Blog

Allah ki Rassi

इस तहरीर को पूरा पढ़े ताकि फिरका वरीयता से बचे और हुक्म ए ईलाही व हुक्म ए नबी पर अमल करे,,
अल्लाह और उसके रसूल ने जिसे मजबूती से थमने का हुक्म दिया है उसे हम मजबूती से थामे रखे और हम तफ़रके मै न पडे और फ़िरकों मै न बटे,,

अल्लाह पाक क़ुरान में फरमाता है…
وَاعۡتَصِمُوۡا بِحَبۡلِ اللّٰهِ جَمِيۡعًا وَّلَا تَفَرَّقُوۡا‌
अल्लाह की रस्सी को मजबूती से थाम लो और तफरके में ना पड़ो।
(सुरह आले इमरान, आयत: 103)

पहले यह जान लेना चाहिए कि रस्सी क्या है और उसकी पहचान और ख़ासियत क्या है?
तो जान लीजिये कि #रस्सी असल में उन 3 धागों को कहते हैं जो आपस में इस तरह लिपटे हों कि एक-दूसरे की हिमायत ओ नुसरत करके क़ुव्वत और मज़बूती का वजूद तशकील दे।

“हब्ल” का माना रस्सी है या रग, जैसा एक जगह अल्लाह ने हब्लिल वरीद यानी शह रग फरमाया चूंकि रग और रस्सी शक्ल ओ सूरत और हक़ीक़त ओ अहमियत में यक्सां मुमासिलत रखती हैं और रग का वजूद भी तीन शै (परती, खून और अम्र) पर क़ायम है और इनमें भी हर दो (परती और खून) एक-दूसरे के हमवज़न हैं जब्कि तीसरा अम्र (रवानी ए खून) उन्हें तक़वियत देती है।

बहरहाल!
वाज़ेह रहे रस्सी कहलाने के लिये कम से कम 3 धागों का होना ज़रूरी है 3 से कम धागे होने पर #डोर कहा जा सकता है रस्सी नहीं!
इसलिये कि तक़वियत के लिये तीसरे की ज़रूरत होती है जैसा कि अल्लाह ने सूरह #यासीन में “फअज़्ज़ज़ना बिसालिस” फ़रमाया यानी फिर हमने तीसरे के ज़रिये उन्हें तक़वियत दी (अज़ उस शै या कैफ़ियत को कहते हैं जो मग़लूब ना होने दे, कमज़ोर ना पड़ने दे)

इससे यह बात भी मालूम होती है कि यह #हुक्म ए हबलिल्लाह
कम से कम 3 जमातों के लिये है।

1. पहला हुक्म खुद हबलिल्लाह के लिये है जो तीन वजूदों पर मुशतमिल है जिनमें दो एक-दूसरे के हमवज़न यानी #सक़लैन होंगे और तीसरा उनमें उन दोनों को तक़वियत देने वाला!

वाज़ेह रहे जो दो चीज़ें #तक़द्दुस ओ हुरमत में एक दूसरे के मसावी ओ हमवज़न हैं वो सक़लैन क़ुरआन और अहलेबैत हैं जिन्हें थामने का वाज़ेह फरमान सरकार ने यौम ए #ग़दीर जारी फरमाया जब्कि तीसरी शै इनमें वही/#अम्र ए इलाही है जो इन दोनों को तक़वियत देने वाली है और कभी इन्हें कमज़ोर या मग़लूब ना होने दे!
पस पहला हुक्म इन तीनों के लिये है कि “कुन” हो जाओ #हबलिल्लाह!

2. दूसरा हुक्म तमाम मुसलमानों के लिए आम है कि जिसे अल्लाह ने हबलिल्लाह बनाया है उन्हें यक्सा मज़बूती से थाम लो यह हबलिल्लाह तुम्हें कभी #मग़लूब या कमज़ोर नहीं होने देगी ना सिराते मुस्तक़ीम से भटकने देगी।

लेकिन यह याद रहे कि हबलिल्लाह के तीनों धागों को यक्सा थामने के लिये भी 3 चीज़ें शर्त हैं,

अव्वल ईमान #तौहीद, #रिसालत और #विलायत पर जो अम्र ए इलाही के धागे का हक़ है!

दूसरा #मवद्दत ए अहले बैत जो आले #मुहम्मद का हक़ है!

तीसरा #तक़वा और खशिय्यत ए इलाही जो क़ुरआन का हक़ है!

जिसके पास यह 3 चीज़ें जितनी ज़्यादा क़वी होंगी वो उतनी ही ज़्यादा मज़बूती और फैज़याबी पायेगा और जो जिसके पास यह तीन चीज़े जितनी कमज़ोर और क़लील होंगी उसकी मज़बूती भी उसी तरह कमज़ोर होगी!

3. तीसरा हुक्म तमाम मख़लूक के लिये है जिन्हें अल्लाह ने बंदों की आज़माईश ओ अज़िय्यत, मुसीबत ओ अज़ाब और #रहमत ओ बरकत के लिये ख़ल्क किया है!

आए अब इस पर हदीस ए सकलैन से हमे क्या हुक्म दिया गया है!,,👇🏻

जाबिर-बिन-अब्दुल्लाह (रजी अल्लाह अन्हो) कहते हैं कि मैंने रसूलुल्लाह (सल,अल्लाहु अलैहे व आलेही व सल्लम) को हज्ज्तुल-वदाअ  में अरफ़ा  के दिन देखा, आप अपनी ऊँटनी क़सवा पर सवार होकर ख़ुतबा दे रहे थे, मैंने आपको फ़रमाते हुए सुना: ऐ लोगो! मैं तुममें ऐसी चीज़ छोड़े जा रहा हूँ कि अगर तुम उसे पकड़े रहोगे तो हरगिज़ गुमराह न होगे: एक अल्लाह की किताब है, दूसरे मेरी अहले बैत
सुनन तिरमिजी हदीस नंबर: 3786 |

अब यहां हमें गौर ओ फिक्र करने की जरूरत है कि क्या हम इस एहकाम पर अमल पैरा है और हमारे कुछ उलमाओं ने सर पसंदी का रास्ता इख्तियार कर लिया है और एक धडा उम्मत का उस ओलेमा के पीछे चलते हुए तफ़रके मै पड़ कर उम्मत को टुकड़ों में बांट रहा है,??

یٰۤاَیُّہَا الَّذِیۡنَ اٰمَنُوۡا لَا تَخُوۡنُوا اللّٰہَ وَ الرَّسُوۡلَ وَ تَخُوۡنُوۡۤا اَمٰنٰتِکُمۡ وَ اَنۡتُمۡ تَعۡلَمُوۡنَ ﴿۲۷﴾
“ترجمہ”
اے ایمان والو! تم اللہ اور رسول ( صلی اللہ علیہ وآلہ وسلم ) سے ( ان کے حقوق کی ادائیگی میں )  خیانت  نہ کیا کرو اور نہ آپس کی امانتوں میں  خیانت  کیا کرو حالانکہ تم ( سب حقیقت ) جانتے ہو
ऐ ईमान वालों ! तुम अल्लाह और रसूल (सल,अल्लाहु अलैहे व आलेही व सल्लम) से (उनके हुकूक की अदायगी मै) ख़यानत ना किया करो और ना उसकी अमानत मै ख़यानत किया करो हालांके तुम (सब हक़ीक़त) जानते हो
(सुरह अनफाल, आयत :27)

अब यहां भी देखना होगी कि ख़यानत से मुराद क्या है जैसे कि तमाम उम्मति इस बात पर मुत्तफिक है कि नमाज अफजलूल इबादत है इसमें कोई ख़यानत नहीं करता नाही उसकी फ़ज़लितो का कोई मोमिन इनकार करता है वैसे ही हज, जकात, रोजे, है इसका भी कोई उम्मति इनकार नहीं करता नहीं उनकी फजीलतों का इनकार करता है यानी इस  अहकम पर कोई ख़यानत नहीं करता!

जब बात आती है कुरआन की तो कुछ लोग ये कहने लग जाते है कि इस आयत मै ऐसे है इस आयत मै वैसे है और कुछ लोग तो यहां तक कह देते है कि इस कुरआन मै तो आयते भी कम है यानी कुरआन मै ख़यानत की जा रही है,,?

इसी तरह अहले बैत के मुआमले मे यही हाल है कुछ लोगों का, की अहले बैत की फजीलत ऐसी नहीं वैसी है यानी अहले बैत के मुआमले मे भी लोग ख़यानत करते आपको नजर आयेंगे जबकि अल्लाह ताअला ने अहले बैत की मोहब्बत उम्मत पर वाजिब करार दी है और कुरआन को महफूज रखने का भी जिम्मा खुद अल्लाह ताअला ने लिया है फिर हम क्यों कुरआन और अहले बैत के मुआमले मे ख़यानत करे हमे तो बिला सूबा कुरआन और अहले बैत को मजबूती से थामे लेना चाहिए!

मुहिब्बे तबरी ने एक रिवायत नकल फरमाई है कि हुज़ूर नबी ए करीम (सल,अल्लाहु अलैहे व आलेही व सल्लम) ने फरमाया

“अल्लाह तआला ने तुम (उम्मती) पर जो मेरा अज़्र मुकर्रर किया है वह मेरे अहलेबैत से मुहब्बत करना है। और में कल तुमसे उनके बारे में दरयाफ्त करूंगा।”
सवाइके मुहर्रका  सफ़ा 753) |

अल्लाह का दीन क़ुरान और हदीश पर मुस्तमील है जैसा की अल्लाह पाक ने फरमाया:

مَنۡ يُّطِعِ الرَّسُوۡلَ فَقَدۡ اَطَاعَ اللّٰهَ ‌ۚ
जिसने रसूल की इताअत की उसने दर असल अल्लाह की इताअत की।
(सुरह निसा, आयत: 80)

यानी अल्लाह के कुरआन के साथ साथ नबी करीम ﷺ की पैरवी करना हम पर लाज़िम है। इन्हीं दोनों चीज़ों की पैरवी कर के हम आखिरत में कामयाब हो सकते हैं।
इन वाज़े दलाईल से हमे मालूम हुआ की अल्लाह की रस्सी मजबूती से थाम कर फिर्का वारियत के खिलाफ़ लड़ना है। और हमारी रस्सी क़ुरान और अहले बैत है।

हक़ ओ हिदायत का बस एक उसूल
किताबुल्लाह और आले रसूल,, 🙏🏻

अर-रहीकुल मख़्तूम  पार्ट 74 सरीया राम्र सरीया ज़ुल क़िस्सा सरीया जमूम सरीया अस



4. सरीया राम्र

रबीउल अव्वल या रबीउल आखर सन् 06 हि० में हज़रत उकाशा बिन मेहरून रज़ि० को चालीस व्यक्तियों की कमान देकर ग़म्र नामी जगह की ओर रवाना किया। यह बनू असद के एक चश्मे का नाम है। मुसलमानों के आने की ख़बर सुनकर दुश्मन भाग गया और मुसलमान उनके दो सौ ऊंट मदीना हांक लाए ।

5. सरीया ज़ुल क़िस्सा न० 1

उसी रबीउल अव्वल या रबीउल आखर सन् 06 हि० में हज़रत मुहम्मद बिन मस्लमा के नेतृत्व में दस लोगों की एक टुकड़ी ज़ुलक़िस्सा की ओर रवाना की गई। यह जगह बनू सालबा के पड़ोस में स्थित थी। दुश्मन जिसकी तायदाद एक सौ थी, इधर-उधर छिप गया और जब सहाबा किराम सो गए, तो अचानक हमला करके उन्हें क़त्ल कर दिया, सिर्फ़ मुहम्मद बिन मस्लमा रज़ियल्लाहु अन्हु बच निकलने में सफल हो सके, वह भी घायल होकर ।

6. सरीया ज़ुल क़िस्सा न० 2

मुहम्मद बिन मसलमा के साथियों की शहादत के बाद रबीउल आखर सन् 06 हि० ही में नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने हज़रत अबू उबैदा रज़ियल्लाहु अन्हु को ज़ुल क़िस्सा की ओर भेजा। वह चालीस लोगों को साथ लेकर उक्त सहाबा किराम की शहादतगाह की ओर चले और रात पैदल सफ़र करके सुबह सवेरे ही, बनू सालबा के पास पहुंचते ही छापा मार दिया, लेकिन बनू सालबा इस तेज़ी से पहाड़ों में भागे कि मुसलमानों की पकड़ में न आ सके, सिर्फ़ एक आदमी पकड़ा गया और वह मुसलमान हो गया, अलबत्ता मवेशी और बकरियां हाथ आईं।

7. सरीया जमूम

यह सरीया ज़ैद बिन हारिसा के नेतृत्व में रबीउल आखर सन् 06 हि० में जमूम की ओर रवाना किया गया। जमूम मर्रज्ज़हरान (वर्तमान फ़ातिमा घाटी) में बनू सुलैम के एक चश्मे का नाम है।

हज़रत ज़ैद रज़ि० वहां पहुंचे तो क़बीला मुज़ैना की एक औरत, जिसका नाम हलीमा था, पकड़ में आ गई। उसने बनू सुलैम की एक जगह का पता बताया, जहां से बहुत से मवेशी, बकरियां और क़ैदी हाथ आए हज़रत ज़ैद यह सब लेकर मदीना वापस आए। रसूलुल्लाह सल्ल० ने उस मुज़नी औरत को आज़ाद करके उससे शादी कर ली।

8. सरीया अस

यह सरीया एक सौ सत्तर सवारों पर सम्मिलित था और इसे भी हज़रत ज़ैद बिन हारिसा रज़ि० के नेतृत्व में जुमादल ऊला सन् 06 हि० में औीस की ओर भेजा गया था। इस मुहिम में क़ुरैश के एक क़ाफ़िले का माल हाथ आया, जो रसूलुल्लाह के दामाद हज़रत अबुल आस के नेतृत्व में सफ़र कर रहा था। अबुल आस उस वक़्त तक मुसलमान न हुए थे। वह गिरफ़्तार तो न हो सके, लेकिन भाग कर सीधे मदीना पहुंचे और हज़रत ज़ैनब की पनाह लेकर उनसे कहा कि वह रसूलुल्लाह सल्ल० से कहकर क़ाफ़िले का माल वापस दिला दें।

हज़रत जैनब रज़ि० ने रसूलुल्लाह सल्ल० के सामने यह बात पेश की तो आपने किसी तरह का दबाव डाले बिना सहाबा किराम से इशारा किया कि माल वापस कर दें। सहाबा किराम रज़ि० ने थोड़ा-ज़्यादा, छोटा-बड़ा जो कुछ था, सब वापस कर दिया।

अबुल आस सारा माल लेकर मक्का पहुंचे, अमानतें उनके मालिकों के हवाले की, फिर मुसलमान होकर मदीना तशरीफ़ लाए। रसूलुल्लाह सल्ल० ने पहले ही निकाह पर हज़रत ज़ैनब को उनके हवाले कर दिया, जैसा कि सहीह हदीस से साबित है। 1

आपने पहले ही निकाह की बुनियाद पर इसलिए हवाले किया था कि उस वक़्त तक कुफ़्फ़ार पर मुसलमान औरतों के हराम किए जाने का हुक्म उतरा नहीं था और एक हदीस में यह जो आया है कि आपने नए निकाह के साथ विदा

1. देखिए सुनन अबू दाऊद, मय शरह औनुल माबूद बाब इला मता तुरहु अलैहि इमरातुहू इज़ा अस ल-म वादहा


किया था या यह कि छः वर्ष के बाद विदा किया था, तो यह न मानी के एतबार से सही है, न सनद के एतबार से’, बल्कि दोनों पहलुओं से कमज़ोर है।

और जो लोग इसी कमज़ोर हदीस के क़ायल हैं, वे एक विचित्र आपस में टकराने वाली बात कहते हैं। वह कहते हैं कि अबुल आस सन् 08 हि० के आखिर में मक्का- विजय से कुछ पहले मुसलमान हुए थे। फिर यह भी कहते हैं कि सन् 08 हि० के शुरू में हज़रत ज़ैनब का इंतिक़ाल हो गया था, हालांकि अगर ये दोनों बातें सही मान ली जाएं, तो विरोधाभास बिल्कुल स्पष्ट है |

सवाल यह है कि ऐसी स्थिति में अबुल आस के इस्लाम लाने और हिजरत करके मदीना पहुंचने के वक़्त हज़रत ज़ैनब रजि० ज़िंदा ही कहां थीं कि उन्हें उनके पास नए निकाह के ज़रिए या पुराने निकाह की बुनियाद पर अबुल आस के हवाले किया जाता ।

हमने इस विषय पर बुलूगुल मराम में बड़े विस्तार में वार्ता की है। 2

इसके अलावा अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से सोचा भी नहीं जा सकता कि आप हुदैबिया का समझौता कर लेने के बावजूद कुरैश के क़ाफ़िले पर छापा मारने के लिए मुसलमानों को भेजेंगे। सीरत लिखने वाले तमाम विद्वान इस पर सहमत हैं। इस समझौते को मुसलमानों ने नहीं, बल्कि कुरैश ने भंग किया था ।

मशहूर साहिबे मग़ाज़ी मूसा बिन उक़बा का रुझान इस ओर है कि यह घटना सन् 07 हि० में अबू बसीर और उनके साथियों के हाथों घटी, लेकिन यह . न सहीह हदीस के अनुसार है, न कमज़ोर हदीस के ।