“ला इलाहा इल्ला अल्लाह, मुहम्मदुर रसूलुल्लाह” के साथ **”अलियुन वलीुल्लाह”

अहले सुन्नत की विभिन्न हदीस, इतिहास और तफ़्सीर की किताबों से “ला इलाहा इल्ला अल्लाह, मुहम्मदुर रसूलुल्लाह” के साथ **”अलियुन वलीुल्लाह” (یا علی ولی اللہ) साबित । 🔥

1. अल-मुअजम अल-औसत (इमाम तबरानी)💥
इमाम तबरानी ने अपनी मशहूर किताब में मेराज की रात का वाकया बयान करते हुए लिखा है:
> **हदीस:** रसूलुल्लाह (स.अ.व.व.) ने फ़रमाया: “जब मुझे मेराज कराई गई, तो मैंने अर्श पर लिखा हुआ देखा: **’ला इलाहा इल्ला अल्लाह, मुहम्मदुर रसूलुल्लाह, अज्ज़दतुहु बि-अली’** (अल्लाह के अलावा कोई माबूद नहीं, मुहम्मद उसके रसूल हैं, मैंने उनकी मदद अली के ज़रिए की)।”
📚हवाला:** इमाम तबरानी, *अल-मुअजम अल-औसत*, जिल्द 6, सफा 269।

2. तारीख-ए-बगदाद (खतीब बग्दादी)💥
मशहूर सुन्नी इतिहासकार खतीब बग्दादी ने जन्नत के दरख्तों और दरवाजों पर लिखे होने का ज़िक्र किया है:
> **हदीस:** हज़रत जाबिर बिन अब्दुल्लाह (रज़ि.) से रिवायत है कि हुज़ूर (स.अ.व.व.) ने फ़रमाया: “जन्नत के दरवाज़े पर लिखा हुआ है: **’ला इलाहा इल्ला अल्लाह, मुहम्मदुर रसूलुल्लाह, अलियुन अखू रसूलुल्लाह’** (अली अल्लाह के रसूल के भाई हैं) और यह मेराज से दो हज़ार साल पहले लिखा गया था।”
📚हवाला:** खतीब बग्दादी, *तारीख-ए-बगदाद*, जिल्द 7, सफा 387।

3. शवाहिद अत्-तन्ज़ील (हाकिम हसकानी)💥
अहले सुन्नत के बड़े मुफस्सिर (तफ़्सीरकार) हाकिम हसकानी ने सूरह अल-बाकरा की आयत के तहत यह रिवायत दर्ज की है:
> **इबारत:** जन्नत के पत्तों और अर्श के पायों पर लिखा है: **’ला इलाहा इल्ला अल्लाह, मुहम्मदुर रसूलुल्लाह, अलियुन वलीुल्लाह’** या **’अज्ज़दतुहु बि-अली’**।
📚हवाला:** हाकिम हसकानी, *शवाहिद अत्-तन्ज़ील*, जिल्द 1, सफा 223-224।

4. मनाकिब अली बिन अबी तालिब (इमाम इब्ने मग़ाज़िली)💥
इमाम इब्ने मग़ाज़िली शाफ़ई ने अपनी किताब ‘मनाकिब’ में कई ऐसी रिवायत नक़्ल की हैं:
> **रिवायत:** रसूलुल्लाह (स.अ.व.व.) ने फ़रमाया: “जब अल्लाह ने अर्श को पैदा किया, तो उस पर नूर से लिखा: **’ला इलाहा इल्ला अल्लाह, मुहम्मदुर रसूलुल्लाह, अलियुन वलीुल्लाह व वज़ीरुल्लाह’**।”
📚हवाला:** इब्ने मग़ाज़िली शाफ़ई, *मनाकिब अली बिन अबी तालिब*, सफा 46।

5. अल-रियाज़ अल-नज़राह (हाफ़िज़ मुहिबुद्दीन तबरी)💥
सुन्नी विद्वान हाफ़िज़ मुहिबुद्दीन तबरी ने अपनी किताब में लिखा है:
> **रिवायत:** जन्नत के दरवाज़े पर सोने के अक्षरों में लिखा हुआ है: **’ला इलाहा इल्ला अल्लाह, मुहम्मदुर रसूलुल्लाह, अलियुन वलीुल्लाह व असदुल्लाह’**।
📚हवाला:** मुहिबुद्दीन तबरी, *अल-रियाज़ अल-नज़राह फी मनाकिब अल-अशराह*, जिल्द 2, सफा 201।

इसी तरह कई कुतुब में हवाले मौजूद है अगर सभी हवाले यहां लिखूंगा तो पोस्ट बहुत लंबी हो जाएगी इसलिए उनके सिर्फ स्कैन पेज डाल रहा हूं नीचे 👇🏻👇🏻👇🏻👇🏻👇🏻👇🏻👇🏻👇🏻👇🏻👇🏻👇🏻👇🏻👇🏻👇🏻👇🏻👇🏻👇🏻👇🏻👇🏻👇🏻👇🏻👇🏻👇🏻👇🏻

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