
Imam Hussain aur Mazamir e Zaboor | امام حسین اور مزامیرِ زبور |



हज़रत इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) की एक रवायत
मुवर्रिख़े दमिश्क़ अल्लामा शम्सुद्दीन इब्ने तालून लिखते हैं कि हज़रत इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) ने अपने आबाओ अजदाद से रवायत करते हुए इरशाद फ़रमाया है कि हज़रत अली (अ.स.) ने बयान फ़रमाया है कि जब आं हज़रत (स अ व व ) ने मुझे यमन की तरफ़ भेजा था तो चन्द ख़ास वसीअतें की थीं जिनमें एक यह थी ‘‘ या अली माख़ाबा मन इस्तेख़ारो लानदम मन इस्तेशार ’’ जो शख़्स अपने कामों में इस्तेख़ारा कर लिया करेगा वह ख़ाएब यासिर न होगा और जो अपने मुख़लिस दोस्तों से मशविरा किया करेगा वह नादिमो शर्मिन्दा न होगा मन इस्तेफ़ादा काफ़िल्लाह फ़क़त इस्तेफ़ाद बैतन फिल जन्नत जो अपने भाई को फ़ी सबीलिल्लाह फ़ाएदा पहुँचाएगा वह जन्नत में अपना घर बनवा लेगा।(अल मता अल असना अशर पृष्ठ 103 प्रकाशित बैरूत)
मामून की वफ़ात, मोतसिम की खि़लाफ़त और हज़रत इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) की गिरफ़्तारी
शादी के बाद हज़रत इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) मदीने में क़दरे पुर सुकून ज़िन्दगी बसर कर रहे थे यानी आपको वह ख़दशा न था जो हुकूमते वक़्त की तरफ़ से आपके आबाओ अजदाद को हर वक़्त लगा रहता था और जिसके नतीजे में शहादत का दर्जा नसीब होता रहता था। आपको जो तकलीफ़ थी वह उम्मुल फ़ज़ल के शिकायती ख़ुतूत की थी जिनके ज़रिए से वह मामून की अनाने तवज्जा आपकी मुख़ालेफ़त की तरफ़ मोड़ना चाहती थीं। मामून चुंकि होशियार और अपने किए के निभाने का आदी था इस लिये उसने कोई परवाह नहीं की लेकिन इसके बाद वाले ख़लीफ़ा ने इसको पूरी अहमियत दे कर आपका काम तमाम कर दिया।
अल्लामा अली नक़ी लिखते हैं कि 218 हिजरी में मामून ने दुनियां को ख़ैर बाद कहा। अब मामून का भाई और उम्मुल फ़ज़ल का चचा मोतसिम जो इमाम रज़ा (अ.स.) के बाद वली अहद बनाया जा चुका था तख़्ते सलतनत पर बैठा और मोतसिम बिल्लाह अब्बासी के नाम से मशहूर हुआ , इसके बैठते ही इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) के मुताअल्लिक़ उम्मुल फ़ज़ल के इसी तरह के शिकायती ख़ुतूत की रफ़्तार बढ़ गई , जिस तरह के उसने अपने बाप मामून को भेजे थे। मामून ने जो तमाम बनी अब्बासीयों की मुख़ालेफ़तों के बवजूद भी अपनी लड़की का निकाह इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) के साथ कर दिया था इस लिये अपनी बात की पच और किए की लाज रखने की ख़ातिर उसने उन शिकायतों पर कोई तवज्जोह नही दी बल्कि मायूस कर देने वाले जवाब से बेटी की ज़बान बन्द कर दी मगर मोतसिम जो इमाम रज़ा (अ.स.) की वली अहदी का दाग़ अपने सीने पर लिये हुए था और इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) को दामाद बनाए जाने से तमाम बनी अब्बास के नुमाइन्दे की हैसियत से पहले ही इख़्तेलाफ़ करने वालों में पेश पेश रह चुका था। अब उम्मुल फ़ज़ल के शिकायती ख़ुतूत को अहमियत दे कर अपने इस इख़्तेलाफ़ को जो इस निकाह से था हक़ बा जानिब करना चाहता था। फिर सब से ज़्यादा इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) की इल्मी मरजीयत आपके इख़लाक़ी असर का शोहरा जो हिजाज़ से बढ़ कर ईराक़ तक पहुँचा हुआ था , वह बिना मुख़ासेमत जो मोतसिम के बुज़ुर्गों को इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) के बुज़ुर्गों से रह चुकि थी वह फिर इस सियासत की नामी और मन्सूबा की शिकस्त का महसूस हो जाना जो इस अक़्द का मुहर्रिक हुआ था जिसकी तशरीह पहले हो चुकि है। यह तमाम बातें थीं कि मोतसिम मुख़ालेफ़त के लिये अमादा हो गया। उसने अपनी सलतनत के दूसरे ही साल इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) को मदीने से बग़दाद की तरफ़ जबरन बुलवा भेजा। हाकिमे मदीना अब्दुल मलिक को इस बारे में ताक़िदी ख़त लिखा मजबूरन इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) अपने फ़रज़न्द हज़रत इमाम अली नक़ी (अ.स.) और उनकी वालेदा को मदीने में छोड़ कर बग़दाद की तरफ़ रवाना हो गए। मुल्ला मोहम्मद मुबीन फिरंगी महली कहते हैं कि जब मामून के बाद मोतसिम ख़लीफ़ा हुआ और उसने इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) के फ़ज़ाएल का आवाज़ सुना तो बराए बुग़ुज़ व अनाद मदीना ए मुनव्वरा से ब मुक़ाम बग़दाद आपको तलब कर लिया। इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) जब मदीने से चलने लगे तो उन्होंने अपने फ़रज़न्द इमाम अली नक़ी (अ.स.) को अपना वसी और ख़लीफ़ा क़रार दे कर कुतुबे उलूमे इलाही और असारे जनाबे रिसालत पनाही उन्हें सुपुर्द फ़रमाया , उसके बाद मदीने से रवाना हो कर नवीं मोहर्रम ( 9 मोहर्रम) 220 हिजरी को बग़दाद पहुँचे और मोतसिम ने उसी साल उनको शहीद कर दिया।(वसीलाए नजात पृष्ठ 260 )