Hazrat Daud al Tai r.a

हज़रत दाऊद ताई

प्रसिद्ध सूफ़ी संत दाऊद ताई ने अपनी सारी ज़िन्दगी अल्लाह की इबादत में गुज़ारी. वे भक्ति, वैराग्य और त्याग का प्रतीक थे. हर व्यक्ति की तरह वे भी साधारण मनुष्य थे, लेकिन उनके जीवन में एक मोड़ ऐसा आया कि जिसने उनके जीवन की दिशा ही बदल दी. एक बार एक फ़क़ीर अल्लाह की मुहब्बत से सराबोर एक गीत गा रहा था-
कौन-सा तेरा चेहरा ख़ाक में नहीं मिले
और कौन-सी तेरी आंख ज़मीन पर नहीं बही
यह शेअर उनके दिल को छू गया. उन्होंने आत्ममंथन किया और फिर संसार और सांसारिक जीवन उन्हें व्यर्थ लगने लगा. बेख़ुदी की हालत में वह हज़रत इमाम अबु हनीफ़ा की ख़िदमत में हाज़िर हुए और पूरा वाक़िया उनसे बयान करके कहा कि मेरा दिल अब दुनिया भर गया है. आप कोई रास्ता बताएं कि दिल को कुछ सुकून हासिल हो. यह सुनकर इमाम साहब ने फरमाया कि एकांत में चले जाओ. उन्होंने ऐसा ही किया. कुछ वक़्त बाद इमाम साहब ने फ़रमाया कि अब यह बेहतर है कि लोगों से मिलो और उनकी बातों पर सब्र करो. इसके बाद वे संतों की संगत में रहने लगे. इसी दौरान प्रसिद्ध संत हबीब राई से उनकी मुलाक़ात हुई. संत से प्रभावित होकर उन्होंने उनसे दीक्षा ली और उनके शिष्य बन गए.

उन्हें विरासत में बीस दीनार मिले थे. वे उसी में ख़ुश रहते थे. जब किसी ने उनसे पूछा कि क्या संतों को धन का संग्रह करना शोभा देता है, तो उन्होंने कहा कि इन दीनारों की वजह उन्हें रोज़ी-रोटी के लिए कोई काम नहीं करना पड़ता और वे निश्चिंत होकर अल्लाह की इबादत कर सकते हैं. इसलिए ज़िन्दगीभर के लिए यह रक़म उनके लिए काफ़ी है. उन्हें अल्लाह की इबादत के अलावा किसी और चीज़ में कोई दिलचस्पी नहीं थी. दिन-रात वे इबादत में ही लीन रहते थे. इबादत की वजह से उन्होंने निकाह भी नहीं किया. जब उनके परिचित उनसे शादी की बात करते, तो वे कहते थे कि जब उनके पास अल्लाह के अलावा किसी और के लिए ज़रा भी वक़्त नहीं, तो फिर शादी करके किसी लड़की की ज़िन्दगी क्यों बर्बाद करूं. किसी ने पूछा दाढ़ी में कंघी क्यों नहीं करते, तो उन्होंने फ़रमाया कि अल्लाह से फ़ुर्सत मिले, तो करूं भी. उन्हें भोजन करने में वक़्त बर्बाद करना भी तकलीफ़देह महसूस होता था. इसलिए वे तरल भोजन ही करते थे. अगर किसी दिन तरल भोजन न मिलता, तो भोजन में पानी डालकर उसे पी लेते थे, ताकि अपना ज़्यादा से ज़्यादा वक़्त अल्लाह की इबादत में ही बिता सकें.

वे जिस मकान में रहते थे, वह बहुत पुराना और जर्जर हालत में था. जब उसका एक हिस्सा गिर गया, तो वे दूसरे हिस्से में रहने लगे और जब वह भी ढह गया, तो दरवाज़े के पास आकर रहने लगे. जब मोहल्ले वालों ने कहा कि वे मकान की मरम्मत करा लें, तो उन्होंने कहा कि उन्हें अल्लाह की इबादत से इतना वक़्त ही नहीं मिलता कि वे घर की तरफ़ ध्यान दें. जिस प्रकार भारतीय दर्शन में इंद्रियों पर नियंत्रण को जीवन के लिए महत्वपूर्ण बताया गया है, उसी प्रकार संत दाऊद ताई ने भी इंद्रियों पर नियंत्रण को सुखी जीवन का आधार क़रार दिया है. उनका कहना है कि इंद्रियों के सुख के जाल में फंसकर मनुष्य अच्छे-बुरे की पहचान भूल जाता है. वे ख़ुद भी इससे दूर रहते थे. एक बार की बात है कि रमज़ान के दिनों में वे धूप में बैठे अल्लाह की इबादत कर रहे थे. उनकी मां ने जब देखा कि रोज़े में भी वे चिलचिलाती धूप में बैठे हैं, तो उन्होंने दाऊद ताई से छांव में आ जाने के लिए कहा. इस पर दाऊद ताई ने कहा कि जब वे अल्लाह की इबादत के लिए बैठे थे, तब यहां छांव ही थी और अब यहां धूप आ गई, तो फिर वे केवल इंद्रियों के सुख के लिए छांव में क्यों आएं.

वे कहते थे कि मनुष्य को सीमित साधनों में ही संतुष्ट रहना चाहिए, क्योंकि इच्छाओं का कोई अंत नहीं है. जब व्यक्ति की एक इच्छा पूरी हो जाती है, तो वे कोई और इच्छा पूरी करना चाहता है. एक के बाद एक इसी तरह इच्छाओं की पूर्ति के प्रयासों में वे अपना सारा जीवन बर्बाद कर लेता है. अगर मनुष्य अपनी इच्छाओं को सीमित रखे, तो वे ज़्यादा सुखी रह सकता है. ऐसा व्यक्ति समाज के लिए भी बेहद उपयोगी होता है. जब पैतृक संपत्ति में मिले उनके दीनार ख़त्म हो गए, तो उन्होंने एक ईमानदार व्यक्ति को अपना मकान बेच दिया, ताकि उन्हें हलाल की कमाई ही मिले. धीरे-धीरे उनकी यह रक़म भी ख़त्म होने लगी. हारून रशीद ने उन्हें कुछ अशर्फ़ियां भेंट करनी चाहीं, तो उन्होंने उन्हें लेने से साफ़ इंकार कर दिया. जब हारून रशीद ने उनसे आग्रह किया कि वे उनसे कम-से-कम एक अशर्फ़ी तो भेंट स्वरूप स्वीकार कर लें, तो उन्होंने कहा कि उनके पास जो रक़म है, वे उनके लिए काफ़ी है. उन्होंने यह भी कहा कि उन्होंने अल्लाह से विनती की है कि जब उनके पास मौजूद यह राशि भी ख़त्म हो जाए, तो वह उन्हें इस संसार से बुला ले, ताकि उन्हें किसी का अहसान न लेना पड़े. अल्लाह ने अपने बंदे की दुआ को क़ुबूल किया. जब उनकी सारी रक़म ख़त्म हो गई, तो वे इस नश्वर संसार को छोड़कर सदा के लिए सर्वशक्तिमान अल्लाह के पास चले गए.

किसी ने संत दाऊद ताई को ख़्वाब में उड़ते हुए यह कहते सुना कि आज मुझे क़ैद से आज़ादी मिल गई है. सुबह वह व्यक्ति ख़्वाब की ताबीर पूछने के लिए दाऊद ताई के घर पास पहुंचा, तो उसे वहां उनके इंतक़ाल की ख़बर मिली. वह व्यक्ति अपने ख़्वाब की ताबीर समझ गया. रिवायत है कि इंतक़ाल के वक़्त आसमान से यह आवाज़ आई कि दाऊद ताई अपनी मुराद को पहुंच गया और अल्लाह तअला भी उनसे ख़ुश है. उन्होंने वसीयत की थी कि उन्हें दीवार के नीचे दफ़न किया जाए. उनकी इस वसीयत को पूरा कर दिया गया.

वे हमेशा दुखी रहते थे और फ़रमाया करते थे कि जिसे हर पल मुसीबतों का सामना करना हो, उसे ख़ुशी किस तरह हासिल हो सकती है. संत दाऊद ताई लोगों को परनिंदा से दूर रहने की सीख देते हुए कहते हैं कि व्यक्ति को सदैव अपने अंदर झांककर देखना चाहिए. उसे आत्मविश्लेषण करना चाहिए कि कहीं उसकी वजह से किसी दूसरे को दुख तो नहीं पहुंचा है. ऐसा करने से व्यक्ति अनेक बुराइयों से बच जाता है. एक बार संत दाऊद ताई से कोई ग़लती हो गई. अपनी ग़लती को याद कर वे अकसर रोने लगते. जब कोई उनसे रोने का कारण पूछता, तो वे कहते कि वे अपनी ग़लती को कभी भूल नहीं पाते. इसलिए रोने लगते हैं. वे कहते थे कि इंसान को अपनी ग़लतियों से सबक़ हासिल करना चाहिए और गुनाह के लिए अल्लाह से माफ़ी मांगनी चाहिए. बेशक, संत दाऊद ताई का जीवन लोगों के लिए प्रेरणा का स्त्रोत है.

tazkira e aulia_Page_87tazkira e aulia_Page_88tazkira e aulia_Page_89_1

Abu Solaiman Dawud ibn Nosair al-Ta’i of Kufa was a man of notable erudition, a pupil of Abu Hanifa; he was converted to the ascetic life by Habib al-Ra’i and threw all his books into the Euphrates. He died between 160 (777) and 165 (782)

The poverty of Dawud-e Ta’i

From the beginning Dawud-e Ta’i was overwhelmed by an inner grief and always avoided the society of his fellow
creatures. The cause of his conversion was that he heard a mourning-woman recite these verses.
On which of your cheeks has decay begun, And which of your eyes has started to run?
Great sorrow invaded his heart, and all comp osure deserted’ him. In this state he went to lessons with his
teacher Abu Hanifa. “What has transpired with you?” Abu Hanifa asked. Dawud related to him the foregoing incident.
“The world has lost its attractions for me,” he added.; “Something has happened inside of me which I
cannot under-~ stand, nor can I discover an explanation  of it in any book ort legal pronouncement.” “Turn away from other men,” Abu Hanifa prescribed.

 

So Dawud turned his face from other men and shut himself up in his house. After a long interval, Abu
Hanifa went to see him. “This is not the solution, for you to hide in your house and utter not a word. The proper course is for you to sit at the feet of the imams and listen to them propounding novel ideas. You should attend to what
they have to say patiently, uttering not a word. Then you will know those problems better than they.”
Recognizing the good sense of what Abu Hanifa said, Dawud resumed his studies

For a year he sat at the feet of the imams, never opening his mouth and accepting their pronouncements with patience, being content simply to listen and not to reply. “This one year’s patience,” he remarked at the end of
that’ time, “is equivalent to thirty years’ strenuous work.”

He then encountered Habib-e Ra’i, who initiated him into the mystic path. He set forth upon it manfully.
He flung his books into the river, went into retirement and cut off all expectation of other men.
Now he had received twenty dinars as an inheritance.These he consumed in twenty years. Certain of
the shaikhs reproved him for this. “The path stands for giving to others, not keeping to
oneself.”
“I hold on to this amount to secure my peace of mind,” he explained. “I can make do with this until I
die.”

He spared himself no austerity, to such an extent that he would dip bread in water and then sip the
water, saying, “Between this and eating the bread I can recite fifty verses of the Koran. Why should I waste my
life?” Abu Bakr-e Aiyash reports, “I went to Dawud’s chamber and saw him holding a piece of dry bread and
weeping. ‘What has happened, Dawud?’ I asked. ‘I want to eat this piece of bread,’ he replied, ‘and I do
not know whether it is hallowed or unhallowed.”’ Another reports, “I called on him, and saw a pitcher
of water placed in the sun. I asked, ‘Why do you not place it in the shade?’ ‘When I put it there, it was in the
shade,’ he replied. ‘Now I am too ashamed before God to indulge myself.’”

Anecdotes of Dawud

It is said that Dawud owned a great palace with many apartments. He would occupy one apartment until it
fell into ruins; then he would move to another apartment . “Why do you not repair the apartment?” he was
asked.

‘I have made a covenant with God not to repair this world,” he replied.
Gradually the whole palace collapsed, nothing remaining except the portico. On the night on which
Dawud died, the portico also fell in. “The roof of the apartment is broken,” remarked
another visitor. “It is about to fall.” ‘] have not looked at this roof for twenty years,”
answered Dawud. “Why do you not marry?” Dawud was asked.
“I do not wish to deceive a believing woman,” he replied.
“How is that?”
“If I propose to a woman,” Dawud explained, “that will mean that I have undertaken to manage her affairs.
Since I cannot attend both to my religious duties and the world, that means that I will have deceived her.”
“Well, at least comb your beard,” they said. “That implies being at leisure to do it,” he answered.
One moonlit night Dawud went up on his roof and gazed at the sky. He fell to meditating on the splendor
of God’s kingdom, and wept until he was beside himself. He fell off on to the roof of his neighbour. The latter,
thinking that a thief was on his roof, rushed up with a sword. Seeing Dawud there, he took him by the
hand.

“Who threw you down here?” he asked. “I do not know,” Dawud replied. “I was beside
myself. I have no idea at all.” Once Dawud was seen running to prayers.
“What is the hurry?” he was asked. “This army at the gates of the city,” he replied.
“They are waiting for me.” “Which army?” they exclaimed.
“The men of the tombs,” he replied. Harun al-Rashid asked Abu Yusof to take him to
visit Dawud. Abu Yusof went to Dawud’s house, but was refused admission. He begged Dawud’s mother to
intercede. “Admit him,” his mother pleaded.
“What business have I with worldlings and evildoers?”
Dawud replied, refusing to comply.
“I implore you, by the right of my milk, admit him,”
his mother said.
“O God,” said Dawud, “Thou hast said, ‘Observe the right of thy mother, for My good pleasure is in her
good pleasure.’ Otherwise, what business have I with them?

He then granted audience. They entered and seated themselves. Dawud began to preach, and Harun wept
copiously. When he withdrew, he put down a gold moidore.
“This is hallowed,” he said. “Remove it,” Dawud said. “I have no need of it. I
sold a house which was mine by hallowed inheritance, and live on the proceeds. I have asked God that when
that money is spent He shall take my soul, so that I may not be in need of any man. I am hopeful that God
has answered my prayer.” Harun and Abu Yusof then returned to the palace.
Abu Yusof went to see the keeper of the purse. “How much is left of Dawud’s money?” he asked.
“Two dirhams,” the keeper replied. “He has been spending a silver penny daily.”
Abu Yusof calculated. Another day, standing with his back to the prayer-niche, he announced, “Today Dawud has died.” Enquiry was made, and it was found to be so.
“How did you know?” they asked. “I calculated from his expenditure that today nothing
remained to him,” Abu Yusof explained. “I knew that his prayer would be answered.”

Hazrat Khwaja Abu Sulaimān Daawūd al-Taai rahmatullāhi alaihi :
 

Aap ke waalid ka naam Nusair hai.
Aap Banu Taai qabeele se ta’alluq rakhte hain.

****************
Aap tabe Aap ne Imaam e aazam Abu Haneefa rahmatullāhi alaihi ki sohbat me rehkar 20 saal tak taaleem haasil ki.
Aap ne Hazrat Khwaja Habeeb Raee, Hazrat Khwaja Fuzail bin Ayaaz, aur Hazrat Khwaja Ibrāheem bin Ad’ham se bhi faiz haasil kiya.

****************
Ek baar Aap ne ek shakhs ko ek sher padhte hue suna. Jis ka mafhoom ye tha ‘Kaun sa chehra hai jo jhukkar khaak par aata nahi? Kaun si aankhen hain jin me se aansoo nikal kar zameen par aate nahi?’ Aap ye sunkar bahot be-chain ho gaye. Aur Imaam e aazam Abu Haneefa ki baargaah me aakar ye baat sunaaya aur kaha ‘Main ab dunya se ukta gaya hu aur ek anjaan shay qalb ko muztarib kiye hue hai.’ Aur phir Imaam e aazam Abu Haneefa ke mashware par aap ne tanhai me mujaahida kiya. Kuchh din baad Imaam e aazam Abu Haneefa ne aap ko tanhaai chhodkar sufiya e kiraam ki sohbat me rehkar faiz haasil karne ke liye farmaaya.
Is ke baad Hazrat Khwaja Habeeb al-Ajami rahmatullāhi alaihi ki baargaah me tashreef le gaye.

****************
Aap Uloom e haqaa’iq ke Shanaasa, Raah e Tareeqat ke aamil aur Saalikeen o Aarifeen ke Peshwa aur Muqtada the.
Aap hamesha saadgi pasand farmaate the.

Aap roz paani me roti bhigokar namak lagaakar khaate the.
Aur khaane ke dauraan aap Qur’an majeed ki 50 aayate tilaawat farmaate the.

Ek baar Aap ke khaadim ne achha lazeez khaana banaakar diya to Aap ne us se farmaaya ‘Ye khaana falaan yateemo khila do. Kyun ki agar main use khaaunga to wo baad me nikalkar kude me chala jaayega aur khatm (bekaar) ho jaayega. Magar wo yateem use khaayenge to wo mere liye aakhirat ki jama punji banega.’

Ek baar ek shakhs ne Aap ke yaha paani ka ghada dhoop me rakha hua dekh kar arz kiya ke ‘Is ko saaye me kyun nahi rakha?’ Farmaaya ‘Jab maine is ko yaha rakha us waqt saaya tha lekin ab dhoop me se uthaate hue nadaamat hoti hai ke mahaz apni raahat ke liye tasi’a auqaat karte hue Zikr e Ilāhi se ghaafil rahu.’

Aap sirf namaaz ke liye ghar se baahar aate aur ba-jama’at namaaz ada karke foran apne ghar me waapas chale jaate.

Aap ke makaan ka ek hissa munhadim ho gaya (gir gaya) to Aap dusre hisse me muntaqil ho gaye aur ab wo bhi munhadim ho gaya to darwaaze me muntaqil ho gaye lekin us ki chhat bhi bahot bosida thi. Jab chhat ka kuchh hissa toot gaya aur logo ne chhat theek karaane ke liye kaha to farmaaya ke ‘Main ALLĀH ta’ala se ye ahad kar chuka hu ke Duniya me taamir ka kaam nahi karaaunga. Aap ke wisaal ke baad wo chhat bhi munhadim ho gai.

****************
Ek baar Hazrat Abu Rabi’a ne kuchh naseehat ke liye kaha to Aap ne farmaaya :
(1) Dunya se parhez karna ALLĀH ta’ala se qareeb karta hai. Tarq e Duniya se banda Khuda tak rasaai haasil kar leta hai.

(2) Deen ko dunya par tarjeeh do aur apne dil ko dunyadaar logo ke khayaalo se paak rakho. Dunya me jo kuchh halaal mile agarche thoda hi ho us se khush raho agar deen ki hifaazat hoti ho.

(3) Fahash-kalaami aur bad-zabaani se bacho aur logo se alaahida raho.

(4) Dunya me roza rakhoge to aakhirat me Iftaar milega.

(5) Murde tumhara intazaar kar rahe hain (ya’ni ek roz tumhe bhi marna hai), is liye waha ki tayyaari karo.

****************
Aap Hazrat Khwaja Habeeb al-Ajami rahmatullāhi alaihi ke mureed aur khalifa hain.

Aap ke khalifa Hazrat Khwaja Ma’aruf al-Karkhi rahmatullāhi alaihi hain.

****************
Ek baar Khalifa Hāroon Rasheed Imaam Abu Yousuf ke saath aap ki mulaaqat ke liye aaya. Aap ne milne se inkaar kiya aur farmaaya ke ‘Main dunyadaar aur zaalim logo se milna pasand nahi karta.’ Aap ki waalida ki guzaarish par aap ne khalifa ko andar aane ki ijaazat di magar shart rakhi ke wo chand lamhe rookkar waapas chala jaayega. Khalifa ne jaate waqt aap ko chand sone ki ashrafiya bataure hadiya dena chaahi magar aap ne use lene se inkaar kiya aur farmaaya ‘maine apna ghar bech diya hai aur us ke badle me jo halaal raqam mili hai usi me se kharch karta hu aur maine ALLĀH ta’ala se dua ki hai ki jab ye raqam khatm ho jaaye tab mujhe dunya se utha lena.’
Baad me Imaam Abu Yousuf ko Hazrat ke shaagird se pata chala ke ‘Ab us raqam me se sirf 10 dirham se kam bache hain.’ Ye sunkar unho ne kaha ke ‘Ab chand din me hi Hazrat dunya se inteqaal farmaane wale hai.’ Aur us ke chand din baad aap ka wisaal hua.

****************
Wisaal ke agle din ek buzurg ne Aap ko tez dhoop me tilaawat e Qur’an karte dekha to aap ko saaye me aa jaane ke liye kaha. Aap ne farmaaya ‘ Main apne nafs ki mukhaalifat karke us ko aur kamzor karna chaahta hu.’

Wisaal se pehle Aap ne puri raat ibaadat e Ilāhi me guzaari aur aakhir me haalat e sajda me Aap ka wisaal hua.

Inteqaal ke waqt ghaib se nida aai ke ‘Daawūd Tai apni muraad ko pahunch gaya aur ALLĀH ta’ala us se raazi hai.’

Aap ke wisaal se waqt ek nek shakhs ne khwaab me dekha ke Aap bhaag rahe hain. Us ne aap se puchha ‘Aap kyun bhaag rahe hain?’ Aap ne farmaaya ‘Maine qaid se aazaad hua hu.’ Subah ko use pata chala ke raat ko Hazrat ka inteqaal hua hai.

****************
Aap ka wisaal 27 Rabi uṡ ṡaani 165 Hijri (783 A.D.) ko hua.

Aap ka mazaar Kufa (Iraq) me hai.

****************
ALLĀH ta’ala us ke Habeeb sallallāhu alaihi wa sallam ke sadqe me
Aur Hazrat Khwaja Daawūd al-Taai rahmatullāhi alaihi aur tamaam Auliya Allāh ke waseele se
Sab ko mukammal ishq e Rasool ata farmae aur Sab ke Eimaan ki hifaazat farmae aur Sab ko nek amal karne ki taufiq ata farmae.
Aur Sab ko dunya wa aakhirat me kaamyaabi ata farmae aur Sab ki nek jaa’iz muraado ko puri farmae.
Aameen.