
झंडा, अल्लाह की तलवारों में से एक तलवार के हाथ में
इस मौक़े पर क़बीला बनू अजलान के साबित बिन अरक़म नामी एक सहाबी ने लपककर झंडा उठा लिया और फ़रमाया, मुसलमानो ! अपने किसी आदमी को सेनापति बना लो ।
1. सहीह बुखारी, बाब ग़ज़वा मूता मिन अर्जि शाम 2/611 2. वही
, 2/611
3. फत्हुल बारी 7/512, ज़ाहिर में तो दोनों हदीस में तायदाद का मतभेद है। दोनों में मेल यह किया गया है कि तीरों के घाव शामिल करके तायदाद बढ़ जाती है।
सहाबा ने कहा, आप ही यह काम अंजाम दें। उन्होंने कहा, मैं यह काम नहीं कर सकूंगा । इसके बाद सहाबा ने हज़रत खालिद बिन वलीद को चुना और उन्होंने झंडा लेते ही बड़ी ज़ोरदार लड़ाई शुरू कर दी। चुनांचे सहीह बुखारी में खुद हज़रत खालिद बिन वलीद रज़ि० से रिवायत है कि मूता की लड़ाई के दिन मेरे हाथ में नौ तलवारें टूट गईं। फिर मेरे हाथ में सिर्फ़ एक यमनी बाना (छोटी-सी तलवार) बाक़ी बचा।
और एक दूसरी रिवायत में उनका बयान इस तरह आता है कि मेरे हाथ में मूता की लड़ाई के दिन नौ तलवारें टूट गई और एक यमनी बाना मेरे हाथ में चिपककर रह गया 12
इधर अल्लाह के रसूल सल्ल० ने मूता की लड़ाई ही के दिन, जबकि अभी लड़ाई के मैदान से किसी क़िस्म की ख़बर नहीं आई थी, वह्य की बुनियाद पर फ़रमाया कि झंडा ज़ैद ने लिया और वह शहीद कर दिए गए। फिर जाफ़र ने लिया, वह भी शहीद कर दिए गए, फिर इब्ने रुवाहा ने लिया और वह भी शहीद कर दिए गए। इस बीच आंखों में आंसू भर आए थे, यहां तक कि झंडा अल्लाह की तलवारों में से एक तलवार ने लिया (और ऐसी लड़ाई लड़ी कि) अल्लाह ने उन पर विजय दिला दी 13
लड़ाई का अन्त
बड़ी बहादुरी, वीरता और ज़बरदस्त जांबाज़ी के बावजूद यह बात बड़ी आश्चर्य में डालने वाली थी कि मुसलमानों की यह छोटी-सी फ़ौज रूमियों की उस भारी सेना की तूफ़ानी लहरों के सामने डटी रह जाए, इसलिए इस नाजुक मरहले में हज़रत खालिद बिन वलीद रजि० ने मुसलमानों को इस भंवर से निकालने के लिए, जिसमें वे खुद कूद पड़े थे, अपनी निपुणता दिखाई।
रिवायतों में बड़ा मतभेद है कि इस लड़ाई का आखिरी अंजाम क्या हुआ । तमाम रिवायतों पर नज़र डालने से स्थिति यह मालूम होती है कि लड़ाई के पहले दिन हज़रत खालिद बिन वलीद दिन भर रूमियों के मुक़ाबले में डटे रहे, लेकिन
1. सहीह बुखारी, बाब ग़ज़वा मूता मिन अर्जि शाम 2/611 2. सहीह बुखारी, बाब ग़ज़वा मूता मिन अर्ज़ि शाम 2/611 3. वही, 2/611
वह एक ऐसी जंगी चाल की ज़रूरत महसूस कर रहे थे जिसके ज़रिए रूमियों पर रौब डालकर इतनी कामियाबी के साथ मुसलमानों को पीछे हटा लें कि रूमियों को पीछा करने की हिम्मत न हो, क्योंकि वह जानते थे कि अगर मुसलमान भाग खड़े हुए और रूमियों ने पीछा शुरू किया, तो मुसलमानों को उनके पंजे से बचाना बहुत कठिन होगा।
चुनांचे जब दूसरे दिन सुबह हुई तो उन्होंने फ़ौज की शक्ल और ढांचा बदल दिया और उसकी एक नई तर्तीब क़ायम की। अगली लाइन को पिछली लाइन और पिछली लाइन को अगली लाइन की जगह रख दिया और दाहिनी लाइन को बाईं से और बाईं को दाहिनी से बदल दिया। यह स्थिति देखकर दुश्मन चौंक गया और कहने लगा कि इन्हें कुमक पहुंच गई है, ग़रज़ रूमी शुरू ही में रौब खा गए।
उधर जब फ़ौजों का आमना-सामना हुआ और कुछ देर तक झड़प हो चुकी, तो हज़रत खालिद ने अपनी फ़ौज की व्यवस्था सुरक्षित रखते हुए मुसलमानों को थोड़ा-थोड़ा पीछे हटाना शुरू किया, लेकिन रूमियों ने इस डर से उनका पीछा न किया कि मुसलमान धोखा दे रहे हैं और कोई चाल चलकर उन्हें जंगल की समाइयों में फेंक देना चाहते हैं। इसका नतीजा यह हुआ कि दुश्मन अपने इलाक़े में वापस चला गया और मुसलमानों का पीछा करने की बात न सोची। इधर मुसलमान कामियाबी और सलामती के साथ पीछे हटे और फिर मदीना वापस आ गए। 1
दोनों फ़रीक़ के मारे गए लोग
इस लड़ाई में 12 मुसलमान शहीद हुए। रूमियों के मारे गए लोगों का पता न चल सका, अलबत्ता लड़ाई का विवरण बताता है कि के बड़ी तादाद में मारे गए। अन्दाज़ा किया जा सकता है कि जब तंहा हज़रत खालिद के हाथ में नौ तलवारें टूट गईं तो मारे जाने वालों और घायलों की तायदाद कितनी रही होगी ?
इस लड़ाई का प्रभाव
इस लड़ाई की तेज़ी, जो बदले के लिए झेली गई थीं, मुसलमान अगरचे वह
1. देखिए फत्हुल बारी 7/513, 514, जादुल मआद 2/156, लड़ाई का विस्तृत विवेचन पिछले स्रोतों के साथ इन दोनों स्रोतों से भी लिया गया है।
बदला न ले सके, लेकिन इस लड़ाई ने मुसलमानों की साख और शोहरत में बड़ी वृद्धि की। इसकी वजह से सारे अरब ने दांतों तले उंगली दबा ली, क्योंकि रूमी उस वक़्त धरती की सबसे बड़ी ताक़त थे। अरब समझते थे कि उनसे टकराना आत्महत्या से कम नहीं है, इसलिए तीन हज़ार की तायदाद का दो लाख की भारी भरकम फ़ौज से टकराकर कोई उल्लेखनीय हानि उठाए बिना वापस आ जाना कुछ कम आश्चर्य की बात न थी।
इससे यह सच्चाई भी बड़े पक्के सबूत के साथ सामने आ गई कि अरब अब तक जिस क़िस्म के लोगों को जानते थे, मुसलमान उनसे अलग-थलग एक दूसरी ही क़िस्म के लोग हैं। उनको अल्लाह की ताईद और मदद हासिल है और उनके रहनुमा वाक़ई अल्लाह के रसूल हैं। इसीलिए हम देखते हैं कि वे ज़िद्दी क़बीले जो मुसलमानों से बराबर लड़ते रहते थे, इस लड़ाई के बाद वे इस्लाम की ओर झुक गए, चुनांचे बनू सुलैम, अशजअ, ग़तफ़ान, जिबयान और फ़ज़ारा वग़ैरह क़बीलों ने इस्लाम कुबूल कर लिया !
यही लड़ाई है, जिसमें रूमियों के साथ खूनी टक्कर हुई थी, जो आगे चलकर रूमी देशों की जीतों और दूर-दूर के इलाक़ों पर मुसलमानों की सत्ता का आरंभ-बिन्दु साबित हुई ।
सरीया ज्ञातुस्सलासिल
जब अल्लाह के रसूल सल्ल० को मूता की लड़ाई के सिलसिले में मशारिफ़े शाम के अन्दर रहने वाले अरब क़बीलों के दृष्टिकोणों का ज्ञान हुआ कि वे मुसलमानों से लड़ने के लिए रूमियों के झंडे तले जमा हो गए थे, तो आपने एक ऐसी रणनीति की ज़रूरत महसूस की, जिसके ज़रिए एक ओर तो इन अरब क़बीलों और रूमियों के बीच फूट पड़ जाए और दूसरी ओर खुद मुसलमानों से उनकी दोस्ती हो जाए, ताकि उस इलाक़े में दोबारा आपके खिलाफ़ इतना बड़ा जत्था जमा न हो सके।
इस मक़सद के लिए आपने हज़रत अम्र बिन आस रज़ियल्लाहु अन्हु को चुना, क्योंकि उनकी दादी क़बीला बलि से ताल्लुक रखती थीं। चुनांचे आपने मूता की लड़ाई के बाद ही यानी जुमादल आखिर सन् 08 हि० में उनका दिल रखने के लिए हज़रत अम्र बिन आस रजि० को उनकी ओर रवाना फ़रमाया ।
ने कहा जाता है कि जासूसों ने यह सूचना भी दी थी कि बनू कुज़ाआ मदीना के चारों तरफ़ हल्ला बोलने के इरादे से एक टुकड़ी बनाई थी, इसलिए आपने हज़रत अम्र बिन आस को उनकी ओर रवाना किया। संभव है दोनों
वजहें जमा हो गई हों।
बहरहाल अल्लाह के रसूल सल्ल० ने हज़रत अम्र बिन आस के लिए सफ़ेद झंडा बांधा और उसके साथ काली झंडियां भी दीं और उनकी कमान में बड़े-बड़े मुहाजिरों और अंसार की तीन सौ नफ़री देकर उन्हें विदा किया। उनके साथ तीस घोड़े भी थे। आपने हुक्म दिया कि बली और अज़रा और बिलक़ीन के जिन लोगों के पास से गुज़रें, उनसे मदद चाहें। वे रात को सफ़र करते और दिन को छिपते रहते थे। जब दुश्मन के क़रीब पहुंचे तो मालूम हुआ, उनका जत्था बहुत बड़ा है इसलिए हज़रत राफ़ेअ बिन मुकैस जुहनी को कुमक तलब करने के लिए अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की खिदमत में भेज दिया।
अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने हज़रत अबू उबैदा बिन जर्राह को झंडा देकर उनकी सरदारी में दो सौ फ़ौजियों की कुमक रवाना फ़रमाई, जिसमें मुहाजिरों के बड़े, जैसे अबूबक्र और उमर, और अंसार के सरदार भी थे। हज़रत अबू उबैदा रज़ि० को हुक्म दिया गया कि अम्र बिन आस से जा मिलें और दोनों मिलकर काम करें, मतभेद न करें। वहां पहुंचकर अबू उबैदा रज़ि० ने इमामत करनी चाही, लेकिन हज़रत अम्र ने कहा, आप मेरे पास कुमक के तौर पर आए हैं। सरदार मैं हूं, अबू उबैदा ने उनकी बात मान ली और नमाज़ हज़रत अम्र ही पढ़ाते रहे ।
कुमक आ जाने के बाद यह फ़ौज और आगे बढ़कर कुज़ाआ के इलाक़े में दाखिल हुई और उस इलाक़े को रौंदती हुई उसकी दूर-दूर की हदों में जा पहुंची। अन्त में एक फ़ौज से लड़ाई हुई, लेकिन जब मुसलमानों ने उस पर हमला किया तो वह इधर-उधर भाग कर बिखर गई।
इसके बाद औफ़ बिन मालिक अशजओ रज़ि० को दूत बनाकर अल्लाह के रसूल सल्ल० की खिदमत में भेजा गया। उन्होंने मुसलमानों की सलामती के साथ वापसी की ख़बर दी और ग़ज़वे का विवरण दिया।
ज्ञातुस्सलासिल वादिल कुरा से आगे एक भू-भाग का नाम है। यहां से मदीना का फ़ासला दस दिन है। इब्ने इस्हाक़ का बयान है कि मुसलमान क़बीला जज़ाम की धरती पर स्थित सलसल नामी एक सोते पर उतरे थे। इसलिए इस मुहिम का नाम ज्ञातुस्सलासिल पड़ गया।
1. देखिए इब्ने हिशाम, 2/623-626, जादुल मआद 2/157
सरीया ख़ज़रा (शाबान 08 हि०)
इस सरीया की वजह यह थी कि नज्द के अन्दर क़बीला मुहारिब के इलाक़े में खज़रा नामी एक जगह पर बनू ग़तफ़ान फ़ौज जमा कर रहे थे, इसलिए उनका सर कुचलने के लिए अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने हज़रत अबू क़तादा को पन्द्रह आदमियों का जत्था देकर रवाना किया। उन्होंने दुश्मन के कई आदमियों को क़त्ल और क़ैद किया और ग़नीमत का माल भी हासिल किया। इस मुहिम में वह पन्द्रह दिन मदीना से बाहर रहे । ‘
तलकीहुल फहूम, पृ० 33

