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कर्बला के 68वें शहीद हज़रते यज़ीद इब्ने ज़ियाद हदली

कर्बला के 68वें शहीद हज़रते यज़ीद इब्ने ज़ियाद हदली

आप का पूरा नाम यज़ीद इब्ने ज़ियाद इब्ने मुहाजिर अल-क़न्दी अल-हदली था। और कुन्नियत अबू शअसा थी। आप अपनी कौम के शरीफ और सरदार थे। आपको फुनूने जंग में बड़ी महारत थी।

आप कूफ़े से निकल कर रिसालः से पहले इमाम हुसैन अलै० से जा मिले थे और कूड़े के तमाम हालात से आप को ब-ख़बर किया था। हुर्र के लश्कर के आ जाने के बाद इब्ने ज़ियाद ने एक ख़त मालिक नसरकन्दी के ज़रिये हुर्र को भेजा था। इब्ने नसर ख़त लेकर और जवाब लेकर जाने ही वाला था कि आप ने उससे मुलाकात करके उसके तर्जे अमल पर इज़ाहारे अफसोस किया। उसने इताअते यज़ीदे म० ल० का हवाला. देकर उन्हे ख़ामोश करना चाहा लेकिन आपने उसके जवाब में कहा कि यज़ीदे म० ल० की इताअत खुदा की नराज़गी से नही बचा सकती। तुझे खुदा और रसूल स० को मुँह दिखाना है।

यौमे आशूरा आप मैदाने कारज़ार में आये और निहायत बे-जिगरी से लडने लगे। यहा तक कि आपके घोडे के पाँव काट दिये गये और आप जमीन पर आ रहे उस वक़्त आपके तरकश में सौ तीर थे। आप ने उन्हें लश्करे कुफ्फार की तरफ फेंका जिसके नतीजे में पच्चान्नबे 95 दुश्मन हलाक हुए यानि सिर्फ पाँच तीर खाली गये। आपके हर तीर के साथ इमाम हुसैन अलै० कामयाबी की दुआ करते थे।

तीरों के ख़त्म हो जाने के बाद आप उठ खड़े हुए और तलवार से हमला करने लगे। यहा तक कि दरजा-ए-शहादत हासिल कर लिया।

कर्बला के 69वें शहीद हज़रते अबु उमरू अल-नहशली

कर्बला के 69वें शहीद हज़रते अबु उमरू अल-नहशली

आप आबिदे शब ज़िन्दा-दार, निहायत मुत्तकी और परहेज़गार थे। आपको महोब्बते आले मोहम्मद स० में बेइन्तेहा शग़फ था। आप फनूने जंग से बहुत ज़्यादा आगाह थे।

आप ने यौमे आशूरा शेरे गुरना की तरह बेशुमार हमले किये और बेइन्तेहा लोगों को फना के घाट उतारा। बिल आखिर दुश्मनों ने आप को घेर लिया और हर किस्म के हमले आप पर करने लगे। यहाँ तक कि कबीला-ए-बनी सअलबा के एक बदबख़्त अम्मार इब्ने नहशल ने आपको शहीद कर दिया।

कर्बला के 70वें शहीद हज़रते जन्दब इब्ने हजीर अल-खूलानी अल-कन्दी

कर्बला के 70वें शहीद हज़रते जन्दब इब्ने हजीर अल-खूलानी अल-कन्दी

आप अपने कबीले के चश्मो चिराग थे। महोब्बते आले मोहम्मद में बड़ा अच्छा मकाम रखते थे। आपका शुमार इज़्ज़तदार और नमूदार शियों में था। आपको अमीरूल मोमिनीन के असहाब में होने का शरफ हासिल था। आप इमाम हुसैन अलै० की मद्द के लिये अपने वतन से चल कर आये थे। हुर्र के पहुँचने से पहले पहुँच कर हज़रत के हमरकाब हो गये थे और इमाम हुसैन अलै० की ख़िदमत में हमातन मशगूल रहे यौमे आशूर आप ने कमाले दिलेरी के साथ दुश्मनों का मुकाबला किया था। आख़िरकार फ़र्ज़न्दे रसूल स० की हिमायत में जन्नत के रास्ते पर जा लगे थे और शरफे शहादत हालिस करके बारगाहे रसूल स० में सुर्खरू हो गये !