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फजीलत ए फातिमा ज़हरा अलैहिस्सलाम

फजीलत ए फातिमा ज़हरा –
एक इल्मदार शख़्स, इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम की ख़िदमत में आया और अर्ज़ करने लगा, “मैंने सूरः दहर की तिलावत की, बार-बार तिलावत की, इसमें अल्लाह ने जन्नत और जन्नत में मिलने वाली, अता की जाने वाली हर चीज़ का ज़िक्र किया है लेकिन इसमें हूरों का ज़िक्र नहीं मिलता हालाँकि कुरआन में कई जगह हूरों का तज़किरा मौजूद है।”,

सैयद शादाब अली
इमाम अलैहिस्सलाम ने फरमाया, “ये सूरः, अम्मा फातिमा सलामुल्लाह अलैहा की शान में नाज़िल हुई लिहाजा अल्लाह ने हूरों की बात को मक्फी रखा ताकि फातिमा सलामुल्लाह हा की शान में कोई कमी ना आ जाए। “
अल्लाहु अकबर कसीरन कसीरा, कुर्बान जाऊँ, बिन्त ए मुहम्मद सलामुल्लाह अलैहा की पाकी और बुलंदी पर की जहाँ आपकी शान बयान की जाती है उस आयत में तो दूर, उस सूरः भीका तक नहीं किया जाता ।
सूरः दहर का एक अख्लाकी पहलू भी है जो लोगों को समझ नहीं आता। अम्मा फातिमा सलामुल्लाह अलैहा के साथ, आखिरत में जन्नत जाने की ख़्वाहिश रखने वाली औरतों को चाहिए की इस सूरः को बार-बार पढ़कर समझें। ये एक सूरः अपने आप में नज़र ओ नज़र का सही तरीका, शौहर की गुर्बत में साथ देने का जज्बा, सखावत, तक़वा और सिर्फ़ अल्लाह की रज़ा के लिए अमल करना जैसे बहुत सारे ज़ाहिरी और बातिनी मसलों पर रौशनी डालती है।
जब इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम बीमार हुए तो आपके घरवालों ने नज़र की कि हुसैन अलैहिस्सलाम को शिफा मिलने पर तीन रोज़े रखेंगे । इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ठीक हुए और रोज़े पूरे करने का वक्त आया । आप अली अलैहिस्सलाम एक यहूदी के पास गए और तीन दिन के काम की बात तय हुई बदले में उसने उजरत की रकम या गन्दुम पहले ही अदा करी यानी एडवांस में, आप अली अलैहिस्सलाम रकम लेकर घर आए और अपनी जौजा के हवाले कर दी। अब जब इफ्तारी का वक्त आया तो दर पर दस्तक हुई एक मिस्कीन आया था, अम्मा फातिमा सलामुल्लाह अलैहा के कहने पर सारा खाना उसे दे दिया गया और घरवालों ने फाका कर लिया।
यहाँ गौर ओ फ़िक्र की बात ये है की घर में दो दिन की और उजरत पहले से रखी है लेकिन चूँकि अभी उसके बदले का काम नहीं किया गया है इसलिए अम्मा फातिमा सलामुल्लाह नज़दीक उसपर हक़ नहीं बनता। अगले रोज़ फिर रोज़ा रखा गया और जैसे ही इफ्तारी करने का वक्त आया दरवाज़े पर दस्तक हुई, एक यतीम खड़ा था, आप फातिमा सलामुल्लाह अलैहा के कहने पर सारा खाना उसे दे दिया गया। ऐसे ही जब तीसरा रोज़ा हुआ और इफ्तार का वक्त होने को था तब दरवाज़े पर दस्तक हुई और क़ैदी को खड़ा पाया, तीसरे दिन का खाना भी उसे ही दे दिया गया। तब अल्लाह रब उल इज्ज़त ने कुरआन में आयतें
नाज़िल की और इरशाद फरमाया-
ये बन्दे नज़र को पूरा करते हैं और उस दिन से डरते हैं जिसकी सख़्ती हर तरफ़ फैली हुई है। ये उसकी मोहब्बत में मिसकीन ( मोहताज ), यतीम और असीर (क़ैदी) को खाना खिलाते हैं।
हम सिर्फ़ अल्लाह की मर्ज़ी की ख़ातिर तुम्हें खिलाते हैं वरना न तुमसे कोई बदला चाहते हैं शुक्रिया।
(सूरः दहर की आयत 7,8,9)
यहाँ सीखने समझने लायक नसीहत ये है की शौहर की गुरबत में कैसे साथ दिया जाता है और तक़वे की हद ये है की काम करने के पहले ही तीन दिन की उजरत दी जा चुकी है या काम एक दिन किया है लेकिन मेहनताना तीन दिन का दे दिया गया है इस शर्त पर की अगले दो दिन भी काम करोगे। ये शरियतन जायज़ है, लेकिन फिर भी फातिमा सलामुल्लाह अलैहा ने उस हिस्से में से लेना गवारा नहीं किया। याद रखें, दुनिया में ही फातिमा सलामुल्लाह अलैहा के सिखाए रास्ते पर चल पाना आसान नहीं है, आख़िरत की तो बात ही अलग है। अगर कम की बहनों को लगता है की वो शौहर को हराम के रास्ते पर ले जाकर भी कामयाबी पा सकती हैं तो वो गलत हैं। मेरे अपनों ! दुनियावी भूख भले ही बर्दाश्त कर लेना लेकिन हराम का एक लुकमा भी कभी ना खाना ।

