Bakht Khan Shaheed

BakhtKhanMPOs26aug2018

जनरल बख्त खान की पहचान 1857 की क्रान्ति में एक मुख्य क्रांतिकारी के रूप में हैं. वो क्रांतिकारियों की सेना के कमांडर इन चीफ थे. इसके अलावा वो एक कुशल प्रशासक,अनुभवी योद्धा और सक्षम नेता भी थे

जनरल बख्त खान का जन्म,परिवार और शिक्षा (General Bakht khan Family details, Birth Details, caste)

उनके पिता का नाम अब्दुलाह खान था जो कि नाजिब-उड़-दूलह के भाई थे. बख्त खान गुलाम कादिर खान रूहेला के कजिन भाई थे. मतलब बख्त खान का रूहेला वंश से सीधा सम्बन्ध था.1774 तक रूहेला वंश के पास अवध का शासन था, लेकिन कालान्तर में ये इनसे छीनकर अंग्रेजों तक पहुच गया और 1801 के बाद तो अंग्रेजों की राज्य में प्रभाविता बढ़ जाने से उनकी अंग्रेजों से दुश्मनी हो गयी.

जनरल बख्त खान का जन्म रोहिलखंड के बिजनोर में हुआ था,बाद में वो ईस्ट इंडिया कम्पनी में सूबेदार बन गए. 40 वर्षों तक बंगाल में घुड़सवारी करके और पहले एंग्लो-अफगान युद्ध को देखकर जनरल बख्त खान ने काफी अनुभव लिया था.

जनरल बख्त खान एक कुशल प्रशासक की भूमिका में (General Bakht Khan as an Administrator)

अंग्रेजों के बढ़ते प्रभाव के बीच में मुगल साम्राज्य को स्थायित्व देने के लिए उन्होंने कोर्ट ऑफ़ एडमिनिस्ट्रेशन(Court of administration) बनाया था जिसके सदस्यों को आर्मी और सरकारी विभाग से चुना जाता था.  उनका सम्मान एक योग्य प्रशासक के रूप में किया जाता था. उनके योग्य प्रशासक होने का सबूत मुंशी जीवन लाल के अंग्रेजो को लिखे  पत्र में मिलता हैं,जिसमे मुंशी ने लिखा था कि “बख्त खान ने बहुत अच्छे फैसले लिए हैं.”

  • नमक और शक्कर पर कोई टैक्स नहीं हैं, उन्होंने विद्रोहियों द्वारा की जा रही लूट पर भी रोक लगाई हैं, और ये आदेश भी  ज़ारी किया था कि यदि कोई लूट करता हुआ दिखता हैं तो उसके हाथ काट दिए जायेंगे.
  • दुकानदारों को भी पूरी सुरक्षा दी जा रही हैं और उन्हें हथियारों का उपयोग करने को प्रेरित किया जा रहा हैं, जिनके पास हथियार नहीं हैं,उन्हें उपलब्ध करवाए जा रहे हैं.
  • दिल्ली बाज़ार से सैनिकों को हटा लिया गया हैं क्योंकि वहाँ पर आम-जनजीवन प्रभावित हो रहा हैं. दिल्ली गेट के बाहर कैंप लगे जा रहे हैं.
  • सैनिको का वेतन देखा जा रहा हैं और उन्हें आर्मी में काम करने के लिए उनकी जागीर लौटाने का भी वादा किया जा रहा हैं. 

जनरल बख्त खान की सैन्य पद्धति  (General Bakht Khan’s Military Strategy)

अपने दुश्मनों को हराने के लिए जनरल बख्त खान हमेशा नए नए तरीके अपनाते थे,जिससे दुश्मनों को उनके अगले कदम का अंदाजा नहीं लग पाता था.जैसे 9 जुलाई को जब उन्होंने अंग्रेजों को क्षति पहुचाने का प्रयास किया, तब उनकी योजना थी कि वो अपने सैनिकों को अंग्रेजो की सफेद पोशाक पहनाकर भेजेंगे, जिससे अंग्रेज कन्फ्यूज हो गये,और उन्हें अंग्रेजों के कैंप में घुसने का मौका मिल गया. बख्त खान की सैन्य अचीवमेंट (Achivement) बहुत ज्यादा थे. चाहे वो अंग्रेजो के 300 घोड़ो को छीनकर उनके मालिक तक पहुंचना हो या बरेली और नीमच में अंतिम हमलों की भूमिका तय करना. जिससे अंग्रेज सरकार को आखिर में उनसे संधि करनी पड़ी.हालांकि अंत में बख्त खान  की बहादुरी और लीडरशिप काम नही सकी, 8 जून को अंग्रेजों ने दिल्ली को घेर लिया, इसके बाद कश्मीरी गेट पर भी आक्रमण कर दिया. 

हिन्दू-मुस्लिम सम्बंध और बख्त खान की इसमें भूमिका (The Hindu-Muslim Equation of the time and Bakht Khan’s Role in it)

1857 की क्रान्ति में हिन्दू और मुस्लिम एकता का सबसे अच्छा उदाहरण माना जाता हैं. वास्तव में इस क्रान्ति की शुरुआत अंग्रेजों द्वारा हिन्दू-मुस्लिम की धार्मिक भावनाए पर चोट पहुचाने के कारण ही शुरू हुई थी. उस समय ब्रिटिश आर्मी नयी राइफल लायी गयी थी,जिसके कारतूस पर से ग्रीस को मुंह लगाकर हटाया जाता था. और ये अफवाह थी कि इसमें गाय और सूअर की चर्बी का उपयोग हुआ हैं. इसलिए दोनों ही वर्ग अंग्रेजों के खिलाफ मैदान में उतर गए, और राष्ट्रीय स्तर पर आधिकारिक रूप से इनका नेतृत्व बहादुर शाह जफर कर रहे थे.लेकिन ये हर कोई जानता था कि क्रांतिकारियों की सेना को और युद्ध का मोर्चा जनरल बख्त खान सम्भाल रहे थे.

1857 की क्रान्ति (1857 ki Kranti and General Bhakt Khan)

बरेली में सेना ने 31 मई 1857 को विद्रोह किया था, शुरुआती  अव्यवस्था,लूट और मार-काट  के बाद वीर बख्त खान को क्रांतिकारियों का नेता घोषित कर दीया गया था,और बख्त खान 1 जुलाई 1857 को अपने रोहिला के सिफ़ी की फौजों और 4000 मुस्लिम जिहादी (जो कि मौलवी सरफरा अली के वफादार थे) के साथ  दिल्ली पहुचे. वैसे उनके एक चालाक और बहादुर मिलिट्री मैन होने की सुचना उनसे पहले ही दिल्ली तक पहुच गयी थी.

उस समय के अंतिम मुगल शासक बहादुर शाह जफर को राजनीति में कोई रूचि नहीं थी,उसने बख्त खान के दिल्ली पहुचते ही उन्हें शाही तलवार और बकल भेंट की लेकिन बख्त खान ने ये नजराना लेने से मना कर दिया. इसके बाद जल्द ही बख्त खान ने राजा की मदद करनी शुरू कर दी, उन्होंने साफ़ शब्दों में जफर से कहा कि तुम एक अच्छे राजा नहीं हो,लेकिन अब भी सम्भावना हैं और अब भी तुम अपनी सेना का सही उपयोग कर सकते हो. क्योंकि अंग्रेजों को मुझसे बेहतर कौन जान सकता हैं?  ये सब कुछ इतना सीधा और स्पष्ट कहा गया था कि हर कोई चकित था लेकिन इसके बदले में बहादुर शाह जफर ने नाराज होने की जगह अपने बेटे मुघल मिर्ज़ा को हटाकर बख्त खान को गवर्नर जनरल बना दिया.

14 सितम्बर को जब अंग्रेजों ने कश्मीरी गेट पर आक्रमण किया तब बख्त खान ने जफर को समझाया कि दिल्ली का बाहरी इलाका अब भी विद्रोहियों के कब्जे में हैं इसलिए युद्ध में डटे रहे, एकपूर्व सूबेदार ने भी जाफर से कहा कि बख्त खान अभी उनके पक्ष में हैं,जो जान पर खेलकर भी मुगल राजा का नाम नीचे नहीं होने देगा,और भारतीयों को जीत दिलवाकर ही रहेगा. पहले तो 80 वर्षीय बहादुर शाह जफर उनकी बात मान भी गए थे लेकिन उनके दरबार के हकीम अहसानुल्लाह खान और जाफर के मृत वारिस के ससुर  मिर्ज़ा फखुर  ने उन्हें दबा दिया और इस तरह से आखिरी मुगल राजा अंग्रेजों के कैदी बन गए.बख्त खान दिल्ली से निकल गए और लखनऊ और शाहजहापुर में जाकर विद्रोहियों के साथ मिल गए.

जनरल बख्त खान की मृत्यु (Death of General Bhakt Khan)

1857 की क्रांति के बाद बख्त खान के नेपाल चले जाने की खबरे आई,और ये भी कि उन्हें अंग्रेजों ने वहाँ मार गिराया हैं. और उन्हें स्वत (Swat: now in District Buner, Khyber Pakhtunkhwa Province of Pakistan) के नानासेर में दफनाया गया हैं. स्वत (Swat: now in District Buner, Khyber Pakhtunkhwa Province of Pakistan)  के इतिहासविदों का कहना हैं कि युद्ध 1857 का हारने के बाद बख्त खान ने स्वत (Swat) के अखौंड की सुरक्षा में अपना बचा हुआ जीवन व्यतीत किया था.

 जनरल बख्त खान से जुड़े रोचक तथ्य (Unknown Facts  about General Bhakt Khan)

  • सेना से निष्कासित होने के बाद से मिर्जा मुगल बख्त खान से नाराज था, बख्त खान की स्पष्टवादिता उनकी मदद नहीं कर सके. बख्त खान स्पष्टवादी होते हुए भी राजकुमार को साफ़ नहीं कह सके कि वो सेना और इसके मामलो से दूर रहे,जबकि ये हर कोई जानता था कि वो बहुत अयोग्य हैं.हालांकि बख्त खान इस बारे में ज़फर को सूचित किया था कि राजकुमार और उनके साथी शहर के व्यापारियों से एकत्र किये गए टैक्स को छूपाकर रख रहे हैं,जिसके कारण आर्मी में वेतन नहीं बांटा जा सकता. राजकुमार खजर को लूट का माल लौटने को कहा गया. आम जन को तब राहत मिली जब मुगल राजा इस पर निर्णय लेने का आश्वासन दिया.
  • बख्त खान की नेतृत्व क्षमता और मिलट्री ज्ञान को देखते हुए मुगल सम्राट ने उन्हें “साहेब-इ-आलम-बहादुर की उपाधि दी थी.
  • बख्त खान की ब्रिगेड अपने तरीके की अनोखी ब्रिगेड होने के कारण प्रसिद्ध थी, लेकिन 2 जनरल घुस खान और जनरल सिधारी सिंह बख्त खान से अलग हो गये थी, क्योंकि वो ये बात स्वीकार नहीं कर सके उनकी बराबरी का ही एक अधिकारी उनसे ज्यादा सम्मान प्राप्त कर रहा हैं. इस कारण युद्ध के दौरान खुद को बचाने के लिए बख्त खान अकेले रह गए थे.
  • इसके अलावा उन पर ब्रिटिश जासूस होने का आरोप भी लगा. चाहे अलीपुर में आर्मी का दुर्ग, मनाली ब्रिज जीतने में मिली असफलता हो,सबका इल्जाम जनरल पर लगा. यहाँ तक कि जाफर को भी शक होने लगा और उन्होंने जुलाई के अंत तक बख्त खान को जनरल के पद से हटा दिया. मुगल दरबार में एडमिनिस्ट्रेशन के लिए दरबार लगता था. जनरल और उनकी बरेली की ब्रिगेड इससे दूर ही रहती थी.हालांकि बहुत आहत होकर भी उन्होंने इन सभी अरोपों को खारिज किया. लेकिन बख्त खान की सेना बिखरने और उन पर आरोप लगने से अंग्रेजों में उनका खौंफ भी कम हो गया.

जनरल बख्त खान पर फिल्म (Movie on General Bhakt Khan)

1979 में जनरल बख्त खान पर एक उर्दू में पाकिस्तानी फिल्म बनी थी,जिसे सरशार अख्तर मलिक ने निर्देशित किया था और नोशीन मलिक ने प्रोड्यूस किया था, फिल्म में मुहम्मद अली,युसूफ खान,सुल्तान राही और सुधीर मुख्य किरदारों में थे.

जनरल बख्त खान के नाम पर धरोहर (Monuments in the name of General Bakht Khan)

स्वत (Swat: now in District Buner, Khyber Pakhtunkhwa Province of Pakistan) में ही उनकी समाधि बनी हुयी हैं जिसके बारे में जहान्ज़ेब कॉलेज के पूर्व प्रोफेसर शाद खान का कहना हैं कि ये एक वीर राजकुमार की समाधि हैं जिसने अंग्रेजों से युद्ध किया था

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Mohammad Bakht Khan, was born in Sultanpur in Ayodhya, Uttar Pradesh. He provided able leadership to the heroes and heroines of The First War of Independence of India of 1857 against the forces of the East India Company, by taking up the responsibility of Commander-in-Chief. He had about 40 years of long experience in the British army.

He defeated the British commanders in the rebellion led by Khan Bahadur Khan in Rohilkhand. Later, he captured the treasury of the East India Company in Bareilly and reached Delhi with his troops. He streamlined the troops after his appointment as the Commander-in-Chief by the Mughal Emperor, Bahadur Shah Zafar.

He initiated democratic reforms by establishing the ‘Greater Administrative Council’ and formulated the Special Constitutional Policy. He felt that there should not be any influence of personal differences and selfishness on independent rule.

Thus, Muhammad Bakht Khan demonstrated great statesmanship in his mission. He said that it was not enough if the British were driven away them from Delhi; they were to be eliminated from nearby states of India as well.

While Muhammad Bakht Khan was busy in his mission, the jealous members of the royal family and the selfish traders misguided the emperor Zafar.

As he understood the situation, Bakht Khan voluntarily gave up his position as the Commander-in-Chief. Later, he fought several battles against the East India Company forces with his own troops. Finally, when the defeat of Delhi had become inevitable, Bakht Khan invited the emperor to go with him to Lucknow of Awadh state. But the emperor did not respond to his advice as he was under the influence of the cunning people around him.

Then, Bakht Khan left Delhi and reached Awadh. Along with Begum Hazarat Mahal he fought against the British forces. But, when Lucknow was seized, he retreated to the Nepal hills along with Begum Hazarat Mahal. From there, Muhammad Bakht Khan started his efforts to fight back against the British force, but could not succeed in his attempts because of the non cooperation of the Nepal ruler, Jung Bahadur.

Muhammad Bakht Khan, who revolted against the British and fought various battles successfully in the First War of Independence of India fighting unto the last on 13 May, 1859.

 

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