
इमाम इब्ने क्रय्यिम लिखते हैं कि यह वह महान विजय है जिसके जरिए अल्लाह ने अपने दीन को, अपने रसूल को अपनी सेना को और अपने अमानतदार गिरोह को सम्मान दिया और अपने शहर को, अपने घर को, जिसे दुनिया वालों के लिए हिदायत का ज़रिया बनाया, कुफ़्फ़ार और मुश्कि के हाथों से छुटकारा दिलाया। इस विजय से आसमान वालों में खुशी की लहर दौड़ गई, इसकी वजह से लोग अल्लाह के दीन में जत्थ के जत्थ दाखिल हुए और धरती का चेहरा रोशनी और चमक-दमक से जगमगा उठा ।
इस लड़ाई की वजह
हुदैबिया समझौते के सिलसिले में हम यह बात बता चुके हैं कि इस समझौते की एक धारा यह थी कि जो कोई मुहम्मद सल्ल० के अहद व पैमान में दाखिल होना चाहे, दाखिल हो सकता है और जो कोई कुरैश के अहद व पैमान में दाखिल होना चाहे, दाखिल हो सकता है और जो क़बीला जिस फ़रीक़ के साथ शामिल होगा, उस फ़रीक़ का एक हिस्सा समझा जाएगा, इसलिए ऐसा कोई क़बीला अगर किसी हमले या ज़्यादती का शिकार होगा, तो यह खुद उस फ़रीक़ पर हमला और ज़्यादती समझी जाएगी।
इस धारा के अन्तर्गत बनू खुज़ाआ अल्लाह के रसूल सल्ल० के अह्द व पैमान में दाखिल हो गए और बनू बक्र कुरैश के अह्द व पैमान में। इस तरह दोनों क़बीले एक दूसरे से अम्न में और बे-खतर हो गए, लेकिन चूंकि इन दोनों क़बीलों में अज्ञानता-युग से दुश्मनी और खिंचाव चला आ रहा था, इसलिए जब इस्लाम का आना हुआ और हुदैबिया समझौता हो गया और दोनों फ़रीक़ एक दूसरे से सन्तुष्ट हो गए तो बनू बक्र ने इस मौक़े को ग़नीमत समझकर चाहा कि बनू खुजाओ से पुराना बदला चुका लें।
चुनांचे नौफुल बिन मुआविया वेली ने बनू बक्र की एक जमाअत साथ लेकर शाबान सन् 08 हि० में बनू खुज़ाआ पर रात के अंधेरे में हमला कर दिया। उस वक़्त बनू खुज़ाआ वतीर नामी एक सोते पर पड़ाव डाले हुए थे। उनके बहुत लोग मारे गए, कुछ झड़प और लंड़ाई भी हुई। से
उधर कुरैश ने इस हमले में हथियारों से बनू बक्र की मदद की, बल्कि उनके
1. जादुल मआद 2/160
कुछ आदमी भी रात के अंधेरे का फायदा उठाकर लड़ाई में शरीक हुए। बहरहाल हमलावरों ने बनू खुज़ाआ को खदेड़कर हरम तक पहुंचा दिया।
हरम में पहुंचकर बनू बक्र ने कहा, ऐ नौफुल ! अब तो हम हरम में दाखिल हो गए। तुम्हारा इलाह !… तुम्हारा इलाह !….
इसके जवाब में नौफ़ुल ने एक बड़ी बात कही, बोला, बनू बक्र ! आज कोई इलाह नहीं, अपना बदला चुका लो। मेरी उम्र की क़सम ! तुम लोग हरम में चोरी करते हो, तो क्या हरम में अपना बदला नहीं ले सकते ?
इधर बनू खुज़ाआ ने मक्का पहुंचकर बुदैल बिन वरक़ा खुज़ाई और अपने एक आज़ाद किए हुए गुलाम राफ़ेअ के घरों में पनाह ली और अम्र बिन सालिम खुज़ाई ने वहां से निकलकर तुरन्त मदीना का रुख किया और अल्लाह के रसूल सल्ल० की खिदमत में पहुंचकर खड़ा हो गया। उस वक़्त आप मस्जिदे नबवी में सहाबा किराम के दर्मियान तशरीफ़ रखते थे । अम्र बिन सालिम ने कहा-
‘ऐ परवरदिगार! मैं मुहम्मद को उनके शहर और उनके वालिद के पुराने अद’ की दुहाई दे रहा हूं। आप लोग औलाद थे और हम जनने वाले 2 फिर हमने ताबेदारी अख्तियार की और कभी उससे हाथ न खींचा। अल्लाह आपको हिदायत दे । आप ज़ोरदार मदद कीजिए, और अल्लाह के बन्दों को पुकारिए, वे मदद को आएंगे, जिनमें अल्लाह के रसूल होंगे हथियार बांधे हुए और चढ़े हुए चौदहवीं रात की तरह गोरे और खूबसूरत । अगर उन पर ज़ुल्म और उनकी तौहीन की जाए, तो चेहरा तमतमा उठता है। आप एक ऐसे भारी भरकम फ़ौज के भीतर तशरीफ़ लाएंगे जो झाग भरे समुद्र की तरह मौजें ले रहा होगा । यक़ीनन कुरैश ने आपके अद को भंग किया है और आपका पक्का पैमान तोड़ दिया है। उन्होंने मेरे लिए कदा में घात लगाई और यह समझा कि मैं किसी को (मदद के लिए) न पुकारूंगा, हालांकि वे बड़े ज़लील और तायदाद में थोड़े हैं। उन्होंने वतीर पर रात में हमला किया और हमें रुकूअ और सज्दे की हालत में क़त्ल किया। (यानी हम मुसलमान थे और हमें क़त्ल किया गया।)’.
1. इशारा उस अहद की ओर है, जो बनू खुज़ाआ और बनू हाशिम के बीच अब्दुल मुत्तलिब के ज़माने से चला आ रहा था। इसका उल्लेख किताब के शुरू में किया जा चुका है।
2. इशारा इस बात की ओर है कि अब्दे मुनाफ़ की मां यानी कुसई की बीवी हब्बी बनू खुनाआ से थीं। इसलिए. नबी सल्ल० का पूरा खानदान बनू खुज़ाआ की औलाद ठहरा ।
अल्लाह के रसूल सल्ल० ने फ़रमाया, ऐ अम्र बिन सालिम ! तेरी मदद की गई। इसके बाद आसमान में बादल का एक टुकड़ा दिखाई पड़ा। आपने फ़रमाया, यह बादल बनू काब की मदद की खुशखबरी से दमक रहा है।
इसके बाद बुदैल बिन वरना खुजाई की सरदारी में बनू खुजाओ की एक जमाअत मदीना आई और अल्लाह के रसूल सल्ल० को बताया कि कौन से लोग मारे गए और किस तरह कुरैश ने बनू बक्र को शह दिया। इसके बाद ये लोग मक्का वापस चले गए।
समझौते के नवीनीकरण के लिए अबू सुफ़िायन मदीना में
इसमें सन्देह नहीं कि कुरैश और उनके मित्रों ने जो कुछ किया था, वह खुली हुई बद-अदी और खुली पैमान शिकनी थी, जिसे सही साबित ही नहीं किया जा सकता। इसलिए खुद कुरैश को भी अपनी बद-अदी का बहुत जल्द एहसास हो गया और उन्होंने उसके अंजाम की संगीनी को नज़र में रखते हुए एक मश्विरे के लिए मज्लिस बुलाई, जिसमें तै किया कि वह अपने सेनापति अबू सुफ़ियान को अपना नुमाइन्दा बनाकर समझौते के नवीनीकरण के लिए मदीना रवाना करें।
इधर अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने सहाबा किराम को बताया कि कुरैश अपनी इस अहद शिकनी के बाद अब क्या करने वाले हैं। चुनांचे आपने फ़रमाया कि ‘गोया मैं अबू सुफ़ियान को देख रहा हूं कि वह अद को फिर से पक्का करने और समझौते की मुद्दत को बढ़ाने के लिए आ गया है।’
उधर अबू सुफ़ियान तैशुदा तज्वीज़ के मुताबिक़ रवाना होकर उस्फ़ान पहुंचा तो बुदैल बिन वरक़ा से मुलाक़ात हुई। बुदैल मदीना से मक्का वापस आ रहा था। अबू सुफ़ियान समझ गया कि यह नबी सल्ल० के पास से होकर आ रहा है, पूछा, बुदैल ! कहां से आ रहे हो ?
बुदैल ने कहा, मैं खुजाआ के साथ उस साहिल और वादी में गया था। पूछा, क्या तुम मुहम्मद सल्ल० के पास नहीं गए थे ? बुदैल ने कहा, नहीं ।
मगर जब बुदैल मक्का की ओर रवाना हुआ, तो अबू सुफ़ियान ने कहा, अगर वह मदीना गया था तो वहां (अपने ऊंट को) गुठली का चारा खिलाया होगा। इसलिए अबू सुफ़ियान उस जगह गया, जहां बुदैल ने अपा ऊंट बिठाया था और उसकी मेंगनी तोड़ी, तो उसमें खजूर की गुठली नज़र आई। अबू के पास सुफ़ियान ने कहा, मैं ख़ुदा की कसम खाकर कहता हूं कि बुदैल मुहम्मद गया था।
बहरहाल अबू सुफ़ियान मदीना पहुंचा और अपनी सुपुत्री उम्मुल मोमिनीन हज़रत उम्मे हबीबा रज़ि० के घर गया। जब अल्लाह के रसूल सल्ल० के बिस्तर पर बैठना चाहा, तो उन्होंने बिस्तर लपेट दिया। अबू सुफ़ियान ने कहा, बेटी ! क्या तुमने इस बिस्तर को मेरे लायक़ नहीं समझा ?
उन्होंने कहा, यह अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का बिस्तर है और आप नापाक मुश्कि आदमी हैं।
अबू सुफ़ियान कहने लगा, ख़ुदा की क़सम ! मेरे बाद तुम्हें शर (दुष्टताई) पहुंच गया है। फिर अबू सुफ़ियान वहां से निकलकर अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के पास गया और आपसे बात की। आपने उसे कोई जवाब न दिया । इसके बाद अबूबक्र रज़ि० के पास गया और उनसे कहा कि वह अल्लाह के रसूल सल्ल० से बात करें ।
उन्होंने कहा, मैं ऐसा नहीं कर सकता।
इसके बाद वह उमर बिन खत्ताब रजि० के पास गया और उनसे बात की। उन्होंने कहा, भला, मैं तुम लोगों के लिए अल्लाह के रसूल सल्ल से सिफ़ारिश करूंगा। इसके बाद वह हज़रत अली बिन अबी तालिब के पास पहुंचा। वहां हज़रत फ़ातमा रज़ि० भी थीं और हज़रत हसन भी थे, जो अभी छोटे से बच्चे थे और सामने फुदक-फुदक कर चल रहे थे। 1
अबू सुफ़ियान ने कहा, ऐ अली ! मेरे साथ तुम्हारा सबसे गहरा नसबी ताल्लुक़ है। मैं एक ज़रूरत से आया हूं। ऐसा न हो कि जिस तरह मैं नामुराद आया उसी तरह नामुराद वापस जाऊं। तुम मेरे लिए मुहम्मद से सिफ़ारिश कर दो ।
हज़रत अली रज़ि० ने कहा, अबू सुफ़ियान ! तुझ पर अफ़सोस ! अल्लाह के रसूल सल्ल० ने एक बात का इरादा कर लिया है। हम इस बारे में आपसे कोई बात नहीं कर सकते ।
इसके बाद वह हज़रत फ़ातमा रज़ि० की ओर मुतवज्जह हुआ और बोला, क्या आप ऐसा कर सकती हैं कि अपने इस बेटे को हुक्म दें कि वह लोगों के दर्मियान पनाह देने का एलान करके हमेशा के लिए अरब का सरदार हो जाए ?
रसूल हज़रत फ़ातमा ने कहा, अल्लाह की क़सम ! मेरा बेटा इस दर्जे को नहीं पहुंचा है कि लोगों के बीच पनाह देने का एलान कर सके और अल्लाह के सल्ल० के होते हुए कोई पनाह दे भी नहीं सकता।
इन कोशिशों और नाकामियों के बाद अबू सुफ़ियान की आंखों के सामने
दुनिया अंधेरी हो गई। उसने हज़रत अली बिन अबी तालिब रजि० से बड़ी घबराहट, संघर्ष और निराशा की हालत में कहा कि अबुल हसन! मैं देखता हूं मामला संगीन हो गया है, इसलिए मुझे कोई रास्ता बताओ।
हज़रत अली रजि० ने कहा, ख़ुदा की क़सम ! मैं तुम्हारे लिए कोई काम की चीज़ नहीं जानता, अलबत्ता तुम बनी कनाना के सरदार हो, इसलिए खड़े होकर लोगों के बीच अमान का एलान कर दो। इसके बाद अपनी धरती पर वापस चले जाओ ।
अबू सुफ़ियान ने कहा, क्या तुम्हारा ख्याल है कि यह मेरे लिए कुछ कारगर होगा ?
हज़रत अली रजि० ने कहा, नहीं, खुदा की क़सम ! मैं इसे कारगर तो नहीं समझता, लेकिन इसके अलावा कोई शक्ल भी तो समझ में नहीं आती।
इसके बाद अबू सुफ़ियान ने मस्जिद में खड़े होकर एलान किया कि लोगो ! मैं लोगों के बीच अमान का एलान कर रहा हूं। फिर अपने ऊंट पर सवार होकर मक्का चला गया।
कुरैश के पास पहुंचा तो वे पूछने लगे, पीछे का क्या हाल है ?
अबू सुफ़ियान ने कहा, मैं मुहम्मद के पास गया, बात की तो अल्लाह की क़सम ! उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया। फिर अबू कहाफ़ा के बेटे के पास गया, तो उसके अन्दर कोई भलाई नहीं पाई। इसके बाद उमर बिन खत्ताब के पास गया तो उसे सबसे कट्टर दुश्मन पाया। फिर अली के पास गया, तो उसे सबसे नर्म पाया। उसने मुझे एक राय दी और मैंने उस पर अमल भी किया, लेकिन पता नहीं वह कारामद भी है या नहीं ?
लोगों ने पूछा, वह क्या राय थी ?
अबू सुफ़ियान ने कहा, वह राय यह थी कि मैं लोगों के बीच अमान का एलान कर दूं और मैंने ऐसा ही किया।
कुरैश ने कहा, तो क्या मुहम्मद ने उसे लागू क़रार दिया ?
अबू सुफ़ियान ने कहा, नहीं।
लोगों ने कहा, तेरी तबाही हो। इस व्यक्ति (अली) ने तेरे साथ मात्र खिलवाड़ किया।
अबू सुफ़ियान ने कहा, ख़ुदा की क़सम ! इसके अलावा कोई शक्ल न बन “सकी।

