ग़ीबत की बदबू अब क्यों नहीं आती!?

*📗ग़ीबत की बदबू अब क्यों नहीं आती!?📗*

*⚡️हज़रते जाबिर बिन अब्दुल्लाह अंसारी रज़ियल्लाहु अन्हु* से मरवी है चूंकि *हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम*. के अहदे मुबारक में गीबत बहुत कम की जाती थी इस लिए उस की बदबू आती थी मगर अब गीबत इतनी आम हो गई कि मशाम उस की बदबू के आदी हो गये हैं कि वह इसे महसूस ही नहीं कर सकते। इस की मिसाल ऐसी है जैसे कोई शख़्स चमड़े रंगने वालों के घर में दाख़िल हो तो वह उस की बदबू से एक लम्हा भी नहीं ठहर सकेगा। मगर वह लोग वहीं खाते पीते हैं और उन्हें बू महसूस ही नहीं होती क्यों कि उन के मशाम (नाक) इस क़िस्म की बू के आदी हो चुके हैं और यही हाल अब इस ग़ीबत की बदबू का है।
*हज़रते कअब रज़ियल्लाहु अन्हु* का कौल है, मैं ने किसी किताब में पढ़ा है। जो शख़्स ग़ीबत से तौबा कर के मरा वह जन्नत में सबसे आख़िर में दाख़िल होगा और जो ग़ीबत करते करते मर गया वह जहन्नम मे सब से पहले जाएगा। फ़रमाने इलाही है –
हर पीठ पीछे बुराईयां करने वाले और तेरी मौजूदगी में बुराईयां करने वाले के लिए जहन्नम का गढ़ा है।
यह आयत वलीद बिन मुगीरा के हक़ में नाज़िल हुई जो मुसलमानों के सामने *हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम* और मुसलमानों की बुराईयां किया करता था! इस आयत की शाने नुज़ूल तो ख़ास है मगर इसकी वईद आम है।

*गीबत ज़िना से भी बदतर है!*

*💫रसूले मकबूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम* इरशाद फ़रमाते हैं! कि अपने आप को ग़ीबत से बचाओ, यह ज़िना से भी ज़्यादा बुरी है। पूछा गया, यह ज़िना से कैसे बदतर है!? तो आपने फरमाया , आदमी ज़िना कर के तौबा कर लेता है तो *अल्लाह तआला* उस की तौबा क़बूल फरमाता है। मगर ग़ीबत करने वाले को जब तक वह शख़्स जिस की ग़ीबत की गई हो, माफ़ न करे, उस की तौबा क़बूल नहीं होती। लिहाज़ा हर ग़ीबत करने वाले के लिए ज़रूरी है कि वह *अल्लाह तआला* के हुज़ूर शर्मिन्दा हो कर तौबा करे ताकि अल्लाह के करम से कामयाब हो कर फिर उस शख़्स से माफी मांगे जिस की उस ने ग़ीबत की थी, ताकि गीबत के अंधियारों से रिहाई हासिल हो।

*✨फ़रमाने नबवी सल्लललाहु अलैहे वसल्लम* है कि जो अपने मुसलमान भाई की ग़ीबत करता है। *अल्लाह तआला* क़ियामत के दिन उस का मुँह पीछे की तरफ़ फेर देगा इस लिए हर ग़ीबत करने वाले पर लाज़िम है कि वह उस मज्लिस से उठने से पहले *अल्लाह तआला* से माफी मांग ले और जिस शख़्स की ग़ीबत की है उस तक बात पहुंचने से पहले ही रुज़ूअ कर ले। क्योंकि ग़ीबत के वहां तक पहुंचने से पहले जिस की ग़ीबत की गई हो, अगर तौबा कर ली जाये तो तौबा क़बूल हो जाती है, मगर जब बात उस शख़्स तक पहुंच जाये तो जब तक वह ख़ुद माफ़ न करे, तौबा से गुनाह माफ नहीं होता और इसी तरह शादी-शुदा औरत से ज़िना का मसला है, जब तक उस का शौहर माफ़ न करे, तौबा क़बूल नहीं होगी। रहा नमाज़ , रोज़ा, हज और ज़कात का मुआमला तो कज़ा, अदा किए बग़ैर इन की तौबा भी क़बूल नहीं होती। _*वल्लाहु अअलम*_
*📕मुकाशफ़तुल क़ुलूब बाब,20 सफ़हा143📕*

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