
Laylatul Qadr aur Hazrat Fatima.





हुज़ूर ﷺ से खुरासान से निकलने वाले लश्कर के बारे में कई हदीसें किताबों में मिलती हैं। उनमें से मशहूर रिवायत यह है:
हदीस:
“खुरासान से काले झंडों वाला एक लश्कर निकलेगा, उसे कोई नहीं रोक सकेगा यहाँ तक कि वह बैतुल मुकद्दस (ईल्या) में अपने झंडे गाड़ देगा।”
हवाला:
Sunan al-Tirmidhi — हदीस नं. 2269
Musnad Ahmad ibn Hanbal — 22387
Sunan Ibn Majah — 4084
एक दूसरी रिवायत में यह भी आया है:
हदीस:
“जब तुम खुरासान की तरफ से काले झंडे आते देखो तो उनके पास जाओ, क्योंकि उनमें अल्लाह के खलीफा महदी होंगे।”
हवाला:
Sunan Ibn Majah — 4084
📖 खुरासान पुराने ज़माने में एक बड़ा इलाक़ा था जिसमें आज का ईरान, अफ़ग़ानिस्तान, तुर्कमेनिस्तान और मध्य एशिया के कुछ हिस्से शामिल थे।

*जब अरब मुँह फेर लेंगे, तो अल्लाह ईरान के लोगों को ले आएगा*
हदीस 1:
हमें जाफ़र बिन मुहम्मद अल-ख़ुल्दी ने बताया, उन्हें मुहम्मद बिन अली बिन ज़ैद अस्-साएग ने, उन्हें सईद बिन मंसूर ने, उन्हें अब्दुल अज़ीज़ बिन मुहम्मद ने, उन्हें अला बिन अब्दुर रहमान ने और उन्होंने अपने पिता के हवाले से हज़रत अबू हुरैरा (रज़ि.) से रिवायत की कि:
जब यह आयत नाज़िल हुई: ‘व इन ततवल्लौ यस्तब्दिल क़ौमन ग़ैरकुम’ (और अगर तुम मुँह फेर लोगे तो अल्लाह तुम्हारे बदले और लोगों को ले आएगा), तो सहाबा ने अर्ज़ किया: “हे अल्लाह के रसूल! वे कौन लोग हैं जिन्हें हमारे मुँह फेरने पर हमारे बदले लाया जाएगा?” उस समय हज़रत सलमान फ़ारसी (रज़ि.) आप ﷺ के पास बैठे थे। आप ﷺ ने उनकी ओर इशारा करते हुए फ़रमाया: “यह और इसकी क़ौम (ईरानी) हैं।”
(अल-मुस्तदरक अलस-सहीहैन, जिल्द 3, किताब तफ़सीरुल क़ुरआन, हदीस: 3709)
(इमाम हाकिम कहते हैं कि यह हदीस मुस्लिम की शर्त पर सही है)।
हदीस 2:
हज़रत अबू हुरैरा (रज़ि.) कहते हैं: रसूल अल्लाह ﷺ ने एक दिन इस आयत की तिलावत फ़रमाई:
> “और अगर तुम मुँह फेर लोगे तो अल्लाह तुम्हारे बदले और लोगों को ले आएगा, फिर वे तुम जैसे न होंगे।”
> सहाबा ने पूछा: “वे कौन लोग होंगे?” आप ﷺ ने हज़रत सलमान (रज़ि.) के कंधे पर हाथ रखा और फ़रमाया: “यह और इसकी क़ौम, यह और इसकी क़ौम (फ़ारस/ईरानी)।”
> (सुनन तिरमिज़ी: 3260, तहक़ीक़ अल्बानी: सहीह)
>
हदीस 3:
हज़रत अबू हुरैरा (रज़ि.) ने बयान किया कि हम रसूल अल्लाह ﷺ के पास बैठे थे कि सूरह अल-जुमुआ की यह आयत नाज़िल हुई: ‘व आख़रीन मिन्हुम लम्मा यलह़क़ू बिहिम’ (और दूसरों के लिए भी जो अभी उनसे नहीं मिले हैं – सूरह जुमुआ, आयत 3)।
मैंने अर्ज़ किया: “या रसूल अल्लाह! ये दूसरे कौन लोग हैं?” आप ﷺ ने कोई जवाब नहीं दिया। मैंने तीन बार यही सवाल किया। महफ़िल में सलमान फ़ारसी (रज़ि.) भी मौजूद थे। नबी करीम ﷺ ने उन पर हाथ रखकर फ़रमाया: “अगर ईमान सुरैया (सितारों के समूह) पर भी होगा, तब भी इन लोगों (ईरान वालों) में से कुछ लोग उस तक पहुँच जाएँगे।”
(सहीह बुखारी, किताब तफ़सीरुल क़ुरआन, हदीस: 4897)
तफ़सीर नूर-उल-सक़लैन और अन्य रिवायत
तफ़सीर ‘मजमा-उल-बयान’ में हज़रत अबू हुरैरा से रिवायत है कि रसूल अल्लाह ﷺ ने सलमान (रज़ि.) की रान (जांघ) पर हाथ मारकर फ़रमाया: “यह और इसकी क़ौम; उस ज़ात की क़सम जिसके क़ब्ज़े में मेरी जान है, अगर ईमान सुरैया से भी जुड़ा होगा तो फ़ारस के लोग उसे हासिल कर लेंगे।”
(तफ़सीर नूर-उल-सक़लैन, जिल्द 5, पेज 46)
इमाम मुहम्मद बाक़िर (अ.स.) से रिवायत है:
“ऐ अरब के लोगो! अगर तुम मुँह फेर लोगे, तो अल्लाह तुम्हारी जगह दूसरों को ले आएगा, यानी ‘मवाली’ (गैर-अरब/ईरानी) को।”
(तफ़सीर नूर-उल-सक़लैन / बिहारुल अनवार 22:52)
इमाम जाफ़र सादिक़ (अ.स.) से रिवायत है:
“खुदा की क़सम! अल्लाह ने उनके (अरबों के) बदले उनसे बेहतर लोगों को चुन लिया है और वे ‘मवाली’ (गैर-अरब) हैं।”
(तफ़सीर नूर-उल-सक़लैन / बिहारुल अनवार 22:53)
अल्लाह हुम्मा सल्ली अला मुहम्मदﷺ वा आले मुहम्मदﷺ


1️⃣ हदीस – मुहब्बत-ए-रसूल ﷺ
हवाला: Sahih al-Bukhari
अरबी:
لَا يُؤْمِنُ أَحَدُكُمْ حَتَّى أَكُونَ أَحَبَّ إِلَيْهِ مِنْ وَالِدِهِ وَوَلَدِهِ وَالنَّاسِ أَجْمَعِينَ
हिंदी में:
“तुम में से कोई भी उस वक़्त तक पूरा मोमिन नहीं हो सकता जब तक मैं (मुहम्मद ﷺ) उसे उसके बाप, बेटे और तमाम लोगों से ज़्यादा महबूब न हो जाऊँ।”
📚 हवाला:
सहीह बुखारी – हदीस 15
सहीह मुस्लिम – हदीस 44
2️⃣ आल-ए-मुहम्मद से मुहब्बत की हदीस
हवाला: Sahih Muslim
हदीस का मफ़हूम:
हुज़ूर ﷺ ने फ़रमाया:
“मैं तुम्हें **अहल-ए-बैत के बारे में अल्लाह से डरने की नसीहत करता हूँ।”
📚 हवाला:
सहीह मुस्लिम – हदीस 2408
✅ नतीजा:
मुसलमान के लिए रसूल ﷺ से हर रिश्ते से ज्यादा मुहब्बत जरूरी है।
और आल-ए-मुहम्मद (अहल-ए-बैत) से मुहब्बत भी दीन का अहम हिस्सा है।