
अल्लाह तआला ने हर नबी की ज़ुर्रियत को उसके अपने सल्ब में रखा और मेरी जुर्रियत को अली के सल्ब में रखा है।
“जनाब रसूल अकरम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम का इरशाद मुबारक है के अली मेरे नसब से हैं, जिसने अली को महबूब रखा उसने मुझे महबूब रखा, जिसने अली से बुग्ज़ रखा पस तहक़ीक़ उसने मुझसे बुज़ रखा”।
बहवालाः (1) मनाक़िबे अली इब्ने अबि तालिब, सफ़हा: 49, 109 (2) यनाबि’-उल-मवद्दाह, सफ़हा: 266 (3) सवाएक़े मुहर्रक़ा, सफ़हाः 47 (4) रियाजुल नज़राह, जिल्दः 2, सफ़हा: 167 (5) मिज़ानुल-ऐतेदाल, जिल्दः 2, सफ़हाः 116 (6) लिसानुल-मिज़ान, जिल्दः 3, सफ़हा: 429 |
हज़रत मोहम्मद इब्ने जा’फ़र तैय्यार रिवायत फरमाते हैं जब मेरे वालिद बुज़ुर्गवार हज़रत जा’फ़र तैय्यार की वफ़ात हुई तो हुजूर मोहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम हमारे घर तशरीफ़ लाए और मेरे और मेरे भाई के सर पर दस्ते शफ़्क़त फेरा और हमसे ता’ज़ियत फरमाई। यूँ ही जब तीसरा दिन हुआ तो आप ने हमसे सोग का लिबास उतरवाया और हमारे हक़ में दुआ फरमाई और बाद अज़ दुआ आप ने फरमाया के मोहम्मद इब्ने जा’ फ़र तैय्यार मेरे चचा अबु तालिब का हम शक्ल है इसलिए मुझे प्यारा है। हज़रत मोहम्मद इब्ने जा’फ़र तैय्यार हज़रत अली अलैहिस्सलाम के दामाद भी थे। आप * का निकाह हज़रत कुल्सूम बिन्ते हज़रत अली से हुआ था।
बहवालाः मजालिसुल-मो’मेनीन, मुसन्निफ़ शहीद सालिस, सफ़हा: 330 |
तर्जुमाः हज़रत मोहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम ने फरमाया के मा-सिवाए मेरे नसब के क़यामत के दिन हर किसी का नसब मुन्क़तअ हो जाएगा।
बहवालाः (1) सवाएने मुहर्रक़ा, सफ़हाः 186 (2) यनाबि’-उल-मवद्दह, सफ़हाः 267 (3) हुलिया-तुल-औलिया’, जिल्दः 7, सफ़हा: 314 (4) मुस्तदरक, जिल्दः 3, सफ़हा: 158 (5) अनवारे ज़हरा’, सफ़हा: 134 (6) मनाक़िबे फ़ातेमा ज़हरा’, मुसन्निफ़ डॉ. ताहीर-उल-क़ादरी, सफ़हा: 58 (7) वसाएल, जिल्दः 14, सफ़हा: 12 (8) अहमद बिन हंबल, फ़ज़ाएलुल-सहाबा, जिल्दः 2, सफ़हा: 625-626 (9) रक़म 4864, तबरानी अल-मुअज्जम-अल-औसत, जिल्द 6, सफ़हा: 357 (10) दैलमी अल फ़िरदौस बहासूर-अल-ख़िताब, जिल्द 3, सफ़हा: 355 (11) कंजुल-उम्माल जिल्दः 1, सफ़हा: 98 |
मुन्दर्जा बाला कुतुब के अलावा बेशुमार कुतुब में इस हदीस को तवातर के साथ दर्ज किया गया है। जिसका सबूत राक़म के पास मौजूद है। इस हदीस के मशहूर रावियान में जो नाम लिखे जाते हैं वोह क़ारइन की नज़र करता हूँ। हज़रत अब्दुल्लाह इब्ने अब्बास, अब्दुल्लाह इब्ने जुबैर, हज़रत उमर इब्ने ख़त्ताब।
जामेअ-उल-अख़बार में हज़रत पैग़म्बर अकरम ने अपनी ज़ुर्रियत की ज़ियारत, मुलाक़ात और उनकी क़ब्रों की ज़ियारत के बारे में फरमाया है के जिस किसी ने भी मेरी औलाद की उनकी ज़िन्दगी में या मरने के बाद ज़ियारत की वोह उस शख़्स की तरह है जिसने मेरी ज़ियारत की हो। बहरहाल उसे बख़्श दिया जाएगा।
हज़रत रसूल अकरम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम की माअरूफ़ हदीस जो मुसलमानों की तमाम कुतुब में मौजूद है आप फरमाते हैं के “मेरी नेक औलाद का एहतेराम अल्लाह के लिए और मेरी गैर सालेह औलाद की इज़्ज़त मेरे लिए करो”।
बहवालाः जामेअ-उल-अख़बार, सफ़हा: 393 |
हज़रत रसूल अकरम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम ने फरमाया जो कोई भी चाहता है के एसा अमल अंजाम दे ताके मेरे नज़दीक मुक़र्रब हो और उस अमल की वजह से वोह मेरे ऊपर हक़ रखता हो के मैं रोज़े क़यामत उसकी शफ़ाअत करूँ तो उसे चाहिए के मेरी जुर्रियत की ख़िदमत करे और उनके दिलों को खुश करे।
बहवालाः अमाली, सफ़हा: 461, शैख़ सद्दुक़ अलैहिर्रहमा |
हाफ़िज़ मोहम्मद इब्ने महमूद नजार ने अपनी सनद के साथ अस्मा’ बिन्ते उमैस से रिवायत की है के हज़रत फ़ातेमा ने मुझे बताया के मैंने जनाब अमीरूल मो’ मेनीन अली अलैहिस्सलाम को शादी की पहली रात को देखा के वोह ज़मीन से गुफ्तगु फरमा रहे हैं और ज़मीन आप अलैहिस्सलाम के सवालों के जवाब दे रही है। सुबह को मैंने यह वाक़ेआ अपने वालिद बुज़ुर्गवार से अर्ज किया तो आप (सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम) फौरन सजदा ए शुक्र बजा लाए और बहुत देर तलक हालते सजदा में रहे। उसके बाद मुझसे फरमाया ऐ फ़ातेमा ! मुबारक हो तुम्हारी नस्ल पाक हो गई, अल्लाह ने तुम्हारे शौहर को तमाम मख़्लूक़ात से अफ़ज़ल किया है। और ज़मीन को हुक्म दिया है के रूए ज़मीन पर मशरिक़ व मग़रिब में जो कुछ रौनुमा हो उससे अली को मुतलअ करती रहे।
बहवालाः कश्फुल-गुम्माह और बहारूल-अनवार, जिल्दः 3, मुतरजम, सफ़हाः 165 |
हज़रत अली से रिवायत है के जब हम मक्का से वापस होने लगे तो अचानक हज़रत हम्ज़ा की बेटी ने मुझे पीछे से पुकारा । ऐ चचा! हज़रत अली, फरमाते हैं के मैं फौरन पलटा और वहाँ पहुँच कर उसे गोद में उठा लिया और फिर बच्ची को हज़रत फ़ातेमा की तरफ बढ़ाते हुए फरमाया के यह लो हज़रत हम्ज़ा की बेटी को, हज़रत फ़ातेमा ने बच्ची को गोद में उठा लिया। उसके बाद हज़रत हम्ज़ा हज़रत अली, हज़रत जा’फ़र तैय्यार और हज़रत अक़ील * की बच्ची की परवरिश में एक दूसरे से सबक़त ले जाने की कोशिश करने लगे।
हज़रत अली ने फरमाया के इस बच्ची की परवरिश मैं करूँगा क्योंके यह मेरे चचा शहीद की बेटी है। हज़रत जा’फ़र तैय्यार की परवरिश करूँगा क्योंके यह मेरे चचा शहीद ने फरमाया के इस बच्ची की बेटी तो है ही मगर इस बच्ची से मेरा एक और भी रिश्ता है के इसकी ख़ाला मेरी बीवी है। इसी तरह हज़रत अक़ील ने फरमाया के क्या अच्छा होता अगर आप दोनों भाई इजाज़त
दें तो इस बच्ची की परवरिश मैं करूँ। इस सुरते हाल को मद्दे नज़र रखते हुए तीनों भाइयों में यह तय पाया के हज़रत मोहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम की ख़िदमत में हाज़िर होकर अपना मस’ला आप के हुजूर पेश करते हैं जो फ़ैसला फरमाएँगे हमें क़बूल होगा। जब यह मुआमला हुजूर अकरम ख़िदमत में पेश किया गया तो आप ने हज़रत जा’फ़र तैय्यार फ़ैसला फरमाया और साथ फरमाया के चुके हज़रत जा’फ़र तैय्यार बच्ची की ख़ाला है जो वालेदा का दर्जा रखती है। की के हक़ में के घर इस
हज़रत रसूल अकरम ने हज़रत अली से फरमाया के “मैं तुझ से हूँ और तु मुझसे है”, हज़रत जा’फ़र तैय्यार से फरमाया “तु तीनत और ख़ल्क़ में मेरी मानिन्द है” और हज़रत अक़ील से फरमाया के तु अन्साबे अरब का आलिम है और हमारा अज़ीज़तरीन भाई है।
बहवाला: ख़साएसे निसाइ फ़ि-मनाक़िबे मुर्तज़वी मुतरजम नासिरे मजलिस तहफ़्फ़ुज़े नामूसे अहलेबैत, कामराहअटक, हदीसः 69, सफ़हा: 58 |

