Our Prophet

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आप सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के अजदाद का ज़िक्र

शज्रामुबारक सुल्ताने कुल जहाँ इमामुल अम्बिया हज़रत मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम जनाब हज़रत मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम इब्न जनाब अब्दुल्लह इब्न जनाब अब्दुल मुत्तलिब इब्न जनाब हाशिम इब्न जनाब अब्दे मुनाफ़ इब्न जनाब क़ुस्सई इब्न जनाब कलाब इब्न जनाब मुर्र्ह इब्न जनाब क़अब इब्न जनाब लुवई इब्न जनाब ग़ालिब इब्न जनाब फ़हर उर्फ़ (क़ुरैश)

तफ़्सीलअल्लाह तआला ने हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम को दो बेटे दिये- हज़रत इस्माईल अलैहिस्सलाम और हज़रत इसहाक़ अलैहिस्सलाम! बहुक्मे ख़ुदा हज़रत इस्माईल अलैहिस्सलाम अरब के मशहूर शहर मक्का मे आकर आबाद हुए और उनकी औलाद वहां बढ़ती और फलती फूलती रही और धीरे धीरे उनकी औलादों ने बहुत से ख़ानदानों और क़बीलों की शक़्ल अख्तियार कर ली! इन्हीं क़बीलों में सब से इज़्ज़त और बुज़ुर्गी वाला क़बीला “क़ुरैश” था! क़ुरैश जनाब फ़हर का लक़ब था जो हुज़ूर सरवरे कायनात फख़्रे मौजूदात हज़रत मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के ग्यारवें जद् मोहतरम हैं!

फ़हर (क़ुरैश)- जनाब फ़हर को क़ुरैश कहने की वजहे तस्मिया ये है कि क़ुरैश लुग़द-ए-हिजाज़ मे व्हेल मछ्ली को कहते है जो समुंदर मे सबसे बड़ा और ताक़तवर जानवर होता है और क्योंकि फ़हर और औलादे फ़हर इज़्ज़त और अज़मत बुज़ुर्गी और बहादुरी के मामले मे तमाम क़बाएले अरब मे मुम्ताज़ थे इसलिए उनको क़ुरैश कहा जाने लगा!

तारीख़ इब्ने कसीर मे है कि इनके ज़माने मे हाकिमे यमन हस्सान ने मक्का पर चढ़ाई कर दी ताकि (माज़अल्लाह) ख़ाने काबा को गिरा दे और उसके मलबे को लेजाकर यमन मे ख़ाना काबा बनवाए! जनाब फ़हर ने अपने भाईयों और दीगर अहले-ख़ाना की क़यादत करते हुए जवाँमर्दी और दिलेरी से फ़ौज का मुक़ाबला किया और हस्सान को शिक़स्त देकर गिरफ़्तार कर लिया! तीन साल तक क़ैद रखने के बाद जनाब फ़हर ने हस्सान को आज़ाद कर दिया और वो यमन जाते हुऐ रास्ते में मर गया! इस वाक़या के बाद जनाब फ़हर की अज़मत और शौकत का सिक्का ख़ित्ता-ए-अरब मे क़ायम हो गया!

औलादे जनाब फ़हर (क़ुरैश)- इब्ने हिश्शाम बहवाला इब्ने इसहाक़ नक़्ल फ़रमाते है कि जनाब फ़हर के चार बेटे थे 1-ग़ालिब 2-मुहारिब 3-हारिस 4-असद और ये सब सैय्यदा लैला बिंत साद बिन हज़ील बिन मुदरका के बत्न से थे!

 

जनाब ग़ालिबहुज़ूर पुर नूर फ़ख्रे बनि आदम मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम जनाब ग़ालिब के नस्ल से थे इनकी कुन्नियत अबु तैएम थी इनके दो बेटे थे 1-तैएम 2-लुवई! हिश्शाम ने इनके एक और बेटे का ज़िक्र किया है जिनका नाम क़ैस था! जनाब ग़ालिब के ये सारे बेटे सैय्यदा सलमा बिंत कअब बिन अमरु के शिकम से थे!

 

जनाब लुवईइनकी कुन्नियत अबु कअब थी! मदारिजिन्नबूवत मे है कि लुवई लाई की तसग़ीर है जिसके माइने ख़ूब ऐशो इशरत से ज़िन्दगी गुज़ारना है! इब्ने इसहाक ने जनाब लुवई बिन ग़ालिब के चार बेटो का ज़िक़्र किया है यानी 1.क़अब 2.आमिर 3.सामअ और 4.औफ़

जिनमे जनाब क़अब आमिर और सामअ की वालिदा सैय्यदा मावेअ बिंत क़अब बिन अल कैस बिन जसर बनु ख़ज़ाअ से थी!

 

जनाब क़अबजनाब क़अब की कुन्नियत अबु हुसैस थी आप आठवें पुश्त मे हुज़ूर मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के जद् अमजद है! अरब मे इनकी इज़्ज़त और अज़मत का अंदाज़ा इस बात से बख़ूबी हो जाता है कि इनका सन् पैदाइश जारी हो गया था और ये सिलसिला तक़रीबन चार सदी तक यानी वाक़ेयाए असहाबे फ़ील तक जारी रहा! इब्ने ख़ल्दून, इब्ने हिश्शाम और इब्ने इसहाक ने जनाबे क़अब के तीन बेटे तहरीर किये है 1.जनाब मुर्रह 2.अदि 3.हुसैस और इनकी वालिदा का नाम सैय्यदा वहिशा बिंत शैयबान बिन मुहारिब बिन फ़हर दर्ज फ़रमाया है!

 

जनाब मुर्रहइनकी कुन्नियत अबु यक़ैज़ थी! ये वो पहले शख़्स है कि जिन्होंने यौमे-अशेब (यौमे जुमा का पहला नाम) मुक़र्रर किया ये उस दिन क़ुरैश को जमा करते और ख़ुत्बा देते थे! जनाब मुर्रह बिन क़अब लोगों को हुज़ूर पुर नूर मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की विलादत की ख़ुशख़बरी देते और फ़रमाते थे कि वो मेरे नस्ल से होंगे उनपर ईमान लाना और उनकी पैरवी करना बहुत ज़रूरी है! उन्होंने इस ज़मन मे बहुत से अशआर भी कहे है उनमे से एक ये है – ” ليتني شاهدن فهوا داوته اذا قریش تنفي الحق خذلانا

तर्जुमाऐ काश कि मै हाज़िर होता उनके इस दावत मे कि जब क़ुरैश अपनी पस्ती की वजह से हक़ का इनकार करेंगे !

जनाब मुर्रह बिन क़अब के तीन बेटे थे 1.जनाब हकीम उर्फ कलाब 2.तैम 3.यकज़

 

जनाब कलाबइनका नाम हकीम कुन्नियत अबु ज़हरा थी! इन्होंने बहुत से शिकारी कुत्ते पाल रखे थे इसलिए कलाब के उर्फ़ से मशहूर हुए! इनके दो बेटे थे 1.जनाब क़ुस्सई और 2.जनाब ज़हरा (जद् जनाब सैय्यदा आमिना ख़ातून)

 

जनाब क़ुस्सईइनका सही नाम ज़ैद था क़ुस्सई नाम का सबब साहिबे मदारिजिन्नबूवत ये नक़्ल फ़रमाते है कि जब उनकी विलादत हुई तो इनकी वालिदा फ़ातिमा बिंत सअद बिन सैल अपने क़बीले से बहुत दूर बिलादे क़ुस्साअ मे ठहरी थी क्यूंकि क़ुस्साअ के माईने बहुत दूर है इसलिये आपको क़ुस्सई कहा जाने लगा और ये भी कहा जाने लगा कि ज़ैद अभि आग़ोशे मादरी मे थे कि इनके वालिद का इन्तक़ाल हो गया! इनकी वालिदा ने दूसरा निकाह रबैय बिन ख़राम से कर लिया! ख़राम का क़बीला मुल्क शाम के सरहद पर रहता था इसलिए फ़ातिमा भी वहीं रहने लगीं और जनाब क़ुस्सई इसी क़बीले मे पल कर जवान हुएं! आलमे शबाब मे ये अपने भाई ज़हरा से मिलने आएं ज़हरा अगरचे नाबीना हो चुके थें मगर आवाज़ से अपने भाई को पहचान गएं! चूंकि आप दूर से चलकर आयें थे इसलिए भी आपको क़ुस्सई कहा जाने लगा था! क़ुस्सई जब अपने वतन मक्का मुकर्रमा वापस आए तो हुलैल खज़ाई हाकिमे मक्का ने अपनी बेटी जुब्बा का निकाह जनाब क़ुस्सई से कर दिया और जहेज़ मे काबातुल्लाह शरीफ़ की तवलियत अपनी बेटी जुब्बा को अता कर दिया और बेटी का वकील अबु-अब्शान को मुक़र्रर कर दिया! हुलैल के वफ़ात के बाद मामूली क़ीमत पर अबु-अब्शान ने हक़ वकालत क़ुस्सई के हाथ फ़रोख्त कर दिया नतीजतन जंग छिड़ गई बनु खज़ाअ ने इस फ़रोख्त को सही तस्लीम करने से इन्कार कर दिया! मक्के के गली कूचे ख़ून से नहा गए दोनों तरफ़ के अक़्लमन्द लोगों ने आतिशे जंग को बुझाने के लिये यामर बिन औफ़ को अपना सालिस तस्लीम कर लिया यामर बिन औफ़ ने फैसला सुनाया के बनु खज़ाअ के तमाम मक़तूलों का ख़ून बहा क़ुस्सई अदा करें जब कि बनु खज़ाअ मक्के की हुकूमत छोड़कर चले जाएं और आइंदा हुकूमत क़ुस्सई करें! इसके बाद बैतउल्लाह शरीफ़ उमूरे मक्का और अपनी क़ौम के घरों नेज़ मक्का मुकर्रमा के तमाम इन्तेज़ामी उमूर के सरपरस्त जनाब क़ुस्सई बन गएं दूसरे लफ्ज़ो मे जनाब क़ुस्सई पूरे मक्का के बादशाह बन गएं थे! चूंकि जनाब क़ुस्सई ने क़ुरैश को दोबारा जमा किया था और बहुत से ख़ूबियों के जामे थे इसलिए क़ुरैश ने इनका नाम मुजम्मा रख दिया! बनि क़अब मे जनाब क़ुस्सई पहले शख्स थे जिनको ऐसी शानदार हुकूमत हासिल हुई पूरी कौम ने इनकी इताअत की चुनांचे क़द्रो मंज़िलत के अज़ीम ओहदे मसलन हजाब (यानी ख़िदमत पर्दाह काबतउल्लाह) सिक़ाअ (यानी हाजियों को पानी पिलाने की ख़िदमत) रफ़ादह (यानी हाजियों की ज़ियाफ़त) नदवा (यानी मजलिसे शोरा या कमेटी घर) और लवा (यानी बवक़्ते जंग परचम बांधने की ख़िदमत) वग़ैरा सब के सब जनाब क़ुस्सई के पास थें! जनाब क़ुस्सई ने मक्का मुकर्रमा के इन्तेज़ामी उमूर को चार हिस्से मे तक़्सीम कर दिया और अपनी क़ौम और क़बीले मे बाट दिया और क़ुरैश के हर क़बीले को कद्र मंज़िलत दी! लोगों ने इनकी हुकूमत को निहायत मुबारक पाया और जनाब क़ुस्सई के मज़हबि अंदाज़ मे इज़्ज़त वा तौक़ीर क़ुरैश के क़ुलूब मे यूँ बैठ गई कि इनके किसी मर्द वा औरत की शादी के मुश्किल मामलात मे मशवरह इनके घर ही मे होता इन्होंने इस मक़सद के लिए एक बड़ा सा घर बना रखा था जिसका दरवाज़ा बैतउल्लाह शरीफ़ के तरफ़ खुलता था इसको ”दारुल नदवा” कहते थे! इसी जगह क़ुरैश की अदालत लगती और इसी जगह मशवरे किये जाते थे! क़ुरैश किसी जंग की तैयारी करते तो परचम जनाब क़ुस्सई के घर बांधा जाता था और परचम ख़ुद आप या आपका बेटा बांधता था! क़ुरैश जनाब क़ुस्सई को उनके ज़िन्दगी मे भी वाजिबुल इत्तिबा समझते थे और उनके वफ़ात के बाद भी उनके अक़वाल को मज़हबी अहकाम के तरह समझते थे और उनके ख़िलाफ़ हरगिज़ न किया जाता था!

 

औलादे जनाब क़ुस्सईजनाब क़ुस्सई के चार बेटे थे 1.अब्दे मुनाफ़ 2.अब्दुल्लाह 3.अब्दुल उज़्ज़ा 4.अब्दुल दार और दो बेटियां तख़मर और बर्रह थी! जनाब सैय्यदा ख़तीजतुल कुबरा का नसब भी अब्दुल उज़्ज़ा बिन क़ुस्सई से था!

 

जनाब अब्दे मुनाफ़जनाब क़ुस्सई के ज़िन्दगी मे ही जनाब अब्दे मुनाफ़ की इज़्ज़त वा अज़मत का शोहरा हो गया था! जनाब अब्दे मुनाफ़ इस क़दर हसीनो जमील थे कि इनको लक़ब क़मरुल बतहा यानी बतहा का चांद कहा जाने लगा! इनका सही नाम मुग़ैरह और कुन्नियत अबुल शम्स थी ये बड़े करीमुन्नफ़्स थे इनकी सख़ावत और हक़ शनासी का ज़माना मोतरिफ़ था! वो तंगदस्त और नादार लोगों के साथ बड़ी फ़य्याज़ी का सुलूक़ करते और फ़ैसला करने मे अदल और इंसाफ से काम लेते थे! अपने सरदारी के ज़माने मे क़ुरैश को भी इस बात की ताक़ीद करते रहते! जनाब अब्दे मुनाफ़ ने तीन शादिया किया था इनकी एक शादी सैय्यदा अल्क़ा अल कुबरा से हुई जो मुर्रह बिन हिलाल की बेटी थी इनके शिकम से जनाब हाशिम, मुत्तलिब, और अब्दुल शम्स तीन बेटे और आज़र, बर्रह, हिन्ना, हाला और कलाबा पांच बेटियां पैदा हुईं!

 

जनाब हाशिम बिन अब्दे मुनाफ़जनाब हाशिम का सही नाम अमरु था ये भी बहुत ख़ूबसूरत और साहिबे जाहो जलाल थे! इनका नाम अमरु के बजाए हाशिम मशहूर होने का सबब ये है कि एक मर्तबा ये तिजारत के लिए मुलके शाम गए हुए थे वहां इनको पता चला कि शहेर मक्का मे क़ैहेत पड़ गया है और लोग भूख से सख़्त परेशान हैं, वो तिजारति माल ख़रीदने के बजाए आटा और रोटियां ख़रीद कर ऊँटों पर लाद लाएं और मक्का मुकर्रमा पहुंच कर बहुत सा शोरबा तैयार करवाया और उन रोटियों को उसमे भिगो दिया (इस खाने को अहले अरब सरीद भी कहते है) इस काम से फ़ारिग़ होकर जनाब हाशिम ने मक्का मुकर्रमा मे ऐलान करवा दिया कि सब अहले शहेर आएं और खाना खाएं चुनांचे यह सिलसिला कई दिनों तक चलता रहा यहाँ तक कि इन्होंने सब कुछ अल्लाह तआला के राह मे अहले मक्का पर लुटा दिया! चूंकि जनाब हाशिम ने अपने हाथों से रोटियों को तोड़कर गोश्त के शोरबे मे डाला था इसलिए इन को हाशिम (यानी टुकड़े टुकड़े कर देने वाला) कहा जाने लगा और मक्का की सरदारी भी आपको मिली!

 

औलादे हाशिमजनाब हाशिम के चार बेटे थे- शैयबा इन्ही को अब्दुल मुत्तलिब कहा जाता है और ये हुज़ूर पुर नूर मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के दादा हैं! अबु सैफ़ी, फज़ला और असद (ये हज़रत अली रज़िअल्लाह तआला अन्हु के वालिदा हज़रत फ़ातिमा रज़िअल्लाह तआला अन्हा के वालिद है यानि हज़रत अली रज़िअल्लाह तआला अन्हु के नाना हैं) जब कि लड़कियों की तादाद पांच है यानी रुक़य्या, शिफ़ा, ज़ईफ़ा, हिना, ख़ाल्दा!

 

जनाब अब्दुल मुत्तलिबजनाब अब्दुल मुत्तलिब का सही नाम आमिर और लक़ब शैयबा था! शैयबा के माइने बूढ़े के है क्योंकि बवक़्ते पैदाइश इनके सर मे सफ़ेद बाल थे इसलिए इनको शैयबा कहा जाने लगा और इनका किरदार भी शानदार और क़ाबिले तारीफ़ था इसलिये इनको शैबतुल हम्द भी कहा जाता था! इनकी वालिदा बनु नज्जार की निहायत बवक़ार ख़ातून सैय्यदा सलमा बिंत अमरू थीं!

 

फज़ाएले अब्दुल मुत्तलिबहज़रत सैय्यदना अब्दुल मुत्तलिब के फज़ाएल मे अज़ीम तर फज़ीलत ये है कि वो हुजूर मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के जद् मोहतरम हैं और इन्होंने कमाल दर्जे की मोहब्बत और शफ़क़त हुजूर मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के साथ फ़रमाया! सीरत इब्ने हिश्शाम मे है कि जनाब मुत्तलिब की वफ़ात के बाद काबा की दरबानी और हाजियों को ज़म-ज़म का पानी पिलाने के ओहदे के साथ-साथ क़ौम के बाक़ी तमाम मामलात के इन्तेज़ामात भी अब्दुल मुत्तलिब ही किया करते थे! इन्हें क़ौम मे बुलन्द मर्तबा हसिल था अहले मक्का इनका बेहद एहतिराम करते थे और इनको सैय्यदे क़ुरैश कहा जाता था! साहिबे मदारिजन्नबूवत फ़रमाते है कि तमाम अहले मक्का इन के फ़रमाबर्दार हो गए और इनकी हद दर्जे ताज़ीम वा तकरीम करने लगे! हज़रत अब्दुल मुत्तलिब के जिस्म से मुश्क़ और अम्बर की खुशबू आती थी और जब भी अहले मक्का को कोई हादसा या परेशानी दरपेश होती तो वो इनको जब्ले सबीर पर ले जाते और इनके वसीले से बारगाहे रब्बुल इज़्ज़त मे दुआ करते तो उस नूरे मोहम्मदी सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के बरकत से जो इनके पेशानी मे ताबे थीं मुश्किलें आसान हो जाती!

 

औलादे अब्दुल मुत्तलिब बक़ौल इब्ने हिश्शाम हज़रत अब्दुल मुत्तलिब के पांच बीवियों से दस बेटे और छ: बेटियां पैदा हुई जिनमे हुजूर मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के वालिद जनाब अब्दुल्लाह और हज़रत अली रज़िअल्लाह तआला अन्हु के वालिद जनाब अबुतालिब हज़रत सैय्यदा फ़ातिमा बिन्त अमरू के बत्न अक़दस से थे!

 

जनाब अबु तालिब हज़रत अबु तालिब का नाम अब्दे मुनाफ़ था मगर असल नाम पर क़ुन्नियत ग़ालिब आ गई! इनको ताजदारे अरब वा अजम हुजूर मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम से कमाल दर्जे की मोहब्बत थी हज़रत सैय्यदना अब्दुल मुत्तलिब के बाद आप ही ने हुजूर मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की ख़िदमत का ज़िम्मा संभाला इसकी एक वजह ये भी है कि आप सरकार के सगे चचा है! मशहूर है कि हज़रत अबु तालिब अपने अहले ख़ा‌ना के साथ खाने के लिए दस्तरख़्वान पर बैठते तो उस वक़्त तक किसी को खाना खाने की इजाज़त ना देते कि जब तक इनके महबूब भतीजे हुजूर मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम दस्तरख़्वान पर जलवाअफरोज़ ना हो जाते थे! आप ने हुजूर मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के ऐलाने नबूवत से पहले और बाद जिस क़द्र जाँनिसारी मोहब्बत और क़ुरबानी का नमूना पेश फ़रमाया है क़यामत तक इसकी मिसाल नही मिल सकती!

 

औलादे अबु तालिब इनके चार बेटे 1.हज़रत तालिब 2.हज़रत अक़ील 3.हज़रत जाफ़रतैयार और 4.हज़रत सैय्यदना अली रज़िअल्लाहु तआला अन्हुमा हुए और बेटियां दो हुई 1.हज़रत सैय्यदा उम्मे हानी  2.हज़रत सैय्यदा जमाना ! और हज़रत अली रज़िअल्लाहु तआला अन्हु के वालिदा का नाम सैय्यदा फ़ातिमा बिन्ते असद था!

जनाब सैय्यदना अब्दुल्लाह रज़िअल्लाहु तआला अन्हु (वालिदे मोहतरम हज़रत मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम)– हज़रत सैय्यदना अब्दुल्लाह अपने वालिद सैय्यदना अब्दुल मुत्तलिब के बड़े लाडले बेटे थे! क्योंकि हामिल नूरे मोहम्मदी थे इसलिए हुसनो जमाल मे बेमिसाल थें इनका लक़ब ज़बीह था! इसकि वजह ये बयान किया जाता है कि जब अब्दुल मुत्तलिब ने ग़ैबी इशारा पाकर चाहे ज़म-ज़म खोदने का इरादा फ़रमाया तो क़ुरैश ने सख़्त मुख़ालफ़त किया और उन्होंने इनको सख़्त परेशान किया सबब इसका ये था कि चाह ज़म-ज़म के मक़ाम के पास दो बुत नस्ब थे जिनका नाम असाफ़ और नाएला था और क़ुरैश नही चाहते थे कि इनके बुतों के दर्मियान कुँवे को खोदा जाए, लेकिन हज़रत अब्दुल मुत्तलिब ने कुवां खोदना शुरु कर दिया (उस वक़्त उनके बेटे हारिस उनके साथ थे) उस वक़्त हज़रत अब्दुल मुत्तलिब ने जबकि ज़म-ज़म ज़ाहिर हो गया “नज़र” मानी की अगर अल्लाह तआला उनको दस बेटे अता फ़रमाए और वो सब जवान होकर उनके मददगार बने तो वो उनमे से एक को अल्लाह के राह मे क़ुरबान कर देंगे! एक शब हज़रत अब्दुल मुत्तलिब ख़ाना काबा के क़रीब सोए हुए थे कि इन्हे ग़ैब से सुनाई दिया कि ”ऐ अब्दुल मुत्तलिब अपनी नज़र को पूरा करो जो तूने रब्बे काबा से मानी थी, वो ख़्वाब से बेदार हुए और लरज़ने लगें उन्होंने फौरन एक दुम्बां क़ुरबान करवाकर खाना बनवाया और उसे फुक़रा और मसाकीन मे तक़्सीम कर दिया! इसके बाद फिर इन्हे ख़्वाब आया कि इससे बड़ी क़ुरबानी पेश करो तो उन्होंने गाय की क़ुरबानी दिया लेकिन फिर ख़्वाब मे हुक्म हुआ कि इससे बड़ी क़ुरबानी दो तो उन्होंने ऊँट क़ुरबान करवाकर फुक़रा मे तक़्सीम करवाया इसके बाद फिर साफ़ साफ़ बता दिया गया कि तुमने अपने फरज़न्दों मे से एक को क़ुरबान करने की मन्नत मांगी थी! इस ख़्वाब पर आप निहायत दर्जा ग़मगीन हो गए और तमाम फरज़न्दों को अपने ख़्वाब से आगाह फ़रमया तो तमाम फरज़न्दों ने एक ज़बान होकर कहा कि अगर आप हममे से किसी को क़ुरबान करना चाहते हैं तो हम तैयार हैं! हज़रत अब्दुल मुत्तलिब ने कहा कि तुम क़ुरआ अन्दाज़ी कर लो तो जिसका नाम आए उसको क़ुरबान करुंगा! जब क़ुरआ निकाला गया तो हज़रत अब्दुल्लाह का नाम आया अब्दुल्लाह निहायत हसीन जमील और बहादुर थे और हज़रत अब्दुल मुत्तलिब इनसे बहुत ज़्यादा मोहब्बत फ़रमाते थे लेकिन इसके बावजूद हज़रत अब्दुल मुत्तलिब उठे और हज़रत अब्दुल्लाह का हाथ पकड़ कर असाफ़ और नाएला के क़रीब ख़ाने काबा से मिले क़ुरैश के क़ुर्बानगाह मे ले आएं ये देखकर क़ुरैश अपनी मजलिसों से उठकर आपके पास आ गए और पूछा कि ”ऐ अब्दुल मुत्तलिब ये तुम क्या करने जा रहे हो? तब आपने पूरा वाक़ेआ उनपर वाज़ेह कर दिया! क़ुरैश ने कहा ख़ुदा तआला की क़सम ऐसा नही होगा जब तक आप मजबूर न हो जाएं इसको ज़िबाह न करे अगर आप ऐसा करेंगे तो फिर आपको देखकर हर शख़्स अपना बच्चा लाया करेगा और इस तरह नस्ले इन्सानी ख़त्म हो जाएगी! मुगैरह बिन अब्दुल्लह ने कहा अगर इसका फ़िदिया हमारे माल से है तो हम देने को तैयार है हुक्म फ़रमाएं (हज़रत अब्दुल्लाह की माँ जनाब सैय्यदा फ़ातिमा बिंत अमरू मुग़ैरह बिन अब्दुल्लाह के ख़ानदान से थीं) इसके बाद सब ने ये हल तज्वीज़ किया कि हिजाज़ मे एक अर्राफ़ा (यानी ग़ैब की बात बताने वाली) रहती है वह हालात सही सही बता देती है उसके पास चलकर इसका हल पूछते हैं! वो सब उसके पास गएं और उसने इसका हल ये बताया कि तुम अपने बेटे और दस ऊँटों को पास पास रखो और क़ुरआ करो अगर तुम्हारे बेटे का नाम क़ुरआ मे आया तो तुम दस दस ऊँटों को बढ़ाते जाओ और क़ुरआ उस वक़्त तक करते जाओ कि जब तक तुम्हारे बेटे के बजाए ऊँटों का नाम ना आ जाए और तुम्हारा रब राज़ी ना हो जाए! हज़रत अब्दुल मुत्तलिब ने यही किया और यहाँ तक ऊँटों की तादाद सौ हो गई और इस पर क़ुरआ ऊँटों पर आया तो सब ने रब का शुक्र अदा किया और उन ऊँटों को क़ुर्बान कर के गरीबों मे तक़्सीम किया गया!

 

हज़रत सैय्यदना अब्दुल्लाह और सैय्यदा आमिना का निकाहमक्का की बहुत सी नौजवान और ख़ूबसूरत लड़कियों और औरतों ने आप के हुस्न जमाल से मुतास्सिर होकर आप से शादी करने की बहुत कोशिश किया कुछ ने तो बहुत दौलत की पेशकश भी किया लेकिन आपने सब की पेशकश ठुकरा दिया! कुछ अहले किताब बाज़ निशानियों से पहचान गए थे कि नबी आख़िरुज़्ज़मां का वजूदे गिरामी हज़रत अबदुल्लाह के सुल्ब मे जलवागर है इसलिए वो इनको हलाक करने की नियत से मक्का मे आने लगे! एक दिन हज़रत अब्दुल्लाह जंगल मे किसी काम के गरज़ से तशरीफ़ लेगएं वहां मुल्के शाम के कुछ अहले किताब तल्वारों से आप पर हमलावर हो गए इत्तेफ़ाक़न हज़रत आमिना के वालिद वहब बिन मुनाफ़ भी जंगल मे मौजूद थे वो इन हमलावरों को देख कर फिक़्रमंद हो गए फिर उन्होंने देखा कि यका यक चंद सवार ग़ैब से नमुदार हुए और उनकी शकल सूरत आम इंसानो जैसी नही थी उन्होंने उन हमलावरों को मार भगाया! वहब बिन मुनाफ़ इस वाक़िये से बहुत मुतास्सिर हुए और उन्होंने ये सोच लिया कि मै अपनी लख़्ते जिगर आमिना का निकाह इनसे करूँगा! आपने अपने दोस्तों से ये पैग़ाम हज़रत अब्दुल मुत्तलिब के पास भिजवाया जनाब अब्दुल मुत्तलिब जब इस बात से आगाह हुए तो वो बहुत खुश हुए और इस रिश्ते को ख़ुशि-ख़ुशि तस्लीम कर लिया और हज़रत अब्दुल्लाह का निकाह हज़रत आमिना से हो गया!

फिर वो हुआ जिससे सारी कायनात का निज़ाम बदलने वाला था, जिससे तमाम आलम को रौनक़ मिलने वाली थी, जिससे ज़िन्दगी को शऊर मिलने वाला था, जिससे फूलो को ख़ुशबू और कलियों को तबस्सुम मिलने वाला था, जिससे बहार को ताज़गी मिलने वाली थी, जिससे हवा को मौज और दरिया को रवानगी मिलने वाली थी, जिससे मशअले तारीख़ को एक नई रौशनी मिलने वाली थी, गोया पूरे कायनात को वो सब कुछ मिलने वाला था जो इससे क़ब्ल नही मिला था! वो नूर इस दुनिया मे जलवागर होने वाला था कि जिसकी दुआ इब्राहीम अलैहिस्स्लाम ने किया था, कि जिसकी बशारत ईसा अलैहिस्सलाम ने दिया था, कि जिसे जनाब सैय्यदा आमिना ख़ातून ने ख़्वाब मे देखा था!  दुआए ख़लील बशारते मसीहा हुआ आमिना के पहलू से हुवैदा

 

हुज़ूर पुर नूर सरवरे कायनात जनाब मोहम्मदे अरबी सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम –यूँ तो किसी क़लम मे ये क़ूवत नही कि जो आप सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की सीरत मुत्ताहिरा पर कुछ बयान करे, क्योंकि आप की सीरत मुत्ताहिरा का शाहिद तो पूरा क़ुरआन मजीद है! लेकिन आपके शाने करीमा का बयान हर अहम किताब के लिये बाईसे फख्र है तो मुसन्निफ यहाँ आपसे मुत्तालिक़ उन पहलुओं  पर रौशनी डालेगा जो इस किताब के लिये बहुत ज़रूरी है!

 

हमारे पैग़म्बर हुज़ूर पाक सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम 12 रबिउल अव्वल सन् 571 ईसवी को मक्का मे पैदा हुए ! आप रूहे ज़मीं के सबसे आला और बुज़ुर्ग ख़ानदान बनि हाशिम मे जलवागर हुए कि जैसा की अहदीसे मुबारिका से साबित है- हज़रत अबु हुरैरा रज़िअल्लाह अन्हु से मरवी है कि हुज़ूर पुर नूर सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया- मै हर ज़माने मे बनि आदम के अफज़ल लोग़ों मे मुन्तक़िल किया गया यहाँ तक कि मुझे उन मे मुन्तक़िल किया गया कि जिसमे मै हुआ हूँ!

सही मुस्लिम मे है कि हुज़ूर रहमते आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने इरशाद फरमाया हक़ तआला ने औलादे इस्माईल अलैहिस्सलाम से कनाना को बर्गुज़ीदा फ़रमाया कनाना से क़ुरैश को क़ुरैश से बनि हाशिम को और बनि हाशिम से मुझको बर्गुज़ीदा फ़रमाया!

और एक हदीसे पाक मे है कि अल्लाह तआला ने अपने तमाम मख़लूक़ से इन्तख़ाब फ़रमाया तो औलादे आदम को बर्गुज़ीदा किया फिर बनि आदम से अरब को और फिर अरब से मुझे बर्गुज़ीदा किया, खूब ग़ौर से सुन लो जो अरब से मुहब्बत रखता है तो वो मुझसे मुहब्बत रखने कि वजह से और जो अरब से दुश्मनी रखता है तो मुझसे दुश्मनी रखने कि वजह से (मदारिजिंनबूवत)

हज़रत सैय्यदा आऐशा सिद्दिक़ा रज़िअल्लाह तआला अन्हा ने हुज़ूर पाक से जिब्रील अलैहिस्सलाम का क़ौल सुना कि जिब्रील अमीन ने हुज़ूर पुर नूर सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम से फ़रमाया कि मैने मशारिक़ से मग़ारिब को देखा है लेकिन किसी शख़्स को आप सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम से ज़्यादा अफ़ज़ल नही पाया और ना किसी औलाद को बनि हाशिम से अफ़ज़ल पाया है!

हज़रत अनस रज़िअल्लाह तआला अन्हु से मरवी है कि हुज़ूर पुर नूर सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने आएते मुबारिक़ा तिलावत फ़रमाया –”لَقَدْ جَاءَكُمْ رَسُولٌ مِّنْ أَنفُسِكُمْ

 यानी फ़ा को ज़बर से पढ़ा और फ़रमाया मै नसब ससराल और हसब मे तुम सबसे नफ़ीस तरीन हूँ और मेरे आबओ अजदाद मे हज़रत आदम अलैहिस्सलाम तक कोई सफ़ाह नही बल्कि वो सब निकाह से हैं!

हज़रत अली करमअल्लाह तआला वजहुल करीम से मरवी है कि हुज़ूर पुर नूर सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया मेरे आबओ अजदाद निकाह से हैं सफ़ाहे जाहिलियत से नही हज़रत आदम अलैहिस्सलाम तक कोई इस बुराई के क़रीब तक न गया!

हज़रत इब्ने अब्बास रज़िअल्लाह तआला अन्हु आयते मुबारिका- وتا كلل باكا فسساجدين  की तफ़्सीर मे फ़रमाते है कि नूरे मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम हमेशा अस्लाबे तय्यबा से अरहामे ताहिरा की तरफ़ मुन्तक़िल होता रहा है यहाँ तक कि हज़रत सैय्यदा आमिना खातून रज़िअल्लाह तआला अन्हा के यहाँ आप कि विलादत बासआदत हो गई!

 

ज़िक्र विलादत मुबारकहज़रत आमिना खातून रज़िअल्लाह तआला अन्हा इरशाद फ़रमाती है कि हुज़ूर सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की विलादत बा सआदत के वक़्त मै घर मे अकेले थी हज़रत अब्दुल मुत्तलिब तवाफ़े काबा मे मसरूफ़ थे मैने लेटे-लेटे जो हि ऊपर को देखा तो देखा कोई बड़ी शय छ्त के रास्ते से घर मे आ रही है इससे मुझ पर हैबत छा गई फिर मुझे यूँ मालूम हुआ कि एक सफेद रंग के परिंदे ने अपने पर मेरे जिस्म पर मले हों जिससे वो खौफ़ जाता रहा फिर वो दूध की तरह कोई चीज़ मुझे पीने को दे गए जिससे मुझे मज़ीद सुकून और क़रार मिल गया फिर मैने दराज़ क़ामद और खूबसूरत औरतें देखा जो कि अब्दे मुनाफ़ की बेटियों से मिलती जुलती थी मेरे इर्द गिर्द जमा हो गयीं और मेरा हाल पूछने लगी मुझे बहुत ताज्जुब हुआ मैने उन से पूछा कि आप लोग कौन हैं और कहाँ से तशरीफ़ लायीं हैं उन्होंने फ़रमाया हम आसिया बिन्त मज़ाहिम (फ़िरऔन की बीवी जो हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम पर ईमान लायीं थी) व मरियम बिन्त इमरान (वालिदा माजिदा हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम) हैं और ये सब औरतें जन्नत की हूरें हैं! फिर मैने एक सफेद रंग की चादर देखी जिसे ज़मीन से लेकर आसमान तक आवेज़ा कर दिया गया! फिर मैने देखा कि मेरा कमरा बहुत खुशनुमा परिंदो से भर गया इनकी चोंच याक़ूत और पर ज़मुर्रद के तरह मालूम हो रहे थे फिर यकायक मेरे निगाहों के सामने से हिजाबात को उठा लिया गया और मैने ज़मीन के मशारिक व मग़ारिब को देख लिया फिर मैने देखा कि तीन झण्डे लहरा रहें है इनमे से एक मशरिक़ मे है और दूसरा मग़रिब मे जब की तीसरा ख़ाना काबा के छत पर नस्ब है बाद अज़ान बहुत सी औरतें मेरे इर्द गिर्द जमा हो गयीं इसी दौरान हुज़ूर पुर नूर सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की विलादत बा सआदत हुई! सैय्यदा आमिना रज़िअल्लाह तआला अन्हा फ़रमाती है कि विलादत के बाद आपने अपना सर सजदे मे रखा और अंगुश्ते मुक़द्दस आसमान के तरफ उठाई! विलादत बा सआदत के वक़्त आप सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के बदने मुक़द्दस पर कोई क़िस्म की आलाईश ना थी यूँ महसूस होता था कि अभी अभी ग़ुस्ल मुबारक फ़रमाया है जिस्म अनवर से निहायत पाकीज़ा और नफ़ीस तरीन ख़ुश्बू आ रही थी नाफ़ मुबारक कटी हुई थी और ख़त्ना किये हुए थे रूए अनवर चौधवी रात के चाँद के तरह रौशन और आँखे ख़ुदरती तौर पर सुर्मां लगी हुई थी दोनों शानों के दरमियान मोहरे नबूवत शरीफ़ा थी!

आपके विलादत बा सआदत के वक़्त हज़रत उस्मान बिन अबिलआस रज़िअल्लाह तआला अन्हु की वालिदा सैय्यदा आमिना ख़ातून के घर पर मौजूद थीं वो फ़रमाती है कि हुज़ूर सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के विलादत के वक़्त सितारे आसमान से ज़मीन के तरफ झुक गए इस वाक़िए से मै डर गई मुझे ऐसा महसूस हुआ कि ये हम पर गिर पड़ेंगे!

आपके विलादत के रोज़ बादशाहे ईरान कसरा के महेल मे एक बड़ा ज़लज़ला आया जिससे उसके महेल के चौदह कंगूरे गिर गए कसरा महेल के लरज़ने और कंगूरों के गिरने से ख़ौफ़ज़दा होगया हरचंद कि वो अपने ख़ौफ़ को छुपाता था लेकिन इतमिनान ख़ातिर जाता रहा! सुबह हुई तो तख़्त पर बैठते ही उसने अपने ख़ास वज़ीरों और दानाओं को हालते गुज़िश्ता से आगाह किया अभी उसकी बात तमाम ना हुई थी कि उसे आतिश कदा ईरान के बुझने की खबर मिल गई जो तक़रीबन एक हज़ार साल से मुसलसल जल रहा था!

चूँकि अहले फारस आतिश परस्त थे इसलिए उन्होंने इस आतिश कदा को कभी बुझने नही दिया इसलिए इसके अचानक बुझने से बादशाह मज़ीद ख़ौफ़ज़दा हो गया!

ख़रायती और अब्ने असाकिर अरवाह से रिवायत करते है कि क़ुरैश के कुछ अफ़राद जिनमे वरक़ा बिन नौफ़िल, ज़ैद बिन अमरू, उबैदउल्लाह हजश, और उस्मान बिन अल हुवैरस शामिल थे एक शब बुतख़ाना के तरफ़ आए तो देखा कि बड़ा बुत मुँह के बल गिरा पड़ा है इन लोगों ने बुत के इस हालत को मुनासिब न जाना और उसे सीधा कर दिया, लेकिन वो फिर धड़ाम से गिर पडा, इन्होने फिर सीधा किया, लेकिन तीसरी बार फिर गिर गया, तो उस्मान बिन हुवैरस बोला आज ज़रूर कोई न कोई अहम बात हुई है, और ये वही शब थी कि जिस शब के सुबह विलादत बा सआदत हुई, इस मौक़े पर उस्मान बिन हुवैरस ने कुछ अशआर कहे जिसका तर्जुमा ये है- ऐ सनम तेरे पास दूर दराज़ से सरदाराने अरब जमा है और तू उलटा गिरा है, बता तो क्या बात है, क्या तू खेल रहा है, अगर हमसे कोई गुनाह हुआ है, तो हम अपने ख़ता का इक़रार करते है, और आईन्दा ना करने का वाएदा करते है और अगर तू ज़लील व मग़लूब हो कर झुक गया है तो फिर आज से तू न बुतो का सरदार है और ना ही हमारा रब, ये कह कर बुत को फिर खड़ा कर दिया तो उसमे से आवाज़ आई – ये सनम तबाह हो गया उस नौ मौलूद के वजह से जिसके नूर से सारी दुनिया रौशन हो गई सारे सनम इसके आमद पर गिर पड़े और बादशाहों के दिल इसकी हैबत से कांपने लगे, नारे फारस बुझ गया जिसकी वजह से शाहे फारस ग़म से भर गया, काहिनो से उनके जिन भाग गए, अब उन्हे झूटी सच्ची कहानी सुनाने वाला ना रहा, ऐ क़ुस्सई की औलादों अपनी गुमराही से बाज़ आजाओ और इस्लाम के कुशादह दामन मे पनाह ले लो!

 

दूध पिलाने का शर्फ़हुज़ूर सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम को आठ औरतों ने दूध पिलाने का शर्फ़ हासिल किया है जिनमे उनकी वालिदा के अलावा ख़ौला बिंत मन्ज़र, उम्मे ऐमन, क़बीला अवा की तीन औरतों ने, हज़रत हलीमा सादिया और एक सादिया नामी दूसरी ख़ातून ने और अबु लहेब की लौंडी सूबिया शामिल हैं!

 

हज़रत अब्बास बिन अब्दुल मुत्तलिब का ख़्वाबहदीस पाक मे है कि अबु लहेब के मरने के बाद हज़रत अब्बास रज़िअल्लाह तआला अन्हु ने इसे ख़्वाब मे देखा तो पूछा- ‘ऐ दुश्मनाने खुदा और रसूल तेरा क्या हाल है, तो उसने कहा तुमसे जुदा होकर मुझे सुकून ना मिला, सख्त अज़ाब मे गिरफ्तार हूँ, अलबत्ता सूबिया को आज़ाद करते वक़्त जिस उंगली से इशारा किया था हर पीर के दिन उस उंगली से मीठा और ठंडा पानी मिल जाता है जिसकी वजह से इस दिन के अज़ाब मे तख़फ़ीफ़ महसूस करता हूँ (सोचने की बात है कि अबु लहब काफ़िर था और इसकी मज़म्मत क़ुरान मजीद मे नाज़िल हो चुकि है लेकिन हुज़ूर सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के मिलाद कि खुशी मे अपनी बांदी सूबिया को दूध पिलाने के ख़ातिर आज़ाद कर दिया तो हुज़ूर सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के तरफ़ से हक़ तआला ने इसे इसका बदला इनायत फ़रमा दिया, अब मेरा उन भाईयों से सवाल है जो ये कहते है कि मिलाद मनाना बिदअत है (अल्लाह उन्हे हिदायत दे) तो मुझको ये जवाब दें कि जब एक काफ़िर को जिसने अपने ज़िन्दगी मे ख़ुदा और रसूल की बेहुर्मती किया लेकिन महबूब सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के मिलाद की खुशी मे अपनी लौंडी को आज़ाद कर देने के सबब अल्लाह ने उसको इतना अज्र अता किया, तो जो ईमान के साथ हुज़ूर सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की मोहब्बत मे मुब्तिला है और जो अपने आक़ा की ख़ुशनूदी के लिए वो सब करता है जिसे आप बिदअत का नाम दे देते हैं तो उनको क़ब्र और हश्र मे कितना बड़ा अज्र हासिल होगा इसका अन्दाज़ा ईमान वाले बख़ूबी लगा सकते हैं) अल्लाह तआला हम सबको इबलीस के मक्र फ़रेब से महफूज़ रखे आमीन!

 

आप सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के हालातो वाक़्यात आप सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की उम्र शरीफ़ जब छ: बरस की हुई तो आपकी वालिदा माजिदा सैय्यदा आमिना खातून रज़िअल्लाह तआला अन्हा का विसाल हो गया और आप सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की कफ़ालत व ख़िदमतगुज़ारी कि ज़िम्मेदारी हज़रत अब्दुल मुत्तलिब ने बतरीक़े हसन पूरी फ़रमाई, और जब आप सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने आठ बरस की उम्र मे क़दम रखा तो आपके दादाजान इस जहाने फ़ानी से रुख़सत हो गएं, तब आपके ख़िदमत की ज़िम्मेदारी जनाब अबु तालिब ने बख़ूबी सरअन्जाम दिया!

 

जब हुज़ूर पुर नूर मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे  वसल्लम ने ज़िन्दगी के बारह बरस तय फरमाए तो हज़रत अबुतालिब के साथ मुल्के शाम के तरफ़ बग़र्ज़ तिजारत रवाना हुएं, बसरह के क़रीब नसारा के जय्यद आलिमे दीन बहेरह राहिब से मुलाक़ात हुई, बहेरह दीने समावीय के बहुत बड़े आलिम और साहिबे तक़वा थे, चूंकि इन्होंने साबक़ा कितब समाविआ मे हुज़ूर पुर नूर सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की निशानियाँ और हालात बड़े तफ़सील के साथ पढ़ी थी तो वो इसलिये दीदार नबवी सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के हद दर्जे मुश्ताक़ थे, जब क़ाफ़ला क़ुरैश मे बहेरह राहिब ने रसूल अल्लाह सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम को देखा तो इन्होंने आपको उसी तरह पाया जिस तरह कि इन्होंने पहले आसमानी किताबों मे पढ़ा था! बहेरह राहिब ने हुज़ूर सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम को पहचान कर हद दर्जे एहतिराम किया, आप सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम का बोसा लिया और ईमान ले आयें, और अबु तालिब के ख़िदमत मे अर्ज़ किया कि वो हुज़ूर सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की ख़ूब हिफ़ाज़त करें क्योंकि ये नबी आखिरुज़्ज़मां हैं और इनका दीन साबक़ा तमाम अदयान का नासिख़ है, यहूदो नसारा इनके जानी दुश्मन है इसलिये इनको मुल्क शाम न ले जाया जाए, इस पर जनाब अबु तालिब ने अपना सारा सामान वहीं फ़रोख़्त किया और वापस मक्का मुकर्रमा आ गएं!

 

जब आप सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने पचीस बरस के उम्र मे क़दम रखा तो इनके ख़िदमत अक़दस मे मक्का की एक बवक़ार मुजस्समा इफ़्फ़त व तहारत ख़ातून हज़रत सैय्यदा ख़तीजा कुबरा रज़िअल्लाह तआला अन्हा ने पैग़ाम भेजा कि अगर आप मुनासिब ख़्याल फ़रमाएं तो उनका माले तिजारत मुल्क शाम के तरफ़ ले जाएं और जो मुनाफ़ा हासिल हो उससे जिस क़द्र चाहें खुद रखें और जिस क़द्र चाहें मुझे दे दें!

हुज़ूर पुर नूर सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने हज़रत ख़दीजा रज़िअल्लाह तआला अन्हा की इस पेशकश को अपने प्यारे चचा हज़रत अबु तालिब के मशवरे से क़बूल फ़रमा लिया, इसके बाद हज़रत ख़दीजा ने अपने ग़ुलाम मैसराह और ख़ुज़ैमा को आपके ख़िदमत के लिये आपके हमराह कर दिया, जब हुज़ूर सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम बसराह पहुंचे तो वहा एक कलीसा के नज़दीक़ एक दरख़्त के नीचे बैठ गए, ये दरख़्त पुराना और सूखा हुआ था लेकिन हुज़ूर सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के बरकत के वजह से वो दरख़्त यकायक सब्ज़ व शादाब हो गया और उसमे फल भी लग गए इर्द गिर्द भी सब्ज़ी फैल गई, ये देखकर उस कलीसा का नस्तूरा नामी राहिब एक किताब अपने हाथों मे लिए अपने कलीसा से बाहर निकला और मैसराह से पूछने लगा ये तुम्हारे साथ कौन है? मैसराह ने बताया ये शुर्फ़ा क़ुरैश और सादात बनु हाशिम से हैं, फिर नस्तूरा आप सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के ख़िदमत मे हाज़िर हुआ और कहने लगा मै आपको लात और उज़्ज़ा की क़सम देता हूँ कि बताएं आप कौन हैं और आपका नाम क्या है? हुज़ूर सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने फ़रमाया मेरे पास से दूर हो जाओ (यानी आप ने लात और उज़्ज़ा से सख़्त इज़हारे नफ़रत फ़रमाया) इसपर नस्तूरा ने अपने हाथ मे लिए हुए किताब को खोल कर पढ़ा और बोला मुझे उस ख़ुदा की कसम कि जिसने हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम पर अन्जील उतारा ये वही नबी आखिरूज़्ज़मां है जिनकी बशारत ईसा अलैहिस्सलाम ने दी! इसके बाद हुज़ूर सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने बसरह मे अपना माल फ़रोख़्त किया और ख़ूब नफ़ा हासिल हुआ आप हुज़ूर सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम कि ख़ैरो बरकत से क़ाफ़ले के दीगर अफ़राद भी मुस्तफैद हुएं! फिर जब आप सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम मक्का मुकर्रमा वापस हुए तो दोपहर का वक़्त था हज़रत ख़दीजा रज़िअल्लाह तआला अन्हा अपनी सहेलियों के साथ बाला ख़ाना मे बैठी थीं उन्होंने देखा कि दो परिंदे आप सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के सर पर साया किये हुए हैं (वो दोनो फरिश्ते थे) हज़रत सैय्यदा ख़दीजा रज़िअल्लाह तआला अन्हा के ग़ुलाम मैसराह और दूसरे शख़्स ख़ुज़ैमा ने भी राह मे पेश आने वाले वाक़ेआत का ज़िक़्र किया जिससे हज़रत खदीजा रज़िअल्लाह तआला अन्हा निहायत मुत्तासिर हुईं!

हज़रत सैय्यदा ख़दीजा रज़िअल्लाह तआला अन्हा अक़्ल और फ़रासत मे निहायत कामिल और हसब नसब मे बहुत आला और बहुत दौलत मंद ख़ातून थीं लेकिन बेवा थीं बहुत से क़ुरैश के मर्दो ने आप से पैग़ामे निकाह दिया मगर इन्होंने किसी को क़बूल न किया लेकिन आप हुज़ूर सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम से इस क़द्र मुत्तासिर थी कि अपने हमराज़ औरत के ज़रिये खुद बारगाहे अक़दस मे निकाह की दरख़्वास्त पेश की जिसे आप सरकार दो आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने अपने महबूब चचा हज़रत अबु तालिब के मशवरे से क़बूल फ़रमा लिया!

 

सरकार दो आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम का निकाहआप सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के तरफ़ से आपके चचा हज़रत अबु तालिब, हज़रत हमज़ा, और दीगर चचा और हज़रत अबु बक्र सिद्दीक़ रज़िअल्लाह तआला अन्हु और दीगर क़ुरैश के रईस हज़रत खदीजा रज़िअल्लाह तआला अन्हा के घर तशरीफ़ ले गएं और वहा आपका निकाह हुआ और आपके चचा अबु तालिब ने बलीग़ ख़ुत्बा पढ़ा जो ये है—

“तमाम तारीफ़े खुदा ही के लिये है जिसने हमको इब्राहीम की औलाद मे और इस्माईल के नस्ल मे पैदा किया और मादे मुज़र के ख़ानदान से किया हम को अपने घर का मुतवल्ली और पासबान बनाया, हमारे हज करने के लिये एक हरम मुक़र्रर फ़रमाया और हम लोगों को बनि आदम का सरदार और हाकिम होने की इज़्ज़त बख़्शी! यह मेरा भतीजा मोहम्मद बिन अब्दुल्लाह (सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम) हमारे दर्मियान अपनी अख़लाकी ख़ूबियों और कमालात के लिहाज़ से जो इज़्ज़त बुज़ुर्गी और दर्जा रखते हैं कोई आदमी भी इसकी बराबरी नही कर सकता! यह मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम जिनके रिश्ते के बारे मे आप सबको मालूम हो चुका है कि ख़दीजा बिंत ख़ुवैलद से निकाह करना चाहते हैं और इसका कुल महर मेरे माल से है! ख़ुदा की क़सम इनको बहुत बड़ा मरतबा हासिल होने वाला है और सबसे अहम वाक़ेआ पेश आने वाला है”!

और इस तरह जनाब सैय्यदा ख़दीजा रज़िअल्लाह तआला अन्हा को हुज़ूर पुर नूर मुख़तारे कुल कायनात फ़ख्रे बनि आदम मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के ज़ौजियत मे आने का शर्फ़ हासिल हुआ!

 

आप सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने जब पैंतीस बरस के उम्र मे क़दम रखा तो उस वक़्त काबे शारीफ़ के तामीरे नौ मे हिस्सा लिया जब हज्रे असवद को नस्ब करने का वक़्त आया तो हर क़बीले के सरदारों ने ये चाहा कि ये ऐज़ाज़ उसे तन्हा हासिल हो, कशीदगी बढ़ी तो तलवारें निकल आई क़रीब था कि ज़मीने हरम ख़ून से रंगीन हो जाती, चंद रोज़ के लिये तामीरे हरम पाक रोक दिया गया! फिर थोड़ा सोचो फ़िक्र के बाद उमय्या बिन मुग़ैरह ने मशवरह दिया कि कल सुबह सूरज निकलने के बाद जो शख़्स सब से पहले बाब बनि शैय्बा से हरम पाक मे दाख़िल हो, उसे साबित मान लो इससे सब सरदार राज़ी हो गये! अगले सुबह सब क़बाएल के सरदार जमा हुए और नज़रें बाब बनि शैय्बा पर जम गई, इधर दो पहाड़ो के बीच से आफ़ताबे ज़माना ने सर निकाला और उधर बाब बनि शैय्बा से आफ़ताबे रिसालत महताबे नबूवत हुज़ूर पुर नूर मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम तशरीफ़ ले आएं तो बेअख़्तियार सब पुकार उठे- ये तो अमीन आ रहें हैं, ये तो अमीन आ रहें हैं, हम राज़ी हैं, हम राज़ी हैं- रसूले कायनात फ़ख्रे मौजूदात सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने अपनी चादर मुबारक ज़मीन पर बिछा दिया ,हज्रे असवद उठाया और चादर मुबारक पर रख दिया, फिर हर क़बीले के सरदारों को फ़रमाया के चादर के कोनों को पकड़ कर उठाओ, सबने एक साथ मिलकर चादर को उठाया जब हज्रे असवद मक़ामे नस्ब तक पहुंचा तो आप सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया, अब तुम सब मुझे अपना नुमाइन्दा चुन लो, सब राज़ी हो गए, तो आपने हज्रे असवद उठाया और सब के तरफ़ से हरम-ए-काबा के दीवार मे नस्ब कर दिया! ये फैसला इस क़द्र दानिशमन्दाना था के ज़माना झूम उठा और क़ुरैशे मक्का ख़ून की होली खेलने से बच गये!

 

आप सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने जब चालीस बरस के उम्र मे क़दम रखा तो ये वक़्त ऐलाने नबूवत का हुआ आप सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम पर वह्यी व बशारत का ज़हूर हुआ जिससे आफ़ाक़े आलम मुनव्वर हुआ! नूरे वह्यी का ज़हूर पीर के दिन सन् इक्त्तालीस ईसवी आमुल फ़ील माहे रबीउल अव्वल के तीन या आठ तारीख़ को हुआ, जब ज़हूरे नबूवत का वक़्त क़रीब आया तो रसूल अल्लाह सलल्ललाहो अलैहे वसल्लम थोड़ी सी खजूरे सत्तू और पानी लेकर मक्का के क़रीबी पहाड़ “जब्ले नूर” पर तशरीफ़ ले जाते और उसके चोटी के क़रीब वाक़े “ग़ारे हिरा” मे कई-कई रोज़ तक इबादत मे मसरूफ़ रहते, फिर कभी जी मे ख़्वाहिश पैदा होती पहाड़ से नीचे तशरीफ़ लाते जी भर तवाफ़े काबा फ़रमाते फिर अपने अहले ख़ाना से मुलाक़ात करते और तोशा लेकर दोबारा ग़ारे हिरा मे जलवागर हो जाते, इसी दौरान आप पर पहली वह्यी मुबारक का नज़ूल सूरह अल-अलक़, 1 से लेकर 5 तक का हुआ!

 

आप सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने दावतो तबलीग़ शुरु किया तो सब से पहले अपने घर के लोगों को दावत दिया जिसमे सबसे पहले आपकी रफ़ीक़े हयात सैय्यदा ख़दीजा रज़िअल्लाह तआला अन्हा ईमान से शर्फ़याब हुईं हज़रत सैय्यदा ख़दीजा रज़िअल्लाह तआला अन्हा तो उस वक़्त ईमान ले आयीं थीं जबकी हुज़ूर पुर नूर सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ग़ारे हिरा से तशरीफ़ लाएं ही थें और हालते वह्यी का ज़िक्र फ़रमाते हुए ये भी फ़रमाया था कि मै शज्रो-हज्र से सुनता हूँ कि वोह मुझे “या मोहम्मद या रसूल अल्लाह” कह कर सलाम अर्ज़ करते हैं, हज़रत ख़दीजा रज़िअल्लाह तआला अन्हा उसी दिन दिलो जान से ईमान ले आयीं थीं, इसके बाद हज़रत अली मुरतज़ा, हज़रत सिद्दिक़े अकबर , हज़रत ज़ैद बिन हारिस रज़िअल्लाह तआला अन्हुमा भी शर्फ़े ईमान से मुशर्रफ़ हो गएं! फिर रोज़ बरोज़ ग़ुलामाने मुस्तफ़ा मे इज़ाफ़ा होता गया इस तरह तीन साल का अर्सा गुज़र गया, फिर रब करीम जल्ला शानहू के तरफ़ से ये हुक्म हुआ कि अब ऐलानिया तौर पर तबलीग़े इस्लाम करो, इस पर नबी सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने ऐलानिया तौर पर तबलीग़े इस्लाम शुरु कर दिया! इसके बाद क़ुरैशे मक्का ने आप सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम और आपके ग़ुलामों पर अर्सए-हयात तंग कर दिया और इस क़द्र शदीद तकलीफ़ दिया कि जिनके तसव्वुर से रूहे इन्सानियत कांप उठती है, लेकिन आपके जाँनिसारों ने आपका साथ न छोड़ा और ईमान से उनका दिल सरशार रहा बल्कि इन ईमान वालों मे वो लोग शामिल होते रहें जिनको आपका ख़लीफ़ा होने का शर्फ़ हासिल हुआ और आपके असहाब होने की दौलत हासिल हुई!

इसी दौरान क़ुरैश ने हुज़ूर पुर नूर मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम को और आपके जाँनिसारों को एक घाटी मे कि जिसको शऐबे-अबि तालिब के नाम से याद किया जाता है महसोर कर दिया! इसी दौरान आमुलहुज़्न का साल भी ग़ुज़रा कि जिसमे आप सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के रफ़ीक़ चचा हज़रत अबु तालिब और आपकी इन्तेहाई वफ़ाशिआर व जाँनिसार ख़िदमतगुज़ार रफ़ीक़े हयात हज़रत सैय्यदा तय्यबा ताहिरा उम्मुल मोमिनीन ख़दीजा रज़िअल्लाह तआला अन्हा का विसाल हो गया, इस वक़्त आप सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की उम्र मुबारक उन्चास साल आठ माह और ग्यारह दिन की थी और आपके रफ़ीक़े हयात कि उम्र पैंसठ साल थी जबकि आपके चचा हज़रत अबु तालिब की उम्र सत्तासी बरस की थी, इस वाक़िए से हुज़ूर पुर नूर सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम पर निहायत रंज तारी हो गया और आपने इस साल को “आमुलहुज़्न” के नाम से पुकारा! इसी साल आपने तबलीग़े इस्लाम के लिये ताइफ़ का सफ़र तय किया जहाँ आपको लोगों ने बहुत तकलीफ़ पहुंचाया और आप पर संगबारी शुरु कर दिया जिससे आपके जिस्म मुबारक से ख़ून जारी हो गया और आपकी नालैने मुबारक ख़ून से लबरेज़ हो गई लेकिन आपने वहाँ के लिये कोई बद्दुआ न किया और फ़रमाया कि यहाँ के लोग ईमान से शर्फ़याब होंगे जो बेशक आपके क़ौले शरीफ़ा के मुताबिक़ हुए भी!

आप सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने अपनी तिरपन साला ज़िन्दगी मक्कह मुकर्रमा मे गुज़ारी उसके बाद कुफ़्फ़ारे मक्का के ज़ुल्म सितम के सबब अपने वतन को अलविदा कहा और मदीना मुनव्वरा को हिजरत कर गएं!

 

आप सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की मदनी ज़िन्दगी और आपके अहले बैत का ज़िक्र

 

आप सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की हिजरत के एक दिन पहले कि जब अबु जहल के साथ-साथ तमाम कुफ़्फ़ारे मक्का ने ये नापाक मन्सूबा बनाया कि आप सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम को (माज़अल्लाह) क़त्ल कर देंगे और उन्होंने इस मकरूह तदबीर को अमली ख़ाका पहनाने के लिये तय्यारी भी करली तो उधर अल्लाह रब्बुलइज़्ज़त ने अपने नबी मुकर्रम को इस मक्र से मुत्तिला फ़रमा कर हुक्म दिया कि आज रात आप अपने बिस्तर पर हज़रत अली रज़िअल्लाह तआला अन्हु को लेटा दें और हज़रत अबु बक्र सिद्दीक़ रज़िअल्लाह तआला अन्हु को लेकर मदीना मुनव्वरा को हिजरत कर जाएँ!

इधर जब कुफ़्फ़ारे मक्का ने आपके घर मे घुसकर आपके बिस्तर पर ये समझकर कि आप सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम उसपर जलवागर हैं हमला किया, तो ये देखकर कि उसपर आपके भाई हज़रत अली रज़िअल्लाह तआला अन्हु लेटे हैं बहुत हैरान हुए और काफ़ी ग़ुस्सा भी, आप सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने हज़रत अली करमअल्लाह वजहुलकरीम से जाते वक़्त ये फ़रमा दिया था कि ऐ अली आज रात तुम पर कुफ़्फ़ारे मक्का हमलावर होंगे लेकिन तुम ज़रा भी न घबराना इन्शाअल्लाह तुम्हें कुछभी नही होगा और कल मेरे बाद लोगों की अमानते बाटकर मदीना मुनव्वरा आ जाना! हज़रत अली करमअल्लाह वजहुल करीम का क़ौल है कि मुझे इस दिन से ज़्यादा सुकून की नींद कभी नही आई क्यूंकि हुज़ूर पाक सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम का ये क़ौल था कि तुम्हें कुछ नही होगा बस इसपर मेरा पूरा ईमान था और मुझे यक़ीन था कि अली को किसी और दिन तो मौत आ सकती है लेकिन इस दिन नही! उधर कुफ्फारे मक्का मे ये शोर मच गया कि मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम हज़रत अबु बक्र रज़िअल्लाह तआला अन्हु के साथ कही चले गये हैं इस पर कुरैश ने अपने जासूसों को हर सिम्त इनको खोजने के लिए रवाना कर दिया, उधर तीन रोज़ व शब ग़ारे सौर मे रहने के बाद आप सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम हज़रत अबुबक़्र सिद्दीक़ रज़िअल्लाह तआला अन्हु के साथ पीर के दिन कबा मे तशरीफ़ लाएँ! जब से अहले मदीना ने ये सुन रखा था कि आप सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने मक्का छोड़ दिया है ये सब रोज़ाना सुबह सवेरे मदीना मुनव्वरा से बाहर निकल कर बुलंद टीलों पर बैठकर मक्का से आने वाले रास्तों को देखते रहते ताकि जमाले माहताबे रिसालत से मुस्तफैद हों, ये रोज़ाना दोपहर तक यहां बैठे रहते थे, एक दिन ये हज़रात इन्तेज़ार कर के वापस पलटे ही थे कि रसूलअल्लाह सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम तशरीफ़ ले आएँ, एक यहूदी ने पुकारा कि ‘ऐ लोगों, जिनके तुम मुन्तज़िर थे वो आ गयें, ये देखकर तमाम लोग ख़ुशी से बेताब होकर नारऐ तकबीर बुलंद करते और नातें पढ़ते हुए मालिके कायनात सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के इर्द गिर्द जमा हो गयें!

रसूल अल्लाह सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने यहाँ चंद रोज़ क़याम फ़रमाया इसी जगह हज़रत सैय्यदना अली करमअल्लाह वजहुल करीम भी पा-पियादा चलते हुए हाज़िरे ख़िदमत हुएँ, मक्का मुकर्रमा से मदीना मुनव्वरा तक के तवील पैदल सफ़र की वजह से हज़रत अली रज़िअल्लाह तआला अन्हु के पैर मे छाले पड़ गये थे जो कि आक़ा करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के दस्ते अक़दस के मस कर देने से उसी वक़्त ठीक हो गयें, इस मुख़्तसर से क़याम के दौरान रसूले अकरम नबी मोअज़्ज़म सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने ‘कबा’ मे उस बे-मिसाल मस्जिद की तामीर करवाई जिसे कुरआन मजीद ने ”उस्सेसा अलातक़वा” के नाम से नवाज़ा और रसूले खुदा हबीबे किबरिया सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने फ़रमाया कि जो शख़्स इस मस्जिद मे दो रिकअत नमाज़ नफ़िल पढ़ेगा उसे अल्लाह तआला उमरा के बराबर सवाब अता फ़रमाएगा!

 

(यकम सन् हिजरी बमुताबिक 622 ईस्वी ) कबा मे चंद रोज़ क़याम के बाद रसूले अकरम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने मदीने मे दाख़िले का अज़्म फ़रमाया, ये जुमा का दिन और बारह रबीउल अव्वल की बारह तारीख़ थी जब हूज़ूर नबी करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम कबा से सवार होकर बनु सालिम के घरों तक पहुंचे, तो जुमा का वक़्त हो गया आप सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने उसी जगह तक़रीबन सौ आदमियों को लेकर नमाज़े ज़ुमा अदा किया ये इस्लाम मे पहला जुमा था और जिस जगह जुमा अदा किया गया उस जगह मस्जिद बना दिया गया जिसका नाम मस्जिदे जुमा पड़ा!

नमाज़े जुमा के बाद रसूले करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम जुनूब के जानीब से इस शहर मे दाखिल हुएँ जिसे इस वक़्त तक दुनिया वाले यसरिब कहा करते थे इसे बलाओं और मुसीबतों का मरकज़ ग़रदायाँ करते थे बीमारियों और वबाओं के इस आम-जगह में हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के क़दम अनवर के बरकत से इस क़द्र रहमत नाज़िल हुई कि न सिर्फ बलाऐं और वबाऐं रफ़ू चक्कर हो गई बल्कि इसकी मटटी ख़ाके शिफ़ा हो गई और रसूले खुदा हबीबे किबरिया सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने यहाँ तक इरशाद फरमाया कि दुनिया के दूसरे शहरो मे वबा, अमराज़, ताऊन और दज्जाल लईन वग़ैरह आ सकता है मगर मक्का मुकर्रमा और मेरे मदीना मुनव्वारा मे नही आ सकता है, (सुबहानअल्लाह) खुदावंदे करीम तमाम मुस्लमानों को इन तमाम वबाओं और बलाओं से महफ़ूज़ फरमाऐं आमीन!

 

मदीना तय्यबा मे रसूले खुदा सरवरे अम्बियां मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम का दाख़ला अजब शानदार था गली कूचे तमहीद व तक़दीस के कलमाते ज़ीशान से गूंज उठे– सही मुस्लिम शरीफ़ बाब हिजरत मे हज़रत बर्रार रज़िअल्लाह तआला अन्हु से मरवी है के

 فَصَعدَالِرّجالُ والَنِّسَاعُ فوقَ البُيوُتِ وتَفرّقَ الغُلمَانُ وَالخَدَمُ فى الّطُرقِ يُنَادُونَ يامُحَمَّدُ ياَرَسُولَ اللهِ يامُحَمَّدُ ياَرَسُولَ اللهِ

यानी हूज़ूर सरवरे कायनात मोहम्मदे अरबी सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के मदीना मुनव्वरा मे तशरीफ़आवरी के वक्त औरतें और मर्द अपने घरों के छतों पर चढ़ गए बच्चे और ग़ुलाम मदीना मुनव्वरा के गली कूचों मे घूमते हुए यानी जुलूस के शक्ल मे “या मोहम्मद या रसूलअल्लाह या मोहम्मद या रसूलअल्लाह” सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के नारे लगाते फिर रहे थे, औरतें मर्द बच्चे बूढ़े सभी नूरे खुदा सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के जमाले जहाँआरा कि एक झलक देखने के लिये मुन्तज़िर थे, अंसार की मासूम व नौख़ेज़ लड़कियाँ प्यारे लहजे और पाकीज़ा ज़बान से नाते रसूल सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के ये शेर पढ़ रहीं थीं!

طَلَع البَدرُ عَلَينا – مِن سَنِيَّانِ الوَدَاعِ وَجَبَ الشُّکرُ عَلَينا

 مَادَ عىٰلِلَّهِ دَاعِ ايُّهَاالمَبعُوثُ فِيناَ –

جِئَتَ بِالاَمراَلمطَاعِ

 “सुन्नियात उल वदाअ नामी पहाड़ो के जानिब से (ये घाटी मक्कह मुर्करमा के राह मे है) हम पर चौधवी शब का चाँद तुलुऊ हो गया है हम पर वाजिब है कि शुक़्र अदा करे, कि दाईइल्लल्लाह जलवागर हो गये!”

“ऐ हमारे पास तशरीफ़ लाने वाले आप हम पर वोह दीने मतीन लेकर तशरीफ़ लाये हैं कि जिसकी इताअत निहायत ज़रूरी है!”

जब कि रसूल अल्लाह सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के ननिहयाल “क़बीला बनु-नज्जार” की भोली भाली बच्चियां ख़ुशी से झूम झूम कर दफ़ बजाते हुए कह रहीं थीं-

 نَحنُ جَوَارٍمِّن بَنى النّجّاَ رِ – يَا حَبَّزَامُحمَّدًامِن جَا رِ

तर्जुमा- कि हम है बच्चियां नज्जार के आली घराने की! ख़ुशी है आमिना के लाल के तशरीफ़ लाने की!

सरकार की आमद कि वजह से जश्न का एक अजीब समा था, हुज़ूर पुर नूर सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम अपनी ऊटँनी पर सवार उनके दरमियान से गुज़र रहें थें! जुमला क़बाएले अंसार के लोग अपनी आँखों को सरे राह बिछा कर सरापा न्याज़ बनकर रसूले करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के दामने करम को थाम कर अर्ज़ कर रहें थे हमारे ग़रीबख़ाने मे क़याम फ़रमा कर नियामत व सरवत के इज़हार और ख़िदमतगारी और जाँनिसारी की सआदत मरहम्मत फरमाऐं हुज़ूर रहमते आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम हर एक के हक़ मे दुआएं रहमत व बरकत फ़रमाते हुए इरशाद फ़रमाते, मेरी ये ऊँटनी को अल्लाह तआला के तरफ़  से जाये क़याम को बता दिया गया है; इसकी रस्सी को छोड़ दो ये जहाँ बैठेगी क़रारगाह होगी चुनाँचे ये ऊँटनी उस जगह बैठी जहाँ अब मस्ज़िदे नबवी है, थोड़ी देर बाद ऊँटनी खड़ी हुई और चंद क़दम आगे बढ़कर घूमी और हज़रत अबु अय्यूब अंसारी रज़िअल्लाह तआला अन्हु के दरवाज़े के बिल्कुल क़रीब बैठ गई हज़रत अबु अय्यूब रज़िअल्लाह तआला अन्हु के खुशी का कोई ठिकाना नही रहा था, कि आफ़ताबे मुक़द्दर बामे उरूज को पहुँच गया था!

फिर सरवरे कायनात सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने वहीं क़याम फ़रमाया, हुज़ूर सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के मर्ज़ी के मुताबिक़ आपकी ऊँटनी के पहले क़याम की जगह मस्जिदे नबवी की तामीर कराया गया!

 

आप सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के मदीना मे दस साला वक्फ़े मे वोह सब हुआ जो हदीस मुबारक से साबित है- जैसे हज़रत सैय्यदा आऐशा रज़िअल्लाह तआला अन्हा से रफ़ाफ़ हुआ, ये नौ शव्वाल मुर्करम यकम सन् हिजरी को हुआ, इसी साल हुज़ूर सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने अंसार और मुहाजिर मे रिश्ता मुवाख़त (भाई चारा) अस्तवार फ़रमाया और एक दूसरे के जायदाद का वारिस बनाया इसी साल रिकअते नमाज़ मे इज़ाफ़ा हुआ यानी दो-दो रिकत नामाज़ फर्ज़ की गई और सफ़र के नमाज़ को पहले फ़राऐज़ पर बरक़रार रखा गया!

 

सन् दो हिजरी मे तहवील क़िबला हुआ, इब्तिदा मे क़िबला बैतुल मुक़द्दस था नबी मुकर्रम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के मदीना मे जलवागरी के सोलह माह और अंदलबाज़ सतरह माह गुज़रने के बाद तक क़िबला बैतुल मुक़द्दस ही रहा फिर रसूलअल्लाह सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के ख्वाहिश पर क़िबला ख़ाना काबा को क़रार दे दिया गया, और ये वाक़ेआ बनु सलमा के बस्ती मे ऐन उस जगह हुआ जहाँ आज मस्जिदे क़िबलतैन बनि हुई है!

हुज़ूर पुर नूर सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम अपने सहाबा के साथ नमाज़ ज़ोहर अदा कर रहें थें ऐन हालते नमाज़ मे नज़ुले ‘वही’ के इंतेज़ार मे आसमान के तरफ़ आसार मुलाहिज़ फ़रमाने के मुन्तज़िर थें आप सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की शदीद ख़्वाहिश थी कि क़िबला ख़ाना काबा को क़रार दे दिया जाए! इसी हालत मे जिब्रील अमीन् पैग़ामे ख़ुदा वंदी लेकर हाज़िरे ख़िदमत हो गएँ

  قَدْ نَرَىٰ تَقَلُّبَ وَجْهِكَ فِي السَّمَاءِ ۖ فَلَنُوَلِّيَنَّكَ قِبْلَةً تَرْضَاهَا ۚ فَوَلِّ وَجْهَكَ شَطْرَ الْمَسْجِدِ الْحَرَامِ ۚ

(ऐ महबूब करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम) हम आपका बार बार आसमान के तरफ़ देखना मुलाहिज़ फ़रमा रहें हैं, तो ज़रूर हम आपको उसी क़िबले के तरफ़ फेर देंगे जिसमे आपको ख़ुशि है तो अभी अपना मुँह मस्जिदे हराम के तरफ़ फेर दीजिये, चुनांचे उसी वक़्त रसूले करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने दौराने नमाज़ ही अपना रुख़े अनवर बैतुल मुक़द्दस से घुमाकर हरम-ए-काबा के तरफ़ फ़रमा लिया, इसी तरह सब सहाबाकिराम भी घूम गएँ!

इसी सन् दो हिजरी मे सैय्यदा तैय्यबा ताहिरा आबिदा ज़ाहिदा फ़ातिमा ज़हरा रज़िअल्लाह तआला अन्हा का निकाह हज़रत सैय्यदना अली शेरे ख़ुदा रज़िअल्लाह तआला अन्हु से हुआ! इसी दो हिजरी मे रमज़ानुल मुबारक के रोज़े फ़र्ज़ हुए, इसी मे ज़क़ात, फ़ितरा, सदक़ा, हुक्म जिहाद, नमाज़े ईद सब का ऐहकाम जारी हुआ! और ग़ज़्वाए बद्रे कुबरा भी इसी साल वजूद मे आया!

 

सन् तीन हिजरी मे ग़ज़्वाए ‘ग़त्फ़ान’ हुआ, इसी तीन हिजरी मे कअब बिन अशरफ बदबख़्त यहूदी का क़त्ल भी वाक़े हुआ, सुर्राया फ़रवाह भी इसी तीन हिजरी मे वाक़े पज़ीर हुआ गज़्वाए ओहद ग़ज़्वाए स्वंयक या क़रक़रूतुलक़द्र इसी तीन हिजरी मे हुआ, इसी तीन हिजरी मे सैय्यदा उम्मे क़ुलसूम रज़िअल्लाह तआला अन्हा की शादी हज़रत उसमान ग़नी रज़िअल्लाह तआला अन्हु से हुई और इसी तीन हिजरी मे हज़रत इमाम सैय्यदना हसन रज़िअल्लाह तआला अन्हु की विलादत बासआदत भी हुई!

 

सन् चार हिजरी मे हज़रत ख़बीब और ज़ैद रज़िअल्लाह तआला अन्हुमा कि शहादत हुई, इसी चार हिजरी मे ग़ज़्वाए बद्र सुग़रा भी वाक़े हुई!

 

सन् पाँच हिजरी मे ग़ज़्वाए ख़ंदक वाक़े हुई, इसी पाँच हिजरी मे ग़ज़्वाए बनु क़रैज़ा और ग़ज़्वाए बनु मुतलिक़ वाक़े हुई!

 

सन् छः हिजरी मे वाक़ेआते हुदैबिया हुआ इसी छः हिजरी मे हुज़ूर पाक सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के तरफ़ से सलातीने ज़माना को दावते इस्लाम के ख़ुतूत भेजे गए!

 

सन् सात हिजरी मे ग़ज़्वाए ख़ैबर वाक़े हुआ और ग़ज़्वाए वादियुल र्क़ुआ हुआ, इसी साल हज़रत मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने हज़रत सैय्यदा मैमूना बिन हारिस रज़िअल्लाह तआला अन्हा से निकाह फ़रमाया!

 

सन् आठ हिजरी मे जंग मूता वाक़े हुई और उसमे हज़रत जाफ़र बिन अबि तालिब रज़िअल्लाह तआला अन्हु की शहादत हुई, इसी हिजरत के आठवें साल मे ग़ज़्वाए फ़तह मक्का भी वाक़े हुई और मुसलमानों को फ़तह नसीब हुई और काबा को बुतों से पाक किया गया, इसी सन् आठ हिजरी मे ग़ज़्वाए हुनैन भी वाक़े हुई, और इसी साल हुज़ूर सरदारे कायनात मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की शहज़ादी सैय्यदा ज़ैनब रज़िअल्लाह तआला अन्हा की वफ़ात हुई इसी सन् आठ हिजरी मे हज़रत मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के शहज़ादे हज़रत सैय्यदना इब्राहीम रज़िअल्लाह तआला अन्हु की विलादत बासआदत हुई और इसी साल मे मिंबर शरीफ़ की तामीर भी हुई!

 

सन् नौ हिजरी मे ग़ज़्वाए तबूक़ वाक़े हुई और ये ग़ज़्वाते नबवी मे आखरी ग़ज़्वा है, हज और ऐलाने बरात का वाक़ेआ भी इसी साल हुआ!

 

सन् दस हिजरी मे हुज़ूर रसूल अल्लाह सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम का नजरान के ईसाईयों से मुबाहेला हुआ, हुज़ूर पुर नूर मोहम्मदे अरबी सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने नजरान के नसारा के तरफ़ मकतूबे गिरामी अरसाल फ़रमाया जिसके जवाब मे नजरान का एक वफ़्द बारगाहे रिसालतमाब मे हाज़िर हुआ, इस वफ़्द मे नसारा के सत्तर सरदार शामिल थे, इनका सरदार अक़ब अब्दुल मसीह, इनका ख़तीब और मुदर्रिसे अज़्म अबुल हारिस बिन अलक़मा और दूसरा सरदार ऐयहम था!

जब ये लोग मदीना मुनव्वरा के तरफ़ आ रहे थे, तो रास्ते मे अबुल हारिस के ऊँट को ठोकर लगी तो इसके भाई करज़ ने बददुआ के तौर पर कहा ठोकर लगे उसको जो दूर है इससे रसूल अल्लाह सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की ज़ाते अक़दस मुराद थी (माज़अल्लाह) इसपर इसके भाई अबुल हारिस ने कहा ठोकर लगे तुझे, उनको क्यों लगे, करज़ ने हैरानी से पूछा भाई ये क्या? अबुल हारिस ने कहा, अल्लाह तआला की कसम मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम अल्लाह तआला के रसूल हैं ये वहीं हैं जिनके हम मुन्तज़िर थें, करज़ ने कहा फिर तुम मुसलमान क्यों नही हो जाते, अबुल हारिस ने कहा अगर मै मुसलमान हो गया तो मेरी क़ौम मेरे ख़िलाफ़ हो जाएगी और जो मरतबा मक़ाम और क़द्रो मन्ज़िलत हासिल है सब जाती रहेगी और जो तहाएफ़ और हदाया हमे मिलते है वो सब छिन जाएंगे, अबुल हारिस की इन बातो से करज़ के दिल मे इस्लाम की मोहब्बत पैदा हो गई और वो क़ाफ़ले से जुदा होकर पहले ही बारगाहे रिसालतमाब सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम मे हाज़िर हो गएँ और शर्फ़े इस्लाम से मुशर्रफ़ हो गएँ!

नजरान के नसारा का ये वफ़्द बारगाहे रिसालतमाब मे हाज़िर होकर हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम के बारे मे कज बक़्शी करने लगा, हर चंद रसूले करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने नाक़ाबिले तरदीद दलाएल से उनको समझाने की बहुत कोशिश किया मगर उन्होने हठ धरमी से काम लिया और कोई बात ना मानी तो अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त ने दर्ज ज़ेल आयाते मुबारक नाज़िल फ़रमाई –

  إِنَّ مَثَلَ عِيسَىٰ عِندَ اللَّهِ كَمَثَلِ آدَمَ ۖ خَلَقَهُ مِن تُرَابٍ ثُمَّ قَالَ لَهُ كُن فَيَكُونُ الْحَقُّ مِن رَّبِّكَ فَلَا تَكُن مِّنَ الْمُمْتَرِينَ فَمَنْ حَاجَّكَ فِيهِ مِن بَعْدِ مَا جَاءَكَ مِنَ الْعِلْمِ فَقُلْ تَعَالَوْا نَدْعُ أَبْنَاءَنَا وَأَبْنَاءَكُمْ وَنِسَاءَنَا وَنِسَاءَكُمْ وَأَنفُسَنَا وَأَنفُسَكُمْ ثُمَّ نَبْتَهِلْ فَنَجْعَل لَّعْنَتَ اللَّهِ عَلَى الْكَاذِبِينَ

बेशक अल्लाह तआला के नज़दीक ईसा अलैहिस्सलाम की मिसाल हज़रत आदम अलैहिस्सलाम के तरह है, इनको मिट्टी से बना लिया फिर उसे फ़रमाया ज़िंदा इन्सान हो जा, और वोह हो गए ‘ऐ सुन्ने वाले’ ये तेरे रब की तरफ़ से बिलकुल हक़ है और तू शक करने वालों से ना होना तो फिर (ऐ महबूब अलैहिस्सलाम) अगर आप से ये ईसा अलैहिस्सलाम के बारे मे बहस करे इल्म आने के बाद तो इनसे फ़रमाएँ के आओ हम बुलाते हैं तुम्हारे बेटों यानी औलाद को और अपनी औलाद को, तुम्हारी औरतों को और अपनी औरतों को, हम ख़ुद भी आते हैं और तुम्हे भी बुलाते हैं, ताकि मुबहाएला करें और झूठों पर अल्लाह तआला की लानत करें! जब नजरान वाले इस इरशादे मुबारक के बाद भी अपने इन्कार पर क़ायम रहे तो हुज़ूर पुर नूर रसूल अल्लाह सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने उनको बहुक्म आएते मुबहाएला पर बुलाया, इन्होने अर्ज़ किया कि हम मशवराह करेंगे और कल जवाब देंगे, जब वो सब मशवराह के लिए जमा हुएँ तो उन्होने अपने सरदार साहिबे राय आलिम अक़ब अब्दुल मसीह से कहा कि फ़रमाए हमारे लिए क्या हुक्म है? तो इसने कहा मेरे साथियों अल्लाह तआला की क़सम तुम पहचान चुके हो कि हज़रत मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम अल्लाह तआला के सच्चे नबी है, अगर तुमने इनसे मुबहाएला किया तो सबके सब हलाक हो जाओगे, अगर तुम इनपर ईमान नही लाना चाह रहे हो तो वतन वापस लौट जाओ और उनसे सुलाह कर लो! दूसरे दिन जब वो बारगाहे अक़दस मे हाज़िर हुए तो हुज़ूरे अक़्दस सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम को मुबहाएला के लिए तैयार पाया, इस वक़्त हज़रत इमाम हुसैन रज़िअल्लाह तआला अन्हु हुज़ूर सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के गोद मे थे, हज़रत इमाम हसन रज़िअल्लाह तआला अन्हु का हाथ हुज़ूर सरवरे कायनात पकड़े हुए थे, सैय्यदा फ़ातिमा ज़हरा रज़िअल्लाह तआला अन्हा अक़ब मे और इनके अक़ब मे हज़रत मौला अली करम अल्लाह तआला वजहुल करीम थे, और रसूले अक़दस सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम इनसे फ़रमा रहें थें कि जब मै दुआ के लिए हाथ उठाऊँ तो तुम आमीन कहना!

गिरोहे नसारा ने जब इन हज़रात ज़ीवक़ार को अपनी तरफ़ आते देखा तो लरज़ गए इनका सदर मुदर्रिस अबुल हारिस कहने लगा ऐ लोगों अल्लाह तआला की क़सम मै ऐसी पाकीज़ा सूरतों को देख रहा हूँ कि वोह अगर अल्लाह तआला के हुज़ूर किसी पहाड़ के अपनी जगह टल जाने की दुआ करे तो वो भी टल जाएगा, खबरदार इनसे मुबहाएला ना करना वरना हलाक कर दिये जाओगे!

मरक़ूम है कि रसूलअल्लाह सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने फरमाया कि कसम है मुझे उस ज़ाते अक़दस की कि जिसके कब्ज़ए कुदरत मे मेरी जान है, अगर ये लोग मुबहाएला करते तो इनकी सूरते मस्ख़ करके बंदरो और खंज़ीरो सी करदी जाती और ये वादी इनपर आग बरसाती और अहले नजरान को बेख़ो-बन से उखाड़ दिया जाता, यहां तक कि इस वादी के जानवरों को भी हलाक कर दिया जाता और एक साल के अंदर हि अंदर तमाम नसारा हलाक हो जाते!

नसारा ने अर्ज़ किया कि हम मुबहाएला नही करेंगे तो हुज़ूर पुर नूर मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने फ़रमाया कि तुम मुसलमान हो जाओ इन्होंने कहा कि हम मुसलमान नही हो सकते, तो आप सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने फ़रमाया कि जंग के लिये तैयार हो जाओ, इन्होंने अर्ज़ किया कि हम जंग नही कर सकते क्योंकि इसकी ताक़त ही नही है, हाँ अलबत्ता हम जज़िया पर सुलह करते हैं, चुनांचे इनके इस पेशकश पर सुलह करली गयी और मज़ीद इनपर ये शर्त आएद की गई कि ना वो सूद खाएंगे और नाही मुसलमानों पर हमला करेंगे!

इसी दस हिजरी मे हज़रत सैय्यदना इब्राहीम रज़िअल्लाह तआला अन्हु फरज़न्द मुबारक सरकार दो आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम का विसाल हुआ!

 

सन् ग्यारह हिजरी बमुताबिक़ 632 633 ईस्वी बरोज़ पीर बारह रबीउल अव्वल हुज़ूर ताजदारे अरब व अजम शफ़ीए उमम फख्रे बनि आदम रहमते आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम सूरह अन्नस्र (इज़ा जा आ नसरुल्लाहे वल फ़तहू) के बाद ही अहले बैत अतहार व सहाबाएकिराम को अपने विसाल मुबारक की खबर दे दी थी!

हज़रत सैय्यदना इब्ने अब्बास रज़ि अल्लाह तआला अन्हु से मरवी है कि हुज़ूर पुर नूर सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के यौमे विसाल, हक़ तआला ने मलकुल मौत को हुक्म दिया कि ज़मीन पर मेरे महबूब सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के हुज़ूर हाज़िर हो, ख़बरदार बग़ैर इजाज़त के दाख़िल ना होना, और नाही बग़ैर इजाज़त के रुहे आली को क़ब्ज़ करना, तो हज़रत मल्कुल मौत दरवाज़ा-ए-अक़्दस पर अराबी के शक्ल मे हाज़िर हुए और बुलंद आवाज़ से अर्ज़ किया “अस्सलामो अलैकुम या अहलल बैते नबूवते व मादिनिर्रिसालते व मुख़तलिफ़िल मलाइकते” इस वक़्त सैय्यदा फ़ातिमा ज़हरा रज़िअल्लाह तआला अन्हा बारगाहे अक़्दस मे मौजूद थी, इसपर आपने अर्ज़ किया कि इस वक़्त हुज़ूर सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की तबीयत कुछ नासाज़ है इस वक़्त वोह आपसे नही मिल सकते तो वोह वहाँ से तशरीफ़ ले गएँ लेकिन दोबारह फिर आएँ और फिर इजाज़त तलब किया, इसपर फिर आपको वही जवाब मिला तो आप लौट गएँ, लेकिन जब तीसरी मर्तबा फिर मल्कुलमौत आएँ और आपने फिर इजाज़त चाहा तो जनाब सैय्यदा ने चाहा कि फिर आपसे वही फ़रमाए जो पहले फ़रमाया था, तो हुज़ूरपुर नूर सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने आपको मना फ़रमा दिया और अर्ज़ किया कि ‘ऐ मेरी लख़्ते जिगर तुम जानती हो ये कौन हैं? ये लज़्ज़तों को तोड़ने वाले, ख़्वाहिशों और तमन्नाओं को कुचलने वाले, इजतिमाई बंधनों को अलग अलग करने वाले, ये बीवियों को बेवा करने वाले और बच्चियों को यतीम बनाने वाले “मल्कुल मौत” हैं, ये सुनकर जनाब सैय्यदा ज़ार क़तार रोने लगीं, रसूलअल्लाह सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने इनको दिलासा दिया और ख़ुद अपने दस्ते मुक़द्दस से उनके रुख़े ज़ेबा से अश्क़ो को साफ़ किया, इस वक़्त घर मे मौजूद हर शख़्स रो रहा था, हुज़ूर पाक सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने शहज़ादगाने ज़ीवक़ार सैय्यदना हसन और सैय्यदना हुसैन अलैहिस्सलाम को बुलाया और अपनी आग़ोशे मोहब्बत मे लेलिया और चूमने लगे इस वक़्त ख़ुद रसूले करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम रो रहें थें, इसपर हज़रत उम्मे सलमह रज़िअल्लाह तआला अन्हा ने अर्ज़ किया कि या रसूल अल्लाह सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम आप क्यों रो रहें हैं तो हुज़ूर रहमतुललिल आलमीन सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने अर्ज़ किया कि मेरा रोना मेरे उम्मत पर रहमत और शफ़क़त के लिये है!

इसके बाद उम्माहातुल मोमिनीन बारी-बारी बारगाहे अक़दस मे हाज़िर होती रहीं और दौलते वसीहत से माला-माल होती रहीं, फिर हुज़ूर सरवरे कायनात सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने मौला अली शेरेखुदा रज़िअल्लाह तआला अन्हु को बुलाया और अर्ज़ किया कि ‘ऐ अली, फ़ला यहूदी का इतना दरहम मेरे ऊपर क़र्ज़ है, तुमको ताक़ीद है कि ये क़र्ज़ तुम उतारना और तुम हौज़े-क़ौसर पर मुझसे सबसे पहले मिलने वालों मे होगे, और फिर सब्रो इस्तिक़ामत और नमाज़ की पाबन्दी की नसीहत फ़रमाई!

मरवी है कि मल्कुलमौत ने हाज़िरे खिदमत होकर अर्ज़ किया- या रसूल अल्लाह सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम अल्लाह तआला ने मुझे आपके तरफ़ भेजा है और हुक्म दिया है कि मै आपकी इताअत करूँ, अल्लाह जल्ला शान्हू ने आपको ये अख़्तियार दिया है कि अगर आप इजाज़त दें तो रूहे आलिया को क़ब्ज़ करलूं, वरना नही, जो आपकी रज़ा है इरशाद फ़रमाए, इतने मे जिब्रील अमीन हाज़िरे ख़िदमत हुए और अर्ज़ किया कि अल्लाह तआला आपको अपनी तरफ़ रुजुउ का इरशाद फ़रमाता है, इसपर हुज़ूरे अकरम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने हज़रत अज़राईल अलैहिस्सलाम को इजाज़त मरहम्मत फ़रमा दी और रफ़ीक़े आला के तरफ़ मुन्तक़िल हो गए!

 

हुज़ूर सरवरे कायनात सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम का यौमे-विसाल दोशम्बा का दिन है और यही आपके विलादत का भी दिन है, यही दिन ऐलाने नबूवत का है, यही दिन मदीना मुनव्वरा मे तशरीफ़ आवरी का है, चुंकि हुज़ूर पुर नूर सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने ज़मानए अलालत मे ये फ़रमा दिया था कि मुझे मेरे अहले बैत ख़ुसूसन अली मुर्तज़ा करमअल्लाह वजहुल करीम ही ग़ुस्ल दें, इसलिये हज़रत इब्ने अब्बास रज़िअल्लाह तआला अन्हु ने ग़ैर अहले बैत के लिये हुज्रए-मुबारक का दरवाज़ा बंद कर दिया, इब्ने अब्बास रज़िअल्लाह तआला अन्हु से मरवी है कि ग़ुस्ल देने के चारो तरफ़ यमनी चादरो से पर्दा कर दिया गया और आपको मौला अली करम अल्लाह वजहुल करीम के साथ दीगर अहले बैत अतहार ने ग़ुस्ल दिया! फिर आपके हुक्म मुबारक के मुताबिक़ आपको तीन साफ़ सूती कपड़े मे कफ़नाया गया!                                                                                        

हुज़ूर पुर नूर सैय्यदे कौनैन सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने पहले ही फ़रमा दिया था कि मुझे ग़ुस्ल देने और कफ़्नाने के बाद मुझे इस हुज्रे मे तन्हा छोड़ देना क्योंकि मुझपर सबसे पहले सलातो जनाज़ा जिब्रील अमीन पढ़ेंगे फिर मीकाईल अलैहिस्सलाम, फिर असराफ़ील अलैहिस्सलाम, फिर अज़्राईल अलैहिस्सलाम फिर गिरोह मलाएका सलातो जनाज़ा पढ़ेंगे इसके बाद मेरे अहलेबैत पढ़ेंगे, फिर मेरे सहाबाकिराम पढ़ेंगे और मुझे मेरे क़ब्र मे मेरे अहलेबैत फरिश्तों के साथ मिलकर उतारेंगे!

 

आप सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम को हुज्रे सैय्यदा आएशा सिद्दीक़ा रज़िअल्लाह तआला अन्हा मे कि जहाँ आपका विसाल मुबारक हुआ और जहाँ आपको ग़ुस्ल मुबारक दिया गया आपके हुक्म के मुताबिक़ दफ़्न किया गया! उमर फ़ारूक़ रज़िअल्लाह तआला अन्हु ने आपके विसाल मुबारक पर फ़रमाया- इन्ना रिजाला मिनअल मुनाफ़िकीन ज़ अम्वा इन्ना रसूलअल्लाह सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम मात वइन्नह लमयम्त व इन्नह ज़हब इला रब्बह कमा ज़हब मूसा ———इला आख़रह”  बाज़ मुनाफ़िक़ीन का ख्याल है कि रसूलअल्लाह सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम फ़ौत हो गएँ हैं, हालांकि वोह फ़ौत नही हुएं, बल्कि अपने रब के पास गएँ हैं जिस तरह मूसा अलैहिस्सलाम चंद रोज़ के लिये तौरेत लेने कोहे तूर पर गए थे, आप सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम अपने मुनाफ़िक़ों को सज़ा देंगे वापस आकर, और मुझे अल्लाह तआला की कसम जिसने कहा कि मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम फ़ौत हो गयें है, मै उसकी गर्दन तलवार से उड़ा दूंगा!

मज़ार-ए-मुजल्ला इमामुल अम्बिया हुज़ूर सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम

 

हुज़ूर पुर नूर मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की अज़वाज व औलाद- हुज़ूर पुर नूर सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की बग़ैर किसी इख़तिलाफ़ ग्यारह बीवियाँ थीं जिनमे छ: क़ुरैशा थीं जिनके नाम ये है-

(1) हज़रत सैय्यदा तैय्यबा ताहिरा ख़दीजा कुबरा बिंत ख़ुवैलद रज़िअल्लाह तआला अन्हा (इनके हयाते मुबारका मे सरकार दो आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने दूसरी किसी ख़ातून से निकाह नही फ़रमाया और आप सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम कि तमाम औलाद मुबारक सिर्फ़ सैय्यदना इब्राहीम रज़िअल्लाह तआला अन्हु को छोड़कर आपही से तवल्लुद हुयीं!

(2) हज़रत सैय्यदा आएशा सिद्दीक़ा रज़िअल्लाह तआला अन्हा (आप हज़रत सैय्यदना अबु बक्र सिद्दीक़ रज़िअल्लाह तआला अन्हु की शहज़ादी हैं)!

(3) हज़रत सैय्यदा हफ़्सा रज़िअल्लाह तआला अन्हा (आप हज़रत सैय्यदना उमर फ़ारूक़ रज़िअल्लाह तआला अन्हु की शहज़ादी हैं)!

(4) हज़रत सैय्यदा उम्मे हबीबा रज़िअल्लाह तआला अन्हा (आप सैय्यदना अबु सुफ़यान रज़िअल्लाह तआला अन्हु की शहज़ादी हैं)!

(5) हज़रत सैय्यदा उम्मे सलमा रज़िअल्लाह तआला अन्हा!

(6) हज़रत सैय्यदा सौदह रज़िअल्लाह तआला अन्हा!

जबकि चार अरबिया लेकिन ग़ैर क़ुरैश हैं जो ये हैं-

(1) हज़रत सैय्यदा ज़ैनब बिंते खुज़ैमा रज़िअल्लाह तआला अन्हा!

(2) हज़रत सैय्यदा मैमूना रज़िअल्लाह तआला अन्हा!

(3) हज़रत सैय्यदा जुवैरिया रज़िअल्लाह तआला अन्हा!

(4) हज़रत सैय्यदा ज़ैनब बिंते हजश रज़िअल्लाह तआला अन्हा!
और एक ग़ैर अरबिया जो बनि इसराईल से हैं वो हैं-

(1) हज़रत सैय्यदा सफ़िया रज़िअल्लाह तआला अन्हा!

और एक उम्मे वलद से भी आपने निकाह फ़रमाया जिनका नाम सैय्यदा मारिया क़िबतिया रज़िअल्लाह तआला अन्हा है और आप सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के एक फ़रज़न्द सैय्यदना इब्राहीम रज़िअल्लाह तआला अन्हु आपसे ही पैदा हुएँ!

इन अज़वाज मुत्तहारात मे से हज़रत ख़दीजा कुबरा और हज़रत ज़ैनब बिंत खुज़ैमा रज़िअल्लाह तआला अन्हमा ने रसूल अल्लाह सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के रेहलत मुबारक से क़ब्ल वफ़ात पाई, बाक़ी अज़वाजे मुत्तहारात हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के रेहलते मुबारक के वक़्त मौजूद थीं!

औलाद मुबारक—

 

(1) हज़रत सैय्यदना क़ासिम रज़िअल्लाह तआला अन्हु – आप रसूलअल्लाह सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के सबसे बड़े शहज़ादे हैं जो कि सैय्यदा ख़दीजा बिंत खुवैलद रज़िअल्लाह तआला अन्हा के बत्न अक़दस से पैदा हुएँ, आपही के वजह से हुज़ूर पुर नूर सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने अबुल क़ासिम कुन्नियत अख़्तियार फ़रमाई, आप ऐलाने नबूवत से क़ब्ल पैदा हुएँ, जब आपकी उम्र मुबारक दो साल की हुई तो आप पर्दा फ़रमा गए!

 

(2) हज़रत सैय्यदना अब्दुल्लाह उर्फ़ तय्यब ताहिर रज़िअल्लाह तआला अन्हु- आप ऐलाने नबूवत के बाद हुज़ूरपुर नूर सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के घर मे जलवागर हुएँ, आप भी हज़रत सैय्यदा ख़दीजा रज़िअल्लाह तआला अन्हा के बत्ने अक़दस से पैदा हुएँ और अहदे तफ़ूलियत मे ही पर्दा फ़रमा गए, जब इनकी रेहलत मुबारका की ख़बर शहर मक्कह मे मशहूर हुई तो बदबख्त आस बिन वाएल ने कहा मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के दोनो बेटे छोटी उम्र मे वफ़ात पा गए अब ये (माज़अल्लाह) अबतर हो गए है यानी न इनकी नस्ल बाक़ी रहेगी और ना ही इनका नाम लेवा होगा क्योंकि अबतर के माईने अपनी नस्ल बाक़ी ना रखने वाला, दुम कटा, बेफ़रज़न्द और बे नाम के है , आस बिन वाएल के इस गुस्ताख़ी के जवाब मे रब्बे ज़ुलजलाल ने सूरत अल क़ौसर का नज़ूल फ़रमाया जिसमे वाज़ेह तौर पर ये ऐलान फ़रमाया दिया गया कि (ऐ महबूब सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम) आप तो साहिबे क़ौसर है जबकि (इन्ना शानियका हुवल अबतर) यानी ये बात शक व शुबहा से बालातर है कि आपका हर दुशमन चाहे वोह आस बिन वाएल हो या चाहे कोई और वही अबतर है यानी इज़्ज़त और अज़मत से तहे-दामन और नस्ल से दुम कटा है! गोया वोह बदनसीब दोनो जहाँ मे बरबाद हो गया जबकि रसूल अल्लाह सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की शान इस तरह बयान किया गया-  الْكَوْثَرَ أَعْطَيْنَاكَ إِنَّا

उलेमाएकिराम ने क़ौसर का कई माईना बताया है जिसमे एक ये भी है की आपके औलादों का क़सरत से होना (अलहम्दुलिल्लाह) आज पूरे दुनिया मे इमाम हसन और इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम से आपकी नस्ल फैली हुई है और पूरी रूहेज़मीं सैय्यदों के आला वजूद से लबरेज़ है, और दूसरा माईना ये है कि दोनो जहान की सारी भलाईयां जो क़सरत मे इतनी अज़ीम है कि मख़लूक के इल्म की वहा तक रसाई ही मुमकिन नही और मख़लूक मे जो भी कोई बयान करता है, वोह शाने रिसालत सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के इस बहरेअज़ीम के मुक़ाबले मे एक क़तरह भी नही, ज़ाहिर है कि जिसकी शान ख़ुद ख़ालिके कायनात अपने ज़ुबाने क़ुदरत से बयान फ़रमाए उस शान को “कमा हक़्क़हु” बयान करना किसी इन्सान और दीगर मख़लूक के बस का रोग नही और जहाँ तक जन्नत के नहर हौज़े-क़ौसर का ताल्लुक़ है तो वोह मेरे आक़ा और मौला रसूले अरबी सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम को मिलने वाली ख़ैर कसीर का एक क़तरह है!

 

(3) हज़रत सैय्यदना इब्राहीम रज़िअल्लाह तआला अन्हु- आप सैय्यदा मारिया क़िबतिया रज़िअल्लाह तआला अन्हा के बत्ने अक़दस से पैदा हुएँ, आप सन् आठ हिजरी ज़िलहिज्जातुल मुकर्रम मे पैदा हुएँ, आपके पैदाइश के वक़्त हज़रत जिब्रील अलैहिस्सलाम बारगाहे रिसालत सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम मे हाज़िरे खिदमत हुए, और सरकार दोआलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम को ”या अबा इब्राहीम” कह कर मुख़ातिब किया हुज़ूर सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम इस कुन्नियत पर बहुत ख़ुश हुए और लख़्तेजिगर का नाम अपने जद् बुज़ुर्गवार हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम के नाम पर इब्राहीम रखा! हज़रत इब्राहीम रज़िअल्लाह तआला अन्हु की उम्र मुबारक अभि सतरह या अठ्ठारह माह की थी कि सन् दस हिजरी मे आपका विसाल हो गया!

 

(4) हज़रत सैय्यदा ज़ैनब रज़िअल्लाह तआला अन्हा- आप रसूले पाक सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की औलाद पाक मे सैय्यदना क़ासिम के बाद सबसे बड़ी शहज़ादी हैं, आपकी विलादत बासआदत रसूल अल्लाह सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की सैय्यदा ख़दीजा रज़िअल्लाह ताला अन्हा के साथ शादी के पांचवे साल हुई, इस वक़्त हुज़ूर पुर नूर सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम कि उम्र शरीफ़ तीस बरस की थी! आपकी शादी रसूल अल्लाह सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने कमसिनि मे ऐलाने नबूवत के क़ब्ल अबुलआस बिन रबिइ बिन अब्दुल उज़ा बिन अब्दुल शम्स बिन अब्दे मुनाफ़ के साथ हज़रत उम्मुल मोमिनीन सैय्यदा ख़दीजा रज़िअल्लाह तआला अन्हा के ख़्वाहिश पर की!

हज़रत सैय्यदा ज़ैनब रज़िअल्लाह तआला अन्हा को अल्लाह तबारको तआला ने दो औलादों से नवाज़ा एक बेटा जिनका नाम हज़रत अली बिन अबुल आस था और एक बेटी जिनका नाम हज़रत सैय्यदा इमामा रज़िअल्लाह तआला अन्हा था, आपको हुज़ूर पुर नूर सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम और हज़रत सैय्यदा फ़ातिमा ज़हरा रज़िअल्लाह तआला अन्हा बेहद मोहब्बत फ़रमाते थे, और आपही के लिए बीबी फ़ातिमा ज़हरा रज़िअल्लाह तआला अन्हा ने हज़रत अली करमअल्लाह वजहुल करीम से अपने ज़िन्दगी मे ये नसीहत की थी के मेरे बाद हसनैन करीमैन के परवरिश के लिये निकाह फ़रमा लीजियेगा! हज़रत सैय्यदा ज़ैनब रज़िअल्लाह तआला अन्हा का विसाल सन् आठ हिजरी मे हुआ!

 

(5) हज़रत सैय्यदा रुक़य्या रज़िअल्लाह तआला अन्हा- हुज़ूर पुर नूर सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के तैंतीसवे साल यानी ऐलाने नबूवत फ़रमाने से क़ब्ल हज़रत सैय्यदा ख़दीजा रज़िअल्लाह तआला अन्हा के बत्ने अक़दस से पैदा हुई,  हुज़ूर पुर नूर सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने आपकी शादी ऐलाने नबूवत के क़ब्ल अपने चचा अबु लहब के बेटे उत्बा से कर दिया था, और आपकी दूसरी बहन सैय्यदा उम्मे क़ुलसूम रज़िअल्लाह तआला अन्हा की शादी अबु लहब के दूसरे बेटे उतैबा से हुई थी, जब रसूल अल्लाह सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने ऐलाने नबूवत फ़रमाया तो कुफ़्फ़ारे मक्कह अबुल आस बिन रबिइया, उत्बा बिन अबु लहब और उतैबा बिन अबु लहब को तरग़ीब दी कि वोह रसूल अल्लाह सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की शहज़ादियों को तलाक़ देदे, अबुल-आस ने तो इससे इन्कार कर दिया लेकिन अबु लहब के दोनो बदबख़्त बेटो ने इस बात को मान लिया, और आप सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के बारगाह मे हाज़िर होकर गुस्ताख़ाना लहजे मे रसूल अल्लाह सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम से मुख़ातिब होकर सैय्यदा रुक़य्या रज़िअल्लाह तआला अन्हा को तलाक़ देदिया, और इस बदबख़्त ने सरकार दो आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम का कुर्ता मुबारक चाक कर दिया और अपना नापाक थूक इमामुल ताहिरीन सैय्यदुल मुरसलीन सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के जानिब फेका और कहा के मैने रुक़य्या को तलाक़ दिया, इसकी इस हरकत पर रसूले बरहक़ सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की ज़बान मुबारक से अल्लाह तआला ने ये जुमला निकाल दिया-  بِكَ کلآ مِن  کَلبًا عَلَيهِ سَلِّطُ اَلّلهُمَّ

“ऐ अल्लाह ताला इस (मलऊन) पर अपने कुत्तो मे से एक कुत्ता मुसल्लत फ़रमा दे! उस वक़्त हज़रत अबु तालिब मजलिसे शरीफ़ा मे मौजूद थे इन्होने उत्बा बिन अबु लहब से फ़रमाया – मै नही जानता कि अब कौनसी चीज़ तुझे इस दुआ के तीर से बचा सकेगी!

अलग़रज़ ये सियाह बातिन अपने बदबख्त बाप के साथ मुल्के शाम के तरफ़ तिजारत के ग़रज़ से रवाना हुआ तो रास्ते मे एक जंगल मे हस्बे साबिक़ पड़ाओ किया, अबु लहब ने अहले क़ाफ़ला से कहा के आज रात तुम सब मेरी मदद करो क्योंकि मुझे अंदेशा है कि कही आज हज़रत मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की दुआ मेरे बेटे के हक़ मे असर ना कर जाए, इसपर सब अहले क़ाफ़ला ने ऊंटो पर लदा हुआ माले तिजारत एक जगह जमा कर दिया और एक बुलंद चबुतरा बनाया फिर उसके ऊपर पूरी हिफ़ाज़त के साथ उत्बा के लिये सोने की जगह बना दी और खुद इसके इर्द-गिर्द घेरा डाल कर बैठ गए, जब ये अपना इन्तेज़ाम कर चुके तो अल्लाह ने इनपर नींद ग़ालिब कर दिया, इसके बाद एक शेर आया, इसने इनमे से एक-एक के मूंह को सूंघा मगर इनमे से किसी को कुछ न कहा, फिर उसने छ्लांग लगाई और माल-ए-तिजारत के उस ढेर पर चढ़ गया जहां उत्बा सोया हुआ था, शेर ने उसे गर्दन से जा दबोचा और टुकड़े-टुकड़े कर दिया!

सैय्यदा रुक़य्या रज़िअल्लाह तआला अन्हा की दोबारा शादी हज़रत सैय्यदना उस्मान ग़नी रज़िअल्लाह तआला अन्हु से हुई और आप सैय्यदा से हज़रत उस्मान ग़नी रज़िअल्लाह तआला अन्हु को अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त ने एक फ़र्ज़न्द नवाज़ा जिनका इस्म शरीफ़ हज़रत अब्दुल्लाह रज़िअल्लाह ताला अन्हु था और इनही के वजह से हज़रत उसमान ग़नी रज़िअल्लाह ताला अन्हु की कुन्नियत अबु-अब्दुल्लाह थी, आपका छ: बरस कि उम्र मे ही इन्तक़ाल हो गया!

हज़रत सैय्यदा रुक़य्या रज़िअल्लाह तआला अन्हा का सन् दो हिजरी मे विसाल हो गया!

 

(6) हज़रत सैय्यदा उम्मे क़ुलसूम रज़िअल्लाह तआला अन्हा- आप सैय्यदा का निकाह अव्वल अबु लहब के बेटे उतैबा से हुआ था लेकिन अभी रुख़सति नही हुई थी की तलाक़ हो गया था, और ये अल्लाह तबारको तआला का मख़सूस इनआम व इकराम था कि रब्बे दो जहाँ ने दोनो शहज़ादियों सैय्यदा रुक़य्या और सैय्यदा उम्मे क़ुलसूम को दुश्मने हक़ अबु लहब के घर मे जाने से बचा लिया!

जब दो हिजरी मे हज़रत सैय्यदा रुक़य्या रज़िअल्लाह तआला अन्हा का विसाल हो गया तो हज़रत उसमान ग़नी रज़िअल्लाह तआला अन्हु बहुत रंजीदा रहने लगे जब हुज़ूर सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने आपकी ये हालत देखा तो इरशाद फ़रमाया, क्या वजह है कि मै तुमको हर वक़्त रन्जो अलम मे डूबा हुआ देखता हूँ, हज़रत उसमान ग़नी ने फ़रमाया आपकी शहज़ादी के विसाल ने मेरी कमर तोड़ दिया है, क्योंकि जो रिश्ता क़राबत आप अलैहिस्सलातो वस्सलाम से वाबस्ता था, अब वोह मुनक़ता (तूट) गया है, और मै इस शर्फ़ से महरूम हो गया हूँ अभी हज़रत उसमान ग़नी रज़िअल्लाह तआला अन्हु कि ये पुरमलाल गुफ़्तगू मुकम्मल ना हुई थी के रसूलअल्लाह सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने फ़रमाया, उसमान ये देखो जिब्रील अमीन मुझे अल्लाह तआला का ये हुक्म पहुंचा रहे है कि मै अपनी बेटी उम्मे क़ुलसूम को उसी महर पर जो मेरी बेटी रुक़य्या का था तुम्हारे अक़्द मे देंदू! चुनांचे रसूलअल्लाह सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने माहे रबिउल अव्वल शरीफ़ की तीन हिजरी को जनाब सैय्यदा उम्मे क़ुलसूम रज़िअल्लाह तआला अन्हा को हज़रत उसमान ग़नी रज़िअल्लाह तआला अन्हु के अक़्द मे दे दिया और निकाह के दो माह बाद जमादुल आख़िर सन् दो हिजरी मे रुख़सति अमल मे आई, हुज़ूर सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की दो शहज़ादियों के यका बाद दीगरे सैय्यदना उसमान ग़नी रज़िअल्लाह तआला अन्हु के अक़्द मे आने के सबब आपका लक़ब “ज़ुन्नूरैन” यानी दो नूरो वाले पड़ गया!

आप सैय्यदा उम्मे क़ुलसूम रज़िअल्लाह तआला अन्हा के यहां कोई औलाद नही हुई और आपका विसाल माहे शाबाने मोअज़्ज़म सन् नौ हिजरी मे हुआ!

Islamic beliefs about Prophet Muhammad ﷺ

♦ It is the basic requirement in Islam that to love Allah and Prophet Muhammad ﷺ more than all others. If someone does not love Prophet Muhammad ﷺ more than others, then he will not be considered as a faithful Muslim.

Prophet Muhammad ﷺ said “None of you will have faith till he loves me more than his father, his children and all mankind.”

Book – Sahih al Bukhari Volume 001, Book 002, Hadith Number 014

♦ Also it is the Islamic fundamental belief that the Prophet Muhammad ﷺ is Hayatun Nabi (He is still alive in his holy grave). Not only him, all the Prophets, companions of Prophet and all the righteous Muslims who martyred for Islam are still alive in their graves.

Since Allah says in Al Quran;

“And say not of those who are slain (martyred) in the way of Allah, “they are dead”, nay, they are living, though you perceive it not” [Surah al-Baqarah, 154]

The above verse says about the martyred. According to Islamic teachings, Prophets and companions are above and beyond the status of Martyred. They ranked number one and two respectively.

That is why, from all over the world every minutes, Muslims say salam and recite blessings (Salawat) upon our Prophet Muhammad ﷺ and send to him. It is said that in Islam, Prophet Muhammad ﷺ replies to our salam.

♦ Further, it is the Islamic belief that even though Prophet Muhammad ﷺ is a human being but should not be considered or said as a common man or ordinary man like us. It will nullify our faith (Imaan). That is why, Muslims respect Prophet Muhammad ﷺ in greatest extend comparing to all other human beings.

♦ Also Muslims believe that Allah has given the knowledge of unseen (Ilmul Ghaib) to his Prophet Muhammad ﷺ. However, it is not possible nor permissible rather it is Kufr (Disbelief) to say that the Prophet’s ﷺ knowledge of the Unseen (Ghayb) is equal to that of Allah – or even like the knowledge of Allah, since Allah’s knowledge is His own and the Prophet’s ﷺ knowledge has been given/granted to him by Allah.

Prophet Muhammad ﷺ is the best role model for the righteous and successful life in this world and hereafter. There cannot find best alternative to him in the history ever. Even the non-Muslim scholars have agreed upon this.

According to renowned Christian scholar Michael H. Hart’s most popular book “The 100: A Ranking of the Most Influential Persons in History”, Hart attributes this to the fact that Muhammad ﷺ was “supremely successful” in both the religious and secular realms. He also accredits Muhammad ﷺ for his role in the development of Islam, far more influential than Jesus’ collaboration in the development of Christianity.Let’s love and follow our beloved Prophet Muhammad ﷺ in our life.

May the peace and blessings of Allah be upon our most beloved Prophet Muhammad ﷺ.

Read full biography of Beloved Prophet ﷺ

E-Book​​​ : Prophet Muhammad Sallallahu Alaihiwasallam

Author : Imam Ibn Kathir (RadhiAllahu Anhu)​​

PROPHET IBRAHIM ( علیھ السلا م )


It is reported that Hadhrat Ibrahim ( علیھ السلا م )  grew up under the guardianship of his uncle Azar (father’s brother), because his father,Tareq died when he was very young. 

However, Salafis and their like minded groups contradict these reports and claim that Azar was the real father of Ibrahim ( علیھ السلا م ). We have discussed this issue in the light of Quran and Ahadith.

(1) It is in Quran – أَمْ كُنتُمْ شُهَدَاءَ إِذْ حَضَرَ يَعْقُوبَ الْمَوْتُ إِذْ قَالَ لِبَنِيهِ مَا تَعْبُدُونَ مِن بَعْدِي قَالُوا نَعْبُدُ إِلَـٰهَكَ وَإِلَـٰهَ آبَائِكَ إِبْرَاهِيمَ وَإِسْمَاعِيلَ وَإِسْحَاقَ إِلَـٰهًا وَاحِدًا وَنَحْنُ لَهُ مُسْلِمُونَ [Meaning –  Nay! were you witness when death visited Yaqoub ( علیھ السلا م ), when he said to his sons: What will you serve (worship) after me? They said: We will serve (worship) your God and the God of your fathers; Ibrahim ( علیھ السلا م ) and Ismail ( علیھ السلا م ) and Ishaq ( علیھ السلا م ); one God only, and to Him do we submit.] ( Al-Baqara – 133).

In the above verse, the sons of Yaqoub ( علیھ السلا م ) are referring to, both Ishaq ( علیھ السلا م ) and  Ismail ( علیھ السلا م ),  as their fathers ( آبَائِكَ  ).  Ishaq ( علیھ السلا م ) is their grand father, and Ismail ( علیھ السلا م )  is the brother of Ishaq ( علیھ السلا م ). Thus, it is proved that the word ( أبي ) is used in Quran for both biological father,  and brother of father.

(2) It is in Quran – وَإِذْ قَالَ إِبْرَاهِيمُ لِأَبِيهِ آزَرَ أَتَتَّخِذُ أَصْنَامًا آلِهَةً ۖ إِنِّي أَرَاكَ وَقَوْمَكَ فِي ضَلَالٍ مُّبِينٍ  [ Meaning – And when Ibrahim ( علیھ السلا م ) said to his father, Azar : Do you take idols for gods? Surely I see you and your people in manifest error] (Al-Anaam – 74).

The literal meanings of this verse  that comes to a reader’s mind are : Ibrahim ( علیھ السلا م ) said to his father whose name was Azar. But as per the rules of laconic usage, descriptive linguistics and rhetoric, this is a wrong understanding  because it is mentioned that “Ibrahim ( علیھ السلا م ) said to his father, Azar”, which denotes different meanings.

Like, we never say, “My father,  Husain, is coming”.  We only say “My father is coming”.

If we talk of a relationship and a name at the same time, people will understand that there are more than one person associated with that relationship. If we have only one person associated with the relationship (like father), we will only say, “My father is coming”. 

Arabic word ( أبي ) is commonly used for biological father, or ‘step father’ or ‘brother of father’. Like in Indian Sub Continent, many children call their father Papa. And they call, elder brother of their father, Abbu, Bade Papa, etc. Similarly, in English language, people use ‘father’ to denote different relationships; like ‘father figure’, ‘father of nation’, ‘god father’, ‘grand father’, ‘heavenly father’, etc. 

If Azar was the biological father of Ibrahim ( علیھ السلا م ), it would have been enough to say, “He said to his father”  or “He said to Azar”.  But the Quranic verse emphasizes“Ibrahim ( علیھ السلا م ) said to his father, Azar”.  This shows that Azar was not biological father of Ibrahim ( علیھ السلا م )

(3) It is in Quran – وَمَا كَانَ اسْتِغْفَارُ إِبْرَاهِيمَ لِأَبِيهِ إِلَّا عَن مَّوْعِدَةٍ وَعَدَهَا إِيَّاهُ فَلَمَّا تَبَيَّنَ لَهُ أَنَّهُ عَدُوٌّ لِّلَّهِ تَبَرَّأَ مِنْهُ ۚ إِنَّ إِبْرَاهِيمَ لَأَوَّاهٌ حَلِيمٌ [ Meaning – Ibrahim ( علیھ السلا م ) would not have asked forgiveness for his father but for a promise he made to him, and when it became clear to him that he was an enemy of Allah(سبحانہ و تعا لی), he renounced him. Ibrahim ( علیھ السلا م ) was tender-hearted and forbearing.] (At-Tauba -114).

Read the above verse carefully;  it says Ibrahim ( علیھ السلا م ) would not have asked forgiveness for his father but for a promise he made to him”.

Remember, we do not pray for our parents because we make a promise to them.  We do it as mandatory and obligatory on us.  We might make a promise to our relatives that we will do dua for them in a specific issue. Thus, the verse shows the relationship of Ibrahim ( علیھ السلا م ) with Azar, was not that of son and real father, rather it was the relationship between two relatives. He asked for forgiveness for (his uncle) Azar because he promised him once.  But when Ibrahim ( علیھ السلا م ) realized that he was an Idol worshiper and the enemy of Allah (سبحانہ و تعا لی), he renounced him.

(4) It is in Hadith – Anas Ibn Malik (رضئ اللہ تعالی عنہ) narrates that one day Prophet (صلى الله عليه و آله وسلم) stood on the pulpit and informed (sahabah) the names of his ancestors: 

The Prophet (صلى الله عليه و آله وسلم) said: Ana, Mohammad Ibn Abdullah, bin Abdul Muttalib, bin Hashim, bin Abd Manaf, bin Qusa’i, binKilab, bin Murra, bin Ka’b, bin Lu’ayy, bin Ghalib, bin Fihr, binMalik, bin an-Nadr, bin Kinanah, bin Khuzaimah, bin Mudrikah, binElias, bin Mudar, bin Nizar, bin Ma’ad,  bin Adnan, bin Udad, binAsha’b, bin Saleh, bin Salooq, bin Hameesa, bin Nabad, bin Khizaar, bin Ismail ( علیھ السلا م ), bin Ibrahim ( علیھ السلا م )bin Tariq. 

(Baihaqi, Hakim, Ahmed, Ibn Kathir in Bidaya wan Nihaya and Ibn Asakir also narrated this Hadith).

It is clear from the above Hadith that the father of Ibrahim ( علیھ السلا م ) was Tariq, a Momin;  while his uncle Azar was an Idol worshiper.

(5) It is in Quran – رَبَّنَا اغْفِرْ لِي وَلِوَالِدَيَّ وَلِلْمُؤْمِنِينَ يَوْمَ يَقُومُ الْحِسَابُ   [Meaning – O our Lord! grant me protection and my parents and the believers on the day when the reckoning shall come to pass! ] (Ibrahim – 41).

In the above verse, Ibrahim ( علیھ السلا م ) is praying for protection for himself, his both parents (who were Momineen) and general believers on the Day of Judgment. This Quranic verse shows Azar, who was an Idol worshiper, was not the father of Ibrahim ( علیھ السلا م ).

(6) Ibn Kathir has written in al-Bidaya wan Nihaya –  Ibrahim ( علیھ السلا م ) was the son of Tariq.  When Tareq was 75 years old, Ibrahim ( علیھ السلا م ) was born to him.  (al-Bidaya wan Nihaya, vol 1, page 139)

(7) Ibn Jarir al-Tabari in his Tafsir and History book has mentioned that – Azar was not the father of Ibrahim ( علیھ السلا م ). ( History of Tabari, Vol. 1,Page 119.  and Tafsir-e-Tabari by Ibn Jarir al-Tabari, Vol. 7, page 158).

(8) Hadhrat Mohammad Abdul Qadeer Siddiqui (r) has written in his Tafseer-e-Siddiqui that Azar was the brother of the father of Ibrahim ( علیھ السلا م ).  (Tafseer-e-Siddiqui) 

ALL ANCESTORS OF

PROPHET MOHAMMAD (صلى الله عليه و آله وسلم)

PROSTRATED BEFORE ALLAH (سبحانہ و تعا لی)

(1) It is in Quran – وَتَقَلُّبَكَ فِي السَّاجِدِينَ  [ Meaning –  And your turning over and over among those who prostrate themselves before Allah.] (Ash Shuara – 219)

Imam Fakr al-Din Razi  wrote, ‘Verily the fathers of the prophets were not disbelievers, because of the saying of Allah (سبحانہ و تعا لی) “He is the One who sees you when you stand; and when you were transferred in the loins of the prostrating ones”. The meaning is that Noor-e-Mohammadi (صلى الله عليه و آله وسلم) transferred from one prostrating one to the next, proving that all forefathers of Mohammad (صلى الله عليه و آله وسلم) were Muslims.’ (Seerah Halbiyya. Imam Muhammad Abu Zuhra, vol. I, p. 103).

(2)  It is in Hadith – “You (Prophet Mohammad – صلى الله عليه و آله وسلم ) descend from the best men of each century.”(Bukhari)

Mullah Jami says: “The holy light shown on the forehead of Hadhrat Adam ( علیھ السلا م ) because he had a particle of Mohammad صلى الله عليه و آله وسلم ). That particle was transferred to Eve ( علیھ السلا م ), to Seth ( علیھ السلا م ).  And then to clean women from clean men,  and to clean men from clean women. That holy light was transferred to foreheads from foreheads together with that particle.” (Shawahid)

(3)  It is in Hadith – The Prophet صلى الله عليه و آله وسلم ) said –“Allah (سبحانہ و تعا لی) chose Kinanah among the sons of Ismail ( علیھ السلا م ), the Quraish among the sons of Kinana and sons of Hashim among the Quraysh. And He chose me among them.” (Muslim)

(4)  It is in Hadith – The Prophet صلى الله عليه و آله وسلم ) said –“I descend from the best people. My ancestors are the best people.” (Tirmidhi)

(5) It is in Hadith – The Prophet صلى الله عليه و آله وسلم ) said –“Allah (سبحانہ و تعا لی) chose me among the distinguished people of Arabia. I descend from the best people.”(Tabarani) 

(6) It is in Hadith – Ibn Abbas (رضئ اللہ تعالی عنہ) narrated : “I transferred you from the generation of one prophet to the generation of another prophet. If a father had two sons, the Messenger of Allah ( صلى الله عليه و آله وسلم ) descended from the one that had the Prophet-hood.”  ( Mawahib al-Ladunniyyah  )

(7) It is in Hadith – The Prophet صلى الله عليه و آله وسلم ) said – “None of my grandparents committed fornication. I descend from the best fathers and clean mothers. If one of my grandfathers had two sons, I descended from the better one.” ( Mawahib al-Ladunniyyah  )

(8) It is in Hadith – The Prophet صلى الله عليه و آله وسلم ) said –“All of my ancestors beginning from Adam ( علیھ السلا م )were married couples. I am the best of you in terms of ancestors.” (Daylami)

(9) It is in Hadith – The Prophet صلى الله عليه و آله وسلم ) said –“I am the most honorable person among people. I am not saying it in order to boast.” (Daylami)

(10) It is in Hadith – Suyuti reported in “Al-Jami‘ Al-Saghir” on the authority of `Ali, (رضئ اللہ تعالی عنہ) that the Prophet صلى الله عليه و آله وسلم ) said: “I was born of the best and noblest lineage after lineage, and nothing of the fornication of Jahiliyyah (pre-Islamic time of ignorance) touched my birth.” Tabarani in “Al-Awsat”. Haythami said: The chain of Narrators of this Hadith have been authenticated by Hakim.

(11) It is in Hadith – Abu Nua’im writes in Dala’il al-Nabuwwa, with the chain of Ibn Abbas (رضئ اللہ تعالی عنہ)that the Prophet صلى الله عليه و آله وسلم ) said, ‘Allah (سبحانہ و تعا لی) continued to transfer me from the loins of the pure to the wombs of the pure, clean and mannered. No two groups have appeared except I was the best of the two.’

(12) It is in Hadith – Imam Tirmidhi has recorded a Hadith which he classified as Hasan, as well as Imam Baihaqi from Abbas ibn Abd al-Muttalib (رضئ اللہ تعالی عنہ) that the Prophet صلى الله عليه و آله وسلم ) said :  “When Allah (سبحانہ و تعا لی) created me, He made me from the best of creations. Then when He created the tribes, He made me from the best of tribes. And when He created souls He made me from the best of souls. Then when He created households, He made me from the best of households. Thus I am the best in terms of household, and the best in terms of souls.’ 

(13) It is in Hadith –  Imam Tabrani writes in Awsat and Imam Baihaqi in Dala’il, from Ummul Momineen Aisha(رضئ اللہ تعالی عنہا)  that the Prophet صلى الله عليه و آله وسلم )said:  “Jibreel ( علیھ السلا م ) said to me, I have searched the Earth, the Easts and the Wests, and I did not find a man better than Muhammad صلى الله عليه و آله وسلم ), and I did not find a clan better than the clan of Bani Hashim.”

After citing the above narration, Imam Suyuti includes the saying of Imam Ibn Hajar : ‘Imam Ibn Hajar said, ‘And it is known that being the best, being the chosen and preferred, comes from Allah (سبحانہ و تعا لی). And in the eyes of Allah (سبحانہ و تعا لی), being the best cannot occur with Shirk (polytheism).
 

(14) It is in Quran –  يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا إِنَّمَا الْمُشْرِكُونَ نَجَسٌ [Meaning – O you who believe! the idolaters are nothing but unclean.](At Tauba – 28)

(15) It is reported that before the fall of Makkah, Abu Sufyan (who had not accepted Islam then) went to visit Ummul Momineen, Umm-e-Habibah (رضئ اللہ تعالی عنہا) who was his daughter. He wanted to sit down on the bedding of the Prophet Mohammad صلى الله عليه و آله وسلم ), but Umm-e-Habibah (رضئ اللہ تعالی عنہا) did not allow her father to sit on it as he was an unbeliever. She said, “You are a polytheist and hence unclean and this is a pure, clean bedding of the Prophet صلى الله عليه و آله وسلم )”.

All Quranic verses and Ahadith mentioned above confirm the fact that Prophet’s صلى الله عليه و آله وسلم ) Grandfather Hadhrat Abdul Muttalib (رضئ اللہ تعالی عنہ) and his Father Abdullah bin Abdul Mutallib (رضئ اللہ تعالی عنہ) and all his ancestors till Adam ( علیھ السلا م ) were either Prophets or among the people who were clean and Honorable Momineen.

 SCHOLARS’ OPINIONS

 

(i) Imam Jalal al-Din Suyuti wrote in his book Masalak al-Hunafa : “The proof is based on two elements. Firstly, it is proven from authentic Ahadith that from the time of Adam( علیھ السلا م ) to Abdullah (رضئ اللہ تعالی عنہ) ( Prophet’s  صلى الله عليه و آله وسلم  father), the Prophet’s صلى الله عليه و آله وسلم ),lineage were the best people. No one was better than his lineage in any generation.

Secondly, it is proven from Ahadith that from the time of Adam ( علیھ السلا م ) up till the time of Abdullah (رضئ اللہ تعالی عنہ) , there was no period in which at least some people of Fitra existed, who worshiped Allah (سبحانہ و تعا لی), performed Salah for Him and thus, through their means and blessings,  the Earth was preserved (from destruction). If it was not for them, the Earth and all above it, would have perished. If we hypothetically assume that some of the forefathers of the Prophet ( صلى الله عليه و آله وسلم ) were polytheists, then we must ask; were they still better than the others of that generation or not? If his fathers were still deemed better, then this necessitates that a polytheist and disbeliever is better than a Muslim! This hypothesis can never be accepted. And if others from previous generations were better than the Prophet’s صلى الله عليه و آله وسلم )forefathers, then this too is unacceptable because it has been proven from authentic Ahadith that his ancestors were the best of each generation. Therefore, it can only be understood and concluded that the forefathers of the Prophet صلى الله عليه و آله وسلم ) were all monotheists and believers, and were the best of their generations.


(ii) Imam Abd al-Razzaq wrote in al-Musannaf, from the chain of Ma’mar, from Ibn Juraij, from Ibn al-Mussaiyab; Ali ibn Abu Talib 
(رضئ اللہ تعالی عنہ) said : “The Earth has continuously been occupied with at least seven Muslims or more. If this was not the case, the Earth and its inhabitants would have perished.’ 

The chain of the above narration is authentic (Sahih) according to the conditions set by Imam Bukhari and Imam Muslim, and though it is saying of Ali (رضئ اللہ تعالی عنہ), we assume he must have heard it from the Prophet صلى الله عليه و آله وسلم ).

(iii) Ibn al-Munzir 
has mentioned in his Exegesis with a sound chain, from Ibn Juraij in the commentary of the verse [ رَبِّ اجْعَلْنِي مُقِيمَ الصَّلَاةِ وَمِن ذُرِّيَّتِي ۚ رَبَّنَا وَتَقَبَّلْ دُعَاءِ  – Meaning – O’ Allah! make me (Ibrahim 
علیھ السلا م ) one who establishes regular Prayer, and also (raise such) among my offspring O our Lord! and accept Thou my Prayer.] (Ibrahim – 40); he said, ‘there has remained from the offspring of Ibrahim (علیھ السلا م ) to our Prophet صلى الله عليه و آله وسلم ) people on Fitra who have worshiped Allah (سبحانہ و تعا لی).

WHAT IS FITRA

AND WHO ARE THE PEOPLE OF FITRA

Some scholars say that Prophet Mohammad’s صلى الله عليه و آله وسلم ) parents and close ancestors are the people of Fitra.

FITRA ( فطرة ) is an Arabic word which means ‘natural disposition’.  Human beings are born with an innate inclination towards Tawhid (Oneness of God), which is inbuilt in their fitra (nature); along with intelligence and all other attributes that are required to be human. 

In the context of our discussion, the people of Fitra can be divided into following three major categories.

(i) The people, through their own natural disposition and enlightened insight, were able to deduce the oneness of Allah (سبحانہ و تعا لی).

(ii) People who diverted from the religion of Ibrahim علیھ السلا م ) and began worshiping idols, like Makkan Pagans. Such people are destined for Hell Fire.

(iii) In view of lack of knowledge and disregard, some people refrained from accepting other beliefs and remained firm on monotheism. They did not indulge in polytheism or idol worship. These are the people who fall under the verse  وَمَا كُنَّا مُعَذِّبِينَ حَتَّىٰ نَبْعَثَ رَسُولًا  [ Meaning – And We do not torment until We send a Prophet.] (Al-Isra – 15).


Some scholars say that Prophet’s 
صلى الله عليه و آله وسلم )parents belonged to the third category of Fitra.  No prophet was sent to them from the time of Ismail علیھ السلا م ) up till the official announcement of Prophet-hood of Mohammad (صلى الله عليه و آله وسلم ), nor did they perform any act associated with disbelief or polytheism.  Therefore, their salvation is a certainty.

Some other scholars say that Allah (سبحانہ و تعا لی)resurrected Prophet’s  صلى الله عليه و آله وسلم ) parents (after their deaths) and they confirmed faith in him. This way they have been saved. This opinion is held by Ibn Shaahin, Abu Bakr al-Khatib al-Baghdadi, Sohaili, Qurtubi, Muhibb Tabri, Nasir al-Din Ibn al-Munzir, etc.

However, we have proved, beyond doubt, in the light of Quran and Ahadith, that all ancestors of Prophet Mohammad صلى الله عليه و آله وسلم ), from Adam علیھ السلا م )till Abdullah (رضئ اللہ تعالی عنہ), were either Prophets or virtuous Momineen and were best among their people. Therefore, they are the recipients of unlimited bounties in Hereafter. We consider it a sin to even discuss about their salvation.

 

 CORRECT UNDERSTANDING OF AHADITH

(1) It is in Hadith –  Narrated Anas (رضئ اللہ تعالی عنہ) that a man said : ” O’ Messenger of Allah صلى الله عليه و آله وسلم ), where is my father?  He said : “In Hell”. When he turned away, he called him back and said : “My father and your father are in Hell ( أبي و أأبوك في النار  )”.  (Muslim, Book 1, 398)

Salafis and their like minded Groups,  take the literal meanings of the above Hadith to prove that Ma’azallah, Astaghfirullah, Prophet’s صلى الله عليه و آله وسلم ) father is in Hell. 

If you take literal meanings of this Hadith, you will have to deny many many authentic Ahadith and Quranic verses mentioned above.

We have proved, in the light of Quran and Ahadith that the word ( أبي ) is used in Arabic for both father and the brother of the father.  In the above Hadith, the Prophet صلى الله عليه و آله وسلم ) is consoling the person that the person’s father and the Prophet’s صلى الله عليه و آله وسلم )uncle, both are in Hell.

(2) It is in Hadith – Abu Huraira (رضئ اللہ تعالی عنہ) reported Allah’s Messenger صلى الله عليه و آله وسلم ) as saying – “I sought permission to beg forgiveness for my mother, but He did not grant it.  I sought permission from Him to visit her grave, and He granted it (permission) to me”. (Muslim)

Salafis and their like minded Groups misinterpret the above Hadith to prove that Ma’azallah, Astaghfirullah, Prophet’s صلى الله عليه و آله وسلم ) mother is in Hell.

Read the following Quranic verse to understand the correct meaning of this Hadith.

(3) It is in Quran –  وَلَا تُصَلِّ عَلَىٰ أَحَدٍ مِّنْهُم مَّاتَ أَبَدًا وَلَا تَقُمْ عَلَىٰ قَبْرِهِ ۖ إِنَّهُمْ كَفَرُوا بِاللَّهِ وَرَسُولِهِ  وَمَاتُوا وَهُمْ فَاسِقُون [Meaning  – ‘And never, (O’ Prophet –  صلى الله عليه و آله وسلم)  pray (funeral prayer) for anyone of them that dies, nor stand at his Grave. Certainly they disbelieved in Allah سبحانہ و تعا لی and His Apostle (صلى الله عليه و آله وسلم) and died in a state of rebellion’. (at-Tauba – 84).

The above Quranic verse is clearly commanding the Prophet صلى الله عليه و آله وسلم ) never to pray funeral prayer or stand by the grave of disbelievers.

Thus, the correct understanding of the above Hadith is, when Prophet صلى الله عليه و آله وسلم )wanted to ask for forgiveness for his mother, Allah سبحانہ و تعا لی ) does not grant it because she is the virtuous mother of the seal of Prophet-hood, and one among the best of women among human beings, who has been rewarded plentiful bounties in Hereafter. Therefore, there is no need to ask for her forgiveness.  Forgiveness is requested for a sinner whose salvation is under scrutiny. 

As far as the permission to visit her grave is concerned, this is granted to the Prophet صلى الله عليه و آله وسلم ) because visiting the graves of Prophets, Sahabah and Muslimeen is a virtuous deed in Islam.

From the above Hadith and Quranic verse, two issues are understood (i) We should not visit the graves of non-believers.  (ii) And when we visit the graves of Sahabah, Imams, or Awliya Allah, we should not pray for their forgiveness or salvation because they are the favorites of Allahسبحانہ و تعا لی ). Rather, we should request them to pray for our forgiveness and salvation.

 

(4) It is in Hadith – Related by al-Hakim in Mustadrak from Ibn Mas`ud (رضئ اللہ تعالی عنہ) and graded authentic, that a young man of the Ansar who asked a lot of questions, once asked the Prophet (صلى الله عليه و آله وسلم), “Are your parents in the Fire?” To which the Prophet (صلى الله عليه و آله وسلم)answered, “My Lord promised to give me what I ask concerning them, and on that day I shall stand at the Praiseworthy Station (of chief intercessor).” (Hakim)

(5) It is in Quran – وَلَسَوْفَ يُعْطِيكَ رَبُّكَ فَتَرْضَىٰ [ Meaning – “And your Lord shall give you so that you will be pleased”.] (Ad-Duha – 5)

The meaning of al-Hakim’s narration is Allah(سبحانہ و تعا لی) will reward uncountable bounties to the parents of Prophet Mohammad صلى الله عليه و آله وسلم ) on the Day of Judgment. There is no doubt in it.  And this is what the Prophet صلى الله عليه و آله وسلم ) is emphasizing in the above Hadith. 

 

1. Makkah/Makkah; Ka’aba, Hajar al-Aswad, Hijr Ismail, Well of Zamzam, Jannat al-Mualla cemetary,
Jabal Nur, Masjid Hudaibiya, Jabal Rahmah, Masjid Numrah
2. Medina; Masjid an-Nabawi, Masjid Quba, Jannatul Baqi cemetary, Grave of Hamza, Masjid Qiblatayn
3. Jeddah; Grave of Lady Hawa (Eve, wife of Adam)
4. Jabal al Lawz (near Al Bad’) alternative site of Mt. Sinai

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Prophets-SAW Makkah house plan


A historic photograph of Bab Al Salam (gate of peace)
in Masjid-Al Nabawi Sharif in Madinah.

 
Prophet’s Masjid in Medina; Prophet Muhammad (Peace and Blessings be Upon him) is buried there. 

Al-Masjid an-Nabawi or the Masjid of the Prophet, in Medina, is the second holiest Masjid in Islam. Al-Masjid al-Haram in Makkah is the holiest Masjid; the Al-Aqsa Masjid (adjacent to the Dome of the Rock, in Jerusalem) is the third holiest in Islam.

The original Masjid was built by the Prophet Muhammad (Peace and Blessings be Upon him). Subsequent Islamic rulers greatly expanded and decorated the Masjid. The most important feature of the site is the green dome over the center of the Masjid, where the tomb of Prophet Muhammad (Peace and Blessings be Upon him) is located. Constructed in 1817C.E. and painted green in 1839C.E., it is known as the Dome of the Prophet. (Early Muslim leaders Abu Bakr and Umar ibn al-Khattab are buried in an adjacent area as well.)

The edifice was originally Prophet Muhammad (Peace and Blessings be Upon him)’s house; he settled there after his Hijrah (emigration) to Medina, later building a Masjid on the grounds. He himself shared in the heavy work of construction. The original Masjid was an open-air building. The basic plan of the building has been adopted in the building of other Masjids throughout the world.

The Masjid also served as a community center, a court, and a religious school. There was a raised platform for the people who taught the Qur’an.

Ar-Rawdah an-Nabawiyah
At the heart of the Masjid is a very special but small area named ar-Rawdah an-Nabawiyah, which extends from the tomb of the Prophet Muhammad (Peace and Blessings be Upon him) to his pulpit. All pilgrims attempt to visit and pray in ar-Rawdah, for there is a tradition that supplications and prayers uttered here are never rejected. Entrance into ar-Rawdah is not always possible (especially during the Hajj season), as the tiny area can accommodate only a few hundred people. Ar-Rawdah has two small gateways manned by Saudi soldiers charged with preventing overcrowding in the tiny area. The green fence at the tomb of Muhammad (Peace and Blessings be Upon him) is guarded by Wahhabi volunteers; they stop pilgrims from touching the fence, a gesture of worship that the Wahhabis regard as shirk, idolatry.

The structure called Prophet Muhammad (Peace and Blessings be Upon him)’s pulpit is also guarded by a Wahhabi volunteer, who attempts to keep pilgrims from touching the pulpit. The current marble pulpit was constructed by the Ottomans. The original pulpit was much smaller than the current one, and constructed of palm tree wood, not marble.


Saudi expansion of the Masjid
The original Masjid was not that large, and today the original exists only as a small portion of the larger Masjid. From 1925, after Medina surrendered to Ibn Sa’ud, the Masjid was gradually expanded until 1955 when extensive rennovations were carried out. The latest renovations took place under King Fahd and have greatly increased the size of the Masjid, allowing it to hold a large number of worshippers and pilgrims. It is also completely air-conditioned and decorated with marble. 
The newer and older sections of the Masjid are quite distinct. The older section has many colorful decorations and numerous small pillars.

The Masjid is located in what was traditionally the center of Medina, with many hotels and old markets nearby. It is a major pilgrimage site and many people who perform the Hajj later go on to Medina to visit the Masjid.

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Hira, the cave where the angel Gabriel is said to have first visited Muhammad (Peace and Blessings be Upon him).

Gar-e-Hira or the Cave of Hira is a cave on the peak name Jabal al-Nour in the Hejaz region of present day Saudi Arabia. It is most notable as the Prophet Muhammad (Peace and Blessings be Upon him), received his first revelations from God through the angel Jibril

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Jannat ul Baqi – Baqi cemetery, where the wives and companions of the prophet Muhammad are buried.

Jannat al-Baqi (also spelt Jannat ul-Baqi) is a famous cemetery in Madinah, Saudi Arabia, located right across from the Masjid al-Nabawi. It is well known since many of Muhammad s.a.w. relatives and companions are buried here, and due to its sanctity. Its name means “Tree Garden of Heaven”. Many traditions relate Prophet Muhammad s.a.w.issuing a prayer every time he passed the cemetery.


Jannatul Baqi had Dargah’s and Mazaars in that place
before the saudis destroyed them.

Prior to the twentieth century, many of the graves were covered with domes or other structures.


However, after the city of Madinah was taken by the Wahabbi forces of Ibn Saud, many of these buildings and tombs, originally intended to identify famous figures and enable Muslims to receive blessings or petition saints buried there for their intercession, were destroyed, in order to keep with the Wahabbi ideal of not venerating graves.


Despite this, the graves of many historic figures continue to be visited by numerous pilgrims and burials continue at the cemetery to this day as well.

After the demolition of 1925, Saudi authorities have stepped up restrictions with regards to visiting graves. Shias come to Jannatul Baqi to pay respect to their leaders, and this often involves invoking the dead and reciting salutations. However, this goes against the principles of the Wahabbi interpretation of Islam, state-sanctioned within Saudi Arabia, and the result is that often books and maps of the graves are confiscated by the authorities.

Many Shia continue to mourn the day that the House of Saud demolished graves in the Baqi cemetery, calling this day Yaum e Gham, literally meaning Day of Sorrow. They continue to protest the Saudi government’s continuous demolition of shrines and ancient Masjids in Saudi Arabia built over shrines.



Jannatul Maula had Dargah’s and Mazaars in that place
before the saudis destroyed them.


People Buried at Jannat al-Baqi
All of Prophet Muhammad’s wives, except for Khadijah
Prophet Muhammad’s son Ibrahim who died in infancy
Fatima Zahra, Prophet Muhammad’s daughter, in a unknown grave.
Many of prophet Muhammad’s aunts
Abbas ibn Abd al-Muttalib, uncle of prophet Muhammad
Hasan ibn Ali, 2nd Shia Imam, grandson of prophet Muhammad
Ali ibn Husayn, 4th Shia Imam, great-grandson of prophet Muhammad
Muhammad al-Baqir, 5th Shia Imam
Jafar Sadiq, 6th Shia Imam
Malik ibn Anas, Islamic jurist
Imam Shamil, Chechen leader
Uthman ibn Affan, after later extensions.
Many other companions of Muhammad.


The Grave of Abu Obedah R .A. ( Muhammed S.A.W_’s Companion )

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Fudhail Bin Iyadh Bin Masood Bin Bishr Al-Tamimi aka Abul Fadhl and Abu Ali, was an early day Sufi Saint, a successor to Abdul Waahid Bin Zaid, third link in the Sufi Silsilah of Chishti Order, and the Master of Ibrahim Bin Adham.  It is said that he was a highwayman before finding God and repenting. He died on 3rd Rabiul Awwal, 187 Hijri in Holy Kaaba. His grave is inJannatul Ma’la, the graveyard in Makkah

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Jannatul Maula

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The tree of our beloved Muhammad (Peace and Blessings be Upon him) where he took shelter.

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Birth (Mawlid) and Reality of Prophet Muhammad saw

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Virtues of Madinah

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Love and Respect for Prophet Muhammad

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Allah honoured the Prophet Muhammad SAW_ by Gifting him some of His own Names

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