अर-रहीकुल मख़्तूम  पार्ट 87 मक्का की विजय पार्ट 05

अंसार के अंदेशे

जब अल्लाह के रसूल सल्ल० मक्का विजय पूरी कर चुके—और मालूम है कि यही आपका शहर, आपका जन्म स्थान और वतन था—तो अंसार ने आपस में कहा, क्या ख्याल है अब अल्लाह ने रसूल सल्ल० को आपकी अपनी धरती और आपका अपना शहर जिता दिया है, तो आप यही ठहरेंगे ? उस वक़्त आप सफ़ा पर हाथ उठाए दुआ फ़रमा रहे थे।

दुआ से फ़ारिग़ हुए तो मालूम किया, तुम लोगों ने क्या बात की है ?

उन्होंने कहा, कुछ नहीं, ऐ अल्लाह के रसूल सल्ल० ! मगर आपने आग्रह किया तो अन्त में उन लोगों ने बतला दिया ।

आपने फ़रमाया, ख़ुदा की पनाह, अब ज़िंदगी और मौत तुम्हारे साथ है। बैअत

जब अल्लाह ने रसूलुल्लाह सल्ल० और मुसलमानों को मक्का की जीत दे दी, तो मक्का वालों पर हक़ स्पष्ट हो गया और वह जान गए कि इस्लाम के सिवा कामियाबी का कोई रास्ता नहीं, इसलिए वे इस्लाम के ताबेदार बनते हुए बैअत के लिए जमा हो गए। अल्लाह के रसूल सल्ल० ने सफ़ा पर बैठकर लोगों से बैअत लेनी शुरू की। हज़रत उमर बिन खत्ताब रज़ि० आपसे नीचे थे 1 और लोगों से अहद व पैमान ले रहे थे। लोगों ने हुज़ूर सल्ल० से बैअत की कि जहां तक हो सकेगा, आपकी बात सुनेंगे और मानेंगे।

इस मौक़े पर तफ्सीरे मदारिक में यह रिवायत आई है कि जब नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम मर्दों की बैअत से फ़ारिग़ हो चुके, तो वहीं सफ़ा

1. इन रिवायतों के लिए देखिए सहीह बुखारी, 1/22, 216, 247, 328, 329, 2/615,617, सहीह मुस्लिम 1/437, 438, 439, इब्ने हिशाम, 2/415, 416, सुनन अबी दाऊद 2/276

ही पर औरतों से बैअत लेनी शुरू की। हज़रत उमर रजि० आपसे नीचे बैठे थे और आपके हुक्म पर औरतों से बैअत ले रहे थे और उन्हें आपकी बातें पहुंचा रहे थे।

इसी बीच अबू सुफियान की बीवी हिन्द बिन्त उत्बा भेस बदलकर आई। असल में हज़रत हमज़ा की लाश के साथ उसने जो हरकत की थी, उसकी वजह से वह डरी हुई थी कि कहीं अल्लाह के रसूल सल्ल० उसे पहचान न लें।

इधर अल्लाह के रसूल सल्ल० ने (बैअत शुरू की, तो) फ़रमाया, मैं तुमसे इस बात पर बैअत लेता हूं कि अल्लाह के साथ किसी को शरीक न करोगी। हज़रत उमर रज़ि० ने (यही बात दोहराते हुए) औरतों से इस बात पर बैअत ली कि वह अल्लाह के साथ किसी को शरीक न करेंगी।

फिर अल्लाह के रसूल सल्ल० ने फ़रमाया और न चोरी करोगी।

इस पर हिन्दा बोल उठी, अबू सुफ़ियान कंजूस आदमी है। अगर मैं उसके माल में से कुछ ले लूं तो ?

अबू सुफ़ियान ने (जो वहीं मौजूद थे) कहा, तुम जो कुछ ले लो, वह तुम्हारे लिए हलाल हैं।

रसूलुल्लाह सल्ल० मुस्कराने लगे। आपने हिन्दा को पहचान लिया, फ़रमाया, अच्छा… तो तुम हो हिन्दा ?

वह बोली, हां, ऐ अल्लाह के नबी सल्ल० ! जो कुछ गुज़र चुका है, उसे माफ़ फ़रमा दीजिए। अल्लाह आपको माफ़ फ़रमाए ।

इसके बाद आपने फ़रमाया, ‘और ज़िना न करोगी।’

इस पर हिन्दा ने कहा, भला कहीं हुर्रा (आज़ाद औरत) भी ज़िना करती है। फिर आपने फ़रमाया, और अपनी औलाद को क़त्ल न करोगी ।

हिन्दा ने कहा, हमने तो बचपन में उन्हें पाला-पोसा, लेकिन बड़े होने पर आप लोगों ने उन्हें क़त्ल कर दिया। इसलिए आप और वे ही बेहतर जानें। याद रहे कि हिन्दा का बेटा हंज़ला बिन अबी सुफ़ियान बद्र के दिन क़त्ल किया गया था । यह सुनकर हज़रत उमर रज़ि० हंसते-हंसते चित लेट गए और अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम भी मुस्कराए। इसके बाद आपने फ़रमाया, और कोई बोहतान न गढ़ोगी।

हिन्दा ने कहा, अल्लाह की क़सम ! बोहतान बड़ी बुरी बात है और आप हमें वाक़ई हिदायत और अच्छे अख़्लाक़ का हुक्म देते हैं।

फिर आपने फ़रमाया, और किसी भली बात में रसूल की नाफरमानी न करोगी।

हिन्दा ने कहा, अल्लाह की कसम हम अपनी इस मज्लिस में अपने दिलों के अन्दर यह बात लेकर नहीं बैठी हैं कि आपकी नाफरमानी भी करेंगी।

फिर वापस होकर हिन्दा ने अपना बुत तोड़ दिया। वह उसे तोड़ती जा रही थी और कहती जा रही थी, हम तेरे ताल्लुक से धोखे में थे।

सहीह बुखारी में है कि हिन्द बिन्त उत्बा आई और बोली, ऐ अल्लाह के रसूल ! इस धरती पर कोई भी खेमे वाले नहीं थे कि जिनका जलील होना आपके खेमे वालों के ज़लील होने से बढ़कर मुझे पसन्द रहा हो, लेकिन आज यह हाल है कि धरती पर कोई खेमे वाले नहीं हैं, जिनका प्रिय होना आपके खेमे वालों के प्रिय होने से बढ़कर मुझे पसन्द हो। आपने फ़रमाया, उस ज्ञात की क़सम, जिसके हाथ में मेरी जान है, अभी और अभी ।

हिन्दा ने कहा, ऐ अल्लाह के रसूल ! अबू सुफ़ियान कंजूस आदमी है, तो क्या मुझ पर कोई हरज है कि उसके माल से अपने घर वालों को खिलाऊं। आपने फ़रमाया, चलन के मुताबिक़ ले लेने में कोई हरज नहीं है।2

मक्का में नबी सल्ल० का निवास और काम

मक्का में अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने 19 दिन निवास किया। उस बीच आप इस्लामी चिह्नों को नवीन करते रहे और लोगों को हिदायत व तक़्वा की रहनुमाई करते रहे। उन्हीं दिनों आपके हुक्म से हज़रत अबू उसैद खुज़ाई ने नए सिरे से हरम-सीमाओं के खम्बे गाड़े। आपने इस्लाम की दावत और मक्का के आस-पास बुतों को तोड़ने के लिए बहुत से सराया भी रवाना किए और इस तरह सारे बुत तोड़ डाले गए। आपके मुनादी ने मक्का में एलान किया कि जो व्यक्ति अल्लाह और आखिरत के दिन पर ईमान रखता हो, वह अपने घर में कोई बुत न छोड़े, बल्कि उसे तोड़ डाले।

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