अना, तकब्बुर और बुग्ज़

*अना, तकब्बुर और बुग्ज़* – ये तीनों रूह के सबसे बड़े रोग हैं। इनके रहते हुए आदमी कभी वली नहीं बन सकता, चाहे जितनी इबादत कर ले।

हमारे चिश्ती निज़ामी सिलसिले में इनको यूं समझाया जाता है:

*1. अना (मैं) – Ego*
ये कहता है “मैं हूँ”।
जबकि तसव्वुफ़ का पहला सबक है *”तू नहीं, वो है”* – फना।

– अना इंसान को सजदे से रोकती है। शैतान ने भी यही कहा था – _अना खैरुम मिनहु_ – मैं इससे बेहतर हूँ।
– इलाज: खिदमत-ए-खल्क। लंगर उठाना, जूते सीधे करना, खुद को सबसे छोटा समझना। हजरत निज़ामुद्दीन औलिया फरमाते हैं – दरवेश वो है जो खुद को सबसे कमतर समझे।

*2. तकब्बुर (घमंड)*
अना का बड़ा भाई है तकब्बुर। अना दिल में पैदा होती है, तकब्बुर ज़ाहिर में दिखती है।

– मेरे मुर्शिद ﷺ ने फरमाया – जिसके दिल में राई के दाने बराबर भी तकब्बुर होगा वो जन्नत में दाखिल न होगा।
– तसव्वुफ़ में दो चादरें हैं – एक इज़्ज़त की, एक अज़मत की। दोनों सिर्फ अल्लाह की हैं। बंदा जब उसे ओढ़ने की कोशिश करता है तो गिर जाता है।           
– इलाज: अपनी औकात को याद रखना – मिट्टी से बना है, मिट्टी में जाना है

*3. बुग्ज़ (कीना / नफरत) – Hatred*
ये सबसे खतरनाक है। अना और तकब्बुर अल्लाह से दूर करते हैं, बुग्ज़ मखलूक से दूर करता है। 
चिश्ती निजामी सिलसिला तो है ही मोहब्बत का। ख्वाजा गरीब नवाज़ ने फरमाया – दुश्मन से भी मोहब्बत से पेश आओ!! 
– जिसके दिल में बुग्ज़ है, उसके दिल में नूर-ए-मोहम्मदी ﷺ नहीं ठहरता। क्योंकि वो नूर तो रहमत है, और रहमत में नफरत की जगह नहीं!!

इलाज: जिसके लिए दिल में बुग्ज़ हो, उसके हक़ में दुआ करना। उसको तोहफा देना। दिल खुद साफ हो जाएगा।

*खुलासा:*

तसव्वुफ़ = *अना को मिटाना, तकब्बुर को तोड़ना, बुग्ज़ को मोहब्बत से बदलना।*

जब तक ये तीनों निकलेंगे नहीं, वो एक आंसू-ए-नदामत पैदा नहीं होगा जिसकी आप बात करते हैं।

अना गई तो मैं गया, मैं गया तो वो मौजूद रहा!!

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