
मनाक़िबे अहले बैत -: कुरान की रोशनी में :-अहले बैत की मुहब्बत हर मुसलमान पर फ़र्ज़ है क्योंकि मुहब्बते अहले बैत ईमान की जान और शर्ते ईमान है। उनकी मुहब्बत के बग़ैर किसी शख़्स के दिल में ईमान दाख़िल नहीं हो सकता। हदीस पाक में वारिद है रहमते दो आलम सल्लल्लाहु अलैह वसल्लम ने फ़रमाया इस्लाम की बुनियाद मेरी और मेरे अहले बैत की मुहब्बत है और हम तमाम मुसलमानों के लिये हुक्मे ख़ुदावन्दी है कि अहले बैत से मुहब्बत करो अहले बैत की मुहब्बत मुहब्बते रसूल है और मुहब्बते रसूल मुहब्बते ख़ुदा है।अहले बैत अतहार की शानो अज़मत व क़दरो मन्ज़िलत व कमालातो किरदार इन्तिहाई बुलन्द व बाला हैं। अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त ने इन्हें मख़सूस सिफ़ात और पाकीज़गी का आला तरीन नमूना बनाया और अज़ीम मरातिब से नवाज़ा। अहले बैत अतहार की फ़ज़ीलत में बेशुमार अहादीस मन्क़ूल हैं और इनकी शानो अज़मत में आयाते कुरआनी नाज़िल हुई हैं जिनमें बाज़ का तज़किरा हस्बे ज़ैल है।कुरान मजीद में इरशादे बारी तआला है–ऐ महबूब (सल्लल्लाहु अलैह वसल्लम) आप मुसलमानों से फ़रमा दीजिये कि मैं तबलीग़ पर तुमसे कोई बदला या सिला नहीं मांगता अलबत्ता मैं चाहता हूँ कि तुम मेरे क़राबतदारों से मुहब्बत करो। (सू०–शूरा–23)
वज़ाहतः- मजकूरा आयात में हुक्मे खुदावन्दी है कि ऐ
महबूब आप मुसलमानों से फरमां दीजिये कि ऐ लोगों मैने जो तुम पर मेहनत की ग़ारे हिरा में सज्दा रेज़ होकर आँसू बहाये और निहायत सख़्त मसाइबो आलाम बर्दास्त किये ओर तुम्हें तारीकियों से निकाल कर रोशन मकाम अता किया और तुम्हें गुमराहियों के अंधेरों से निजात देकर सिराते मुस्तकीम की राह दिखाई और मैने शिकम (मुबारक) पर पत्थर बाँधकर ख़न्दकें खोदीं मैदाने उहद और तॉयफ में अपने जिस्म (अतहर) पर ज़ख़्म खाये और तुम्हें जहन्नुम से बचाकर राहे जन्नत पर डाल दिया और तुम्हें जहालत व ज़िल्लत से बचाकर इज़्ज़त व इन्सानियत से हम किनार किया और तुम्हें दावते हक देकर तुम्हारी रहनुमाई की और ईमान से बहरेयाब किया।
इन तमाम एहसानात का मैं तुमसे कोई बदला या सिला नहीं माँगता मेरा अज्र तो मेरे रब के पास है और मुझे मेरा अज्र मेरा रब अता करेगा मैं तुमसे किसी अज्र का तालिब नहीं हूँ बल्कि मुझे तो तुम्हारे अज्र की फिक्र है जो तुम्हें मेरे क़ाबत दारों से मुहब्बत के बाइस मिलेगा मैं चाहता हूँ कि तुम मेरे अहले बैत से मुहब्बत करो इसी में तुम्हारी भलाई और बेहतरी है और दुनियाँ व आख़िरत में अज्रे अज़ीम का बाइस है अल्लाह तआला और उसके रसूल (हुजूर सल्लल्लाहु अलैह वसल्लम) की कुर्बत और ईमान में पुख़्तगी मेरे अहले बैत की मुहब्बत से हासिल होगी इसलिये मैं चाहता हूँ कि तुम मेरे अहले बैत से मुहब्बत करो।
तफासीर व अहादीस में है कि जब ये आयतनाज़िल हुई तो सहाबाकिराम (रज़िअल्लाहु तआला अन्हु) ने अर्ज किया या रसूलुल्लाह आपके क्राबत दार कौन हैं तो आप सल्लल्लाहु अलैह वसल्लम ने फ़रमाया हज़रत मौला अली, सइयदा फातिमा ज़हरा और इमाम हसन व इमाम हुसैन (अलैहिमुस्सलाम) ये मेरे क़ाबत
दार हैं इनसे मुहब्बत करो। (इमाम सना उल्ला पानी पती-तफसीर मज़हरी-8/420)
(इमाम जलालुद्दीन सयूती-दुर्रे मन्सूर-5/701)
(इमाम कुरतबी- तफ्सीर कुरतबी-8/415)
(इमाम फखरूद्दीन राज़ी- तफसीर कबीर-27/166)
(मजमउज़्ज़वाइद-7/103, 9/168)
इमाम तबरानी ने हज़रत अब्दुल्लाह बिन अब्बास से रिवायत नकल की है कि जब ये आयते मुबारका “ऐ महबूब आप फ़रमां दें कि मैं तुमसे इस (तबलीगे हक) का कुछ सिला नहीं चाहता सिवाय अहले क्राबत की मुहब्बत के” नाज़िल हुई तो सहाबाकिराम (रजिअल्लाहु तआला अन्हु) ने अर्ज किया या रसूलुल्लाह आपके क़ाबत दार कौन हैं जिनकी मुहब्बत हम पर वाजिब है तो आप सल्लल्लाहु अलैह वसल्लम ने फरमाया- हज़रत मौला अली, खातूने जन्नत सइयदा फातिमा ज़हरा और इमाम हसन व इमाम हुसैन (अलैहिमुस्सलाम) हैं। (मुअजम कबीर तबरानी-3/47,48)

