
4. क़ैसर शाहे रूम के नाम पत्र
सहीह बुखारी की एक लम्बी हदीस में उस पत्र का मूल पाठ लिखा हुआ है जिसे अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने हिरक़्ल शाहे रूम के पास रवाना फ़रमाया था, वह पत्र इस तरह है-
बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम०
अल्लाह के बन्दे और उसके रसूल मुहम्मद की ओर से हिरक़्ल अज़ीम रूम के नाम
उस व्यक्ति पर सलाम जो हिदायत की पैरवी करे, तुम इस्लाम लाओ सालिम रहोगे। इस्लाम लाओ अल्लाह तुम्हें तुम्हारा बदला दो बार देगा और अगर तुमने मुंह फेरा तो तुम पर अरीसियों (जनता) का भी गुनाह होगा । ऐ अहले किताब ! एक ऐसी बात की ओर आओ जो हमारे और तुम्हारे दर्मियान बराबर है कि हम अल्लाह के सिवा किसी और को न पूजें, उसके साथ किसी चीज़ को शरीक न करें और अल्लाह के बजाए हमारा कोई भी व्यक्ति किसी को रब न बनाए । पस अगर लोग रुख फेरें तो कह दो कि तुम लोग गवाह रहो, हम मुसलमान हैं। 2
इस पत्र को पहुंचाने के लिए दिया बिन खलीफ़ा कलबी का चुनाव हुआ । आपने उन्हें हुक्म दिया कि वह यह पत्र सरबराह बसरी के हवाले कर दें और वह’ उसे क़ैसर के पास पहुंचा देगा। इसके बाद जो कुछ पेश आया, उसका विवेचन सहीह बुखारी में इब्ने अब्बास रज़ियल्लाहु अन्हु की रिवायत में मिलता है। उनका इर्शाद है कि अबू सुफ़ियान बिन हर्ब ने उनसे बयान किया कि हिरक़्ल ने उसको कुरैश की एक जमाअत समेत बुलाया। यह जमाअत हुदैबिया समझौते के
1. मुहाज़राते खज़री 1/147, फ़हुल बारी 8/127, 128, साथ ही देखिए रहमतुल- लिल आलमीन 2. सहीह बुखारी 1/4, 5
तहत अल्लाह के रसूल सल्ल० और कुरैश के कुफ्फार के दर्मियान तैशुदा अम्न की मुद्दत में शामदेश को तिजारत के लिए गई हुई थी। ये लोग एलिया (बैतुल मक़िदस) में उसके पास हाज़िर हुए।
हिरक़्ल ने उन्हें अपने दरबार में बुलाया। उस वक्त उसके गिर्दा गिर्द रूम के बड़े-बड़े लोग थे। फिर उसने उनको और अपने तर्जुमान को बुलाकर कहा कि यह आदमी जो अपने आपको नबी समझता है, उससे तुम्हारा कौन-सा आदमी सबसे ज्यादा क़रीब नसबी ताल्लुक रखता है?
अबू सुफ़ियान का बयान है कि मैंने कहा, मैं उसका सबसे ज्यादा करीबी खानदानी आदमी हूं ।
हिरकुल ने कहा, इसे मेरे क़रीब कर दो और इसके साथियों को भी करीब करके उसकी पीठ के पीछे बिठा दो। इसके बाद हिरकुल ने अपने तर्जुमान के ज़रिए अबू सुफ़ियान के साथियों से कहा कि मैं इस आदमी से उस आदमी (नवी सल्ल०) के बारे में सवाल करूंगा। अगर यह झूठ बोले तो तुम लोग उसे झुठला देना ।
अबू सुफ़ियान कहते हैं कि ख़ुदा की कसम ! अगर झूठ बोलने की बदनामी का डर न होता तो मैं आपके बारे में यक़ीनन झूठ बोलता ।
अबू सुफ़ियान कहते हैं, इसके बाद पहला सवाल जो हिरकुल ने मुझसे आपके बारे में किया, वह यह था कि तुम लोगों में उसका खानदान कैसा है ? मैंने कहा—वह ऊंचे खानदान वाला है।
हिरक़्ल ने कहा— तो क्या यह बात इससे पहले भी तुममें से किसी ने कही थी ?
मैंने कहा- नहीं।
1. उस वक्त कैंसर इस बात पर अल्लाह का शुक्र बजा लाने के लिए हम्स से एलिया (बैतुल मक़िदस) गया हुआ था कि अल्लाह ने उसके हाथों फ़ारस वालों को जबरदस्त हार दी। (देखिए सहीह मुस्लिम 2/99) विस्तार में यों है कि फारसियों ने खुसरो परवेज़ को क़त्ल करने के बाद रूमियों से उनके क़ब्ज़े के इलाकों की वापसी की शर्त पर सुलह कर ली और वह क्रास भी वापस का दिया जिसके बारे में ईसाइयों का अक़ीदा है कि उसी पर हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम को फांसी दी गई थी। कैंसर इस समझौते के बाद क्रास को असल जगह लगाने और इस खुली जीत पर अल्लाह का शुक्र बजा लाने के लिए 629 ई० यानी सन् 07 हि० में एलिया (बैतुल मदिस) गया था।
हिरक़्ल ने कहा—क्या इसके बाप-दादा में से कोई बादशाह गुजरा है ? मैंने कहा- नहीं।
हिरक़्ल ने कहा-अच्छा तो बड़े लोगों ने उसकी पैरवी की है या कमज़ोरों ने ? मैंने कहा—बल्कि कमज़ोरों ने ।
हिरकुल ने कहा- क्या इस दीन में दाखिल होने के बाद कोई व्यक्ति इस दीन से घबराकर अलग भी हो गया है ?
मैंने कहा- नहीं।
हिरक़्ल ने कहा—उसने जो बात कही है, क्या उसे कहने से पहले तुम लोग उसको झूठे के नाम से याद करते थे ?
मैंने कहा, नहीं ।
हिरव़ल ने कहा, क्या वह बद-अहदी भी करता है ?
मैंने कहा, नहीं, अलबत्ता हम लोग इस वक़्त उसके साथ समझौते की एक मुद्दत गुज़ार रहे हैं, मालूम नहीं, इसमें वह क्या करेगा ?
अबू सुफ़ियान कहते हैं कि इस एक वाक्य के सिवा मुझे और कहीं कुछ घुसेड़ने का कोई मौक़ा न मिला।
हिरव़ल ने कहा- क्या तुम लोगों ने उससे लड़ाई लड़ी है ?
मैंने कहा- जी हां।
हिरक़्ल ने कहा–तो तुम्हारी और उसकी लड़ाई कैसी रही ?
मैंने कहा-लड़ाई हमारे और उसके बीच डोल है। वह हमें दुख दे लेता है और हम उसे दुख पहुंचा लेते हैं।
हिरक़्ल ने कहा—वह तुम्हें किन बातों का हुक्म देता है ?
मैंने कहा—वह कहता है सिर्फ़ अल्लाह की इबादत करो, उसके साथ किसी चीज़ को शरीक न करो। तुम्हारे बाप-दादा जो कुछ कहते थे, उसे छोड़ दो और वह हमें नमाज़, सच्चाई, परहेज़गारी, पाकदामनी और रिश्तेदारों के साथ अच्छे बर्ताव का हुक्म देता है।
इसके बाद हिरक़्ल ने अपने तर्जुमान से कहा, तुम इस आदमी (अबू सुफ़ियान) से कहो कि मैंने तुमसे उस व्यक्ति का खानदान पूछा तो तुमने बताया कि वह ऊंचे खानदान का है और क़ायदा यही है कि पैग़म्बर अपनी क़ौम के ऊंचे खानदान में भेजे जाते हैं।
और मैंने मालूम किया कि क्या यह बात इससे पहले भी तो तुममें से किसी
ने कही थी। तुमने बतलाया नहीं। मैं कहता हूं कि अगर यह बात इससे पहले किसी और ने कही होती, तो मैं यह कहता कि यह आदमी एक ऐसी बात की नक़्क़ाली कर रहा है, जो इससे पहले कही जा चुकी है ।
और मैने मालूम किया कि क्या इसके बाप-दादों में कोई बादशाह गुजरा है, तो तुमने बतलाया कि नहीं। मैं कहता हूं कि अगर उसके बाप-दादों में कोई बादशाह गुज़रा होता तो मैं कहता कि यह व्यक्ति अपने बाप की बादशाही चाहता है।
और मैंने यह मालूम किया कि क्या जो बात उसने कही है, उसे कहने से पहले तुम लोग उसमें झूठ पाते थे? तो तुमने बताया कि नहीं। और मैं अच्छी तरह जानता हूं कि ऐसा नहीं हो सकता कि वह लोगों पर तो झूठ न बोले और अल्लाह पर झूठ बोले ।
मैंने यह भी मालूम किया कि बड़े लोग उसकी पैरवी कर रहे हैं या कमज़ोर । तो तुमने बताया कि कमज़ोरों ने उसकी पैरवी की और सच तो यही है कि यही लोग पैग़म्बरों के पैरोकार होते हैं
मैंने पूछा कि क्या इस दीन में दाखिल होने के बाद कोई व्यक्ति इससे पलटा भी है ? तो तुमने बतलाया कि नहीं और सच तो यह है कि ईमान जब दिलों में घुस जाता है, तो ऐसा ही होता है।
और मैंने मालूम किया कि क्या वह बद-अदी भी करता है ? तो तुमने बतलाया कि नहीं और पैग़म्बर ऐसे ही होते हैं, वे बद-अहदी नहीं करते।
मैंने यह भी पूछा कि वह किन बातों का हुक्म देता है ? तो तुमने बताया कि वह तुम्हें अल्लाह की इबादत करने और उसके साथ किसी चीज़ को शरीक न ठहराने का हुक्म देता है। बुतपरस्ती से मना करता है और नमाज़, सच्चाई, परहेज़गारी और पाकदामनी का हुक्म देता है।
तो जो कुछ तुमने बताया है, अगर वह सही है, तो यह व्यक्ति बहुत जल्द मेरे इन दोनों क़दमों की जगह का मालिक हो जाएगा। मैं जानता था कि यह नबी आने वाला है, लेकिन मेरा यह गुमान न था कि वह तुममें से होगा। अगर मुझे यक़ीन होता कि मैं उसके पास पहुंच सकूंगा, तो उससे मुलाक़ात की तकलीफ़ उठाता और अगर उसके पास होता तो उसके दोनों पांव धोता। इसके बाद हिरक़्ल ने रसूलुल्लाह सल्ल० का पत्र मंगाकर पढ़ा। जब पत्र पढ़ चुका तो वहां आवाज़ें उठने लगीं और बड़ा शोर मचा। हिरक़्ल ने हमारे बारे में हुक्म दिया कि हम बाहर कर दिए जाएं। जब हम लोग बाहर लाए गए, तो मैंने अपने साथियों।
से कहा, ‘अबू कबशा’ के बेटे का मामला बड़ा जोर पकड़ गया। इससे तो बनू असफ़र (रूमियों) 2 का बादशाह डरता है।’ इसके बाद मुझे बराबर यक़ीन रहा कि रसूलुल्लाह सल्ल० का दीन ग़ालिब आकर रहेगा, यहां तक कि इस्लाम मेरे दिल की आवाज़ बन गया। 3
यह क़ैसर पर नबी सल्ल० के पत्र का वह असर था, जिसके गवाह अबू सुफ़ियान भी थे। इस पत्र का एक असर यह भी हुआ कि क़ैसर ने अल्लाह के रसूल सल्ल० के इस मुबारक पत्र को पहुंचाने वाले यानी दिल्ह्या कलबी रज़ि० को माल और उपहार दिया, लेकिन हज़रत दिया ये उपहार लेकर वापस हुए तो क़बीला जुज़ाम के कुछ लोगों ने उन पर डाका डालकर सब कुछ लूट लिया । हुमा में
हज़रत दिया मदीना पहुंचे तो अपने घर के बजाए सीधे मस्जिदे नबवी में हाज़िर हुए और सारी बात कह सुनाई। पूरी बातें सुनकर अल्लाह के रसूल सल्ल० ने हज़रत ज़ैद बिन हारिसा के नेतृत्व में पांच सौ सहाबा किराम की एक जमाअत हुमा भेजी। हज़रत ज़ैद ने क़बीला जुज़ाम पर रात में छापा मारकर उनकी अच्छी- भली तायदाद को क़त्ल कर दिया और उनके जानवरों और औरतों को हांक लाए। जानवरों में एक हज़ार ऊंट और पांच हज़ार बकरियां थीं और क़ैदियों में एक सौ औरतें और बच्चे थे ।
चूंकि नबी सल्ल० और क़बीला जुज़ाम में पहले से समझौता चला आ रहा था, इसलिए इस क़बीले के एक सरदार ज़ैद बिन रफ़ाआ जुज़ामी ने झट नबी सल्ल० की सेवा में अपना विरोध नोट कराया। ज़ैद बिन रफ़ाआ उस क़बीले के कुछ और लोगों समेत पहले ही मुसलमान हो चुके थे और जब हज़रत दिह्या पर डाका पड़ा था, तो उनकी मदद भी की थी, इसलिए नबी सल्ल० ने उनका विरोध
1. अबू कबशा के बेटे से मुराद नबी सल्ल० की जाते गरामी है। अबू कबशा रजज़ बिन ग़ालिब खुज़ाई की कुन्नियत (उपाधि) है। वह वहब बिन अब्दे मुनाफ़ के नाना थे । अबू कंबशा मुश्कि था, शाम गया तो ईसाई हो गया। जब नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने कुरैश के दीन का विरोध किया और हनीफ़ीया लेकर आए तो आपकी त्रुटि निकालने के लिए उसकी उपमा दी और उसकी तरफ़ जोड़ दिया। (दलाइलुन्नुबूवः, बैहक़ी 1/82, 83, सीरते नबवीया व अवी हातिम, पृ० 44) बहरहाल अबू कबशा अनजाना शब्द है और अरबों का तरीक़ा था कि जब किसी की. निन्दा करनी होती तो उसके बाप-दादों में से किसी अनजाने व्यक्ति से उसे जोड़ देते। 2. रूमियों को बनू असफ़र कहा जाता है, क्योंकि रूम के जिस बेटे से रूमियों की नस्ल
थी, वह किसी वजह से असफ़र (पीले) की उपाधि से जाना जाने लगा था। 3. सहीह बुखारी 1/4, सहीह मुस्लिम 2/79-99
स्वीकार करते हुए माले ग़नीमत और क़ैदी वापस कर दिए।
ग़ज़वे की तारीख लिखने वालों ने आम तौर से इस घटना को हुदैबिया समझौते से पहले बताया है, पर यह भारी ग़लती है, क्योंकि क़ैसर के पास जो पत्र भेजा गया, भेजने का यह काम हुदैबिया समझौते के बाद अमल में लाया गया था, इसीलिए अल्लामा इब्ने क़ैयिम ने लिखा है कि यह घटना बेशक हुदैबिया के बाद की है। ‘

