चौदह सितारे हज़रत इमाम अली रज़ा(अ.स) पार्ट- 15

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आपकी तसानीफ़

उलमा ने आपकी तसानीफ़ में सहीफ़तुर रज़ा , सहीफ़तुर रिज़विया , तिब्बे रज़ा और और मसनदे इमाम रज़ा (अ.स.) का हवाला दिया है और बताया है कि आपकी तसानीफ़ हैं। सहीफतुर्ररज़ का ज़िक्र अल्लामा मजालिसी , अल्लामा तबरसी और अल्लामा ज़हमख़शरी ने किया है। इसका उर्दू तरजुमा हकीम इकराम अली रज़ा लखनवी ने प्रकाशित कराया था। अब जो तक़रीबन नापैद है। सहीफ़तुर अरज़ा का तरजुमा मोलवी शरीफ़ हुसैन साहब बरेलवी ने किया है। तिब्बे रज़ा का ज़िक्र अल्लामा मजलिसी शेख़ मुन्तख़बुद्दीन ने किया है। इसकी शरह फ़ज़लुल्लाह इब्ने इरावन्दी ने लिखी है इसी को रिसाला ज़हबिया भी कहते हैं और इसका तरजुमा मौलाना हकीम मक़बूल अहमद साहब क़िबला मरहूम ने भी किया है। इसका तज़किरा शमशुल उलमा अल्लामा शिबली नोमानी ने अल मामून पृष्ठ 92 में किया है। मसनदे इमाम रज़ा (अ.स.) का ज़िक्र अल्लामा चेलपी ने किताब मशफ़ुल ज़नून में किया है। जिसको अल्लामा अब्दुल्लाह अमरत सरी ने किताब अरजहुल मतालिब के पृष्ठ 454 पर नक़ल किया है। नाचीज़ मुअल्लिफ़ के पास यह किताब मिस्र की मतूबा मौजूद है। यह किताब 1321 हिजरी में छपी है और इसके मुरतिब अल्लामा शेख़ अब्दुल अलवासा मिस्री और महशी अल्लामा मोहम्मद इब्ने अहमद है।

हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) ने ‘‘ माऊल लहम ’’ बनाने और मौसिमयात के मुताअल्लिक़ जो अफ़दा फ़रमाया है उसका ज़िक्र किताबों में मौजूद है। तफ़सील के लिये मुलाहेज़ा हो।( दमए साकेबा वग़ैरा )


हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) और शेरे क़ालीन

अल्लामा मोहम्मद तक़ी इब्ने मोहम्मद बाक़र हज़रत इमाम हसन असकरी (अ.स.) के हवाले से तहरीर फ़रमाते हैं कि हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) की वली अहदी के ज़माने में एक दफ़ा शदीद तरीन क़हत पड़ा। मामून ने हज़रत की खि़दमत में हाज़िर हो कर अर्ज़ की मौला कोई तदबीर कीजिए और किसी सूरत से दुआ फ़रमाइये कि ख़ुदा वन्दे आलम नज़ूले बारां कर दे। अब मुल्क की बुरी हालत हो गई है। भूख और प्यास से लोगों के जान बहक़ होने का सिलसिला शुरू हो गया है। आपने इरशाद फ़रमाया ऐ बादशाह घबरा नहीं। मैं दो शम्बे के दिन तलबे बारीश के लिये निकलूगां। मुझे अपने परवर दिगार से बड़ी तवक़्क़ा है। इंशा अल्लाह नजूले बारां होगा और ख़ल्के़ ख़ुदा की परेशानी दूर होगी। ग़रज़ कि वक़्ते मुक़र्रर आया और इमाम (अ.स.) सहरा की तरफ़ बरामद हुए। आपने मुसल्ला बिछाया और दस्ते दुआ बारगाहे अहदीयत में बलन्द कर के दोआ फ़रमाई अभी दुआ के जुमले तमाम न होने पाए थे कि ठन्डी हवा के झोंके चलने लगे। बादल छा गया बूंदे पड़नी लगीं और इस क़दर बारिश हुई कि जल थल हो गया। बादशाह भी ख़ुश हुआ पब्लिक भी मुतमईन और आसूदा हुई और लोग अपने अपने घरों को वापस चले गए। इस करामते ख़ास और इस्तेजाबत दोआ की वजह से बहुत से हासिद जल भुन कर ख़ाकिस्तर हो गए। एक दिन जब दरबार आरास्ता था उन्हीं हासिदों में से एक ने कहा , लोग आपके बारे में बहुत से ख़ुराफ़ात नशर करते हैं और आपको बढ़ाने की सई में मुनहमिक़ हैं। सब चाहते हैं कि आपका पाया बादशाह सलामत के पाय से बलन्द कर दें और सुने सब से बड़ी करामत जो आपकी इस वक़्त मशहूर की जा रही है वह यह है कि आप ने बारिश करा दी है मैं कहता हूँ कि जब कि बारिश अर्से से नहीं हुई थी। वह आपकी दुआ करते या न करते उसे तो होना ही था लेहाज़ा मेरी नज़र में यह करामत कोई हैसियत नहीं रखती हां करामत और मोजिज़ा तो यह है कि पेशे नज़र क़ालीन और मस्नद पर जो शेर की तस्वीर बनी हुई है उसे मुजस्सम कर दीजिये और हुक्म दीजिए की मुझे फाड़ खाए।

हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) ने फ़रमाया कि देख मैंने किसी से नहीं कहा कि मेरी करामत बयान करे और न यह कहा कि मुझे बढ़ाने की कोशिश करे। अब रह गया आबे बारानी का वाक़ेया , वह ख़ुदा की मेहरबानी और इनायत से अमल में आया है , मैं इसमें भी अपनी कोई तारीफ़ नहीं चाहता। यह सब ख़ुदा की इनायत है। अलबत्ता जो तुझे यह हौंसला है कि शेरे क़ालीन व मसनद मुजस्सम हो जाए और तुझे फाड़ खाए तो ले यह किए देता हूँ।

यह फ़रमा कर आप शेर की तस्वीरों की तरफ़ मुतवज्जा हुए और आपने फ़रमाया , ‘‘ कि ऐन फ़ाजिर कि नज़दे शमाअस्त और राबदरौ असर राबाक़ी नगज़ारीद ’’ इस फ़ासिक़ व फ़ाजिर को चीर फाड़ कर खा जाओ कि इसका निशान तक बाक़ी न रहे।

इमाम (अ.स.) का यह फ़रमाना था कि दोनों शेर की तस्वीर मुजस्सम हो गयीं और उन्होंने हमहमा भर कर काफ़िर अज़ली पर हमला कर दिया जिसका नाम हमीद बिन महरान था और उसे पारा पारा कर के खा डाला। इस हंगामे को देख कर मामून बेहोश हो गया। हज़रत ने उसे होश में ला कर शेरों को हुक्म दिया कि अपनी असली हालत व सूरत में हो जाओ चुनान्चे वह फिर क़ालीन व मसनद की तसवीन बन गये।( काशेफ़ुन नक़ाब शरह उयून अख़बार रज़ा पृष्ठ 216)


हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) के साथ उम्मे हबीबा बिन्ते मामून की शादी और मामून का सफ़रे ईराक़

वाक़ेए वली अहदी के क़बल बाद से ले कर 202 हिजरी के शुरू तक हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) से मनाज़िरे , मुबाहसे और इल्मी मज़ाहिरे मामून रशीद कराता रहा। अब इसकी वजह या यह हो कि शोहरते आम्मा हो जाए और अलवी सरनिगंू रहें और अलमे ख़ुरूज बुलन्द न करें या यह हो कि अब्बासीयों पर हुज्जतें क़ायम हो जायं और हज़रत की अहलीयत व क़ाबलीयत से मरऊब हो कर वह लोग मुख़लेफ़त और तमरूद व सरकशी का क़सद न करें और ठीक से मामून को हुकूमत करते दें। या यह हो कि इमाम रज़ा (अ.स.) और उनके मानने वालों के दिल साफ़ हो जायें और किसी को बाद के आने वाले वाक़ेयात में यह शुबहा न हो कि मनाज़रे और मुबाहसे के बाद मामून ने अपने ख़ुफ़िया मक़सद की तकमील के लिये ईराक़ का सफ़र करने का फ़ैसला किया। इसके क़ब्ल इसने यह ज़रूरी समझा कि शुबहे की गुनजाईश को ख़त्म कर देने के लिये अपनी लड़की की शादी इमाम रज़ा (अ.स.) से कर दे। चुनान्चे उस ने रऊसा अल शहाद बरसरे दरबार मजिलिसे अक़्द कर के अपनी बेटी उम्में हबीब की शादी हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) के साथ कर दी।

अल्लामा शिब्लन्जी लिखते हैं कि ‘‘ ज़ौजा अल मामून अबनाता उम्में हबीब फी अव्वल सुन्नतह असनैन वमातैन वल मामून मतार्वज्जाहू अल ईराक़ ’’ मामून ने अवएल 202 हिजरी में अपनी लड़की उम्मे हबीबा का अक़्द हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) के साथ कर दिया , यह उस वक़्त किया जब कि वह सफ़रे ईराक़ का तहय्या कर चुका था।( नूरूल अबसार पृष्ठ 142 प्रकाशित मिस्र )

अल्लामा मोहम्मद रज़ा लिखते हैं कि उम्मे हबीबा को आपके तसर्रूफ़ में नहीं दिया गया।( जन्नातुल ख़ुलूद पृष्ठ 32) यह 202 हिजरी ही है जिसमें अब्बासीयों ने बग़दाद की हुकूमत से मामून को बे दख़ल कर के इसकी जगह पर इब्राहीम बिन मेहदी को ख़लीफ़ा बनाने का ऐलान कर दिया था। इस वक़्त बग़दाद की हालत यह थी कि वह इन्तेशार और बद नज़मियों का मरकज़ बन गया था।

मुवर्रिख़ ज़ाकिर हुसैन वाक़िए वली अहदी के बाद के हालात के सिलसिले में लिखते हैं कि बग़दाद और उसके गिर्द व नवाह में बिल्कुल बदनज़मी फैल गई , लुच्चेख् ग़ुन्डे दिन दहाड़े लूट मार करने लगे। जुनूबी ईराक़ व हिजाज़ में भी मामलात की हालत ऐसी ही ख़राब हो रही थी। फ़ज़ल सब ख़बरों को पोशीदा रखता था । मगर इमाम रज़ा (अ.स.) ने उन्हें बा ख़बर कर दिया। बादशाह वज़ीर से बदज़न हो गया। मामून को जब इन शोरिशों की ख़बर हुई तो बग़दाद की तरफ़ रवाना हो गया। सरख़स में पहुँच कर उसने अपने वज़ीर को हम्माम में क़त्ल करा दिया। फिर जब तूस पहुँचा तो इमाम रज़ा (अ.स.) को जिनको वली अहद करने के सबब बग़दाद में बग़ावत हुई थी अग़ूरों में ज़हर दे कर शहीद कर दिया। मामून में ज़ाहिर में तो मातम किया और वहीं दफ़्न कर के मक़बरा तामीर कराया। मामून ने इमाम (अ.स.) की वफ़ात का हाल बग़दाद लिख भेजा जिससे वहां अमनो अमान क़ायम हो गया। मामून आगे बढ़ा यहां तक कि मदाएन पहुँच कर आठ दिन क़याम किया। जहां बग़दाद के जंगी सरदारों , रईसों से मिला। बनी अब्बास ने उसका इस्तक़बाल किया और उसने बाज़ अमाएद की दरख़्वास्त पर फिर वही अब्बासी सियाह रंग इख़्तेयार कर लिया। मामून के आने की ख़बर सुन कर इब्राहीम बिन मेहदी और उसके तरफ़दार भाग गये मगर फिर इब्राहीम पकड़ा गया।( तारीख़े इस्लाम जिल्द 1 पृष्ठ 61 वल फ़ख़्री वल मामून )

अफ़ज़लियत ए हज़रात अली

अफ़ज़लियत ए हज़रात अली

कुरान ए करीम की सुरत नं: 3 : سورة آل عمران – आयत नं: 61 पर अल्लाह ﷻ फरमाता है:
فَمَنۡ حَآجَّکَ فِیۡہِ مِنۡۢ بَعۡدِ مَا جَآءَکَ مِنَ الۡعِلۡمِ فَقُلۡ تَعَالَوۡا نَدۡعُ اَبۡنَآءَنَا وَ اَبۡنَآءَکُمۡ وَ نِسَآءَنَا وَ نِسَآءَکُمۡ وَ اَنۡفُسَنَا وَ اَنۡفُسَکُمۡ ۟ ثُمَّ نَبۡتَہِلۡ فَنَجۡعَلۡ لَّعۡنَتَ اللّٰہِ عَلَی الۡکٰذِبِیۡنَ ﴿۶۱﴾
तरजूमा
फिर ए महबूब! जो तुमसे ईशा के बारे मै  हुज़त करे बाद इसके के तुम्हे इल्म आ चुका तो उनसे फरमा दो आओ हम बुलाए अपने बेटे और तुम्हारे बेटे और अपनी औरतें और तुम्हारी औरतें और अपनी जाने और तुम्हारी जाने, फिर मुबाहीला करें तो जूठों पर अल्लाह की लानत डालें

आयते मुबाहिला, खास पंजतन पाक की शान में नाजिल हूइ है
कुरान मजीद में सूरह आले इमरान की आयत नं 61 में है-
فَقُلۡ تَعَالَوۡا نَدۡعُ اَبۡنَآءَنَا وَ اَبۡنَآءَکُمۡ وَ نِسَآءَنَا وَ نِسَآءَکُمۡ وَ اَنۡفُسَنَا وَ اَنۡفُسَکُمۡ ثُمَّ نَبۡتَہِلۡ فَنَجۡعَلۡ لَّعۡنَتَ اللّٰہِ عَلَی الۡکٰذِبِیۡنَ.
तरजुमा
“आप कह दें – आओ, हम अपने बेटों को बुलाते हैं और तुम अपने बेटों को बुलाओ, हम अपनी बेटियों को बुलाते हैं और तुम अपनी बेटियों को बुलाओ, हम अपनी नफ्सो को बुलाते हैं और तुम अपनी नफ्सो को बुलाओ फिर दोनों फरीक अल्लाह से दुआ करें कि जो झूठा हो उसपर अल्लाह की लानत हो।”

आयते मुबाहिला  की शान-ए-नजूल के बारे में इमाम वाहिदी निशापुरी [वफात 468 हिजरी] ने ‘असबाब ए नुजूल ए कुरआन’ में सफा नं 97 पर लिखा है-
الشعبی کا قول ہے کہ ابناءنا سے مراد حسن اور حسین ہیں، ونساءنا سے مراد حضرت فاطمہ ہیں اور انفسنا سے مراد علی بن ابی طالب رضی اللہ عنہم ہیں۔
यानि ‘बेटों से मुराद हसन और हुसैन رضي الله عنهما हैं, बेटियों से मुराद फातिमा हैं और नफ्स से मुराद अली बिन अबी तालिब رضي الله عنهما है,,
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कुरआन की नस से साबित है कि मौला अली (अलैहिस्सलाम) नफ्स ए रसूल ﷺ  है इसी लिए हम रसूल ﷺ की नफ़स पर किसी और को फ़ोकियत नहीं देते |
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इमाम इब्ने असाकिर ने तारीख ए मदीना ए दमिश्क के जिल्द नं 42 में सफा नं 42 पर  रिवायत नकल किया है कि-
عن النبي ﷺ قال لأم سلمة : « يا أم سلمة ، إن عليا لحمه من لحمي ، ودمه من دمي ، وهو مني بمنزلة هارون من موسى غير أنه لا نبي نبي بعدي.
यानि ‘नबी करीम ﷺ ने हजरत उम्मे सलमा رضي الله عنها से फरमाया कि – ए उम्मे सलमा, ये अली رضي الله عنه  हैं- इसका गोश्त मेरा गोश्त है, इसका खून मेरा खून है और मेरे नजदीक ऐसे है कि जैसे मूसाعَلَيْهِ ٱلسَّلامُ  के नजदीक हारुन عَلَيْهِ ٱلسَّلامُ थे.. बस मेरे बाद वो नबी नहीं हैं।’

इमाम तबरानी ने रिवायत नकल किया है कि-
حدثنا علي بن العباس البجلي الكوفي ثنا محمد بن تسنيم ثنا حسن بن حسين العربي ثنا يحيى بن عيسى الرملي عن الاعمش عن حبيب بن ابي ثابت عن سعيد بن جبير عن ابن عباس قال قال رسول الله صلى الله عليه وسلم لام سلمة :
“هذا علي بن ابي طالب لحمه لحمي ودمه دمي هو مني بمنزلة هارون من موسى الا انه لانبي بعدي”.
यानि ‘हजरत इब्ने अब्बास رضي الله عنه से रिवायत है कि नबी करीम ﷺ ने हजरत उम्मे सलमा رضي الله عنها  से फरमाया कि- ये अली رضي الله عنه हैं, इसका गोश्त मेरा गोश्त है और इसका खून मेरा खून है और मेरे नजदीक अली رضي الله عنه ऐसे हैं कि जैसे हजरत मूसा عَلَيْهِ ٱلسَّلامُ के नजदीक हजरत हारुन عَلَيْهِ ٱلسَّلامُ थे.. सिवाय इसके कि मेरे बाद कोई नबी नही |
मुअज्मल कबीर जिल्द नं 12 हदीस नं 12341 सफा नं 18
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सैयदना सलमान رضي الله عنه  से रिवायत है के मैंने अपने महबूब रसूलल्लाह ﷺ से सुना है के आपﷺ ने फरमाया: में और अली رضي الله عنه अल्लाह ﷻ  के सामने नूर थे, खलकते आदम عَلَيْهِ ٱلسَّلامُ से 14 हजार साल पहले जब आदम عَلَيْهِ ٱلسَّلامُ को पैदा क्या  गया तो अल्लाह ﷻ ने उसे मजकुरा दो हिस्सो मे तकसीम किया एक हिस्से मे दूसरा हिस्सा अली है,
फजाइले सहाबा पेज नं: 374 हदीस नं: 1130

हदीस ए नूर की तस्दीक करते हुवे हजरत मौलाना अहमद रजा खान फाजिले बरेलवी ने कसीदा नूर लिखा और इस कसीदा ए नूर से दो शेर यहां लिख रहा हूं

नूर ओ बिन्ते नूर ओ ज़ौजे नूर ओ उम्मे नूर ओ नूर
नूर ए मुतलक की कनीज अल्लाह रे लहना नूर का

तेरी नस्ल ए पाक मे है बच्चा बच्चा नूर का
तू हैं ऐैन ए नूर तेरा सब घराना नूर का
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कुरान ए करीम की सुरत नं: 7 : سورة الأعراف – आयत नं: 142  पर अल्लाह ﷻ इरशाद फरमाते है:
وَ وٰعَدۡنَا  مُوۡسٰی ثَلٰثِیۡنَ  لَیۡلَۃً وَّ اَتۡمَمۡنٰہَا بِعَشۡرٍ فَتَمَّ  مِیۡقَاتُ رَبِّہٖۤ اَرۡبَعِیۡنَ  لَیۡلَۃً ۚ وَ قَالَ مُوۡسٰی  لِاَخِیۡہِ ہٰرُوۡنَ  اخۡلُفۡنِیۡ  فِیۡ  قَوۡمِیۡ وَ اَصۡلِحۡ  وَ لَا تَتَّبِعۡ  سَبِیۡلَ  الۡمُفۡسِدِیۡنَ ﴿۱۴۲ ﴾
और हमने मूसा से तीस रातों का वादा फरमाया और उनमें दस राते मजीद बढा कर पूरी की तो उसके रब का वादा पूरी चालीस रातों का हुवा और मूसा ने अपने भाई हारून से कहा मेरी कॉम(उम्मत) पर मेरा नाईब रहना और इसलाह करना और फसादियों के रास्ते पर मत चलना, (तर्जुमा कंजुल ईमान)

बुखारी शरीफ की  हदीस
रसूलुल्लाह  ﷺ  ग़ज़वाए-तबूक के लिये तशरीफ़ ले गए तो अली رضي الله عنه को मदीना में अपना नायब बनाया। अली رضي الله عنه ने कहा कि आप मुझे बच्चों और औरतों में छोड़े जा रहे हैं? नबी करीमﷺ ने फ़रमाया, क्या तुम इस पर ख़ुश नहीं हो कि मेरे लिये तुम ऐसे हो जैसे मूसा عَلَيْهِ ٱلسَّلامُ के लिये हारून عَلَيْهِ ٱلسَّلامُ थे। लेकिन फ़र्क़ ये है कि मेरे बाद कोई नबी नहीं होगा।
सहीह बुखारी जिल्द: 4 हदीस नंबर: 4416

जिब्राइअमीन عَلَيْهِ ٱلسَّلامُ ने हाजिर हो कर हुजूर अक़दस ﷺ  से अर्ज की हुजूर का रब हुजूर को सलाम कहता है और फरमाता है अली رضي الله عنه तुम्हारी निस्बत मेरे नजदीक ऐसी है जेसे मूसा عَلَيْهِ ٱلسَّلامُ के लिए हारून عَلَيْهِ ٱلسَّلامُ मगर तुम्हारे बाद कोई नबी नहीं
फतवा ए रजविया, जिल्द:15, सफा: 677

कुरआन ए मजीद फ़ुरक़ान ए हामिद सुरत नं: 7 : سورة الأعراف – आयत नं: 142 से और बुखारी सरीफ की सहीह हदीस और फतवा ए रजविया की सहीह हदीस से हमें यही पता चलता है की मूसा नबी عَلَيْهِ ٱلسَّلامُ की उम्म्त में मूसा नबी عَلَيْهِ ٱلسَّلامُ के बाद हारून عَلَيْهِ ٱلسَّلامُ अफजल थे वैसे ही रसूलल्लाहﷺ कि उममत मे रसूलल्लाह ﷺ के बाद मौला अली رضي الله عنه अफजल है,,
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इमाम अहमद बिन हंबल رضي الله عنه  ने ‘फजाएल ए सहाबा’ में रकम नंबर 1033 के तहत रिवायत नकल किया है कि-
حَدَّثَنَا عَبْدُ اللَّهِ قَالَ : حَدَّثَنِي أَبِي ، قثنا مُحَمَّدُ بْنُ جَعْفَرٍ ، نا شُعْبَةُ ، عَنْ أَبِي إِسْحَاقَ ، عَنْ عَبْدِ الرَّحْمَنِ بْنِ يَزِيدَ ، عَنْ عَلْقَمَةَ ، عَنْ عَبْدِ اللَّهِ قَالَ : كُنَّا نَتَحَدَّثُ أَنَّ أَفْضَلَ أَهْلِ الْمَدِينَةِ عَلِيُّ بْنُ أَبِي طَالِبٍ.
यानि ‘सय्यदना अब्दुल्ला बिन मसूद رضي الله عنه ने फरमाया- हम अहले-ए-मदीना में सबसे अफजल सय्यदना अली رضي الله عنه को समझते थे।’

इमाम अहमद बिन हंबल رضي الله عنه ने अपने इसी किताब में फिर आगे रकम नंबर 1097 के तहत रिवायत नकल किया है कि-
حَدَّثَنَا عَبْدُ اللَّهِ قَالَ : حَدَّثَنِي جَدِّي قثنا أَبُو قَطَنٍ قثنا شُعْبَةُ ، عَنْ أَبِي إِسْحَاقَ ، عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ يَزِيدَ ، عَنْ عَلْقَمَةَ ، عَنْ عَبْدِ اللَّهِ ، وَهُوَ ابْنُ مَسْعُودٍ ، قَالَ : كُنَّا نَتَحَدَّثُ أَنَّ أَفْضَلَ أَهْلِ الْمَدِينَةِ عَلِيُّ بْنُ أَبِي طَالِبٍ.
حدثنا عبد الله قال : حدثني جدي، قثنا أبو قطن، قثنا شعبة، عن أبي إسحاق، عن عبد الله بن يزيد، عن علقمة عن عبد الله وهو ابن مسعود قال: كنا نتحدث أن أفضل أهل المدينة علي بن أبي طالب.
यानि ‘हजरत अब्दुल्लाह बिन मसूद رضي الله عنه ने फरमाया- हम अहले-ए-मदीना में सबसे अफजल सय्यदना अली رضي الله عنه को समझते थे|
‘फजाएल ए सहाबा की इन दोनों हदीसों की सनद सहीह है,
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अब्दुल हक़ मुहद्दिस देहलवी ने तकमील-उल-ईमान में सफा नं 146 पर लिखते हैं कि-
“अहले सुन्नत का इस बात पर इत्तेफाक और इजमा है कि तमाम सहाबा में अबू बकर व उमर رضي الله عنهم  को तकद्दुम व अफजलियत हासिल है। इनके दरमियान रिआयत ए तरतीब में कोई इख्तिलाफी मुआमला नहीं है।
लेकिन बआज़ फ़ुक़्हा ओ मुहद्दिसीन ने सरह  कसीदह इमालियह में यह मन्क़ूल है कि खुलफाए-अरबा की अफजलियत, औलादे पैगंबर के अलावा- के साथ मख्शूश है।”

कहने का मतलब तमाम सहाबा رضي الله عنهم में सबसे अफजल इन्हीं बुजुर्गों (अबू बकर, उमर رضي الله عنهم. वगैरह) की हस्ती है मगर इन सबकी अफजलियत अहले बैत رضي الله عنهم यानि औलादे पैगंबर ﷺ के बाद आती है यानि सबसे अफजल अहले बैत رضي الله عنهم ही हैं।
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इमाम इब्ने हज़र मक़्की ने सवायके-मुहर्रिका में हज़रत इब्ने उमर رضي الله عنه से नकल किया है कि नबी करीम ﷺ ने फ़रमाया-
أول من أشفع له يوم القيامة من امتي اهل بيتي ، ثم الاقرب فالاقرب من قريش ، ثم من آمن بي واتبعني من اليمن ، ثم من سائر العرب ، ثم الاعاجم ، ومن اشفع له أولا أفضل.
यानि “क़यामत के रोज मैं सबसे पहले अपनी उम्मत में से अपने अहले-बैत رضي الله عنهم की शिफाआत करुंगा, फिर कुरैश में से करीब-तरीन रिश्तेदारों की फिर अंसार की फिर उन लोगों की जो मुझपर ईमान लाएं और अहले-यमन में से जिन्होंने मेरी इत्तेबा की फिर बाकी अरबों की फिर बाकी लोगों की और जिसकी मैं पहले शिफारिश करुंगा वो अफजल होगा।”          –
सवायके-मुहर्रिका सफा 435

हजरत अहमद रजा खांन फाजिले बरेलवी ने फतावा रिजविया के जिल्द नं: 23 में सफा नं: 233 पर लिखा है-
नबी करीम ﷺ  कयामत में सबसे पहले अहले बैत رضي الله عنهم  की सिफाआत करेंगे और जिसकी सिफाआत पहले हो वही अफजल है,,
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इमाम काज़ी अबू बकर अल बाक़लानी رضي الله عنه [मतवफ्फह 403 हिजरी] ने ‘मनाकिब अइम्मा ए अरबा’ में रकम नंबर 351 के तहत लिखते हैं कि-
” والقَوْلُ بِتَفْضِيل عَليٍّ رِضْوَانُ الله عنه مَشْهُورٌ عِنْدَ كَثِيرٍ مِنَ الصَّحَابَةِ كالذي يَرْوِي عن عَبْدَ الله بن عَبَّاس وحُذَيْفَة بن اليمان وعمار وجابر بن عبدالله وأبي الهيثم بن التّيهان وغيرِهم، وإنْ كانَتْ الرِوَايَةُ في تفضيل أبي بكرٍ أشهر عند أصْحَاب الحَدِيث..”

यानि ‘और मौला अली رضي الله عنه की अफ़ज़लियत का कौल कसीर सहाबा किराम रिजवानुल्लाह अलैहिम अजमआईन में मशहूर था जैसा कि अब्दुल्ला बिन अब्बास, हुजैफा बिन यमान, अम्मार बिन यासिर, जाबिर बिन अब्दुल्लाह, अबू हैसिम बिन तैहान رضي الله عنهم व बाकी लोगों से मरवी है।
और जहां तक ताल्लुक रहा अबू बकर رضي الله عنه की अफजलियत का तो यह कौल असहाब उल हदीस (यानि मुहद्दिसीन) में ज्यादा मशहूर है।’
                       – सफा नंबर 294

फिर रकम नंबर 369 के तहत लिखते हैं कि-
فكذلِكَ قد رَوَى عن عَبدِ الله بَنْ عَباس والحَسَن بَنْ عَلي وأُبَيّ وزَيْدِ وعَمَّارَ بَنْ يَاسر، وسلمان الفارسي، وجَابِرَ ابْنِ عبد الله ، وأبي الهَيْثم بن التّيهان الأنصاري، وحذيفة بن اليمان، وعمرو ابن الحمق، وأبي سعيد الخُذري، وغيرهم من الصحابةِ رَضِيَ الله عنهم، كانوا يقولون: إِنَّ عَلياً خَيْرُ البَشَرِ ، وخَيْرُ النَّاسِ بعد رسول الله، وأعْلَمُهم، وأوَّلُهم إسلاماً، وأحبهم إلى رسول الله ، إلى نَظَائِرِ هذه، فيَجِبُ دَلالَهُ قَوْلِهِم على تَفْضِيله.

यानि ‘अब्दुल्ला बिन अब्बास, हसन बिन अली, अबू दरदा, ज़ैद बिन अरक़म, अम्मार बिन यासिर, सलमान फारसी, जाबिर बिन अब्दुल्ला, अबू हैसिम बिन तैहान, हुजैफा बिन यमान, अम्र बिन अल हमक़, अबू साईद खुदरी और दीगर सहाबा किराम رضي الله عنهم   से रिवायत किया गया है कि इन्होंने फरमाया- अली رضي الله عنه  दर-हक़ीकत खैरुल-बसर (इंसानों में सबसे बेहतरीन शख्स) और रसूल ए खुदा ﷺ के बाद लोगों में सबसे बेहतर हैं और लोगों में सबसे ज्यादा इल्म रखने वाले और सबसे पहले इस्लाम लाने वाले और रसूल-अल्लाह ﷺ  के नजदीक सबसे ज्यादा महबूब हैं।’
         – सफा नंबर 294.

फिर रकम नंबर 617 के तहत लिखते हैं कि-
“وقد روى أن قوماً من الصحابة كانوا يذهبون إلى تفضيل على على أبي بكر..”

यानि ‘नि:संदेह (बिना किसी शक ओ शुबह) के सहाबा किराम की एक जमाआत हजरत अली رضي الله عنه को हजरत अबू बकर رضي الله عنه  पर तफ़्ज़ील का मज़हब रखती थी।’
           – सफा नंबर 471
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