٌ. رَوَاهُ التِّرْمِذِيُّ، وَقَالَ: هٰذَا حَدِيْثٌ حَسَنٌ صَحِيْحٌ.

’’حضرت علی رضی اللہ عنہ سے مروی ہے کہ آپ نے بیان کیا: حضور نبی اکرم صلی اللہ علیہ وآلہ وسلم نے مجھ سے عہد فرمایا: (اے علی!) مومن ہی تجھ سے محبت کرے گا اور منافق ہی تجھ سے بغض رکھے گا۔‘‘

اس حدیث کو امام ترمذی نے روایت کیا اور فرمایا: یہ حدیث حسن صحیح ہے۔

  • “Ḥaz̤rat ʻAlī raḍiya Allāhu ‘anhu se marwī hai ki āp ne bayān kiyā: Ḥuz̤ūr Nabīye Akram ṣallá Allāhu ‘alayhi wa-Ālihi wa-sallam ne mujh se ʻehd farmāyā: (ae ʻAlī!) momin hī tujh se maḥabbat karegā aur munāfiq hī tujh se buġhz̤ rakhkhegā.” Is ḥadīs̲ ko imām Tirmiḏẖī ne riwāyat kiyā aur farmāyā: yeh ḥadīs̲ ḥasan ṣaḥīḥ hai.
    [Aḳhrajah al-Tirmiḏẖī fī al-Sunan, kitāb al-manāqib, bāb manāqib ʻAlī bin Abī Ṭālib raḍiya Allāhu ‘anhu, 05/643, al-raqm: 3736,

Ṭāhir al-Qādrī fī Ḥusnu al-maʻāb fī Ḏh̲ikri Abī Turāb karrama Allāhu waj·hahu al-Karīm,/19, al-raqm: 09.]

Hadith (मुस्लिम,जि.1,सफा:1440,ह.2682)

👉🏿मोमिन मरने की तमन्ना ना करे👈🏿

☪️हुजूर नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु अलयहे वसल्लम ने फरमाया:-

🔮”तुम मे से कोई मौत की तमन्ना ना करें ओर ना वक्त से पहले मरने की दुआ करें क्युकी जब कोई शख्स मर जाता हैं तो उसके आमाल का सिलसिला मुन्कता हो जाता हैं ओर मोमिन के लिए लम्बी उम्र भलाई है।”

(मुस्लिम,जि.1,सफा:1440,ह.2682)