Hadith: Mera Salaam

Imam ibne Hajar Asqalani Apni Kitaab Lisan Ul Meesan Mein Likhte Hain Ke Jab Hazrat  Syeda Fatimah سلام اللہ علیہا  Ki Wiladat Howi Tou Allah تبارک وتعالی  Ne Hazrat Jibra’il Se Farmaya :

Jao Aur Mera Salaam ( Mere Muhammad ﷺ) Aur Naomaulood ( Syeda Fatima سلام اللہ علیہا) Ko Pahochao.

मर्तबा बिन्ते मोहम्मद मुस्तफ़ा ﷺ जनाबे सय्यदा फ़ातिमा ज़ाहरा عَلَیهِ‌السَّلام/س

जब जनाबे फ़ातिमा अल-ज़ाहरा (عَلَیهِ‌السَّلام/س) की पैदाइश हुई तो अल्लाह ﷻ ने जिब्राईल अमीन से कहा:- जाओ! और मेरे मोहम्मद (ﷺ) और मेरी फ़ातिमा (عَلَیهِ‌السَّلام/س) को मेरा सलाम कहो।

📚 ऐहले’सुन्नत कुतुब:- लिसजुल मिज़ान, मुसन्निफ़ इमाम अल-हाफ़िज़ अहमद बिन अली बिन हजर अल-असक़लानी।

चौदह सितारे हज़रत इमाम अली रज़ा(अ.स) पार्ट- 9

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मामून की तलबी से क़ब्ल इमाम (अ.स.) की रौज़ा ए रसूल पर फ़रयाद

अबू मख़नफ़ बिने लूत बिने यहया ख़ज़ाई का बयान है कि हज़रते इमाम मूसिए काज़िम (अ.स.) की शहादत के बाद 15 मोहर्रमुल हराम शबे यक शम्बा को हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) ने रौज़ा ए रसूले ख़ुदा (स.अ.) पर हाज़री दी। वहां मशग़ूले इबादत थे कि आंख लग गई , ख़्वाब में देखा कि हज़रत रसूले करीम (स.अ.) बा लिबासे स्याह तशरीफ़ लाये हैं और सख़्त परेशान हैं। इमाम (अ.स.) ने सलाम किया हुज़र ने जवाबे सलाम दे कर फ़रमाया , ऐ फ़रज़न्द ! मैं और अली (अ.स.) , फ़ात्मा (स.अ.) हसन (अ.स.) , हुसैन (अ.स.) सब तुम्हारे ग़म में नाला व गिरया हैं और हम ही नहीं फ़रज़न्द ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) व मोहम्मद बाक़र (अ.स.) , जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) और तुम्हारे पदर मूसिए काज़िम (अ.स.) सब ग़मगीन और रंजीदा हैं। ऐ फ़रज़न्द ! अन्क़रीब मामून रशीद तुम को ज़हर से शहीद कर देगा। यह देख कर आपकी आंख खुल गई और आप ज़ार ज़ार रोने लगे। फिर रौज़ा ए मुबारक से बाहर आए। एक जमाअत ने आपसे मुलाक़ात की और आपको परेशान देख कर पूछा कि मौला इज़तिराब की वजह क्या है ? फ़रमाया , अभी अभी जद्दे नाम दार ने मेरी शहादत की ख़बर दी है। अबुल सलत दुश्मन मुझे शहीद करना चाहते हैं और मैं खुदा पर पूरा भरोसा करता हूँ जो मरज़िए माबूद हो वही मेरी मरज़ी है इस ख़्वाब के थोड़े अर्से के बाद मामून रशीद का लशकर मदीने पहुँच गया और इमाम (अ.स.) को अपनी सियासी ग़रज़ पूरी करने के लिये वहां से दारूल खि़लाफ़त ‘‘ मर्व ’’ में ले आया।( कन्ज़ुल अन्साब पृष्ठ 86)


इमाम रज़ा (अ.स.) की मदीने से मर्व में तलबी

अल्लामा शिब्लन्जी लिखते है कि हालात की रौशनी में मामून ने अपने मुक़ाम पर यह क़तई फ़ैसला और अज़म बिल जज़म कर लेने के बाद कि इमाम रज़ा (अ.स.) को वली अहले खि़लाफ़त बनायेगा। अपने वज़ीरे आज़म फ़ज़ल बिन सहल को बुला कर भेजा और उससे कहा कि हमारी राए है कि हम इमाम रज़ा (अ.स.) को वली अहद सुपुर्द कर दे तुम भी इस पर सोच विचार करो और अपने भाई हसन बिन सहल से मशविरा करो। इन दोनों ने आपस में दबादलाए ख़यालात करने के बाद मामून की बारगाह में हाज़री दी। उनका मक़सद था कि मामून ऐसा न करे वरना खि़लाफ़त आले अब्बास से आले मोहम्मद (अ.स.) में चली जायेगी। उन लोगों ने अगर चे खुल कर मुख़ालफ़त न की लेकिन दबे लफ़्ज़ों में नाराज़गी का इज़हार किया। मामून ने कहा मेरा फ़ैसला अटल है और मैं तुम दोनों को हुक्म देता हूँ कि तुम मदीने जा कर इमाम रज़ा (अ.स.) को अपने हमराह लाओ। (हुक्मे हाकिम मर्गे मफ़ाजात) आखि़र कार यह दोनों इमाम रज़ा (अ.स.) की खि़दमत में मक़ामे मदीने मुनव्वरा हाज़िर हुए और उन्होंने बादशाह का पैग़ाम पहुँचाया। हज़रते इमाम अली रज़ा (अ.स.) ने इस अर्ज़ दाश्त को मुस्तरद कर दिया और फ़रमाया कि इस अम्र के लिये अपने को पेश करने के लिये माज़ूह हूँ लेकिन चूंकि बादशाह का हुक्म था कि उन्हें ज़रूर लाओ इस लिये उन दोनों ने बे इन्तेहा इसरार किया और आपके साथ उस वक़्त तक लगे रहे जब तक आपने मशरूत तौर पर वादा नहीं कर लिया।( नूरूल अबसार पृष्ठ 41)


इमाम रज़ा (अ.स.) की मदीने से रवानगी

तारीख़ अबुल फ़िदा में है कि जब अमीन क़त्ल हुआ तो मामून सलतनते अब्बासिया का मुस्तक़िल बादशाह बन गया। यह ज़ाहिर है कि अमीन के क़त्ल होने के बाद सलतनत मामून के पाए नाम हो गई मगर यह पहले कहा जा चुका है कि अमीन नाननहाल की तरफ़ से अरबीउन नस्ल था और मामून अजमिउन नस्ल था। अमीन के क़त्ल होने से ईराक़ की अरब का़ैम और अरकाने सलतनत के दिल मामून की तरफ़ से साफ़ नहीं हो सकते थे बल्कि वह ग़मो ग़स्से की कैफ़ीयत महसूस करते थे दूसरी तरफ़ खुद बनी अब्बास में से एक बडी़ जमाअत जो अमीन की तरफ़ दार थी इससे भी मामून को हर तरह का ख़तरा लगा हुआ था। औलादे फ़ात्मा (स.अ.) में से बहुत से लोग जो वक़्त्न फ़वक़्तन बनी अब्बास के मुक़ाबिल ख़ड़े होते रहते थे वह ख़्वाह क़त्ल कर दिये गये हों या जिला वतन किये गए हों या क़ैद रखे गए हों उनके मुआफ़िक़ एक जमाअत थी जो अगर चे हुकूमत का कुछ बिगाड़ न सकती थी मगर दिल ही दिल में हुकूमते बनी अब्बास से बेज़ार ज़रूर थी। ईरान में अबू मुस्लिम ख़ुरासानी ने बनी उमय्या के खि़लाफ़ जो इश्तेआल पैदा किया वह इन मज़ालिम को याद दिला कर जो बनी उमय्या के हाथों हज़रते इमाम हुसैन (अ.स.) और दूसरे बनी फ़ात्मा (स.अ.) के साथ किये गये थे। इस से ईरान में इस ख़ानदान के साथ हमदर्दी का पैदा होना फ़ितरी था। दरमियान में बनी अब्बास ने इससे ग़लत फ़ायदा उठाया मगर इतनी मुद्दत में कुछ ना कुछ ईरानियों की आंखें भी खुल गई होगीं कि उनसे कहा गया था क्या और इक़्तेदार किन लोगों ने हासिल कर लिया है। मुम्किन है कि ईरानी क़ौम के इन रूझानात का चर्चा मामून के कानो तक भी पहुँचा हो। अब जिस वक़्त की अमीन के क़त्ल के बाद वह अरब क़ौम पर और बनी अब्बास के ख़ानदान पर भरोसा नहीं कर सकता था और उसे हर वक़्त इस हल्क़े से बग़ावत का अन्देशा था तो उसे इसी सियासी मस्लहत इसी में मालूम हुई। अरब के खि़लाफ़ अजम और बनी अब्बास के खि़लाफ़ बनी फ़ात्मा को अपना बनाया जाए और चुंकि तरज़े अमल में ख़ुलूस समझा नहीं जा सकता और वह आम तबाए पर असर नहीं डाल सकता। अगर यह नुमाया हो जाए कि वह सीयासी मसलहतों की बिना पर है इस लिये ज़रूरत हुई कि मामून मज़हबी हैसियत से अपनी शियत नवाज़ी और विलाए अहले बैत के चर्चे अवाम में फैलाए और वह यह दिखलाए कि वह इन्तेहाई नेक नीयती पर क़ाएम है। ‘‘ अब हक़ बा हक़दार रसीद के मकूले को सच्चा बनाना चाहता है।’’

इस सिलसिले में जनाबे शेख़ सद्दूक़ आलाल्लाहो मुक़ामा ने फ़रमाया है कि इसने अपनी नज़र की हिक़ायत भी शाया की कि जब अमीन का और मेरा मुक़ाबला था और बहुत नाज़ुक हालत थी और यह उसी वक़्त मेरे खि़लाफ़ सीसतान और किरमान में भी बग़ावत हो गई थी और ख़ुरासान में भी बेचैनी फैली हुई थी और फ़ौज की तरफ़ से भी इतमिनान न था और उस वक़्त दुश्वार माहोल में मैंने खुदा से इलतिजा की और मन्नत मानी कि अगर यह सब झगड़े ख़त्म हो जायें और मैं बामे खिलाफ़त तक पहुँचू तो उसको उसके असली हक़दार यानी औलादे फ़ात्मा मे से जो इसका अहल है उस तक पहुँचा दूंगा। इसी नज़र के बाद मेरे सब काम बनने लगे और आखि़र तमाम दुश्मनों पर फ़तेह हासिल हुई यक़ीनी यह वाक़िया मामून की तरफ़ से इस लिये बयान किया गयाा कि इसका तर्ज़े अमल खुलूसे नियत और हुस्ने नियत पर मुबनी समझा जाए। यूं तो अहले बैत (अ.स.) के खुले दुश्मन सख़्त से सख़्त थे वह भी इनकी हक़ीक़त और फ़ज़ीलत से वाक़िफ़ थे। मगर शीयत के मानी यह जानना तो नहीं है बल्कि मोहब्बत रखना और इताअत करना है और मामून के तरज़े अमल से यह ज़ाहिर है कि वह इस दावाए शीयत और मोहब्बते अहले बैत का ढिंढोरा पीटने के बावजूद खुद इमाम की इताअत नहीं करना चाहता था बल्कि इमाम को अपना मंशा के मुताबिक़ चलाने की कोशिश थी। वली अहद बनने के बारे में आपके इख़्तेआरात को बिल्कुल सलब कर दिया गया और आपको मजबूर बना दिया गया था। इससे ज़ाहिर है कि यह वली अहदी की तफ़वीज भी एक हाकिमाना तशद्द था जो उस वक़्त इमाम के साथ किया जा रहा था।

इमाम रज़ा (अ.स.) का वली अहदी को क़ुबूल करना बिल्कुल वैसा ही था जैसा हारून के हुक्म से इमाम मूसा काज़िम (अ.स.) का जेल ख़ाने में चला जाना। इस लिये जब इमाम रज़ा (अ.स.) मदीने से ख़ुरासान की तरफ़ रवाना हो रहे थे तो आपके रंजो सदमा और इस्तेराब की कोई हद न थी। रौज़ा ए रसूल से रूख़सत के वक़्त आपका वही आलम था जो हज़रत इमाम हुसैन (अ.स.) का मदीने से रवानगी के वक़्त था। देखने वालों ने देखा कि आप बे ताबाना रौज़े के अन्दर जाते हैं और नालाओ आह के साथ उम्मत की शिकायत करते हैं। फिर बाहर निकल कर घर जाने का इरादा करते हैं और फिर दिल नहीं मानता फिर रौज़े से लिपट जाते हैं यही सूरत कई मरतबा हुई। रावी का बयान है कि मैं हज़रत के क़रीब गया तो फ़रमाया , ऐ महूल ! मैं अपने जद्दे अमजद के रौज़े से ब जब्र जुदा किया जा रहा हूँ , अब मुझको यहां आना नसीब न होगा।( सवानेह इमाम रज़ा ( . . ) जिल्द 3 पृष्ठ 7)

महूल शैबानी का बयान है कि जब वह ना गवार वक़्त पहुँच गया कि हज़रते इमाम रज़ा (अ.स.) अपने जद्दे बुज़ुर्गवार के रौज़ा ए अक़दस से हमेशा के लिये विदा हुए तो मैंने देखा कि आप बेताबान अन्दर जाते और बा नालाओ आह बाहर आते हैं और दिल में उम्मत की शिकायत करते हैं या बाहर आ कर गिरया ओ बुका फ़रमाते हैं और फिर अन्दर चले जाते हैं। आपने चन्द बार ऐसे ही किया और मुझसे न रहा गया और मैंने हाज़िर हो कर अर्ज़ की मौला इज़्तेराब की क्या वजह है ? फ़रमाया , ऐ महूल ! मैं अपने नाना के रौज़े से जबरन जुदा किया जा रहा हूँ। मुझे इसके बाद अब यहां आना न नसीब होगा। मैं इसी मुसाफ़िरत और ग़रीबुल वतनी में क़त्ल कर दिया जााऊंगा और हारून रशीद के मक़बरे में मदफ़ून हूंगा। उसके बाद आप दौलत सरा में तशरीफ़ लाए और सब को जमा कर के फ़रमाया कि मैं तुम से हमेशा के लिये रूख़सत हो रहा हूँ। यह सुन कर घर में एक अज़ीम कोहराम बरबा हो गया और सब छोटे बड़े रोने लगे। आपने सब को तसल्ली दी और कुछ दीनार आइज़्ज़ा में तक़सीम कर के राहे सफ़र इख़्तेयार फ़रमाया। एक रवायत की बिना पर आप मदीने से रवाना हो कर मक्के मोअज़्ज़मा पहुँचे और वहां तवाफ़ कर के ख़ाना ए काबा को रूख़सत फ़रमाया।

SCIENTIFIC MIRACLE OF HOLY QURAN AND SUNNA ABOUT CREATION OF OFFSPRING.

Medical & Life Sciences
Professor: Megahid Abu Elmagd.

Professor: Samy Hilal.

Facts of fertilization as mentioned in the holy Quran:

Fact (1):

So let man see from what he is created. He is created from a water gushing forth. Water gushing forth: a water with automaticity due to the presence of motile sperms that emitted during ejaculation.

The Tenth World Conference on Scientific Signs in the Qur’an and Sunnah

Water gushing forth means in Arabic exessive rains.

Water gushing forth means also a rapid hurry walking.

In order for The semen to be able to fertilize the ovum it must fulfill these criteria:

1. Viability>

2. Huge number more than 20 million per ejaculate>

3. Rapid motility of sperms>

4. Normal shape and function of the sperms.

All these criteria are present in the Quranic word ☺ls a water gushing forth.

Fact (2):

The embryo is created from a fluid emitted from both male and female> when the prophet peace be upon him was asked by a Jewish who said ” O Mohammed, What is man created from? The prophet answered O Jewish he is created from both the fluid (Nutfah) of the man and the fluid (Nutfah) of the woman musnad Ahmed, vol 2 p 465

Fact (3):

Not from all the fluid is the offspring created. Sahih Muslim. Kitab El Nikah Bab el Azl.


Fact (4):

Genetic programming “Taqdir” occurs immediately after the formation of the zygote (fertilized ovum).

The Quran refers these early successive events in Al- alalqa creation and Al Taqdir (genetic programming that occurs at the early stages of the Nutfah amshag]

“woe to man what made him reject god? From what substance has he created him? from Nutfah he has created him and immediately planned or programmed him”)surah Abbassa 80 ayat 17-19.

Part 2

Causes of infertility and sterility as revealed by the Holy Quran:

Infertility means: the diminished ability to conceive or produce an offspring.

Sterility is the complete inability to conceive or produce an offspring.

Infertility was mentioned in verses 40 Allomran,5 and 8 Mariam.

While sterility was mentioned in verses 55 El Haj, 50 El shora, 29 El Zariat 41,42 Elzariat also.

We observed from these verses the following:

The wife of Zakaria was mentioned as a woman with while the wife of Ibrahim was called a sterile infertility . عقيم woman .

The wind and the day of resurrection were called as . عقیم Sterile

What is the meaning of land (infertility and sterility in Arabic dictionaries)

First sterility a sterile man who can`t give offspring while sterility means the complete disability to conceive or produce offspring

So the Quran is the first book to realize the fact that the inability to produce offspring is related to two main causes infertility and sterility.

So the Quran mentioned in Surrah El Anbia the repair and وأصلحنا له زوجه towards the wife of Zakaria only cured his wife (to bear a child) for him. This is not mentioned towards the wife of Ibrahim who was described in the .. عاقر holy Quran as sterile

Section 13 – The modesty of the Prophet and lowering of his gaze

Section 13 – The modesty of the Prophet and lowering of his gaze

The modesty of the Prophet, praise and peace be upon him, is unparalleled and is yet another of his excellent virtues. Modesty is that which causes a person to turn his face away from a matter when something dislikeable occurs, or to leave something alone when it is best left undone. Lowering of one’s gaze is to restrain one’s eyes from something one finds disagreeable or has the element of temptation.

Commenting upon the shyness of the Prophet, praise and peace be upon him, Abu Sayeid Al Khudri said, “The Messenger of Allah was more modest than a cloistered virgin. When he disliked something, it was easily discernable upon him face.”

The Prophet, praise and peace be upon him, was extremely sensitive, his modesty and generosity prevented him from saying or thinking of anything that a person would dislike to hear.

Lady Ayesha, Mother of Believers, may Allah be pleased with her said, “When the Prophet heard something he disliked about someone, he would not say, ‘What do you think about so-and-so doing or saying this?’ Rather he would say, ‘What do you think about a people who do such a thing or say this?’ so he could forbid it without mentioning the name of the person who had done it.”

Anas tells us of the occasion when a man went to the Prophet, praise and peace be upon him, with traces of saffron on him. However, he did not say anything to him because it was not his habit to confront anyone with something he disliked. When the man left, the Prophet, praise and peace be upon him, asked one of his Companions to either ask him to wash if off or remove it.

Lady Ayesha also tells us that the Prophet, praise and peace be upon him, was

not vulgar neither did he use obscene language. In the market place he neither shouted nor repaid evil with evil, and that his disposition was to forgive and overlook.

The son of Salaam and Abdullah, Abbas’ son who were both knowledgeable of the Torah and commented that the Torah mentions these qualities would be found in the awaited Prophet.

Another facet of his modesty is that he would never stare directly at someone’s face. When someone was persistent he addressed them in an affectionate, respectful way with the familiar expression “father or mother of so-and-so.”