
मुआशरती सोच और अहमियते नसब पर क़ुरआन की गवाही
कुरआन मजीद ने क़ौम, क़बीले और ख़ानदानों की तक़्सीम का बुनियादी मक़सद मुआशरती ज़िन्दगी में इंसान की पहचान क़रार दिया है। हर शख़्स अपने बाप-दादा व अजदाद के नाम से पहचाना जाता है इसलिए ख़ुद को दूसरे के बाप-दादा व अजदाद की तरफ ना मन्सूब करे, चुके हमारे यहाँ आज-कल लोग हर मुआमले में अदम-ओ-एतेदाल का शिकार हो जाते हैं लेहाज़ा मुआशरती बुराइयों में एक बद-नज़्मी यह भी मौजूद है के कुछ लोग अपने आबाई और ख़ानदानी फरव्र का इज़हार कुछ इस अन्दाज़ से करते हैं के जैसे वोह कोई आसमानी मख़्लूक़ हैं हालाँके उनका ज़ाती किरदार इंतेहाई ना-शाइस्ता और क़ाबिले नफ़रत होता है। जो एक मुसलमान तो क्या किसी भी इंसान को जैब नहीं देता। दौलत, ताक़त, बिरादरी, रंग-ढंग, सियासी असर व रसूख की बिना’ (के सबब) पर किसी को कमतर जानना या अल्लाह की दी हुई नेअमतों पर तकब्बुर करना इस्लामी और कुरआनी ता’लिमात के सरासर मनाफ़ी है। सरवरे आलम हज़रत मोहम्मद मुस्तफ़ा ने दौरे जाहिलियत में मुआशरे की एसी तमाम बुराइयों और बद-नज़्मियों को इस्लामी ता’लिमात की रोशनी से ख़त्म कर दिया था और कमज़ोर व पसमान्दा अफ़राद को इज़्ज़त व मर्तबत से नवाज़ा और तक़्वा, परहेज़गारी और ख़ुशकिरदारी को इंसान की अज़मत का ज़ेवर क़रार दिया है।
وي्तबाल ने क्या खुब कहा है के,
एक ही सफ़ में खड़े हो गए महमूद व अयाज़, ना कोई बन्दा रहा ना बन्दा नवाज़
बाअज़ लोग ज़ाती कमालात ही को बाएसे फ़ज़ीलत समझते हैं उनके नज़दीक नसबी इज़्ज़त व शरफ़ की कोई हैसियत नहीं है। लेकिन एसे हज़रात शदीद ग़लती का शिकार हैं अगर चे वोह अपने इस मौक़िफ़ (नज़रिये) की ताइद के लिये मज़कूरा आयते मुक़द्दसा को ही अकसर मवाक्रेअ पर पेश करते हैं। दरअसल एसे अफ़राद बद-अक़ीदगी का शिकार हो चुके हैं वोह इस आयते मुक़द्दसा के सही मफ़हूम तक रसाई हासिल करने से क़ासिर हैं। आइये इस आयते मुबारका के अल्फ़ाज़ पर गौर फरमाएं, इसमें वाज़ेहतरीन अल्फ़ाज़ यह हैं,
يَا أَيُّهَا النَّاسُ إِنَّا خَلَقْنَاكُم مِّن ذَكَرٍ وَأُنثَى وَجَعَلْنَاكُمْ شُعُوبًا وَقَبَائِلَ لِتَعَارَفُوا إِنَّ أَكْرَمَكُمْ عِندَ اللَّهِ أَثْقَاكُمْ إِنَّ اللَّهَ عَلِيمٌ خَبِيرٌ
(सुरह अल होजोरात, आयतः 13)
तर्जुमाः ऐ लोगों ! हमने तुम्हें मर्द और औरत से पैदा फरमाया और हमने तुम्हें (बड़ी-बड़ी) क़ौमों और क़बीलों में (तक़्सीम) किया ताके तुम एक दूसरे को पहचान सको । बेशक अल्लाह के नज़दीक तुममें ज़्यादा बा-इज़्ज़त वोह है जो तुममें ज़्यादा परहेज़गार हो, बेशक अल्लाह खुब जानने वाला खुब ख़बर रखने वाला है।
इस आयते मुबारका में वाज़ेह हुक्म दिया गया है के इंसान सिर्फ एक दूसरे के नसब का लिहाज़ रखे और पहचान करे और अपने बाप-दादा के सिवा दूसरे किसी की तरफ अपनी निस्बत ना करे, और ना यह के अपने नसब पर फख्र करे और दूसरों को जलील यानी कमतर ना जाने। हमारे यहाँ आम तौर पर कहा जाता है के फलाँ आदमी हसब व नसब वाला है। हसब का लफ़्ज़ इंसानी किरदार के लिए बोला जाता है मसलन उसका इल्म, तक़्वा और ख़ुशकिरदारी वगैरह और नसब का
ता’ल्लुक़ खुनी निस्बत यानी ख़ानदानी इन्तेसाब से है। कुर’ आने-हकीम ने इंसानी मुआशरे को क़ौमों और क़बीलों में तक़्सीम करने की हिकमत जो बयान की है उसमें यह दोनों चीजें वाज़ेह हैं।
अरबाबे फ़िक्र व दानिश से गुज़ारिश है के ख्वारिजों से पुछें इसमें वोह कौनसा जुम्ला है जो नसबे रसूल की अहमियत के मनाफ़ी है? यहाँ तो हर एक फ़र्द का क़बीला और कुंबा इसलिए बनाया गया के उसे मा’लूम हो सके के वोह किसकी औलाद है? उसका बाप कौन था, उनका किरदार क्या था? जब तमाम लोगों की पहचान के लिए क़बाएल व शऊब (शौअबे) बने हैं तो सवाल पैदा होता है के क्या ख़ानदाने रसूल की कोई पहचान नहीं है? और उनके लिए यह मफ़हूम कहाँ से निकल आया के नसब की अहमियत कोई नहीं। आप तमाम लोग मजकूरा बाला आयते मुबारका के उस हिस्से पर ग़ौर कीजिये जहाँ इरशादे ख़ुदावन्द करीम है के,
إِنْ أَكْرَمَكُمْ عِندَ اللَّهِ أَتْقَاكُمْ
तर्जुमा: बेशक अल्लाह के नज़दीक तुममें ज़्यादा बाइज़्ज़त वोह है जो तुममें ज़्यादा परहेज़गार हो,
अब बताइये, आले रसूल के मौरिसे आ’ला सैय्यदुल-कोनैन ख़ातेमुल-अंबिया’, मौला ए काएनात करम अल्लाहो वजहु, हसनैन करीमैन अलैहिमुस्सलाम, मरकज़े अनवार ज़ाते ताहेरा से बढ़कर किसका किरदार ऊजला और पुरनूर होगा? बेशक हुजूर अकरम ईमान की रूह व जान हैं और उनसे और उनकी आल से मोहब्बत ही ईमान का एक अहम जुज़्व है। उलमा’ ए कराम इस बारे में फरमाते हैं, (नूरूल-अब्सार, सफ़हा: 117)
ومن حلوي الشَّرفَاء عَلَيْنَا وَإِنْ بَعْدُوا فِي النَّسب أَنْ تُؤْثِرِ رَضِاهُمْ عَلَى أَهْوَائِنَا وَشَهَوَاتِنَا وَلَعَظمَهُمْ وَتُوَكِّرُهُمْ وَلَا تَهْلِسُ فَوْقَ سَرِبُرٍ وَهُمْ عَلَى الْأَرْضِ
तर्जुमाः सादात का यह हक़ (अगर चे वोह नसब में बईद भी हों उसके बावजूद) हम पर लाज़िम है के हम अपनी आरज़ूओं और ख़्वाहिशात पर उनकी रज़ा को मुक़द्दम समझें और उनकी ता’ज़िम व तौक़ीर बजा लाएं और जब वोह ज़मीन पर बैठे हों तो हम चारपाइयों पर ना बैठें।
मज़कूरा बाला आयत की तफ़्सीर फरमाते हुए हुजूर अकरम ने इरशाद फरमाया, जिसे तबरानी और बैहक़ी में बरिवायत हज़रत अब्दुल्लाह इब्ने अब्बास से नक़ल फरमाया है। रिवायत है के हुजूर अकरम ने इरशाद फरमाया,
فانا اللى وَلدِ آدَمَ وَاكْرَمَهُمْ عَلَى اللهِ وَذَلِكَ قَوْلُهُ تَعَالَى فَجَعَلْنَكُمْ شُعُوبًا وَقَبَائِلَ لِتَعَارَفُوا
तर्जुमाः और मैं ही सबसे ज़्यादा मुत्तक़ी हूँ और औलादे आदम (अलैहिस्सलाम) में सबसे ज़्यादा अकरम (नसबन) हूँ और इसीलिए अल्लाह तआला का इरशाद है के हमने तुम्हारी शाखें और क़बीले बनाए ताके तुम आपस में पहचान रखो।

