
लड़ाई की तैयारी और छिपाने की कोशिश
दे तबरानी की रिवायत से मालूम होता है कि रसूलुल्लाह सल्ल० ने अद शिकनी की ख़बर आने से तीन दिन पहले ही हज़रत आइशा रजि० को हुक्म दिया था कि आपका साज व सामान तैयार कर दें. लेकिन किसी को पता न चले। इसके बाद हज़रत आइशा रज़ि० के पास हज़रत अबूबक्र रज़ि० तश्रीफ़ लाए, तो पूछा, बेटी ! यह कैसी तैयारी है ?
उन्होंने कहा, ख़ुदा की क़सम ! मुझे नहीं मालूम।
हज़रत अबूबक्र रज़ि० ने कहा, यह बनू असफ़र यानी रूमियों से लड़ने का वक़्त नहीं। फिर रसूलुल्लाह सल्ल० का इरादा किधर का है ?
हज़रत आइशा रज़ि० ने कहा, अल्लाह की क़सम ! मुझे नहीं मालूम।
तीसरे दिन बहुत सवेरे अम्र बिन सालिम खुजाई चालीस सवारों को लेकर पहुंच गया और ऊपर वाले पद ‘या रब इन्नी नाशिदन मुहम्मदन… ( आखिर तक ) कहा, तो लोगों को मालूम हुआ कि अहद शिकनी की गई है।
इसके बाद बुदैल आया, फिर अबू सुप्रियसान आया और लोगों को हालात का ठीक-ठीक पता लग गया। इसके बाद रसूलुल्लाह सल्ल० ने तैयारी का हुक्म देते हुए बताया कि मक्का चलना है और साथ ही यह दुआ फ़रमाई कि ऐ अल्लाह ! जासूसों और ख़बरों को कुरैश तक पहुंचने से रोक और पकड़ ले, ताकि हम उनके इलाक़े में उनके सर पर एकदम जा पहुंचें।
फिर पूरे खुफ़िया अन्दाज़ में और राज़दारी की ग़रज़ से रसूलुल्लाह सल्ल० ने शुरू माह रमज़ान में सन् 08 हि० में हज़रत अबू क़तादा बिन रुबई के नेतृत्व में आठ आदमियों का एक सरीया बल अज़म की ओर रवाना फ़रमाया। यह जगह ज़ीखशब और ज़िल मर्वा के बीच मदीना से 36 अरबी मील की दूरी पर वाक़े है। मक्सद यह था कि समझने वाला समझे कि आप उसी इलाक़े का रुख करेंगे और यही ख़बरें इधर-उधर फैलें, लेकिन जब यह सरीया अपनी तैशुदा जगह पहुंच गया, तो उसे मालूम हुआ कि रसूलुल्लाह सल्ल० मक्का के लिए रवाना हो चुके हैं। चुनांचे यह भी आपसे जा मिला। 1
1. यही सरीया है कि जिसकी मुलाक़ात आमिर बिन अज़बत से हुई, तो आमिर ने इस्लामी तरीक़े से सलाम किया लेकिन महलम बिन जसामा ने किसी पिछली रंजिश की वजह से उसे क़त्ल कर दिया, और उसके ऊंट और सामान पर क़ब्ज़ा कर लिया। , इस पर यह आयत उतरी, ‘जो तुमसे सलाम करे उसे यह न कहो कि तू ईमान वाला
इधर हज़रत हातिब बिन अबी बलतआ ने कुरैश को एक चिट्ठी लिखकर यह ख़बर भेजी कि अल्लाह के रसूल सल्ल० हमला करने वाले हैं। उन्होंने यह चिट्ठी एक औरत को दी थी और उससे कुरैश तक पहुंचाने का मुआवज़ा तै कर रखा था। औरत सर की चोटी में चिट्ठी छिपाकर रवाना हुई। लेकिन अल्लाह के रसूल सल्ल० को आसमान से हातिव की इस हरकत की ख़बर दे दी गई। चुनांचे आपने हज़रत अली, हज़रत मिक़दाद, हज़रत ज़ुबैर और हज़रत अबू मरसद ग़नवी को यह कहकर भेजा कि जाओ रौजा खान पहुंचो, वहां एक हौदज पर बैठी औरत मिलेगी, जिसके पास कुरैश के नाम एक चिट्ठी होगी, ये लोग घोड़ों पर सवार तेज़ी से रवाना हुए। वहां पहुंचे तो औरत मौजूद थी। उससे कहा कि वह नीचे उतरे और पूछा कि क्या तुम्हारे पास कोई पत्र है ?
उसने कहा, मेरे पास कोई पत्र नहीं। उन्होंने उसके कजावे की तलाशी ली, लेकिन कुछ न मिला। इस पर हज़रत अली रजि० ने उससे कहा, मैं खुदा की क़सम खाकर कहता हूं कि न रसूलुल्लाह सल्ल० ने झूठ कहा है, न हम झूठ कह रहे हैं। तुम या तो पत्र निकालो या हम तुम्हें नंगा कर देंगे। जब उसने यह इरादा देखा तो बोली अच्छा मुंह फेरो। उन्होंने मुंह फेरा तो उसने चोटी खोलकर पत्र निकाला और उनके हवाले कर दिया।
ये लोग चिट्ठी लेकर अल्लाह के रसूल सल्ल० के पास पहुंचे, देखा तो उसमें लिखा हुआ था, (हातिब बिन अबी बलतआ की ओर से कुरैश की तरफ़ फिर कुरैश को रसूलुल्लाह सल्ल० के रवाना होने की खबर दी थी।1
नहीं।’ इसके बाद सहाबा किराम महलम को रसूलुल्लाह सल्ल० के पास ले आए कि आप इसके लिए मफ़िरत की दुआ करें, लेकिन जब महलम आपके सामने हाज़िर हुआ, तो आपने तीन बार फ़रमाया, ऐ अल्लाह ! महलम को न बख्श! इसके बाद महलम अपने कपड़े के दामन से अपने आंसू पोंछता हुआ उठा। इब्ने इस्हाक़ का बयान है कि उसकी क़ौम के लोग कहते हैं कि बाद में उसके लिए रसूलुल्लाह सल्ल० ने मफ़िरत की दुआ कर दी थी।
देखिए जादुल मआद 2/150, इब्ने हिशाम 2/625, 627, 628 1. सुहैली ने कुछ लेखकों के हवाले से चिट्ठी में यह लिखा बयान किया है, ऐ कुरैश की जमाअत । अल्लाह के रसूल सल्ल० तुम्हारे पास रात जैसी बढ़ती बाढ़ की शक्ल में भारी फ़ौज लेकर आ रहे हैं और ख़ुदा की कसम, अगर वह अकेले भी तुम्हारे पास आ जाएं, तो अल्लाह उनकी मदद करेगा और उनसे अपना वायदा पूरा करेगा, इसलिए तुम लोग अपने बारे में सोच लो। वस्सलाम वाक़दी ने अपनी एक मुर्सल सनद से रिवायत किया है कि हज़रत हातिब ने सुहैल
अल्लाह के रसूल सल्ल० ने हज़रत हातिब को बुलाकर पूछा कि हातिब ! यह क्या है ?
उन्होंने कहा, ऐ अल्लाह के रसूल सल्ल० ! मेरे खिलाफ़ जल्दी न फ़रमाएं। ख़ुदा की क़सम ! अल्लाह और उसके रसूल पर मेरा ईमान है। मैं न तो इस्लाम से विमुख हुआ हूं और न मुझमें तब्दीली आई है। बात सिर्फ इतनी है कि मैं खुद कुरैश का आदमी नहीं, अलबत्ता उनमें चिपका हुआ था और मेरे बाल-बच्चे वहीं हैं, लेकिन कुरैश से मेरी कोई रिश्तेदारी नहीं कि वे मेरे बाल-बच्चों की हिफ़ाज़त करें। इसके खिलाफ़ दूसरे लोग जो आपके साथ हैं, वहां उनके रिश्तेदार हैं जो उनकी हिफ़ाज़त करेंगे, इसलिए जब मुझे यह चीज़ हासिल न थी, तो मैंने चाहा कि उन पर एक एहसान कर दूं जिसके बदले में वे मेरे रिश्तेदारों की हिफ़ाज़त करें। इस पर हज़रत उमर बिन खत्ताब ने कहा,
! ‘ऐ अल्लाह के रसूल सल्ल० ! मुझे छोड़िए, मैं इसकी गरदन मार दूं, क्योंकि इसने अल्लाह और उसके रसूल के साथ खियानत की है और यह मुनाफ़िक़ हो गया है।’
अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया, देखो, यह बद्र की लड़ाई में शरीक हो चुका है और उमर ! तुम्हें क्या पता? हो सकता है अल्लाह ने बद्र वालों पर नमूदार होकर कहा है कि तुम लोग जो चाहो, करो, मैं तुम्हें बख्श दिया। यह सुनकर हज़रत उमर रज़ि० की आंखें भीग गईं और उन्होंने कहा, अल्लाह और उसके रसूल बेहतर जानते हैं।’
इस तरह अल्लह ने जासूसों को पकड़ लिया और मुसलमानों की जंगी तैयारियों की कोई ख़बर कुरैश तक न पहुंच सकी।
इस्लामी फ़ौज मक्का के रास्ते में
10 रमज़ान 08 हि० को अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने मदीना छोड़कर मक्का का रुख किया। आपके साथ दस हज़ार सहाबा किराम थे। मदीना पर अबूज़र गिफ़ारी रज़ि० की नियुक्ति हुई ।
बिन अम्र, सफ़वान बिन उमैया और इक्रिमा के पास यह लिखा था कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने लोगों में ग़ज़वे का एलान कर दिया है और मैं नहीं समझता कि आपका इरादा तुम लोगों के सिवा किसी और का है और मैं चाहता हूँ कि तुम लोगों पर मेरा एक एहसान रहे। (फ़त्हुल बारी 7/521) 1. सहीह बुखारी 1/422, 2/612, हज़रत जुबैर और हज़रत अबू मरसद के नामों में वृद्धि सहीह बुखारी की कुछ दूसरी रिवायतों में है।
जोहफ़ा में या इससे कुछ ऊपर आपके चचा अब्बास बिन अब्दुल मुत्तलिब मिले। वह मुसलमान होकर अपने बाल-बच्चों समेत हिजरत करते हुए तशरीफ़ ला रहे थे, फिर अबवा में आपके चचेरे भाई अबू सुफियान बिन हारिस और फुफेरे भाई अब्दुल्लाह बिन उमैया मिले। आपने इन दोनों को देखकर मुंह फेर लिया, क्योंकि ये दोनों आपको बहुत कष्ट पहुंचाया करते और आपकी बुराई किया करते थे। ऐसी स्थिति देखकर हज़रत उम्मे सलमा रजि० ने अर्ज़ किया कि ऐसा नहीं होना चाहिए कि आपके चचेरे और फुफेरे भाई ही आपके यहां सबसे ज्यादा भाग्यहीन हों।
इधर हज़रत अली रज़ि० ने अबू सुफ़ियान बिन हारिस को सिखाया कि तुम अल्लाह के रसूल सल्ल० के सामने जाओ और वही कहो जो हज़रत यूसुफ़ अलै० के भाइयों ने उनसे कहा था, कि ‘खुदा की क़सम ! अल्लाह ने आपको हम पर बरतरी दी और यक़ीनन हम ही ख़ताकार थे। (12 : 91) क्योंकि आप यह पसन्द नहीं करेंगे कि किसी और का जवाब आपसे अच्छा रहा हो।
चुनांचे अबू सुफ़ियान ने यही कहा और जवाब में तुरन्त अल्लाह के रसूल सल्ल० ने फ़रमाया, ‘आज तुम्हें कोई फटकार नहीं। अल्लाह तुम्हें बख्श दे और वह तमाम रहम करने वालों में सबसे ज़्यादा रहम करने वाला है।’ इस पर अबू सुफ़ियान ने कुछ पद सुनाए, जिनमें से कुछ ये थे-
‘तेरी उम्र की क़सम ! जिस वक़्त मैंने इसलिए झंडा उठाया था कि लात के योद्धा मुहम्मद के योद्धाओं पर ग़ालिब आ जाएं, तो मेरी स्थित रात के उस मुसाफ़िर जैसी थी जो अंधेरी घुप रात में हैरान हो, लेकिन अब वक़्त आ गया है कि मुझे हिदायत दी जाए और मैं हिदायत पाऊं। मुझे मेरे नफ़्स की बजाए एक हादी ने हिदायत दी, और अल्लाह का रास्ता उसी व्यक्ति ने बताया जिसे मैंने हर मौके पर धुत्कार दिया था।’
यह सुनकर अल्लाह के रसूल सल्ल० ने उनके सीने पर मारकर फ़रमाया, तुमने मुझे हर मौक़े पर धुत्कारा था।’
1. बाद में अबू सुफियान के इस्लाम में बड़ी खूबी आ गई। कहा जाता है, जबसे उन्होंने इस्लाम कुबूल किया, शर्म की वजह से अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की ओर सर उठाकर न देखा, अल्लाह के रसूल सल्ल० भी उनसे मुहब्बत करते थे और उनके लिए जन्नत की खुशखबरी देते थे, और फ़रमाते थे, मुझे उम्मीद है कि यह हमज़ा का बदल साबित होंगे। जब उनकी मौत का वक़्त आया तो कहने लगे, मुझ पर न रोना, क्योंकि इस्लाम लाने के बाद मैंने कभी कोई गुनाह की बात नहीं कही। जादुल मआद 2/162, 163
मर्रज़्ज़हरान में इस्लामी फ़ौज का पड़ाव
अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अपना सफ़र जारी रखा। आप और सहाबा रोज़े से थे लेकिन अस्फ़ान और कुदैद के बीच कदीद नामी चश्मे पर पहुंचकर आपने रोज़ा तोड़ दिया। और आपके साथ सहाबा किराम रजि० ने भी रोज़ा तोड़ दिया। इसके बाद फिर आपने सफ़र जारी रखा, यहां तक कि रात के के वक़्तों में मज़हरान की वादी फ़ातमा में पहुंचकर पड़ाव डाला। वहां शुरू आपके हुक्म से लोगों ने अलग-अलग आग जलाई। इस तरह दस हज़ार (चूल्हों में) आग जलाई गई। अल्लाह के रसूल सल्ल० ने हज़रत उमर बिन खत्ताब रज़ि० को पहरे पर मुक़र्रर फ़रमाया।
अबू सुफ़ियान नबी सल्ल० के दरबार में
मरज़्ज़हरान में पड़ाव डालने के बाद हज़रत अब्बास रज़ि० अल्लाह के रसूल सल्ल० के सफ़ेद खच्चर पर सवार होकर निकले। उनका मक्सद यह था कि कोई लकड़हारा या कोई भी आदमी मिल जाए तो उससे कुरैश के पास खबर भेज दें ताकि वे मक्के में रसूलुल्लाह सल्ल० के दाखिल होने से पहले आपके पास हाज़िर होकर अमान तलब करें।
इधर अल्लाह ने कुरैश पर सारी ख़बरों का पहुंचना रोक दिया था, इसलिए उन्हें हालात का कुछ पता न था, अलबत्ता वे भय और आशंका के शिकार थे और अबू सुफ़ियान बाहर जा-जाकर ख़बरों का पता लगाता रहता था। चुनांचे उस वक़्त भी वह और हकीम बिन हिज़ाम और बुदैल बिन वरक़ा ख़बरों का पता लगाने की ग़रज़ से निकले हुए थे ।
हज़रत अब्बास रजि० का बयान है कि खुदा की क़सम ! मैं अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के खच्चर पर सवार जा रहा था कि मुझे अबू सुफियान और बुदैल बिन वरक़ा की आपसी बातें सुनाई दीं। वे आपस ही में कह सुन रहे थे। अबू सुफ़ियान कह रहा था कि ख़ुदा की क़सम ! मैंने आज रात जैसी आग और ऐसी फ़ौज तो कभी देखी ही नहीं और जवाब में बुदैल कह रहा था, ये ख़ुदा की क़सम ! बनू खुजाआ हैं। लड़ाई ने इन्हें नोच कर रख दिया है और इस पर अबू सुफ़ियान कह रहा था, खुजाआ इससे कहीं कमतर और ज़लील हैं कि यह उनकी आग और उनकी फ़ौज हो ।
1. सहीह बुखारी 2/613
हज़रत अब्बास कहते हैं कि मैंने उसकी आवाज़ पहचान ली और कहा, ‘अबू हंज़ला ?”
उसने भी मेरी आवाज़ पहचान ली और बोला, ‘अबुल फ़ज़्ल ?’ मैंने कहा, हां।
उसने कहा, क्या बात है ? मेरे मां-बाप तुझ पर कुर्बान ?
मैंने कहा, यह रसूलुल्लाह (सल्ल०) हैं लोगों सहित, हाय कुरैश की तबाही ! अल्लाह की क़सम !
उसने कहा, अब क्या होला है ? मेरे मां-बाप तुम पर कुर्बान !
मैंने कहा, अल्लाह की क़सम ! अगर वे तुम्हें पा गए, तो तुम्हारी गरदन मार देंगे, इसलिए इस खच्चर पर पीछे बैठ जाओ। मैं तुम्हें रसूलुल्लाह सल्ल० के पसा ले चलता हूं और तुम्हारे लिए अमान तलब किए देता हूं।
इसके बाद अबू सुफ़ियान मेरे पीछे बैठ गया और उसके दोनों साथी वापस चले गए।
हज़रत अब्बास रज़ि० कहते हैं कि मैं अबू सुफ़ियान को लेकर चला। जब किसी अलाव के पास से गुज़रता, तो लोग कहते कौन हैं? मगर जब देखते रसूलुल्लाह सल्ल० का खच्चर है और मैं उस पर सवार हूं तो कहते कि रसूलुल्लाह सल्ल० के चचा हैं और आपके खच्चर पर हैं, यहां तक कि मैं उमर बिन खत्ताब रज़ि० के अलाव के पास से गुज़रा। उन्होंने कहा कौन है ? और उठकर मेरी ओर आए। जब नीचे अबू सुफ़ियान को देखा, तो कहने लगे, अबू सुफ़ियान ! अल्लाह का दुश्मन ? अल्लाह का शुक्र है कि उसने बिना अद व पैमान के तुझे (हमारे) क़ाबू में कर दिया।
इसके बाद वह निकलकर अल्लाह के रसूल सल्ल० की ओर दौड़े और मैंने भी खच्चर को एड़ लगाई। मैं आगे बढ़ गया और खच्चर से कूदकर अल्लाह के रसूल सल्ल० के पास जा घुसा। इतने में उमर बिन खत्ताब भी घुस आए और बोले कि ऐ अल्लाह के रसूल सल्ल० ! यह अबू सुफ़ियान है। मुझे इजाज़त दीजिए, मैं इसकी गरदन मार दूं।
मैंने कहा, अल्लाह के रसूल सल्ल० ! मैंने इसे पनाह दे दी है। फिर मैंने अल्लाह के रसूल सल्ल० के पास बैठकर आपका सर पकड़ लिया और कहा, ख़ुदा की क़सम ! आज रात मेरे सिवा कोई और आपसे सरगोशी (कानाफूसी) न करेगा ।
जब अबू सुफ़ियान के बारे में हज़रत उमर रज़ि० ने बार-बार कहा, तो मैंने
कहा, उमर ! ठहर जाओ खुदा की क़सम ! अगर यह बनी अदी बिन काब का नाम होता तो तुम ऐसी बात न कहते।
उमर रज़ि० ने कहा, अब्बास ! ठहर जाओ, ख़ुदा की क़सम ! तुम्हारा इस्लाम लाना मेरे नज़दीक खत्ताब के ईमान लाने से—अगर वह इस्लाम लाते—ज़्यादा पंसदीदा है और इसकी वजह मेरे लिए सिर्फ़ यह है कि रसूलुल्लाह सल्ल० के नज़दीक तुम्हारा इस्लाम लाना खत्ताब के इस्लाम से ज़्यादा पसन्दीदा है।
अल्लाह के रसूल सल्ल० ने फ़रमाया, अब्बास ! इसे (यानी अबू सुफ़ियान को) अपने डेरे में ले जाओ, सुबह मेरे पास ले आना। इस हुक्म के मुताबिक़ मैं उसे डेरे में ले गया और सुबह नबी सल्ल० की खिदमत में हाज़िर किया। आपने उसे देखकर फ़रमाया, अबू सुफ़ियान ! तुम पर अफ़सोस ! क्या अब भी तुम्हारे लिए वक़्त नहीं आया कि तुम यह जान सको कि अल्लाह के सिवा कोई माबूद नहीं ?
अबू सुफ़ियान ने कहा, मेरे मां-बाप आप पर फ़िदा, आप कितने बुर्दबार, कितने करीम और कितने रिश्तेदारों का ख्याल रखने वाले हैं? मैं अच्छी तरह समझ चुका हूं कि अगर अल्लाह के साथ कोई और भी माबूद होता, तो अब तक मेरे कुछ काम आया होता।
आपने फ़रमाया अबू सुफ़ियान ! तुम पर अफ़सोस ! क्या तुम्हारे लिए अब भी वक़्त नहीं आया कि तुम यह जान सको कि मैं अल्लाह का रसूल हूं ?
अबू सुफ़ियान ने कहा, मेरे मां-बाप आप पर फ़िदा, आप कितने जानकार, कितने मेहरबान, कितने जोड़ने वाले हैं, इस बात के बारे में तो अब भी दिल में कुछ न कुछ खटक है।
इस पर हज़रत अब्बास ने कहा, अरे, गरदन मारे जाने से पहले की नौबत आने से पहले इस्लाम कुबूल कर लो और यह गवाही और इक़रार कर लो कि अल्लाह के सिवा कोई इबादत के लायक़ नहीं और मुहम्मद अल्लाह के रसूल हैं। इस पर अबू सुफ़ियान ने इस्लाम कुबूल कर लिया और हक़ की गवाही दी।
हज़रत अब्बास रज़ि० ने कहा, ऐ अल्लाह के रसूल सल्ल० ! अबू सुफ़ियान एज़ाज़ पसन्द (पद लोलुप) है, इसलिए इसे कोई एज़ाज़ दीजिए।
आपने फ़रमाया, जो अबू सुफ़ियान के घर में घुस जाए उसे अमान है और जो अपना दरवाज़ा अन्दर से बन्द कर ले उसे अमान है और जो मस्जिदे हराम में दाखिल हो जाए, उसे अमान है।

