
मुश्रेकीने मक्का व कुफ्फ़ार के बेहूदा और बातिल ख़्यालात को रद्द करने के लिए रसूल अक़दस पर नुज़ूले सुरह अल-कौसर
जब इस्लाम की दा’वत व तब्लीग़ का आग़ाज़ हुआ तो मुश्रेकीन व कुफ़्फ़ार ने हुजूर अकरम और आप के जाँनिसारों पर बे-पनाह जुल्म व सितम ढाए, तरह-तरह की अज़ियतें पहुँचाई और उस पर भी बस ना किया बल्के पैग़ामे हिदायत को रोकने के लिए बे-शुमार गैर अख़लाक़ी साज़िशें भी कीं। दुश्मनाने इस्लाम की नफ़रतें व गैज़ो-ग़ज़ब उनको हमेशा मुतहर्रिक रखती थीं, मगर दूसरी जानिब अज़्मे नबुव्वत और उसकी इत्तेबाअ व इताअत में जज़्बा ए जाँफ़रोशी के साथ हर क़िस्म के बातिल कुव्वत को शिकस्त देने का अहद किये हुए हक़ व सदाक़त के राही मंज़िल की तरफ गामज़न थे। एसे में उन ज़ालिमों के दिल को क़रार तब आया जब सैय्यदुल मुर्सलीन रहमतुंल्लिल-आलमीन के साहबज़ादे हज़रत अब्दुल्लाह अलैहिस्सलाम का विसाल हुआ। उस मौक़े पर दुश्मनाने इस्लाम और ख़ासकर आस बिन वाएल जैसे बेहया शख़्स ने आप को (नऊज़ोबिल्लाह) “अबतर” कहना शुर ूकर दिया उनके जंग आलूद दिलों में यह ख़्याल पैदा हुआ के आप की नरीना (लड़का) औलाद ना रही अब इस मुक़द्दस मिशन को आप के बाद आगे बढ़ाने वाला कोई ना होगा और दीन की इशाअत व तब्लीग़ का नामो-निशान ना रहेगा। मगर ख़ुदावन्द करीम ने उन तमाम ज़ालिमों की ख़्वाहिशों को नेस्त-ओ-नाबूद कर दिया और आले रसूल पाक की हसन व हुसैन की सुरत में एक एसी नवीद सुनाई जो उन ज़ालिमों के लिए बेहद नागुज़ीर थी, उन्हें क्या ख़बर थी के,
नूरे ख़ुदा है कुन की हरकत पे खन्दाज़न, फुंकों से यह चराग़ बुझाया ना जाएगा
अबतर उसे कहा जाता है जो मुन्क़तअ ए नस्ल हो यानी जिसकी आगे नस्ल ना चल सके (यानी उसकी औलाद में सिर्फ लड़कियाँ ही हों)। इसलिए मुश्रेकीन व कुफ़्फ़ार आप को (नऊज़ोबिल्लाह) मुन्क़तअ-उल-नस्ल होने का ता’ना देते। गैरते ख़ुदावन्दी को जलाल आया और रब करीम ने अपने महबूब रसूल को तसल्ली व तश्फ़ी देने के लिए, मुश्रेकीने मक्का व कुफ़्फ़ार के बेहूदा और बातिल ख्यालात को रद्द करने के लिए अल्लाह ने अपने रसूल अकरम पर सुरह अल-कौसर नाज़िल फरमाई।
बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम
إِنَّا أَعْطَيْنَاكَ الْكَوْثَرَ فَصَلِّ لِرَبِّكَ وَالْحَرُ إِنْ شَانِئَكَ هُوَ الْأَبْتَرُ
इन्ना अ’तयनाकल-कौसर ० फ़सल्ले लेरब्बेका वन-हर ० इन्ना शाने’ अका होवल-अबतर ० (सुरह अल-कौसर)
बेशक हमने आपको (हर खैर व फ़ज़ीलत में) बे-इंतेहा कसरत बख़्शी है पस आप अपने रब के लिए नमाज़ पढ़ा करें और कुर्बानी दिया करें (यह हदीया ए तशक्कुर है) बेशक आपका दुश्मन ही बे-नस्ल और बेनाम-ओ-निशान होगा।
नोटः कौसर से मुराद हौज़े कौसर या नहरे जन्नत भी है और कुरआन और नबुव्वत व हिकमत भी, फ़ज़ाएल व मोअजेज़ात की कसरत या असहाब व इत्तेबाअ और उम्मत की कसरत भी मुराद ली गई है। रिफ़अते ज़िक्र और खुल्ने अज़ीम भी मुराद है और दुनिया व आख़िरत की नेअमत भी, नुसरते इलाहिया और कसरते फुतुहात भी मुराद हैं और रोज़े क़यामत मक़ामे महमूद और शफ़ाअते उज़्मा भी मुराद ली गई।
कौसर के माअने
मुफ़स्सिरीन ने कौसर के मुख्तलिफ़ माअने बयान किये हैं, मसलनः हौज़े-कौसर, दुनिया व आखिरत में खैर कसीर, रसूल अकरम की ज़ुर्रियत में कसरत, शिफ़ा।
यह तमाम माअने सही हैं और इनमें कोई तज़ाद भी नहीं पाया जाता है कुरआन मजीद अपने दामन में मुख्तलिफ़ माअने लिए हुए हैं। लेकिन इमाम जा’ फ़र सादीक़ अलैहिस्सलाम ने फरमाया के कौसर से मुराद हज़रते फ़ातेमा ज़हरा’ की औलाद के ज़रिये रसूले ख़ुदा की नस्ल कसीर का बाक़ी रहना है जिसका शुमार नामुम्किन है।
अहले सुन्नत के मुफस्सिर इमाम फ़ख़रूद्दीन राज़ी अपनी तफ़्सीर में रक़म तराज़ हैं के, कौसर से रसूले ख़ुदा की औलाद मुराद है और यह सुरह उन लोगों के जवाब में नाज़िल हुई जो रसूलल्लाह को बे-औलाद होने का ता’ना देते थे। चुनाँचे कौसर के माअने यह है के ख़ुदा अपने रसूल को ता-क़यामत बाक़ी रहने वाली नस्ल अता करेगा, यही वजह है के अहले बैत अलैहिस्सलाम को इतनी कसरत से (मज़्लूमाना) शहीद करने के बावजूद इनकी नस्ल में कमी नहीं हुई, लेकिन बनी उमैय्या के कोई आसार बाक़ी नहीं रहे।
इमाम बाक़र, इमाम सादीक़, इमाम मूसा काज़िम और नफ़्से ज़किया जैसे अफ़राद सब के सब नस्ल पैग़म्बर और इमाम रज़ा में शुमार होते हैं।

