Imam Hasan (A.S)

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हज़रत सैय्यदना इमाम आली मक़ाम हसन अलैहिस्सलाम

आप रज़िअल्लाह तआला अन्हु की विलादत बासआदत पंद्रह रमज़ानुल मुबारक सन् तीन हिजरी में, मदीना मुनव्वरा मे हुई, जब ये मुबारक ख़बर बारगाहे नबवी मे पहुँची तो रसूल अल्लाह सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ख़ुशी और मसर्रत के साथ काशाने सैय्यदा मे तशरीफ़ लाएँ और फ़रमाया मेरे बेटे को मुझे दिखाओ, हज़रत असमा बिंत उमैस रज़िअल्लाह तआला अन्हा उस वक़्त वहाँ मौजूद थी उन्होंने शहज़ादे को एक ज़र्द रंग के कपड़े मे लपेटकर आप सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के आगोशे मोहब्बत मे दे दिया हुज़ूर सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने ज़र्द रंग के कपड़े को देखकर फ़रमाया मेरे बेटे को ज़र्द रंग के कपड़े मे ना लपेटा करो चुनांचे उसी वक़्त उस ज़र्द रंग के कपड़े को हटा दिया गया और सफेद रंग के कपड़े मे लपेट दिया गया, हुज़ूर सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने प्यारे शहज़ादे के दाएँ कान मे अज़ान और बाएँ कान मे अक़ामत इरशाद फ़रमाया फिर हज़रत अली रज़िअल्लाह तआला अन्हु से फ़रमाया, इसका क्या नाम तजवीज़ फ़रमाया उन्होंने अर्ज किया कि इसका इख़्तियार तो आपको है, अगर चाहें तो मौलूद का नाम हरब रख लें – हुज़ूर सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया ”मै वही का मुन्तज़िर हूँ! इतने मे ज़िब्रील अमीन अलैहिस्सलाम सब्ज़ कपड़े यानि पारचऐ जन्नती पर आपका मुनक्कश मुबारक नाम लेकर हाज़िरे ख़िदमत हुऐ, फिर नबी करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने हज़रत अली रज़िअल्लाह तआला अन्हु से फ़रमाया कि हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम के भाई हज़रत हारून अलैहिस्सलाम के बड़े बेटे का नाम ‘शब्बर’ था, इसका अरबी तर्जुमा ‘हसन’ बनता है, मेरे बेटे का नाम यही होगा!

रसूलअल्लाह सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने सातवें दिन दो मेण्ढे ज़िबाह करके प्यारे शहज़ादे इमाम हसन अलैहिस्सलाम का अकीक़ा किया, और सरके बालों के बराबर सदक़ा दिया (नसाई)

हज़रत अली रज़िअल्लाह तआला अन्हु से मरवी है कि हज़रत इमाम हसन रज़िअल्लाह तआला अन्हु सर से लेकर सीने तक रसूलअल्लाह सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम से मुशाबहत रखते थे (तिरमज़ी शरीफ)

हज़रत अनस  रज़िअल्लाह तआला अन्हु से मरवी है कि इमामे हसन रज़िअल्लाह तआला अन्हु रसूलअल्लाह सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम से बहुत ज़्यादा मुशाबेह थे और फ़रमाते है कि मैने उनसे बढ़कर किसी को रसूलअल्लाह सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम का हमशक़्ल नही देखा (सही बुख़ारी शरीफ़)

हज़रत बरा बिन आज़िब रज़िअल्लाह तआला अन्हु से मरवी है कि मैने रसूलअल्लाह सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम को इस हाल मे देखा कि इन्होंने हज़रत हसन रज़िअल्लाह तआला अन्हु को अपने दोश मुबारक पर उठा रखा था और कह रहें थे ऐ इलाही मै इससे मोहब्बत करता हूँ तू भी इससे मोहब्बत फरमा (बुख़ारी,मुस्लिम)

हज़रत अबु बक़रह रज़िअल्लाह तआला अन्हु से मरवी है कि एक दिन रसूलअल्लाह सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम मिम्बर शरीफ़ पर रौनक़ अफ़रोज़ थे आपके पहलू मे हज़रत हसन रज़िअल्लाह तआला अन्हु बैठे थे हुज़ूर अक़दस कभी लोगों की तरफ़ देखते और कभी जनाब हसन के तरफ़, फिर फ़रमाया मेरा ये बेटा ”सैय्यद” है और अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त इसके ज़रिये से मुसलमानों के दो गिरोहों के दरमियान सुलाह करवाएगा (बुख़ारी शरीफ़)

हज़रत अम्र रज़िअल्लाह तआला अन्हु से रिवायत है कि रसूलअल्लाह सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने फ़रमाया हसन और हुसैन दुनिया मे मेरे फूल है (बुख़ारी शरीफ़)

हज़रत इब्ने अब्बास रज़िअल्लाह तआला अन्हु से मरवी है कि एक बार हुज़ूर सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम हज़रत हसन रज़िअल्लाह तआला अन्हु को कन्धों पर उठाए थें कि किसी शख़्स ने देख कर कहा वाह साहबज़ादे तुम्हारी सवारी कितनी अच्छी है, ये सुनकर सरकार दो आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने फ़रमाया देखो सवार भी तो कितना अच्छा है (हाकिम)

हज़रत इब्ने ज़ुबैर रज़िअल्लाह तआला अन्हु से रिवायत है कि रसूलअल्लाह सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम हज़रत इमाम हसन रज़िअल्लाह तआला अन्हु से बेहद मोहब्बत फ़रमाते थे, मैने बचश्म ख़ुद देखा की बाज़ औक़ात रसूलअल्लाह सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम सजदे मे होते और इमाम हसन रज़िअल्लाह तआला अन्हु गर्दन या पीठ पर सवार हो जाते और जब तक वो खुद न उतरते हुज़ूर सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम उनको ना उतारते, मैने येभी देखा कि हुज़ूर सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम हालते रुकूउ मे थे कि हज़रत हसन रज़िअल्लाह तआला अन्हु आएँ और सरकार दो आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के क़दम मुबारक के दरमियान से निकल कर दूसरी तरफ़ चले गएँ!

हज़रत ज़ुबैर बिन अरक़म रज़िअल्लाह तआला अन्हु से मरवी है कि एक दिन हज़रत इमाम हसन रज़िअल्लाह तआला अन्हु ख़ुत्बा देने के लिए खड़े हुए तो क़बीला अज़्दशनु का एक शख़्स खड़ा हुआ और उसने कहा कि ऐ लोगों मै इस बात की गवाहि देता हूँ कि रसूल अल्लाह सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम सैय्यदना हसन रज़िअल्लाह तआला अन्हू को गोद मे लिए हुए फ़रमा रहें थे कि जो मुझसे मोहब्बत करता है उसे चाहिये कि वो इनसे भी मोहब्बत फ़रमाये, जो लोग यहां मौजूद हैं, वो मेरी बात उन लोगों को पहुँचा दें जो यहाँ मौजूद नही हैं, उस शख़्स ने मज़ीद कहा अगर मुझे रसूलअल्लाह सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के फ़रमाने ज़ीशान की इताअत मन्ज़ूर न होती तो मै ये बात अपनी ज़बान पर ना लाता (रवाह अल हाकिम)

हज़रत इमाम हसन रज़िअल्लाह तआला अन्हु बड़े ही बुर्दबार इज़्ज़त और शान वाले पुरवक़ार और साहिबे जाहो हशम थें आप फ़ितना फ़साद और ख़ूँरेज़ी को सख़्त नापसंद फ़रमाते थें, सख़ावत मे बेबदल थें, बसाऔक़ात एक एक शख़्स को एक एक लाख दरहम अता फ़रमाते थें  (तारीख़ अल ख़ुलेफ़ा,अल सियूती)

आप रज़िअल्लाह तआला अन्हु के ज़माने ख़लाफ़त मे एक अराबी हाज़िरे ख़िदमत हुआ, उसने आते ही आपके आबाओ अजदाद के शान मे गुस्ताख़ी करना शुरु कर दिया जब वो ख़ुब गुस्ताख़िया कर चुका तो आप रज़िअल्लाह तआला अन्हु ने ख़ादिम को तलब फ़रमा कर उसे बहुत कुछ अता फ़रमा दिया फिर माज़रत करते हुए इरशाद फ़रमाया इस वक़्त मजबूर हूँ यही कुछ मौजूद था जो दे दिया है वरना और अता फ़रमाता, वो अराबी ये इल्म और शाने सख़ावत देख कर रो पड़ा और क़दमो मे गिर कर कहने लगा, हुज़ूर मैने जो ग़ुस्ताख़िया की वो बनामे ख़ुदा माफ़ फ़रमा दीजिये मैने ये सब बतौरे इम्तेहान किया था!

सन् चालिस हिजरी मे हज़रत सैय्यदना इमाम अली अलैहिस्सलाम की शहादत के बाद अहले कूफ़ा ने बिला इत्तेफ़ाक़ हज़रत इमाम हसन अलैहिस्सलाम के हाथों पर बैअत किया, रसूलअल्लाह सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के हदीस मुबारक़ के मुताबिक़ आप आख़री ख़लिफ़ा राशिद हैं!

सबसे अवल क़ैस इब्ने साद ने बैअत के लिए हाथ बढ़ा कर कहा क़ुरआन वा सुन्नत के नफ़ाज़ और मुलहदों से क़ताल के लिए अपना हाथ बढ़ाएं और बैअत क़ुबूल फरमाएं, आपने जवाबन इरशाद फ़रमाया- ”عصا كتابللاه و سنت رسولےهي وبا تيان عصا کل شرط ”

इस के बाद और लोग भी बैअत करने लगे, आप फ़रमाते जाते थे कि तुम लोग मेरे कहने को सुनते रहना, मेरी इताअत करना, जिससे मै सुलाह करूँ उससे तुम भी सुलाह करना, जिससे मै जंग करूँ तुमभी उससे लड़ना, इन फुकरों से लोगों को शुबह पैदा हो गया और अहले कूफ़ा आपस मे सरगोशियाँ करने लगें कि ये तो हमारे अमीर नहीं हैं और ना ही ये जंग का इरादा रखते हैं (इब्ने ख़लदून)

अमीरूल मोमिनीन हज़रत अली रज़िअल्लाह तआला अन्हु ने मरतबा शहादत पर फ़ाऐज़ होने से महज़ चंद रोज़ बेशतर मुल्के शाम पर हमला करने के लिए दावए मोहब्बत करने वाले ईराक़ियो का एक लशकर तरतीब दिया था चालीस हज़ार आदमियों से अमीर शाम के ख़िलाफ जंग और मौत पर बैअत ली थी, लेकिन अभी ये लशकर अपनी मन्ज़िल के तरफ़ रवाना ना हुआ था कि हज़रत अली रज़िअल्लाह तआला अन्हु शहीद कर दिए गएँ, फिर जब लोगों ने अमीरूल मोमिनीन हज़रत इमाम हसन अलैहिस्सलाम के हाथ पर बैअत कर ली और हज़रत अली रज़िअल्लाह तआला अन्हु कि शहादत की ख़बर मशहूर हो गई तो अमीर शाम लश्करे जर्रार लेकर हज़रत हसन रज़िअल्लाह तआला अन्हु से जंग के लिए कूफ़ा के तरफ़ बढ़ा ये वाक़या सन् इक्तालीस हिजरी का है (तारीख़ अल कामील इब्ने असीर)

हज़रत इमाम आली मक़ाम हसन अलैहिस्सलाम भी अपने हमराहियों का लशकर लेकर मुक़ाबले के लिए कूफ़ा से बाहर आए, आप रज़िअल्लाह तआला अन्हु के आगे चलने वाले दस्ते पर बारह हज़ार का लशकर था जिसकी कमान क़ैस बिन साद और हज़रत अब्दुल्लाह बिन अब्बास रज़िअल्लाह तआला अन्हुमा के हाथ मे थी, जबकी क़ैस लशकर के एक हिस्से पर कमाण्डर थे, जब ये लशकर इमाम हसन के क़यादत मे मदाएन पहुँचा तो क़याम के साथ मशहूर हो गया कि क़ैस बिन साद को क़त्ल कर दिया गया है, इस ख़बर के फ़ैलते ही लशकर मे बेचैनी की कैफ़ियत तारी हो गई, लोग एक दूसरे से उलझ पड़े कुछ नआक़बत अन्देश हज़रत इमाम हसन अलैहिस्सलाम के क़ेमे पर हमलावर हो गए, जो कुछ पाया लूट लिया अन्दर दाख़िल हुए तो न सिर्फ़ ये कि आप रज़िअल्लाह तआला अन्हु के नीचे से जानमाज़ खीच लिया बल्कि वो चादर भी छीन ली जो आप ओढ़े थे, एक बदबख़्त ने मज़ीद नआक़बत अन्देशी का मुज़ाहिरा किया आप रज़िअल्लाह तआला अन्हु के रान मुबारक पर नेज़ा मार दिया, ये सूरते हाल देखकर ख़ानदाने रबिअ व हमदान आप रज़िअल्लाह तआला अन्हु के हिमायत मे उठ खड़े हुए और अदबाशों के मजमा को मुन्तशिर कर दिया आप रज़िअल्लाह तआला अन्हु को ज़ख़्मी हालत मे एक तख़्त पर उठा कर मदाएन लाया गया और क़सरे उबैज़ मे ठहराया गया (इब्ने ख़लदून)

इस बेहंगम शोर व ग़ुल के ख़त्म होने के बाद हज़रत अमीरुल मोमिनीन इमाम हसन मुजतबा रज़िअल्लाह तआला अन्हु ने अहले कूफ़ा की बेवफ़ाई और ग़द्दारी देखकर अमीर शाम के तरफ़ ख़त तहरीर किया, मै ख़लाफ़त से दस्तकश होना चाहता हूँ बशर्ते कि  मेरे वालिद बुज़ुर्गवार को मेरे सामने गालियां न दी जाए और ना ही उनको मेरे सामने सख़्त अलफ़ाज़ व कलमात से याद किया जाए, ख़त रवाना करने के बाद हज़रत इमाम हसन अलैहिस्सलाम ने इसका ज़िक्र इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम और हज़रत अब्दुल्लाह बिन जाफ़र रज़िअल्लाह तआला अन्हु से किया उन्होंने आपको बहुत समझाया बुझाया मगर आप अपनी राय पर क़ायम रहे, दरबारे शाम मे अमीर शाम एक सादे कागज़ पर दस्तख़त और मोहर लगाकर अब्दुल्लाह बिन आमिर और अब्दुल्लाह बिन समरह के मारफ़त हज़रत इमाम हसन अलैहिस्सलाम के ख़िदमत मे भेज चुके थे, साथ ही दूसरे काग़ज़ पर लिखा था कि सुलह के लिये जो शराएत आप चाहे तहरीर फ़रमा दे हमे मन्ज़ूर है, हज़रत इमाम हसन रज़िअल्लाह तआला अन्हु ने इस काग़ज़ पर कि जिसपर अमीर शाम की मोहर और दस्तख़त थी, पहले शराएत के अलावा चंद शराएत और भी तहरीर फ़रमा दिया जिसे अमीर शाम ने मानने से इन्कार कर दिया और कहा कि सिर्फ़ वही शरते काफ़ी है जिनका तुम पहले ज़िक्र कर चुके हो (तारीख़ इब्ने ख़लदून)

हज़रत जलालउद्दीन सियूती रहमतउल्लाह अलैह नक़्ल फ़रमाते है कि हज़रत इमाम हसन रज़िअल्लाह तआला अन्हु और हज़रत अमीर शाम के दरमियान इन शराएत पर सुलह हुई कि फ़िल वक़्त अमीर शाम ख़लीफ़ा बन जात  हैं लेकिन इनके इन्तक़ाल के बाद ख़लीफ़ा अल मुस्लिमीन हज़रत इमाम हसन रज़िअल्लाह तआला अन्हु होंगे, ईराक़ हिजाज़ के बाशिन्दों पर मज़ीद कोई टेक्स आएद नही किया जाएगा, और सिर्फ़ वही टेक्स वसूल किया जाएगा जो हज़रत अली के ज़माने से किया जा रहा है, हज़रत इमाम हसन रज़िअल्लाह तआला अन्हु के ज़िम्मे जो कर्ज़ है उसे हज़रत मुआविया अदा करेंगे, इन शराएत को दोनो फ़रीक़ों ने क़बूल किया और इन्ही पर बाहेमी सुलह हो गई और रसूलअल्लाह सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम का मोजज़ह ज़ाहिर हो गया, जो आपने फ़रमाया था कि “मेरा ये बेटा मुसलमानों के दो गिरोहों के बीच सुलह कराएगा (तारीख़ अल ख़ुलेफ़ा)

बाद तफ़वीज़े अमारत आपके लश्करों ने ख़राज दारुल जबर हज़रत इमाम हसन रज़िअल्लाह तआला अन्हु को देने से इन्कार कर दिया और कहा कि ये तो हमारा माले ग़नीमत है, हम इसे नही दे सकते, आप रज़िअल्लाह तआला अन्हु ने अहले ईराख़ को जमा करके ख़ुत्बा दिया, बाद हम्दो सना के इरशाद फ़रमाया, ऐ अहले ईराक़, मैने तीन मरतबा तुमसे दरगुज़र किया तुमने मेरे वालिद को क़त्ल किया मैने सब्र किया मेरे घर को लूटा मैने सब्र किया, फ़िर फ़रमाया तुम पर वाज़ेह हो जाना चाहिए कि तुमने दो मख़तूलों के दरमियान सुलह की, एक मक़तूल सिफ़्फ़ीन के हैं कि जिनपर तुम रो रहे हो, दूसरे मक़तूल नहरवान के हैं कि जिनके मुआवज़ा का मुतालबा कर रहे हो और जो बाक़ी हैं वो ख़ाजिल हैं और रोने वाले और बदला लेने वाले हैं, जनाब मुआविया ने मुझे एक अम्र पेश किया है जिसमे ना तो इज़्ज़त है और ना ही इन्साफ़, बस अगर तुम मौत पर राज़ी हो (यानि जंग कर सकते हो तो) हम इस अम्र को क़ुबूल न करें और इनसे अल्लाह तआला के भरोसे पर तलवारों से फ़ैसला करें (लशकरे शाम का मुक़ाबला मैदाने जंग मे करें) तो हम मुआविया के उस अम्र को क़ुबूल कर लें और तुम्हें राज़ी कर दें, लोगों ने हर तरफ़ से चिल्ला चिल्ला कर कहा सुलह क़ायम रखिये, सुलह क़ायम रखिये चुनाँचे हज़रत हसन अलैहिस्सलाम ने अपने ख़लाफत के छटे महीने हज़रत मुआविया की बैअत कर ली!

अल्लामा सियूती अलैहरहमा फ़रमाते है कि हज़रत इमाम हसन अलैहिस्सलाम माहे रबिउल अव्वल सन् इक्तालिस हिजरी मे ख़लाफ़त से दस्तबर्दार हुएं (तारीख़ अल ख़ुलेफ़ा)

सैय्यदना अली रज़िअल्लाह तआला अन्हु के ज़माने ख़लाफ़त मे शहर कूफ़ा को दरुल ख़ुलफ़ा क़रार दिया था और आप वहीं मुन्तक़िल हो गएँ थे, इमाम हसन अलैहिस्सलाम ने अहले कूफ़ा के मुसलसल बेवफ़ाई के वजह से ख़लाफ़त से दस्तबर्दारी के बाद कूफ़ा को छोड़ दिया और मदीना तय्यबा की तरफ़ रवाना हो गएँ, इब्ने ख़लदून मे है कि हज़रत इमाम हसन अलैहिस्सलाम मै अपने अहले बैत और अपने मुताल्लिक़ीन के मदीना मुनव्वरा के तरफ़ रवाना हुएँ तो अहले कूफ़ा आपको अलविदा कहने के लिए कूफ़ा के बाहर दूर तक रोते हुए आयें इसके बाद आप रज़िअल्लाह तआला अन्हु मदीना मुनव्वरा मे ही मुक़ीम रहे!

 शहादतइब्ने साद ने इमरान बिन अब्दुल्लाह के हवाले से तहरीर फ़रमाया है कि हज़रत इमाम हसन अलैहिस्सलाम ने एक मर्तबा ख्वाब में देखा कि इनके दोनो आँखो के दरमियान قل هوللاهو عہد लिखा है, अहले बैत ने ये ख़्वाब सुना तो बहुत ख़ुश हुएँ लेकिन जब हज़रत सैद इब्ने अल मुसैब रज़िअल्लाह तआला अन्हु ने ये ख़्वाब सुना तो अर्ज़ किया कि हुज़ूर अगर ये ख़्वाब पूरा हो गया तो आपकी ज़िन्दगी मुबारक क़रीब अल इख़्तेताम है, इस वाक़ेआ के चन्द रोज़ बाद ही आप रज़िअल्लाह तआला अन्हु को ज़हर दिया गया और आप शहीद हो गएँ!

हज़रत सैय्यदना इमाम हसन अलैहिस्सलाम की शहादत ज़हर ख़ुरानी से पाँच रबिउल अव्वल सन् पचास हिजरी ज़ के नज़्दीक़ सन् इक्क्यावन हिजरी मे हुआ! (तारीख़ अल ख़ुलेफ़ा,तिबरी,इब्ने ख़लदून)

जब सैय्यदना हसन अलैहिस्सलाम को ज़हर दिया गया तो आपकी तबियत शरीफ़ा सख़्त बेचैन हो गई, आपने हुसैन अलैहिस्सलाम को तलब फ़रमाया, आप रज़िअल्लाह तआला अन्हु जब हाज़िरे ख़िदमत हुएँ, तो फ़रमाया, भाई मुझे कई मरतबे ज़हर दिया गया मगर हर बार अल्लाह तआला ने मुझे बचा लिया, लेकिन इसबार इतना सख़्त ज़हर दिया गया है कि इसने मेरा कलेजा टुकड़े-टुकड़े कर दिया है, इसी दौरान सख़्त कर्ब और तकलीफ़ के साथ आपको ख़ून की क़य आई जिसमे जिगर के कई टुकड़े थे, जब चंद मर्तबा ऐसे ही ख़ून की क़य आई तो आप रज़िअल्लाह तआला अन्हु के जिस्म अनवर का रंग बदल गया, हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने सख़्त बेताबी के आलम मे रोते हुए पूछा कि भाई जान बताईये कि आपके साथ ये ज़ुल्म किसने किया है, आपने फ़रमाया किस लिये पूछ रहे हो, तो इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने कहा कि क़त्ल करने के लिये तो हज़रत इमाम हसन अलैहिस्सलाम ने फ़रमाया, मेरे भाई नही, अगर वो वही है जिसका मुझे ग़ुमान है तो अल्लाह तआला उससे ज़बरदस्त इन्तेक़ाम लेने वाला है और अगर वो नही है, तो मै नही चाहता कि किसी बेगुनाह को मेरी वजह से कोई तकलीफ़ पहुँचे, आपने किसी का भी नाम नही लिया, और सब्रोरज़ा का पैग़ाम पूरी दुनिया को दे गये!

आप रज़िअल्लाह तआला अन्हु को आपकी वालिदा माजिदा सैय्यदा फ़ातिमा ज़हरा रज़िअल्लाह तआला अन्हा के पहलू मे जन्नतुल बक़िया शरीफ़ मे दफ़्न कर दिया गया! मज़ार पुर अनवार हज़रत सैय्यदना इमाम हसन मुजतबा अलैहिस्सलाम (जन्नतुल बक़िया )

Janatul Baqi shareef

आपकी उम्र शरीफ़ उस वक़्त तक़रीबन छियालीस (46) बरस की थी!

अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त आप रज़िअल्लाह तआला अन्हु के सब्रो तहाम्मुल के सदक़े उम्मते मुस्लिमां पर ख़ैर फ़रमाए, और हम सबको आपके नक़्शे क़दम पर चलने की तौफ़ीक़ और रफ़ीक़ अता फ़रमाए! आमीन—————-                                                                     

हसन मुजतबा है नाम लक़ब आपका है शब्बर

वालिदे ज़ीशान हैं अली फ़ातहे ख़ैबर

वालिदा हैं सैय्यदुन्निसा नाना हैं इमामुल अम्बिया

भाई हैं हुसैन आपके शब्बीरे मुअतबर

हमशक्ले मुसतफ़ा हैं, हैं ज़ीशाने बावक़ार

फ़रख़ुन्दा बख़्शो ने पाया आपका दीदार

ख़लीफ़ा राशिद थे आख़िरी, थे इस्लाम की पतवार

दुश्मन हो गए आपके जहन्नम के हक़दार

करिये ख़ुदारा एक नज़रे करम इधर

जाए कहाँ ये मँगता छोड़के आपका दर

औलाद हूँ मै आपकी कोई हूँ नही दीगर

एक चश्मे रहमत से सँवर जाए मुक़द्दर

(आमीन)

अमीर सैय्यद क़ुतुबउद्दीन क़ुत्बी (आक़िब)

  अज़वाज वा औलाद – 

(1) हज़रत फ़ातिमा बिन्त अबु मसऊद रज़िअल्लाह तआला अन्हा (इनके शिकमे अतहर से हज़रत ज़ैद रज़िअल्लाह तआला अन्हु पैदा हुए)

(2) हज़रत ख़ौला बिन्त मन्ज़ूर बिन रियान बिन अम्र बिन जाबिर बिन अक़ील रज़िअल्लाह तआला अन्हा (इनके बत्ने अकदस से हज़रत सैय्यदना हसन मुसन्ना रज़िअल्लाह तआला अन्हु पैदा हुएँ, और सादाते क़ुत्बिया आपके ही नस्ल से हैं आपका तफ़्सीली ज़िक्र आगे आएगा)

(3) हज़रत सलमा बिन्त अमरूल क़ैस रज़िअल्लाह तआला अन्हा

(4) हज़रत उम्मे इसहाक़ बिन्त तुलैह बिन उबैदउल्लाह (हज़रत इमाम हसन अलैहिस्सलाम के बाद इनके साथ इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने निकाह किया)

(5) हज़रत हब्दाह बिन्त हुबैरा मख़ज़ूमी रज़िअल्लाह तआला अन्हा

(6) हज़रत आएशा बिन्त हज़रत उसमान ग़नी रज़िअल्लाह तआला अन्हा

(7) हज़रत उम्मे क़ुलसूम बिन्त फ़ज़ल बिन अब्बास बिन अब्दुल मुत्तलिब रज़िअल्लाह तआला अन्हा (इनके बत्ने अक़दस से हज़रत अबु बक़्र, हज़रत अब्दुल्लाह, और हज़रत अम्र रज़िअल्लाह तआला अन्हुमा पैदा हुए)

हज़रत सैय्यदना इमाम हसन अलैहिस्सलाम के बारह साहबज़ादे थे जिनका नाम ये है – 1.हज़रत ज़ैद 2.हज़रत तल्हा 3.हज़रत इस्माईल 4.हज़रत अब्दुल्लाह 5.हज़रत हम्ज़ा 6.हज़रत याक़ूब 7.हज़रत अब्दुल रहमान 8.हज़रत अबु बक्र 9.हज़रत हुसैन अल अशरम 10. हज़रत क़ासिम 11.हज़रत अम्र और 12.हज़रत सैय्यदना हसन मुसन्ना रज़िअल्लाह तआला अन्हुमा!

हज़रत इमाम हसन अलैहिस्सलाम के बेटे हज़रत अम्र, हज़रत क़ासिम और हज़रत अब्दुल्लाह रज़िअल्लाह तआला अन्हुमा क़रबला मे अपने चचा मोहतरम हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के रफ़ाक़त मे शहीद हुए और आपकी नस्ल पाक आपके चार फ़रज़न्दों से जारी हुई यानी हज़रत ज़ैद, हज़रत हसन मुसन्ना, हज़रत हुसैन अलअशरम, और हज़रत अम्र रज़िअल्लाह तआला अन्हुमा से लेकिन हज़रत हुसैन अल अशरम और हज़रत अम्र का सिलसिलए नस्ल ख़त्म हो गया और पूरी दुनिया मे हज़रत ज़ैद और हज़रत हसन मुसन्ना रज़िअल्लाह तआला अन्हुमा की नस्ल जारी और सारी है! हज़रत इमाम हसन अलैहिस्सलाम की पाँच शहज़ादिया भी थी जिनका नाम ये है

(1) हज़रत सैय्यदा फ़ातिमा (2) हज़रत सैय्यदा उम्मे सलमा (3) हज़रत सैय्यदा उम्मे अब्दुल्लाह (4) हज़रत सैय्यदा उम्मुल हुसैन और (5) हज़रत सैय्यदा उम्मुल हसन जिनमे सैय्यदा फ़ातिमा की शादी हज़रत सैय्यदना इमाम ज़ैनुल आबिदीन अलैहिस्सलाम से हुई थी!

हज़रत इमाम हसन के फ़रज़न्द हज़रत इमाम हसन मुसन्ना रज़िअल्लाह तआला अन्हु के नस्ल पाक से ख़ानवादा क़ुत्बिया मौजूद है और इन्शाअल्लाह इनका तफ़्सीली ज़िक्र इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के बाद होगा!

Shahadat Imam Hasan A.S. (28 Safar)

  • Al-Bukhari narrated that Anas r.a said: No-one more resembled the
    Prophet, may Allah bless him and grant him peace, than Hazrat al-Hasan ibn Ali a.s
  • The two Shaykhs narrated that al-Bara’ said: I saw the Prophet,
    may Allah bless him and grant him peace, with Hazrat al-Hasan upon his
    shoulder, saying, ‘O Allah, I love him, so love him.’
  • Al-Bukhari narrated that Ibn  Umar said: The Prophet, may Allah
    bless him and grant him peace, said, ‘They are my two descendants
    (literally ‘my two sprigs of basil’ or ‘my two sweet-smelling plants
    [or flowers]’) in the world,’ meaning Hazrat al-Hasan and Hazrat al-Hussein.
  • At-Tirmidhi and al-Hakim narrated that Abu Sacid al-Khudri
    said: The Messenger of Allah, may Allah bless him and grant him
    peace, said, ‘Al-Hasan and al-Hussein are the two lords of the youth
    of the people of the Garden.’
  • He narrated that Anas said: The Prophet, may Allah bless him
    and grant him peace, was asked, ‘Who of the people of your house
    are most beloved to you?’ He said, ‘Al-Hasan and al-Hussein.’
  • Al-Hakim narrated that Ibn cAbbas said: The Prophet, may Allah
    bless him and grant him peace, approached carrying al-Hasan on
    his shoulder. A man met him and said, ‘What a blessed mount you have, boy!’ The Prophet, may Allah bless him and grant him peace,
    replied, And what a blessed rider is he.’
  • Ibn Sacd narrated that “Abdullah ibn az-Zubayr said: The one
    most like the Prophet, may Allah bless him and grant him peace,
    of his family and the most beloved to him is al-Hasan ibn cAli. I
    saw him come while he was prostrate and mount his shoulders — or
    he said, ‘his back’ – and he did not make him get down until he
    himself got down. I saw him while he was bowing in prayer and
    he would separate his legs for him so that he could pass through
    the other side.’
  • Ibn Sacd narrated that Abu Salamah ibn cAbd ar-Rahman said:
    The Prophet, may Allah bless him and grant him peace, used to put
    forth his tongue for al-Hasan ibn cAli, then when the infant saw
    the redness of the tongue, he would be merry with him.
  • Al-Hakim narrated that Zuhayr ibn al-Arqam said: Al-Hasan ibn
    cAli stood to deliver the khutbah, and a man from Azd Shanu’ah
    stood up and said, ‘I witness that I saw the Prophet, may Allah bless
    him and grant him peace, place him in his lap saying, “Whoever loves me, let him love him, and let the one whois present convey it to whoever is absent,” and if it were not for high regard for the Messenger of Allah, may Allah bless him and grant
    him peace, I would not have related it to anyone
  • Al-Hakim narrated that cAbdullah ibn cUbayd ibn cUmayr said:
    Al-Hasan performed the Hajj twenty-five times walking, and the
    high-bred, riding beasts were led along with him

 

After the martyrdom of Imam Ali (AS) in the mosque of Kufa in 41 Hijri and the election of Imam Hasan (AS) (the proof of Allaah and the rightful successor of wilayat-e-Ali A.S) as the next caliph by aamm atul muslimeen, was a thorn in the heart of Muawiyah. Muawiyah ibn Abi Sufyan, who had a long-running dispute with Maula Ali (A.S), summoned the commanders of his forces in Syria, Palestine, and Transjordan to join him in preparation for battle.

His propaganda machine against the House of Imam Ali (AS), in fact against Islam, began its work in earnest. Large sums of money and fraudulent promises of vast properties and governorships of provinces were given to many commanders of Maula Hasan`s (AS) army who then left Imam Hasan(AS) without much power. Muawya first attempted to negotiate with Maula Imam Hasan (a.s), sending him letters asking him to give up his caliphate, believing he could thus avoid killing fellow Muslims and avoid lingering questions regarding his legitimacy should he martyr Imam Hasan outright.

Most historians say that large sums of money and promises of vast properties and governorships of provinces were offered to commanders of Imam Hassan`s army who left him, one of which was Ubaydallah ibn Al abbas, the commander of Maula Imam Hasan army and that Muawiyah was not interested in the functions of preaching piety or theology but in expanding his sphere of influence in the territories already conquered by the Muslims and in further conquests to the north and north west of Syria.

Negotiations failed and Muawiyah decided to march against Imam Hasan`s army of forty thousand with his own army, claimed to have numbered sixty thousand fighters. The two armies faced each other near Sabat. Imam Hasan is said to have given a sermon in which he proclaimed his hatred of schism and appealed to his men to follow his orders even if they did not agree with them. The people began to look at one another and asked each other, “What do you think he intends by what he has just said?”

“We think that he intends to make peace with Muawiya and hand over the authority to him” they answered.
“By God the man has become an unbeliever they declared and they rushed towards his tent. They plundered him to the extent that they even took his prayer mat from under him. Then abd al rehman set on him and stripped his silk cloak from his shoulder.

He remained sitting, still girt with his sword but without his cloak. He called for his horse and mounted it. Groups of his close associates and true Muslim (Lover of Allah Prophet and Ahele bait )surrounded him and kept those who wanted (to attack) him away from him. 

Imam Hasan was distressed, understanding that the engagement of Muslims in a battle against each other would mean a loss of many: Muawiyah sent two men from the Banu Quraish to negotiate a settlement. The Treaty agreed upon between Muawiya and Imam Hasan (AS) tells us the following salient points:

 

  • That Muawiya should rule strictly according to the Holy Quran and the Sunna of the Prophet.
  • That Muawiya should not appoint or nominate anyone to the Khilafat after him but that the choice should be left to the Muslims.
  • That the people should be left in peace, wherever they are in the land of God.
  • That the persecution of the companions of Imam Ali(AS) should immediately be stopped; their lives and properties and families guaranteed safe conduct and peace.
  • That the cursing of Imam Ali (AS) from the pulpit should stop immediately.
  • That no harm should be done secretly or openly against Imam Hasan and his brother Imam Hussain or any of the Ahlubayt.(AS)

This agreement concluded, Imam Hasan (AS) went to Kufa, shortly followed by Moawiya who came their to take the allegiance of the people.

In a speech delivered in front of Moawaiya, Imam Hasan (AS) explained the situation clearly.:
“O`People, Allah has guided you through our elders (Muhammad and Ali) and spared you from bloodshed through those who followed (referring to himself). Indeed this (the Khilafat) is nothing but a passing phase, these wordly possessions keep shifting and changing hands.”

For inasmuch as Moawiya desired the sovereignty in this world, so Imam Hasan`s concern was not with worldly leadership for its own sake, but as a tool whereby he might guide the people towards God and His true commandments. After his abdication he resided in Madinah where he spent the remaining ten years of his life teaching the Qora`an and knowledge of true Deen to all seekers of truth that came to him.Imam Hasan (AS) had never relinquished the position of an Imam and guide as appointed by God.

History tells us that from day one Moawiya did not comply with any one of the terms of the treaty agreed upon between him and Imam Hasan (AS) He trampled the treaty under his feet saying to the people of Kufa,”do you think I have taken power to teach you about Islam. No, I have taken power for the sake of it and if any one of you tries to disagree with me shall pay a costly price of losing his head.(Tarikul Kholafa, Jalaluddin Soyuti)”

Moawiya carried out his ambition of keeping the power in his family by nominating his son Yazid after him as the ruler of the Kingdom. This demanded that Imam Hasan(AS) should predecease him, an unlikely event considering their discrepancy in their ages. Hence Moawiya  bribed Ju`da bint Ash`ath, to poison him in 50 Hijri. Imam embraced Shahadat with the effect of poisoning on 28th of the month of Safar. He was 47 years old.

 

Misconception Against Imam Hasan a.s due to jealousy of Ahele Bait :

<<<<Analysis of the Terms and Conditions of Treaty>>>>

1. Following the Book and Sunnah

“Hazrat Hasan (as) would hand over the rule, or government, to Muawiya provided he acts according to the Holy Book of God, the Sunnah of the Holy Prophet (saw) and the character of pious and virtuous caliphs;”{Ibn. Atham – ‘Al Futuh’, vol. 4, p.160; Baladhuri – Al-Ansab al Ashraf, vol. 3 p., Ibn. Abi al Hadid, ‘Sharh al-Nahjul Balaghah’, Cairo: Dar Ahya al Kutub al Arabia, 1962, vol. 16, p.22; Hasan Kamil al Maltavi – ‘Al Imam al Hasan bin ‘Ali’, p.121; Razi Ale Yasin – ‘Sulh-ul Hasan’, Qum, Manshuraat al Razi, 1993, p.259. Husayn Muhammad Jafri – ‘The Origins and Early Development of Shia Islam’, Qum, Ansarian Publications, p.152.}

In the above first condition, many points have to be thoroughly studied: The Imam (as), by demanding Muawiya to follow the Book and Sunnah as the first condition of the Treaty, proved that acting according to the Book and Sunnah was the ideal goal of the Imam (as), and if he was handing over the reign temporarily to Muawiya, then only his steps in accordance with the Shariah would be considered legal.

Accordingly, if Muawiya went against the said condition and Imam Hasan (as) were able to rule again, then he would have the legal right to claim it back from Muawiya. In fact, the Imam (as) had restricted the actions of Muawiya to be within law and constitution. Incidentally, by adding the virtuous character of pious caliphs as a condition, he had by implication also proved that his father was a pious and virtuous caliph and the feelings and ideas of Muawiya about him were wrong.

If earlier his father had not accepted the condition (of following the previous caliphs) in the ‘Shura‘ of Hazrat Umar, it was due to the fact that he did not consider their style in accordance with religious standard and he himself had better grasp and understanding than them of the issues relating to the Holy Qur’an and Sunnah.

2.Monarchy or Caliphate

Another important point for consideration in the above condition is whether Imam Al-Mujtaba (as) had handed over the rule over Muslims and the government to Muawiya through peace treaty, or he had given allegiance to Muawiya as a caliph and had accept ed the caliphate of Muawiya formally.

It should be clearly understood that often such language has been used in historical versions which implies that either Imam Hasan (as) had shown his willingness to give allegiance to Muawiya, or had assured him of following him completely, or handed over the caliphate to him, or, in the words of historian Ibn. Qutaiba, had handed over the Imamat to him!

We are not concerned about the words used. Ahlul Sunnat in this regard differentiate between caliphate and ‘Khilafate Rashida’ (truly religious caliphate). Without going into this argument, we have to find an answer to the question whether Imam Hasan (as) had handed over the caliphate to Muawiya and accepted him formally as a caliph and had given allegiance to him (i.e. the way the allegiance was given by the Muslims wherein the commitment of complete obedience to the caliph was made).

Alternatively, whether Imam Hasan (as) had made a peace treaty with Muawiya like an agreement between two parties in any other dispute, rather than giving allegiance and, through the agreement, he had temporarily handed over the government to Muawiya on specified conditions and not the high religious authority which is called ‘caliphate’?

Imam Al-Mujtaba (as) was a duly elected and formal caliph of Muslims. His caliphate had all the legal and constitutional validity which was in accordance with the practice among the Muslims at the time.

Not only the leading personalities and the residents of Haramain Sharifain had paid allegiance to him but he also had the support of all the states and the opposition by Syria and Egypt could not affect the constitutional position, especially as a period of six months had elapsed since his taking over as the caliph.

If Imam Hasan (as) had given allegiance to Muawiya or had agreed to hand over the caliphate to him, granting him the legitimacy of caliphate, then Muawiya would have been included among the true Islamic caliphs (‘Rashidin Caliph’) and no political opponent of his would have been able to challenge that status as Hazrat Abu Bakr had also nominated Hazrat Umar as caliph.

However, the fact remains that after fourteen hundred years, even the supporters of Muawiya cannot dare claim that Muawiya was a truly Islamic caliph (‘Rashid Caliph’). Muawiya understood the point very well and when he fully realized the political plan of Imam Hasan (as), even before the formal announcement of the peace treaty, he publicized that Imam Hasan (as) had accepted him as a caliph.

Perhaps he thought that through a large army, military strength and repenting his earlier deed against Imam Hasan (as), he would be successful in getting recognition as a caliph. However, despite the political and military pressure, the grandson of the Holy Prophet (saws) not only refused to accept Muawiya as a caliph, but accused him as being power hungry and declared his government as oppressive and illegal. 

For that reason, though some historians have shown anxiety, a majority of them have expressed words like ‘tasleem-ul-amr’ (acceptance of the order) or ‘nuzool-ul-hukm’ (receipt of a directive), which clearly indicate that the Imam (as) had only relinquished power, or handed over government, to Muawiya. A team of current researchers supports this view. A few leading ones among these are:

Justice Amir ‘Ali,
Dr. Abdel Salam Turmanini,
Dr. Syed Muhammad Vakil,
The scholar Razi Aale Yasin. {Amir ‘Ali – ‘Mukhtasar Tarikh al Arab’ (Arabic translation: ‘feef B’albaki), Beirut, Dar ul Ilm lil Malayeen, 1961, p…; Abdus Salaam Tarmanini – ‘Ahdaas al Tarikh al Islami’,vol. 1, p.420; Mohd. Vakil – ‘Al Umayyun bain al Sharq wal Gharb’, Beirut, Dar al Shamiah, 1995, vol. 1 p.25; Razi Ale Yasin – ‘Sulh-ul Hasan’, Qum, pp.267-276.}

It was Imam Al-Mujtaba (as)’s maturity of thought, example of excellence, courage, and the success of his political foresight which resulted in Muawiya being considered as a monarch or king by all sections of the society at that time, and he had to accept that status. A clear example of the same is that after Imam Al-Mujtaba (as), S’ad bin Abi Waqas, the well known Companion of the Holy Prophet (saws), addressed Muawiya as ‘monarch’. {Ibn. Athir – ‘Al Kamil fi al Tarikh’, Beirut: Darul Kutub al Ilmiah, 1987, vol. 3 p. 275; Razi Ale Yasin – ‘Sulh-ul Hasan’, Qum, pp.268.}

However, there is no historical significance of allegiance to Muawiya after peace. Rather some researcher or historian, while discussing the peace, might only guess that Imam Hasan (as) might have given allegiance.

3.The future of Caliphate

“Muawiya does not have the right to nominate anyone after him. After him the authority shall return to (Imam) Hasan (as). According to some narrations, ‘after Muawiya, it will be left to ‘Shura‘ of Muslims as they deem fit’.”

Imam Hasan Al-Mujtaba (as) knew the intentions of Muawiya very well. He knew that Muawiya will change the Islamic system of government to the kingdom of Qaiser and Kisra and it will become his family hierarchy. Therefore, the Imam had, by agreement, taken away the right of nomination of heir apparent from him.

What is narrated by some that the grandson of the Holy Prophet (saw) had advanced the condition that Muawiya will not nominate anyone after him but rather the election of the caliph will be left to the ‘Shura‘ of Muslims, is not correct. {Ibn. Atham – ‘Al Futuh’, vol. 4, p.159; Baladhuri – Al-Ansab al Ashraf, vol. 3 p.42; Ibn. Abi al Hadid, ‘Sharh al-Nahjul Balaghah’, vol. 16, p.22.}

‘Allama Ibn. ‘Abdul Barr writes: “There is no difference of opinion among ulama that Imam Hasan (as) had offered the rule to Muawiya till his life time only. Therefore, it had to return to Imam Hasan (as) after him and this was one of the conditions of the agreement between the two.

Imam Hasan (as) considered it advisable not to shed the blood of Muslims for the sake of caliphate and made the agreement, though he considered himself much more entitled to caliphate.” ‘Allama Ibn. ‘Abdul Barr quotes many narrations in which the condition of the government being returned to Imam Hasan (as) is very clearly mentioned. {Ibn. A’bdul Barr – ‘Al IStiab’.}

Hafiz Dhahabi also writes about this condition very strongly in his various publications. He also quotes ‘Umru bin Deenar according to whom Muawiya had made the agreement with Imam Hasan (as) that if he meets with any accident, the rule will be returned to Imam Hasan (as). {Hafiz Dhahabi, ‘Tarikh Al Islam’, Beirut, Darul Kutub al Arabi, 1987, Period of Muawiya, p.5; Hafiz Dhahabi, ‘Al A’bar;, Beirut, vol. 1,pp. 34-35; refer to Ibn. Hajar – ‘Al Asaba fi Tamyiz al Sahaba’.}

All the historians and researchers who have mentioned this condition are: Ibn. S’ad (according to Ibn. Hajar ‘Asqalani), Ibn. Hajar Asqalani (Al-asabah fi Tamyiz al-Sahaba) Ibn. Asakir (Tarikh-e-Ibn. Asakir), Muhib al-Tabari (Dhakair al-Uqba), Ibn. Qutaiba Dinawari (al-Imamah wal-Siyasa), Husayn Dayar Bakri (Tarikh al-Khamis), Suyuti (Tarikh al-Khulafa), Ibn. Abdul Barr (al-Istiab) Hafiz Dhahabi (Tarikh al-Islam-o-al-‘abar) Dr. Abdul Salam Tarmanini (Ahdas al-Tarikh al-Islami) {Ibn. Hajar – ‘Al Asaba fi Tamyiz al Sahaba’; Muhib al Tabari – Dhakair al Uqba, Cairo, Maktaba al Qudsi, 1356 A.H., p. 139; Ibn. Qutaiba Dainwari – ‘Al Imama wal Siyasa’, Qum, Intisharat al Razi, 1413 A.H. p.184; Husayn Dayar Bakri – ‘Tarikh al Khamis, p.390; Suyuti – ‘Tarikh al Khulafa’, Qum,Intisharat al Raza, 1411 A.H., p. 191; Abdul Qadir Badran, ‘Tahzib Tarikhe Damishq’…Asakir, Beirut, Darul Ahya al…, 1987, vol 4, p.224.}

All these writers have clearly written that, according to the agreement, the rule had to return to Imam Hasan (as) after Muawiya. Apart from this, there are other sources of evidence after which no element of doubt remains in accepting this condition.

In this regard, attention is drawn to those letters of Muawiya, written before peace, wherein he had offered the future government to Imam Hasan (as) and had confessed that he (Imam Hasan (as)) was the rightful claimant of the same. In addition to these letters, another argument is available from Ibn. Qutaiba Dinawari and other sources.

They write that when Muawiya tried to appoint Yazid as his heir apparent and invited delegations from different areas, all the others agreed but when the Iraqi delegation was asked about it, its leader Akhnaf bin Qais said:

“(O Muawiya) you have already made an agreement with Imam Hasan (as) in the name of God (and religion), of which you are well aware, that after you, the government will be his.” {Ibn. Qutaiba – ‘Al Imamah wal Siyasah’, Egypt: Shirka Mustafa al Babi, 1963, vol. 1 p. 171.}

Only the historians Ibn. Aasam Kufi, Baladhuri and Ibn. Abi al-HAdid Mo’tazilli disagree with this condition and state that Imam Hasan (as) had said that the choice of future incumbent of caliphate should be left to ‘Shura‘. 

The other writers do not write anything about the appointment of the future caliph.

Firstly, this disagreement does not have much force in that if the Muslims were consulted, whether in the life of Muawiya, or after him, they would not elect anyone except Imam Hasan (as) as they loved him more than even his father. However, it seems that by adding the condition of ‘shura‘ an impression has been given that Imam Hasan (as) had abdicated and had handed over the rule to Muawiya.

Therefore, after Muawiya he needed a fresh mandate for caliphate, which would be available through ‘shura‘. But these writers ignore the fact that Imam Hasan (as) had put in all the terms and conditions in the blank paper which he thought fit; he had completed six months of caliphate and had handed over the rule to Muawiya for a given period.

Therefore, the authority to rule over Muslims should have been returned to him according to law and ethics and it does not make sense that he himself would raise the issue of ‘shura‘. Ibn. Aasam Kufi and Baladhuri also write that Muawiya had offered the future rule to Imam Hasan (as) but they claim that the Imam (as) had shown no inclination towards it.

We feel that these writers have mixed up two issues: one, concerning the destiny of Muslims, and the other, regarding worldly rank and wealth. Imam Hasan (as) had not shown disinclination towards the guidance of Muslims, or caliphate. He had rather shown no interest towards worldly status and the collection of wealth through it.

 In support of the argument is the narration of Baladhuri himself wherein he has mentioned that when Muawiya offered his future rule and huge sums of money to Imam Hasan (as), he had replied: “he is tempting me towards something which, if I had any inclination towards the same, I would not offer it to him.” {Baladhuri – ‘Ansab al Ashraf’, vol. 3 p.41.}

The restoration of Peace and Order

“The life and property of all persons, whether black, red (Persian slave) or of whatever colour, and living in Syria, Iraq, Tihama, Hijaz or anywhere else, will be protected and they will not be harmed.” {Ibn. Atham – ‘Al Futuh’, vol. 4, p.160; Baladhuri – ‘Ansab al Ashraf’, vol. 3 p.42; Ibn. Abi al Hadid, ‘Sharh al-Nahjul Balaghah’,vol. 16, p.22; Husayn Dayar Bakri – ‘Tarikh al Khamis’, p.390; Taha Husayn – Islamiyat – ‘Al Fitnatul Kubra’ pp.979-980; Hasan Kamil al Maltavi – ‘Al Imam al Hasan bin ‘Ali’, p.121; Razi Ale Yasin – ‘Sulh-ul Hasan’, Qum, p.260; Baqar Qarshi – ‘Hayat al Imam al Hasan bin ‘Ali’, vol 2, p.242.}

This condition reflects that one of the top priorities of Imam Hasan (as) was to provide protection of life, property and honour to all men. With the conquest of vast territories, many Persians, named as ‘Humaraa’, had also been enslaved along with the blacks and had become part of the Muslim Ummah.

Due to the tribal and the feudal system of the Arabs, they had not yet been granted full citizenship rights. Rather, they were oppressed. Rising above the consideration of Muslim or non-Muslim, master or slave, the Imam (as) had made peace with Muawiya on the condition that he will protect the life, property and honour of all persons.

This way the Imam (as) proved that he was above the distinction based on colour, religion or race was very serious about restoring peace, and that it was his goal to protect the life, property and honour of every person living in the Muslim society.

Conspiracy against Ahlul Bayt of the Holy Prophet

“Muawiya will not take any open or secret action against (Imam) Hasan bin ‘Ali (as) or against Ahlul Bayt of the Holy Prophet (saws) and he will not try to terrorize them anywhere.” {Ibn. Atham – ‘Al Futuh’, vol. 4, p.160; Baladhuri – ‘Ansab al Ashraf’, vol. 3 p.42; Taha Husayn – ‘Al Fitnatul Kubra’ p.979; Hasan Kamil al Maltavi – ‘Al Imam al Hasan bin ‘Ali’, p.121; Razi Ale Yasin – ‘Sulh-ul Hasan’, Qum,p.261; Baqar Qarshi – ‘Hayat al Imam al Hasan bin ‘Ali’, vol 2, p.245.}

If this condition was violated or anyone else would harm the progeny of the Holy Prophet (saws), then the blame would come to Muawiya as it was his rule. Due to the high status and the popularity of the progeny of the Holy Prophet (saws) among the Muslims, any such conspiracy was not in the interest of Muawiya.

Through this condition, in a way, it had become the responsibility of Muawiya to protect the life and honour of the progeny of the Holy Prophet (saws) and the Holy Ahlul Bayt (as).

The undesirable schism of reviling Hazrat ‘Ali (as)

“Hazrat ‘Ali (as) will be remembered with dignity and honour and no abusive language will be used against him or, according to some narrations, it will not be practiced in the life of Imam Hasan (as).”

This condition, with some variation, has been recorded by the majority of the historians, some of the more prominent ones being: Abul Faraj Isphahani, Ibn. Abi-al-HAdid Mo’tazilli Ibn. Khaldun Ibn. Asakir ,Ibn. Kathir Sheikh Mufid The historian Tabari Ibn. Athir Ibn. S’ad Ibn. Sabbagh Maliki The scholar Razi Ale Yasin The scholar Baqar Qarshi. {Abul Faraj – ‘Maqatil al Talibin’, vol.1, p.43; Ibn. Abi al Hadid – ‘Sharh al-Nahjul Balaghah’, vol. 16 p.44; Ibn. Khaldun, ‘Tarikh Ibn. Khaldun’, Beirut, Muassasah A’lami lil Mutboo’at, 1971, vol. 2, p. 186; Abdul Qadir Badran, ‘Tahzib Tarikhe Damishq’…, vol 4, p.224; Ibn. Kathir, ‘Al bidayah wal Nihaya’, Beirut, Maktaba al Ma’rif. 1974, vol.8, pp.15-16; Sheikh Mufid – ‘Kitab al Irshad’, Tehran, Intisharat-e-Ilmiah, vol. 2 p.10; Tabari – ‘Tarikh al Tabari’, Beirut: Darul Kutub al Ilmiah 1988, vol 3, p. 166; Ibn. Athir – ‘Al Kamil fi al Tarikh’, vol. 2, p.446; Abdul Aziz Salim – ‘Tarikh al Daula al Arabia, Iskandaria: Moas sasah Shabab al Jame’h, 1993, vol.2, p.337; Ibn. Sa’d – ‘al Tabaqaat al Kubra’, Tarjuma Al Imam al Hasan, under publication, research by Abdul Aziz Tabatabai, Qum, Moassa sah Aale Ahlul Bayt, 1996; Qism min al Jaza-e-Samin’ p.76; Ibn. Sabbagh Maliki- ‘al Fusul al Muhimmah’, Najaf, Darul Kutub, p.145; 261; Baqar Qarshi – ‘Hayat al Imam al Hasan bin ‘Ali’, vol 2, p.243.}

This condition reflects that Imam Hasan Al-Mujtaba (as) was very much concerned about the high status and respect for his illustrious father. He and his group were determined to face all conspiracies meant to hurt the honour of Hazrat ‘Ali (as) and would not show any leniency in this respect.

The Bait-ul-Maal of Kufa

“Muawiya would hand over the Bait-ul-Maal of Kufa and the revenue of Darab Jerd (Darab Gard, a state in Iran) to Imam Hasan (as) so that he could meet his expenses and pay back his debt and other dues.” { Ibn. Khaldun, ‘Tarikh Ibn. Khaldun’, vol. 2, p. 186; Abdul Qadir Badran, ‘Tahzib Tarikhe Damishq’…Ibn. Asakir, Beirut, vol. 4, p.224; Ibn. Kathir, ‘Al bidayah wal Nihaya’, vol.8, p.15; Hafiz Dhahabi, ‘Tarikh Al Islam’; Dainwari – ‘Al Akhbar al Tiwal, Cairo, Dar Ahya al Kutub, 1960, p.218; Ibn. Khalkan – ‘Wafeeyat al ‘yan’, Qum, Manshurat al Razi, 1364 A.H., vol. 2, p.66; Ibn. Athir – ‘Al Kamil fi al Tarikh’, Beirut, vol. 2, p.446; Husayn Dayar Bakri – ‘Tarikh al Khamis’, vol. 2, p.390; Hafiz Dhahabi, ‘Al A’bar, vol. 1, pp.34-35; Tabari – ‘Tarikh al Tabari’, vol 3, p. 166; Ibn. S’ad – ‘al Tabaqaat al Kubra’, vol. 8,p.76, under publica tion. Dr.Abdus Salaam Tarmanini – ‘Ahdaas al Tarikh al Islami’,vol.1, p.420; Abdul Aziz Salim – ‘Tarikh al Daulatal Arabia,vol .2, p.337 ; Sayuti – ‘Tarikh al Khulafa’, Qum, p. 191.}

Before deciding whether this condition is true or false, it is necessary to study the relevant details.

The historian Tabari, and later Ibn. Athir, writes that Imam Hasan (as) wanted that Muawiya should hand over to him the money available in the Bait-ul-Maal of Kufa. Muawiya agreed to this condition. At that time there were fifty lakh (five million) Dirham in that Bait-ul-Maal which (Imam) Hasan bin ‘Ali (as) took to Madina. 

Dr. Husayn Muhammad Jafri and  Syed Ahmed Shafai Qutbi, challenging this narration of the historian Tabari, writes:

“For two reasons, there seems to be no logical reason for this condition:”
“1. Till the time of the peace agreement, Imam Hasan (as) was the undisputed caliph of Kufa. Therefore, the Bait-ul-Maal was under his custody;”

“2.  Hazrat ‘Ali (as) use to distribute all that was in the Bait-ul-Maal  at the end of every week. Therefore, it is difficult to believe that within the few months of the caliphate of Imam Hasan (as), despite heavy war expenses and the disorder due to the martyrdom of Hazrat ‘Ali (as), fifty lakh (five million) Dirham would still be available in the Bait-ul-Maal.” {Husayn Muhammad Jafri – ‘The Origins and Early Development of Shia Islam’, p.149.}

In a few narrations it is mentioned that Imam Al-Mujtaba (as) had demanded that Muawiya should allow him to take as much money from Bait-ul-Maal as he wished so that he could repay the debt and other dues, while some others say that Imam Hasan (as) wanted that Muawiya should hand over the Bait-ul-Maal of Kufa to him.

At that time there were said to be seventy lakh (seven million) Dirham in the Bait-ul-Maal of Kufa which Imam Hasan (as) is alleged to have taken with him to Madina. Muawiya had promised to give him an additional sum of ten lakh (one million) Dirham per annum. In “Mukhtasar-al-Jame’ ” it is even alleged that Imam Hasan (as) had sold the caliphate to Muawiya for fifty lakh (five million) Dirham and had taken the commitment that he would pay a similar amount annually to the Imam (as). {Husayn Dayar Bakri – ‘Tarikh al Khamis’, vol. 2, p.390.}

According to the historian Dinawari, Imam Hasan (as) had demanded that, apart from Bait-ul-Maal, the revenue of an Iranian state Darab Jard would be reserved for him a sum of twenty lakh Dirham (two million) would be given to his younger brother Imam Husayn (as) and Bani Hashim would be given preference over Bani Abde Shams. Also, that these conditions had been included in the Peace Agreement. The condition about Darab Jard’s revenue has also been mentioned by other historians. {Ibn. Khaldun, ‘Tarikh Ibn. Khaldun’, vol. 2, p. 186; Abdul Qadir Badran, ‘Tahzib Tarikhe Damishq’…Ibn. Asakir, Beirut, vol. 4, p.224; Ibn. Kathir, ‘Al bidayah wal Nihaya’, vol.8, p.15; Hafiz Dhahabi, ‘Tarikh Al Islam’; Dainwari – ‘Al Akhbar al Tiwal, Cairo, Dar Ahya al Kutub, 1960, p.218; Ibn. Khalkan – ‘Wafeeyat al ‘yan’, Qum, Manshurat al Razi, 1364 A.H., vol. 2, p.66; Ibn. Athir – ‘Al Kamil fi al Tarikh’, Beirut, vol. 2, p.446; Husayn Dayar Bakri – ‘Tarikh al Khamis’, vol. 2, p.390; Hafiz Dhahabi, ‘Al A’bar, vol. 1, pp.34-35; Tabari – ‘Tarikh al Tabari’, vol 3, p. 166; Ibn. S’ad – ‘al Tabaqaat al Kubra’, vol. 8,p.76, under publica tion. Dr.Abdus Salaam Tarmanini – ‘Ahdaas al Tarikh al Islami’,vol.1, p.420; Abdul Aziz Salim – ‘Tarikh al Daulatal Arabia,vol .2, p.337 ; Sayuti – ‘Tarikh al Khulafa’, Qum, p. 191.}

All these narrations have so many inaccurate statements that the researchers doubt whether such a large amount could have been demanded from Muawiya and consider these narrations as weak. Those mentioning such narrations have used the Arabic words “qeel or yaqal” which is a clear indication that these are weak narrations.That is why a large number of historians do not even mention these conditions. Apart from the above, many objections can be raised against these narrations:

(1). Imam Al-Mujtaba (as) was the caliph of Islam. Is it possible that he was so indebted that he needed such a large amount for its repayment while the Bait-ul-Maal of Muslims was under his own control?

(2). In the Bait-ul-Maal, along with booty, there is also the amount of propitiatory offerings and Zakat. Is it possible that Imam Hasan (as), being one of the Ahlul Bayt on whom propitiatory offerings are forbidden, had considered it lawful to use the money from Bait-ul-Maal for his personal expenses? Had he done so, would the other members of the household of the Holy Prophet (saw) not have objected?

(3). It is a hard historical fact that huge sums had been offered to the Imam (as) by Muawiya so that he may abdicate caliphate in favour of Muawiya, but he declined Muawiya’s politics of bribery and faced him boldly. He clearly indicated that if he had the love of wealth and coveted worldly power and authority, Muawiya would never have been able to snatch the same from him.

In the light of these hard facts, there is no doubt that the weak narrations, particularly those that he sold the caliphate in exchange for a certain amount and put the condition that Bani Hashim be given a higher status than Bani Umayyah, are unreliable. The fact is that in the dignified and pious life of the grandson of the Holy Prophet (saws) there is no chance of such behaviour.

In authentic narrations about him it has been stated that twice he had distributed all that he had among the needy. Similarly, in his character and manners there is no indication that he might have aired family status and ignored the principle of equality in the distribution of money from Bait-ul-Maal.

 <<<<About Marriage>>>>

According to his grandson, Abdullah ibn Ḥasan a.s, he usually had four wives, the limit allowed by the law.Stories spread out on this subject and have led to the suggestions that he had 70 or 90 wives in his lifetime, along with a harem of 300 concubines. According to Madelung, and as per my studies however, these reports and descriptions are “for the most part vague, lacking in names, concrete specifics and verifiable detail; they appear to defame the Ahele Bait and work in  the favour of people who are enmey to Ahele Bait and they appear to be spun out of the reputation of al-Hasan as a mitlaq, now interpreted as a habitual and prodigious divorcer, some clearly with a defamatory intent.” Living in his father’s household, “Ḥasan was in no position to enter into any marriages not arranged or approved by him,” says Madelung. According to Ebn Saa’d (pp. 27–28), whose information seems to be more reliable, however, Hasan had 15 sons and 9 daughters from six wives and three named mahaziya.