Year: 2021
बीबी ज़ैनब सलामुल्लाह अलैह जिनके बिना इमाम हुसैन की कुर्बानी कोई नहीं जान पाता


इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम और उनके घराने के मर्द तो कर्बला में शहीद हो गए थे, लेकिन ज़ैनब सलामुल्लाह अलैह के खुत्बा और अक्वाल ही थे जिन्होंने इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की कुर्बानी को लोगों के बीच पहुंचाया था.
मुहर्रम के मौके पर अक्सर इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम को याद किया जाता है. लगभग हर कोई इमाम हुसैन की शहादत की बात करता है लेकिन कर्बला की लड़ाई जो याजिद और उसकी सोच के खिलाफ लड़ी गई उसमे इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के खानदान के कई लोग कुर्बान हुए थे. उस लड़ाई में हिस्सा लिया था एक ऐसी शख्सियत ने जिसका नाम बा-अफसोस लोगो के दरमियान में उतना मश्हूर नहीं है.
ये नाम है इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की बहन जनाबे ज़ैनब सलामुल्लाह अलैह का. ये वही बीबी ज़ैनब हैं जो कर्बला के मारके मे एक लीडर बनकर उभरी थीं. अगर बीबी ज़ैनब न होतीं तो इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम को शायद सिर्फ एक ऐसे गाज़ी के रूप में याद किया जाता जिसने वक़्त के ज़ालिम राजा के खिलाफ जिहाद छेड़ा था.
इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम और उनके घराने के जवान तो कर्बला में शहीद हो गए थे, लेकिन बीबी ज़ैनब सलामुल्लाह अलैह के खिताब और अक्वाल ही थे जिन्होंने इमाम हुसैन की कुर्बानी को लोगों के बीच पहुंचाया था.
इमाम हुसैन अल की शहादत तो कर्बला के युद्ध में 680AD या 61 हिजरी (इस्लामिक कैलेंडर) के दसवें मुहर्रम में ही हो गई थी. इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने अपनी लड़ाई लड़ ली थी अब बीबी ज़ैनब सलामुल्लाह अलैह की बारी थी.

कौन थीं ज़ैनब?
सयैदा ज़ैनब बिन्त अली असल में पैगंबर मोहम्मद सलल्लाहू अलैही व सल्लम की नवासी थीं. पैगंबर अलैहिस्सलाम की बेटी फातिमा अलैहिस्सलाम की बेटी ज़ैनब. यानी इमाम हुसैन और इमाम हसन की हक़िक़ी बहन. अपने घराने के बाकी अफराद की तरह ही बीबी ज़ैनब सलामुल्लाह अलैह ने भी इस्लामिक इतिहास में अहम हिस्सा निभाया था. हज़रते ज़ैनब की शादी अब्दुल्लाह इब्न जाफर (मौला आली के भतीजे) से हुई थी और जब इमाम हुसैन अल ने याजिद-पलीद के खिलाफ लड़ाई छेड़ी थी तब बीबी ज़ैनब ने उनका साथ दिया था. बीबी ज़ैनब ही वो थीं जिन्होंने कर्बला में इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के एक बेटे ज़ैनुल अबीदिन अलैहिस्सलाम (Zain-ul Abidin) की जान बचाई थी और ऐसे इस्लामी इतिहास में इमाम हुसैन की नस्ल को जिंदा रखा था. बीबी ज़ैनब की शहादत के बाद उनका रौज़ा सीरिया के दमास्कस में बनाया गया.
इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की बहन बीबी सलामुल्लाह अलैह जैनब ने ही लोगों तक ये बात पहुंचाई थी कि कैसे याजिद के खिलाफ इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम को शहादत मिली और क्यों वो कोई गद्दार नहीं थे
कुफा में ज़ैनब के खुत्बात..
11वें मुहर्रम के दिन औरते, बच्चे और इमाम हुसैन का बेटे जैन उल अबीदिन याजिदी फौज ने कैद कर लिए गए थे और कुफा के गवर्नर इब्न ज़ियाद की अदालत में पेश किए जाने थे. कुफा वो शहर था जहां ज़ैनब और उनकी बहन उम्मे कुलसुम ने औरतों को कुरान की तालीम दी थी. पैगंबरे इस्लाम अलैहिस्सलाम की नवासी ज़ैनब अपने बाबा अली और भाई-बहनों के साथ इसी शहर में रही थीं.
इसी शहर में बंदी बनाकर जनाबे ज़ैनब को लाया गया. जैसे ही कारवां कुफा में पहुंचा वहां लोगों की भीड़ लग गई उन लोगों को देखने के लिए जिन्हें वक़्त की हुकुमत ने गद्दार साबित कर दिया था. कहा जाता है कि जिनकी मौत हुई थी कर्बला के युद्ध में उनका सिर लाने को कहा गया था और उस समय इमाम हुसैन और अली अब्बास (अलैहिमुस्सलाम) का सिर लिए ज़ैनब चली आ रही थीं.
उसी समय ज़ैनब ने अपना पहला खुत्बा दिया जब लोग उन्हें गद्दार समझ रहे थे. ज़ैनब की आवाज़ से लोगों की आवाज़ दब गई और ज़ैनब ने जोर से दहाड़ कर लोगों के बीच अपनी बात पहुंचाई. तब कुफ़ा के लोगो ने मह्सूस किया के ये लह्ज़ा मौला अली पाक का है जो उनकी बेटी की जुबां से निकल रहा है।
जो लोग गद्दारों की सज़ा का जश्न मना रहे थे वो भी ज़ारो क़तार अश्क बहाने लगे जब ज़ैनब ने अपना खिताब दिया और इमाम हुसैन की बात बताई.

क्या हुआ था गवर्नर की अदालत में?
जब अगले दिन गवर्नर की अदालत में पैगंबर का परिवार पहुंचा तो गवर्नर इब्न जियाद ने ज़ैनब को नहीं पहचाना. उनकी बदहवास हालत में भी वो बुलन्द हौसलों से भरी हुई थीं. उनके सामने इमाम हुसैन का कटा हुआ सिर रखा था. ज़ैनब की पहचान जानकर जब गवर्नर ने उनका मजाक उड़ाया तो ज़ैनब ने कहा कि गवर्नर ने खुद अपने पापों के कारण लानत ली है और उन्हें जल्द ही इसका पता चल जाएगा. ज़ैनब ने कहा कि वो खुशकिस्मत हैं कि वो मौला अली की बेटी हैं और रसूले पाक की नवासी और इमाम हुसैन की बहन जिसने शहादत हासिल की थी.

बीबी ज़ैनब का सफर
जब ज़ैनब और उनके कारवां को दमास्कस जाना पड़ा तब 750 मील की वो सर्दियों का सफर उन लोगों पर काफी भारी पड़ी. उन लोगों को लंबा रास्ता लेना पड़ा ताकि गद्दारों से बचा जा सके. तब ज़ैनब उनकी बहन और हुसैन के बेटे जैन उल अबीदिन पर कारवां में मरने वाले बच्चों को दफनाने और रोती बिलखती मांओं को संभालने की जिम्मेदारी थी.
उस दौर में ज़ैनब के भाषण लोगों में जज्बा भर देते थे और उनकी बहन और फातिमा कुब्रा (हुसैन की बेटी) भी लोगों को जागरुक करते थे. ज़ैनब ने हुसैन की कुर्बानी की कहानी लोगों तक पहुंचाई, वो जहां भी जाती लोगों को अपने दादा, पिता और भाई की कहानी सुनाती और साथ ही इब्न ज़ियाद की ज़ूल्म की दासताँ की भी बतातीं.
दमास्कस में पहुंचने के बाद उन्हें 72 घंटों तक बाज़ार के चौराहे पर खड़ा रखा गया. तब भी ज़ैनब ने दर्द भरा खुत्बा दिया और लोगों को बताया कि इमाम हुसैन ने किस तरह अपना कुर्बानी दी. और लोगों को ये बताया कि वो गद्दारों की जीत का जश्न नहीं मना रहे हैं वो तो इस्लाम असल पाक घराना है।
याजिद की अदालत..
कुफा से दमास्कस के रास्ते के बीच बीबी ज़ैनब और बाकी लोग कर्बला में अपने परिवार के शहीद लोगों का सिर देख रहे थे तो उन्हें बहुत रन्ज हो रहा था. उस समय जंग में जीतने वाली फौज हारने वाली फौज के लोगों का कटा हुआ सिर लेकर जाती थी और अपनी जीत का जश्न मनाती थी. याजिद की अदालत में भी इमाम हुसैन का कटा हुआ सिर ज़ैनब के सामने रखा था.
याजिद ने कई बड़े लोगों को बुलाया था ये देखने के लिए. सभी बंदी रस्सियों से बंधे हुए याजिद के सामने पहुंच रहे थे. उन्हें सिंहासन के सामने एक तख्त पर खड़ा किया गया और याजिद तब भी अपनी जीत का जश्न मना रहा था.
उस समय बीबी ज़ैनब ने पूरी ताकत लगाकर खड़े होकर कुरान की बातें बताईं और कर्बला के जंग को लेकर अपना खुत्बा दिया. उस समय वहां मौजूद हर शख्स चौंक गया था. यहां तक कि याजिद भी. बीबी ज़ैनब ने सबको रास्ता दिखाया था. उसके बाद बंदियों को एक साल तक टूटे घर में रखा गया और फिर याजिद ने सबको रिहा कर दिया. इमाम ज़ैनउल आबीदीन ने अपनी बुआ से मश्वरा किया और याजिद-पलीद को कहा गया कि सभी शहीदों के सिर लौटा दिए जाएं और उन्हें एक घर दिया जाए तब बीबी ज़ैनब सलामुल्लाह अलैह ने अपनी पहली मिजलिस की थी और इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम पर गुजरे ज़ूल्म लोगो को बयाँ की. बीबी ज़ैनब इस पूरे दौर में इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की शहादत के बारे में लोगों को बेदार करती रहीं और असिरों (कैदियों) का हौसला बढ़ाती रहीं.
बीबी ज़ैनब बुढ़ापे में मदीना वापस आई थीं और वहां भी अपने भाई के कुर्बानियों की कहानी सुनाई थी. ज़ैनब की असली जीत यही थी कि उनके भाई की शहादत की कहानी आज भी लोगों द्वारा याद की जाती है और अगर ज़ैनब न होतीं तो शायद इमाम हुसैन एक गद्दार की तरह देखे जाते. बीबी ज़ैनब ने ही शहादत का असली मतलब लोगों को समझाया था.
Falsafa e Shahadat e Azeem Imam Hussain AlahisSalam.
हुजूर नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की इत्तिबा में आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम अहले बैत पर दुरूद भेजने का बयान

तरजमा : हज़रत अबू हुरैरह रज़ि अल्लाहु अन्हु हुजूर नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से रिवायत करते हैं कि आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया : जिसे यह खुशी हासिल करना हो कि उसके नाम-ए-आमाल का पूरा-पूरा बदला दिया जाए जब वह हम अहले बैत पर दुरूद भेजे तो उसे चाहिए कि यूं कहे : ऐ अल्लाह! तू दुरूद भेज हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम और आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की अज़्वाजे मुतहहरात उम्महातुल-मुमिनीन पर और आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की जुर्रियत और अहले बैत पर जैसा कि तूने दुरूद भेजा हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम पर बेशक तू बहुत ज़्यादा तारीफ़ किया हुआ और बुजुर्गी वाला रब है। इस हदीस को इमाम अबू दाऊद ने रिवायत किया है।
तरजमा : हज़रत अब्दुर्रहमान अबी लैला. रज़ि अल्लाहु अन्हु बयान करते हैं कि कब बिन अजरा रजि अल्लाहु अन्हु मुझे मिले और कहा क्या मैं तुम्हें वह (हदीस) हदिया न करूं जो मैंने हुजूर नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से सुनी है? मैंने कहा क्यों नहीं। रावी बयान करते हैं मैंने कहा कि वह मुझे हदिया करो तो उन्होंने कहा : हमने हुजूर नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से सवाल किया। सो हमने अर्ज किया : या रसूलुल्लाह! आपके अहले बैत पर दुरूद भेजें? तो हुजूर नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया : (यू) कहो : ऐ अल्लाह तू (बसूरते रहमत) दुरूद भेज। मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम और आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की आल पर जैसा कि तूने दुरूद भेजा हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम और कैसे

आप अलैहिस्सलाम की आल पर बेशक तू हमीद मजीद है और ऐ अल्लाह तू बरकत अता कर मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम और आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की आल को जैसा कि तूने बरकत अता की इब्राहीम अलैहिस्सलाम और आप अलैहिस्सलाम की आल को बेशक तू हमीद मजीद है। इस हदीस को इमाम हाकिम और तबरानी ने रिवायत किया है।
तरजमा : हज़रत वासेला अस्का रज़ि अल्लाहु अन्हु बयान करते हैं कि मैं हज़रत अली रज़ि अल्लाहु अन्हु की तलाश में बाहर निकला तो मुझे किसी ने कहा कि वह हुजूर नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के पास हैं पस. मैंने (वहा) उन (के पास जाने) का इरादा किया (और जब मैं वहां पहुंचा) तो मैंने उन्हें हुजूर नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की चादर के अन्दर पाया और हज़रत अली, हजरत फातिमा और हसन और हुसैन रज़ि अल्लाहु अन्हुम उन सबको हुजूर नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने एक कपड़े के नीचे जमा कर रखा था पस आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया : ऐ अल्लाह! बेशक तूने अपने दुरूद और अपनी रिज़वान को मुझ पर और उन पर खास कर दिया है। इस हदीस को इमाम तबरानी ने रिवायत किया है।
तरजमा : हज़रत हुसैन बिन अली रज़ि अल्लाहु अन्हुमा बयान करते हैं कि हुजूर नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया : हम अहले बैत की मुहब्बत को लाज़िम पकड़ो पस वह शख्स जो इस हाल में अल्लाह से (विसाल के बाद) मिला कि वह हम से मुहब्बत करता हो तो वह हमारी शफाअत के वसीले से जन्नत में दाखिल होगा और उस जात की कसम जिसके कब्ज-ए-कुदरत में मुझ मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) की जान है किसी भी शख्स को उसका अमल हमारे हक की मारफित हासिल किए बेगैर फाइदा नहीं देगा। इस हदीस को इमाम तबरानी ने रिवायत किया है।

तरजमा : हज़रत अबू राफे रज़ि अल्लाहु अन्हु बयान करते हैं कि हुजूर नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने हज़रत अली रज़ि अल्लाहु अन्हु से फरमाया : ऐ अली! तू और तेरे (चाहने वाले) मददगार (क्यामत के रोज़) मेरे पास हौज़े कौसर पर चेहरे की शादाबी और सैराब हो कर आएंगे और उनके चेहरे (नूर की वजह से) सफेद होंगे और बेशक तेरे दुश्मन (क्यामत के रोज़) मेरे पास हौज़े कौसर पर बदनुमा चेहरों के साथ और सख़्त प्यास की हालत में आएंगे। इस हदीस को इमाम तबरानी ने रिवायत किया है।
तरजमा : हज रत जाबिर बिन अब्दुल्लाह रजि अल्लाहु अन्हुमा बयान करते हैं कि हुजूर नबी अकरम सल्लल्लाहु, अलैहि व सल्लम ने फरमाया : बेशक मैंने अपनी बेटी का नाम फातिमा रखा है क्योंकि अल्लाह तआला ने उसे और उसके चाहने वालों को आग से छुड़ा (और बचा) लिया है। इस हदीस को इमाम दैलमी ने रिवायत किया है।
तरजमा : हज़रत अब्दुल्लाह बिन मस्ऊद रज़ि अल्लाहु अन्हु हुजूर नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से रिवायत करते हैं कि आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया : अहले बैते मुस्तफा सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की एक दिन की मुहब्बत पूरे साल की इबादत से बेहतर है और जो इसी मुहब्बत पर फौत हुआ तो वह जन्नत में दाखिल होगा। इस हदीस को इमाम दैलमी ने रिवायत किया है।
तरजमा : हज़रत जैद बिन अरकम से मरफूअन रिवायत है कि पांच चीजें ऐसी हैं कि अगर किसी को नसीब हो जाएं तो वह आखिरत के अमल का तारिक नहीं हो सकता (और वह पांच चीजें यह है) : नेक बीवी, नेक औलाद, लोगों के साथ हुस्ने मुआशरत और अपने मुल्क में रोजगार और आले मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की इस हदीस को इमाम दैलमी ने रिवायत किया है। मुहब्बत।
तरजमा : हजरत अली बिन अबी तालिब रजि अल्लाहु अन्हु मरफूअन रिवायत करते हैं कि हुजूर नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया : चार शख्स ऐसे हैं क्यामत के रोज़ जिनके लिए मैं शफाअत करने वाला हूंगा (और वह यह हैं 🙂 मेरी औलाद की इज्जत व तक्रीम करने वाला, और उनकी हाजात को पूरा करने वाला, और उनके मुआमलात के लिए तग व दौ करने वाला जब वह मजबूर हो कर उसके पास आएं तो दिलो जान से उनकी मुहब्बत करने वाला। इस हदीस को इमाम मुतकी हिन्दी ने रिवायत किया है।
तरजमा : हज़रत जाबिर बिन अब्दुल्लाह रजि अल्लाहु अन्हुमा बयान करते हैं कि आले रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की एक खादिमा थी जो उनकी ख़िदमत में बजा लाती उसे ‘बरीरह’ कहा जाता था पस उसे एक आदमी मिला और कहा : ऐ बरीरह अपनी चोटी को ढांप कर रखा करो बेशक मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम तुम्हें अल्लाह की तरफ से कुछ फाइदा नहीं पहुंचा सकते। रावी बयान करते हैं पस उसने हुजूर नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को इस वाकया की खबर दी पस आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम अपनी चादर को घसीटते हुए बाहर तशरीफ़ लाए दरआं हालेकि हुजूर नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के दोनों रुखसारे मुबारक सुर्ख थे और हम (अन्सार का गरोह) हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के गुस्से को आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के चादर के घसीटते और रुख्सारों के सुर्ख होने से पहचान लेते थे पस हमने अस्लहा उठाया और हुजूर नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के पास आ गये और अर्ज किया : या रसूलुल्लाह! आप जो चाहते हैं हमें हुक्म दें पस उस जात की कसम जिसने आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को हक के साथ मबऊस फरमाया है अगर आप हमें हमारी माओं, आबा और औलाद के बारे में भी कोई हुक्म फरमाएंगे तो हम उनमें भी आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के कौल को नाफिज़ कर देंगे पस आप
सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम मिंबर पर तशरीफ फरमा हुए और अल्लाह तआला की हम्दो सना बयान की और फरमाया : मैं कौन हूँ? हमने अर्ज किया : आप मुहम्मद बिन अब्दुल्लाह बिन अब्दुल-मुत्तलिब बिन हाशिम बिन अब्दे मनाफ हैं। आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया : मैं हज़रत आदम अलैहिस्सलाम की औलाद का सरदार हूं लेकिन कोई फल नहीं, मैं वह पहला शख्स हूं जिससे कब्र फटेगी लेकिन कोई फ़ल नहीं और मैं वह पहला शख्स हूं जिसके सर से मिट्टी झाड़ी जाएगी लेकिन कोई फल नहीं और मैं सबसे पहले जन्नत में दाखिल होने वाला हूं लेकिन कोई फल नहीं। उन लोगों को क्या हो गया है जो यह गुमान करते हैं कि मेरा रहम (नसब व तअल्लुक) फाइदा नहीं देगा ऐसा नहीं है जैसा वह गुमान करते हैं। बेशक मैं शफाअत करूंगा और मेरी शफाअत कबूल भी होगी यहां तक कि जिसकी मैं शफाअत करूंगा वह यकीनन दूसरों की शफाअत करेगा और उसकी भी शफाअत कबूल होगी यहां तक कि इब्लीस भी अपनी गर्दन को बुलन्द करेगा शफाअत में तमञ् की खातिर (या किसी तौर उसकी शफाअत भी कोई कर दे)। इस हदीस को इमाम तबरानी ने बयान किया है।
बअद शहादते करबला का हौलनाक मन्ज़र

मैदाने करबला में जब यजीदी दरिन्दे तमाम आवान व अन्सार और औलादे अकील दीगर बनी हाशिम का खून बहा चुके अब इने रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम यानी फातिमा का लाल अपनी आखिरी कुरबानी पेश करने के लिए और इस्लाम के दरख्त को अपने खून से सींचने के लिए तैयार कर चुका ताकि क्यामत तक के लिए इस्लाम का दरख्त हरा हो जाए। शबे आशूरा से दस्वीं की सुबह तक यह मुसीबतें इमाम हुसैन के ऊपर कि हर शहीद की लाश को खेमे तक लाए जिसमें बराबर का भाई और जवान बेटा व छ: माह का बच्चा शामिल था।
रिवायतों से पता चलता है कि नौ मुहर्रम तक हज़रत इमाम हुसैन रज़ि अल्लाहु अन्हु के सर के बाल और दाढ़ी के बाल सियाह थे मगर आशूरा के अम्र तक आपके तमाम बाल गमों से सफेद हो गये।
तारीख़ कहती है कि हज़रत इमाम हुसैन दुश्मनों की चमकती हुई हज़ारों तल्वारों और बेशुमार नेज़ों और बरछियों के बीच में आए।

क्या हालत होगी उस इंसान की जिसका ज़ालिमों ने सब कुछ छीन लिया हो। अपनी निगाहों के सामने पूरे घर को ख़ाक व खून में एड़ियां रगड़ कर दम तोड़ते देख कर यही नहीं बल्कि दिल पर सब्र व ज़ब्त का पत्थर रख कर एक-एक लाश उठा कर खेमा तक लाने वाले हज़रत इमाम हुसैन के अब दिल की हालत क्या रही होगी।
मैदाने करबला में फौजे अश्किया ने सरकारे इमाम हुसैन को हर तरफ से घेर लिया तीरों की बारिश होने लगी इमाम घोड़े पर डगमगाने लगे इतने तीर जिस्म में पैवस्त हो गये कि आप घोड़े से ज़मीन पर आ गये, और सज्दे में गिर गये। शिम्र खंजर लेकर आगे बढ़ा और सीन-ए-अक्दस पर सवार हो गया और गर्दन पुश्त की जानिब से ठहर-ठहर कर काटने
लगा यहां तक कि सरे अक्दस को तने पाक से जुदा कर दिया। इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिऊन।

सरकार इमाम आली मकाम के सरे पाक का तने अक्दस से जुदा होना था बस करबला में क्यामत आ गई। जलजले पे ज़लज़ले आने लगे। आसमान में अन्धेरा छा गया। सिर्फ दरियाए फुरात ही का पानी नहीं बल्कि दुनिया भर के दरियाओं और समुन्द्रों के पानी उछलने लगे। मौजें सर को पटकने लगीं।
मौजें तमाम सर को पटकती हैं आज भी
आले नबी के पास जो पानी न जा सका
दिन ही में सितारे नमूदार हो गये। उधर यज़ीदी दहशत गर्दा ने अहले बैते अत्हार के खेमों में आग लगा दी और सामान लूटने लगे। हज़रत सकीना के कानों की बालियां नोच लीं। हज़रत सैय्यदा जैनब और सैय्यदा उम्मे कुल्सूम के सरों से रिदाओं को छीन लिया। इक रिदाए ज़ैनब को छीन कर यज़ीदों ने
जाने कितनी सदियों को बेरिदा बना डाला
बेसहारा बीवियां किस को पुकारें। बच्चे भाग-भाग कर माओं को पुकारने लगे।
हजरत सैय्यदा जैनब रज़ि अल्लाहु अन्हा ने हज़रत सैय्यद सज्जाद से पूछा कि बेटा तुम इमामे वक़्त हो बताओ कि हम लोग खेमों में जल कर मर जाएं या कि बाहर निकलें।
दुश्मन के एक सिपाही का बयान है कि जब खेमे जल रहे थे तो मैंने देखा कि एक बुलन्द कामत खातून कभी खेमे के अन्दर जाती हैं और कभी बाहर आती हैं। कभी दाएं तरफ देखती हैं कभी बाएं तरफ और कभी आसमान की तरफ और फिर अपने हाथ पर हाथ मारती हैं।
सिपाही कहता है कि मैंने कहा कि ऐ खातून दूर हो जाइए आम बहुत तेज है। उस पर उस खातून ने जवाब दिया कि ऐ शैख हमारा एक बीमार भतीजा खेमे के अन्दर है जो शिद्दते मरज की बडू से उठने पर कादिर नहीं है। मैं उसे तन्हा आग के शोब्लों में कैसे छोड सकती हूं।
हजरत सैय्यदा जैनब रजि अल्लाहु अन्हा जलते हुए खेमों के भड़कते हुए शोब्लों के अन्दर जा कर हजरत सैय्यद सज्जाद को अपने पुश्त पर लाद कर बाहर लायीं। इतने में इमाम जैनुल आबेदीन ने आंखें खोली और देखा कि मेरे बाबा का सरे पाक नेजे की नोक पर है। खेमे जलने लगें बीवियां एक खेमे से दूसरे खेमे में जाने लगीं, जब आखिरी खेमे में गई तो उसमें भी आग लगा दी गई। इमाम हुसैन का पूरा घर आलमे गुरबत में लुट गया।
सर तन से जुदा होते ही आलमे बाला में कुहराम मच गया। इमाम आली आली मकाम की शहादत के बाद ही फौरन आसमान के किनारों से सुर्ख गुबार उठा और देखते-देखते तमाम जहान तारीक हो गया।
और इस कद्र अन्धेरा छा गया कि पास ही में खड़े हुए की सूस्त नजर न आती थी। इतने में आसमान से खून की बारिश शुरू हो गई और तीन दिन तक मुसलसल खून की बारिश होती रही और दुनिया भर में जहां जिस चीज़ को उठाया जाता खून ही खून नज़र आता। मदीने में उम्मुल-मुमिनीन जनाब उम्मे सलमा रज़ि अल्लाहु अन्हा के पास जो करबला की मिट्टी वाली शीशी थी वह खून से लब्रेज़ हो गई। हज़रत यहिया अलैहिस्सलाम का कुर्ता जो एक जमाना से खुश्क था वह दून आलूद हो गया। यजीदी फौजों में खुशी के बाजे बजने लगे। फौल सियाह आंधियां चलने लगीं।
तरजमा : जब सैय्यदना इमाम हुसैन रज़ि अल्लाहु अन्हु को शहीद किया गया तो सूरज को शदीद गहन लग गया हत्ता कि दोपहर के वक़्त तारे नमूदार हो गये यहां तक कि उन्हें इत्मीनान हो गया कि यह रात है।
जब हज़रत इमाम हुसैन रज़ि अल्लाहु अन्हु को शहीद किया गया तो आसमान सुर्ख हो गया। (मोअजमें कबीर स. 282)
तरजमा : हज़रत इमाम हुसैन की शहादत के वक्त आसमान पर सुखी हो गई। (मोअजमें कबीर स. 282)
तरजमा : जब हज़रत इमाम हुसैन रज़ि अल्लाहु अन्हु को शहीद किया गया तो बैतुल-मक्दिस को जो भी पत्थर उठाया जाता उसके नीचे ताज़ा खून पाया जाता। (मोअजमें कबीर स. 283)
तरजमा : शहादत इमाम हुसैन रज़ि अल्लाहु अन्हु के दिन मुल्क शाम में जो भी पत्थर उठाया जाता वह खून आलूद होता।
अल्लामा जलालुद्दीन सुयूती फरमाते हैं कि हज़रत इमाम हुसैन की शहादत के दिन सूरज ग्रहण में आ गया था और फिर मुसलसल आसमान छ: माह तक सुर्ख रहा। बाद में वही सुर्जी आहिस्ता-आहिस्ता शफ़क बन गई अब यह निशानी सुबह क़यामत तक बाकी रहेगी जो शहादते इमाम से पहले मौजूद न थी।
(सवाइके मुहरिका स. 645, तारीखे खुलफा स. 304) मुहद्देसीन बयान करते हैं कि इमाम आली मकाम की शहादत पर न सिर्फ दुनिया रोई बल्कि ज़मीन व आसमान ने भी आंसू बहाए। शहादत हज़रत इमाम हुसैन पर आसमान भी नौहा कुना था। इंसान तो इंसान जिबातों ने भी मज़्लूमे करबला की नौहा ख्वानी की। मुहद्देसीन बयान करते हैं कि नवास-ए-रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की शहादत के वक्त बैतुल-मक्दिस से जो पत्थर उठाया गया। उसके नीचे से खून
निकला। शहादते हज़रत इमाम हुसैन के बाद भी मुल्क शाम में जिस पत्थर को हटाया गया उसके नीचे से खून का चश्मा उबल पड़ा। मुहद्देसीन का कहना है कि शहादते इमाम हुसैन पर पहले आसमान सुर्ख हो गया। फिर सियाह हो गया। सितारे एक दूसरे के टकराने लगे। यूं लग रहा था जैसे काइनात टकरा कर ख़त्म हो जाएगी। यूं लगा जैसे क्यामत कायम हो गई हो। दुनिया में अन्धेरा छा गया।
ईसा बिन हारिस अल-किन्दी से मरवी है :
तरजमा : जब इमाम हुसैन को शहीद कर दिया गया हम सात दिन तक ठहरे रहे जब हम अम्र की नमाज़ पढ़ते तो हम दीवारों के किनारों से सूरज की तरफ देखते तो गोया वह ज़र्द रंग की चादरें महसूस होता और हम सितारों की तरफ देखते तो उनमें से बाज़ बाज़ से टकराते।

