
*हलाल रिज़्क ओर किरदार*
*حلال رزق اور کردار*
हलाल रिज़्क और किरदार – ये दो नहीं, एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।
जिसका लुक्मा हलाल, उसका किरदार हलाल।
जिसका लुक्मा हराम, उसका किरदार कभी आला नहीं हो सकता।
1. हलाल रिज़्क क्या है?
लोग समझते हैं – बस सूद न खाओ, रिश्वत न खाओ तो हलाल हो गया।
नहीं।
तरीकत में हलाल की 3 शर्तें हैं –
*पहला – कमाई हलाल हो*
बेईमानी, धोखा, मिलावट, सूद, रिश्वत, किसी का हक मारना – ये सब हराम।
*दूसरा – नियत हलाल हो*
कमा रहे हो तो नियत क्या है? दिखावा? लोगों पर रौब? या अल्लाह ने कहा – कमाओ ताकि मेरे बंदों का बोझ न बनो, अपने बच्चों को हलाल खिलाओ।
हुजूर ﷺ ने फरमाया – *सबसे बेहतर कमाई आदमी के अपने हाथ की कमाई है।*
*तीसरा – शुक्र हलाल हो*
कमा कर अल्लाह को भूल गए तो वो रिज़्क वबाल बन गया। हलाल रिज़्क वो है जो अल्लाह के करीब करे।
2. हलाल रिज़्क का किरदार पर असर
बुजुर्ग फरमाते हैं –
> *जैसा खाओगे अन्न, वैसा होगा मन।*
40 दिन हराम खाने से दिल सियाह हो जाता है। दुआ कुबूल नहीं होती।
हुजूर ﷺ ने फरमाया – एक शख्स लंबे सफर में, परेशान हाल, हाथ उठा कर दुआ करता है – या रब, या रब। पर उसका खाना हराम, पीना हराम, कपड़ा हराम, तो उसकी दुआ कैसे कुबूल हो?
और जिसका लुक्मा हलाल –
उसकी आंखों में हया आती है।
जुबान पर सच आता है।
दिल में रहम आता है।
नमाज में खुशू आता है।
3. किरदार क्या है?
किरदार – नमाज-रोजे का नाम नहीं साहब।।
किरदार वो है जो तन्हाई में हो।
*किरदार 4 चीज़ों का नाम है -*
1. *जुबान का किरदार* – सच बोलना, गीबत न करना, वादा पूरा करना।
2. *आंख का किरदार* – हराम से बचना, किसी को हकीर न समझना।
3. *हाथ का किरदार* – किसी का हक न मारना, जुल्म न करना।
4. *दिल का किरदार* – कीना न रखना, हसद न करना, सबके लिए खैर चाहना।
हुजूर ﷺ से पूछा – सबसे अच्छा मुसलमान कौन? फरमाया – *जिसकी जुबान और हाथ से दूसरा मुसलमान महफूज रहे।*
आखिरी बात – निचोड़
साहब, याद रखें –
*रिज़्क रूह की गिजा है, किरदार उस गिजा का असर है।*
हराम रिज़्क से कभी वली नहीं बना।
हलाल रिज़्क से ही औलिया बने हैं।
हजरत बायजीद बस्तामी की माँ ने 40 साल तक एक भी लुक्मा मुश्तबह नहीं खाया, तब जाकर बायजीद पैदा हुआ।
इसलिए फकीर कहते हैं –
> *लुक्मा दुरुस्त कर, सब कुछ दुरुस्त हो जाएगा।*
आपका लुक्मा हलाल, तो आपकी नस्ल आला, आपकी दुआ आला, आपका विसाल आला।

