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Contribution of Hakim Ajmal Khan to Alkaloid

Contribution of Hakim Ajmal Khan to Alkaloid Research on Asrol-
(#unaniday2026 special)

Historical and Scientific Role-
Hakim Ajmal Khan played a pivotal role in bridging traditional Unani medicine and modern scientific research in India. Although he was not a laboratory chemist himself, his visionary leadership laid the foundation for systematic scientific investigation of Unani drugs, including Rauwolfia serpentina (Asrol).
Hakim Ajmal Khan strongly advocated for the chemical and pharmacological validation of traditional medicines. During the early 20th century, he actively encouraged young Indian scientists to investigate medicinal plants used in Unani and Ayurveda using modern scientific methods.

Association with Dr. Salimuzzaman Siddiqui-
One of the most significant outcomes of Hakim Ajmal Khan’s vision was his association with Salimuzzaman Siddiqui, a pioneering organic chemist.
Under the intellectual patronage and encouragement of Hakim Ajmal Khan, Dr. Salimuzzaman Siddiqui conducted extensive chemical research on Rauwolfia serpentina. In 1931, he successfully isolated an important indole alkaloid from Asrol and named it Ajmaline, in honour of Hakim Ajmal Khan.
This act was not merely symbolic; it acknowledged Hakim Ajmal Khan’s decisive role in Promoting scientific research on indigenous drugs.

Creating an academic environment for Unani–modern medicine integration
Supporting young scientists working on medicinal plants
Scientific Importance of Ajmaline
Ajmaline later gained international recognition as:
A potent antiarrhythmic agent.
A valuable drug in cardiac electrophysiology.
A diagnostic tool in Brugada syndrome.

हज़रत ख्वाजा मुम्शाद दीनोरी रहमतुल्लाह तआला अलैहि

हज़रत ख्वाजा मुम्शाद दीनोरी रहमतुल्लाह तआला अलैहि

आप हज़रत अबू इसहाक शामी चिश्ती के पीरो मुर्शिद हैं। हम्दान और बगदाद के बीच एक शहर में पैदा हुए बो दीनोर के नाम से मशहूर है।

आप बड़े पाए के बुजुर्ग हुए हैं, आप के इल्म और जुम्ला कमालात का तमाम जमाना काइल है। और चिश्तिया सिलसिले के पीरों में आप को बहुत ऊँचा मुकाम हासिल है। आप निहायत दौलतमन्द थे। दौलतमन्द होने के साथ-साथ आप इन्तिहाई दर्जे के गरीब परवर भी थे। जब यादे इलाही ने आप पर गल्बा किया तो आपने अपनी सारी दौलत राहे खुदा में लुटा दी। आपने हजरते खिजिर अलैहिस्सलाम से भी मुलाकात की थी और उन्हीं के इर्शाद पर आप ख्वाजा हुबैरा बसरी के मुरीद हुए थे।

आप की ये करामत बहुत मशहूर है कि एक बार आप बुत खाने की तरफ जानिकले और बुत पूजने वालों से फरमाया, “तुम को शरम नहीं आती कि खुदा को छोड़कर बूतों की पूजा करते हो।” आप के इस कहने का बुत परस्तों पर ऐसा असर हुआ कि वहाँ मौजूद सारे के सारे बुत परस्त कलिमा पढ़कर दाखिले इस्लाम हुए। १४, मुहर्रमुलहराम सन् (३१९) हिजरी में आप की वफात हुई।

हज़रत ख्वाजा हुबैरा बसरी रहमतुल्लाह तआला अलैहि

हज़रत ख्वाजा हुबैरा बसरी रहमतुल्लाह तआला अलैहि

आप हज़रत ख्वाजा मुम्शाद दीनोरी के पीरो मुर्शिद हैं। आप की विलादत बसरा में हुई। और आपने हज़रत हुज़ीफ़ा मरइशी से बयअत हासिल की और खुदा की इबादत में हमा वक़्त मश्गूल रहना ही आप का शीवा था। आप ने एक सौ तीस बरस की उम्र पाई । १७ या १८ शव्वाल सन् (२७९) हिजरी को अपने मालिके हक़ीक़ी से जामिले और मज़ारे पाक बसरा में हैं।

अर-रहीकुल मख़्तूम  पार्ट 72 ग़ज़वा अहज़ाब पार्ट 6

अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया, तुम सिर्फ़ एक आदमी हो (इसलिए कोई फ़ौजी क़दम नहीं उठा सकते, अलबत्ता) जितना संभव हो, उनमें फूट डालो, और उनका मनोबल गिराओ, क्योंकि लड़ाई तो चालबाज़ी का नाम है।

इस पर हज़रत नुऐम तुरन्त ही बनू कुरैज़ा के पास पहुंचे। अज्ञानता-युग में उनसे उनका बड़ा मेल-जोल था। वहां पहुंचकर उन्होंने कहा, आप लोग जानते हैं और खास ताल्लुक़ मुहब्बत कि मुझे आप लोगों से उन्होंने कहा, जी हां। है I

नुऐम ने कहा, अच्छा तो सुनिए कि क़ुरैश का मामला आप लोगों से अलग है। यह इलाक़ा आपका अपना इलाका है। यहां आपका घर-बार है, माल व दौलत है, बाल-बच्चे हैं, आप इन्हें छोड़कर कहीं और नहीं जा सकते, मगर जब कुरैश और ग़तफ़ान मुहम्मद से लड़ने आए, तो आपने मुहम्मद के खिलाफ उनका साथ दिया। ज़ाहिर है, उनका यहां न घर-बार है, न माल व दौलत है, न बाल-बच्चे हैं, इसलिए उन्हें मौक़ा मिला तो क़दम उठाएंगे, वरना बोरिया-बिस्तर बांधकर चल देंगे। फिर आप लोग होंगे और मुहम्मद होंगे, इसलिए वह जैसे चाहेंगे, बदला लेंगे ।

इस पर बनू कुरैज़ा चौंके और बोल, नुऐम ! बताइए अब क्या किया जा सकता है ?

उन्होंने कहा, ‘देखिए ! कुरैश जब तक आप लोगों को अपने कुछ आदमी बंधक के तौर पर न दें, आप उनके साथ लड़ाई में न शरीक हों
कुरैज़ा ने कहा, आपने बहुत मुनासिब राय दी है।

इसके बाद हज़रत नुऐम सीधे कुरैश के पास पहुंचे और बोले, आप लोगों से मुझे जो मुहब्बत और खैरख्वाही का जज़्बा है, उसे तो आप जानते ही हैं ? उन्होंने कहा, जी हां।

हज़रत नुऐम ने कहा, अच्छा तो सुनिए कि यहूदियों ने मुहम्मद और उनके साथियों से जो अपने क़ौल व क़रार तोड़े थे, इस पर वे लज्जित हैं और अब उनमें यह बात चल रही है कि वे (यहूदी) आप लोगों से कुछ बंधक लेकर उन (मुहम्मद) के हवाले कर देंगे और फिर आप लोगों के खिलाफ़ मुहम्मद से अपना मामला मज़बूत करेंगे, इसलिए अगर वे बंधक मांगें तो आप हरगिज़ न दें ।’

इसके बाद ग़तफ़ान के पास भी जाकर यही बात दोहराई। (उनके भी कान खड़े हो गए)

इसके बाद जुमा (शुक्रवार) और सनीचर के बीच की रात को कुरैश ने

यहूदियों के पास यह सन्देश भेजा कि हमारा ठहराव किसी सही और उचित जगह पर नहीं है, घोड़े और ऊंट मर रहे हैं, इसलिए उधर से आप और इधर से हम लोग उठें और मुहम्मद पर हमला कर दें।

लेकिन यहूदियों ने जवाब में कहलाया कि आज सनीचर का दिन है और आप जानते हैं कि हमसे पहले जिन लोगों ने इस दिन के बारे में शरीअत के हुक्म की खिलाफ़वर्जी की थी, उन्हें कैसे अज़ाब से दोचार होना पड़ा था। इसके अलावा आप लोग जब तक अपने कुछ आदमी हमें बंधक के रूप में न दे दें, हम लड़ाई में शरीक न होंगे।

दूत जब यह जवाब लेकर वापस आए, तो कुरैश और ग़तफ़ान ने कहा, अल्लाह की क़सम ! नुऐम ने सच ही कहा था। चुनांचे उन्होंने यहूदियों को कहला भेजा कि ख़ुदा की क़सम ! हम आपको कोई आदमी न देंगे, बस, आप लोग हमारे साथ ही निकल पड़ें और (दोनों ओर से) मुहम्मद पर हल्ला बोल दिया जाए।

यह सुनकर कुरैज़ा ने आपस में कहा, अल्लाह की क़सम ! नुऐम ! तुमने सच ही कहा था, इस तरह दोनों फ़रीक़ का एतबार एक दूसरे से उठ गया। उनकी सफ़ों में फूट पड़ गई और उनके हौसले टूट गए।

इस बीच मुसलमान अल्लाह से यह दुआ कर रहे थे-

‘ऐ अल्लाह ! हमारी परंदापोशी फ़रमा और हमें खतरों से बचा ले।’

और अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम यह दुआ फरमा

रहे थे— ‘ऐ अल्लाह ! किताब उतारने वाले और जल्द हिसाब लेने वाले, इन फ़ौजों को पसपा कर । ऐ अल्लाह ! इन्हें परास्त कर और झिंझोड़कर रख दे। 1

आखिरकार अल्लाह ने अपने रसूल सल्ल० और मुसलमानों की दुआएं सुन ली, चुनांचे मुश्किों की सफ़ों में फूट पड़ जाने और बद-दिली और पस्तहिम्मती आ जाने के बाद अल्लाह ने उन पर तेज़ हवाओं का तूफ़ान भेज दिया, जिसने उनके खेमे उखाड़ दिए, हांडियां उलट दी, खेमों की खूंटियां उखाड़ दी, किसी चीज़ को क़रार न रहा और उसके साथ फ़रिश्तों की फ़ौज भेज दी, जिसने उन्हें हिला डाला और उनके दिलों में रौब और डर डाल दिया।

इसी ठंडी और कड़कड़ाती रात में अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने हज़रत हुज़ैफ़ा बिन यमान रज़ि० को कुफ़्फ़ार की खबर लाने के लिए भेजा, वह उनके मोर्चे में पहुंचे, तो वहां ठीक यही हालत पाई जा रही थी और

1. सहीह बुखारी, किताबुल जिहाद 1/144, किताबुल मग़ाज़ी 2/590
मुश्कि वापसी के लिए तैयार हो चुके थे। हज़रत हुज़ैफ़ा रज़ि० ने नबी सल्ल० की सेवा में वापस आकर उनके रवाना होने की खबर दी।

चुनांचे अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने सुबह की तो (देखा कि मैदान साफ़ है) अल्लाह ने दुश्मन को किसी भलाई के हासिल होने का मौक़ा दिए बिना उसको ग़म व गुस्सा के साथ वापस कर दिया है और उनसे लड़ने के लिए अकेले काफ़ी हुआ है।

ग़रज़ यह कि इस तरह अल्लाह ने अपना वायदा पूरा किया, अपनी फ़ौज को सुखरू किया, अपने बन्दे की मदद की और अंकेले उस भारी फ़ौज को पसपा किया।

चुनांचे इसके बाद आप मदीना वापस आ गए।

ग़ज़वा खंदक सबसे सही कथन के अनुसार शव्वाल 05 हि० में पेश आया था और मुश्किों ने एक महीने या लगभग एक महीने तक अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम और मुसलमानों का घेराव किए रखा था।

कुल मिलाकर, तमाम स्रोतों पर नज़र डालने से मालूम होता है कि घेराव की शुरुआत शव्वाल में हुई थी और अन्त ज़ीक़ादा में।

इब्ने साद का बयान है कि अल्लाह के रसूल सल्ल० जिस दिन खंदक़ से वापस हुए, बुध का दिन था और ज़ीक़ादा के ख़त्म होने में सिर्फ़ सात दिन बाक़ी थे ।

अहज़ाब की लड़ाई (खंदक़ का ग़ज़वा) सच तो यह है कि घाटों की लड़ाई न थी, बल्कि तनावों की लड़ाई थी। इसमें कोई खूनी झड़प नहीं हुई, फिर भी यह इस्लामी तारीख (इतिहास) की एक निर्णायक लड़ाई थी ।

चुनांचे इसके नतीजे में मुश्रिकों के हौसले टूट गए और यह स्पष्ट हो गया कि अरब की कोई भी ताक़त मुसलमानों की इस छोटी सी ताक़त को, जो मदीने में पनप रही थी, ख़त्म नहीं कर सकती, क्योंकि अहज़ाब की लड़ाई में जितनी बड़ी ताक़त जुटा ली गई थी, अब अरबों के बस की बात न थी, इसलिए अल्लाह रसूल सल्ल० ने अहज़ाब की वापसी के बाद फ़रमाया- के

‘अब हम उन पर चढ़ाई करेंगे, वे हम पर चढ़ाई न करेंगे। अब हमारी फ़ौज उनकी ओर जाएगी।”

1. सहीह बुखारी 5/290

How long did you stay in the world?”QURAN & MATHEMATICS

“How long did you stay in the world?”
QURAN & MATHEMATICS
You Lived Only 121 Seconds — Did You Realize?)

121 Seconds… and the Eternal Decision

Beginning: In the Light of the Qur’an
Allah Almighty says: (Surah Al-Mu’minun)

قَالَ كَمْ لَبِثْتُمْ فِي الْأَرْضِ عَدَدَ سِنِينَ(112)
He will ask: “How many years did you remain on the earth?”

قَالُوا لَبِثْنَا يَوْمًا أَوْ بَعْضَ يَوْمٍ فَسْأَلِ الْعَادِّينَ(113)
They will reply: “We remained for a day, or part of a day. Ask those who keep count.”

قَالَ إِنْ لَبِثْتُمْ إِلَّا قَلِيلًا لَوْ أَنَّكُمْ كُنْتُمْ تَعْلَمُونَ(114)
Allah will say: “You stayed only a little — if only you had known.”

And Allah also says:

يَوْمٍ كَانَ مِقْدَارُهُ خَمْسِينَ أَلْفَ سَنَةٍ
A Day (of the Hereafter) whose measure is equal to fifty thousand years of worldly time.
(Surah Al-Ma‘arij, Ayah 4)

A Scientific Perspective: How Long Is Worldly Life?
According to the Qur’an, one Day of the Hereafter equals 50,000 years of this world.

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In today’s terms, the average human lifespan is about 70 years.

Let us calculate:
70 ÷ 50,000 = 0.0014
One day = 24 hours × 60 minutes × 60 seconds = 86,400 seconds
0.0014 × 86,400 = 121 seconds (approximately)

Conclusion:
A complete 70-year human life equals only about 121 seconds — just two minutes — on the scale of the Day of Judgment.

Now Calculate According to Your Own Age
If you are 20 years old, you have lived only 34 seconds on the clock of the Hereafter.
If you are 35 years old, you have lived only 60 seconds.
If you are 50 years old, you have lived only 84 seconds.
And if your life ends at 70 years, then your entire worldly existence amounts to just 121 seconds.

A Reflection for Today’s Human Being
O human of today — pause and think.

Your seventy years of struggle, your desires, your ambitions, and your pride —
on the scale of the Hereafter — are worth only two minutes.

Will you sell your eternal Paradise for 121 seconds of pleasure?
Will you buy everlasting fire for a few fleeting moments of gain?

Think deeply.
The time that has passed will never return,
and the time that remains is slipping away moment by moment.

This world is a temporary examination,
while the Hereafter is the eternal reality.

Allah, the Lord of Majesty, has granted the human being a gift that is priceless — beautiful, precious, unmatched, and extraordinary.

Now the decision is in your hands:

Will you align your few remaining seconds
with the frequency of Paradise (good deeds),
or will you tune your life
to the frequency of Hell (evil deeds)?