
हुजूर ﷺ ने रोटी का टुकड़ा उठा लिया*
उम्मुल मोमिनीन हज़रते आयशा सिद्दीक़ा रदी अल्लाहु अन्हा फ़रमाती हैं, कि नूर के पैकर, तमाम नबियों के सरवर, दो जहां के ताजवर, सुल्ताने बहरोबर *ﷺ* मेरे पास तशरीफ़ लाए और रोटी का एक टुकड़ा गिरा हुवा देखा, तो उसे (उठा कर) पोंछा और इरशाद फ़रमाया : *“ऐ आयशा ! अल्लाह की नेअ़मतों का एहतिराम किया करो ! इसलिये कि जब ये किसी अहले ख़ाना से रूठ कर चली जाती हैं, तो दोबारा लौट कर नहीं आतीं । “*
(شعب الايمان للبیهقی، باب فی تعدید نعم الله،الحدیث:4557 ، ج 4 ،ص132)
हमारी दावतो का हाल ये है, के खाना इतना बिगड़ता है के उस से दो तीन डेग भर जाती है … मुफ़्त में दावत मिली हैं, इस लिए खाने वालों को ये तमीज़ नहीं है, कि ख़ाना उतना ही मांगे जितनी जरूरत है …. और जो ख़ाना प्लेट में दिया गया है, उसे मुकम्मल पूरा कर के ही उठे …
हमारे घरों में भी देखें, तो कभी चावल बच गए , रोटी बच गई , सालन बच गया …. और उसे किसी गरीब को देने के बजाए फेंक दिया जाता है ….
और हमारी क़ौम बचा हुआ ख़ाना ऐसी जगह फेंकती है, जहां लोगो के कदम पड़ते है … और लोग परेशान होते हैं, उसका गुनाह अलग अपने नाम में लिख दिया जाता है l
रिज़्क़ का इतना बिगाड़ करने के बाद हम शिकायत करते है के घर में बरकत नहीं , पैसा टिकता नहीं , ख़ाना खाने के बावजूद उसके लज़्ज़त नही मिलते , तरह तरह की बीमारियां रहती है … ये सब तो होगा ही ….
रोज़ी का अदब करें, ख़ाना इतना पकाएऐं के ज्यादा बचे नही , कम हो जाए तो हर्ज नहीं , कम हो जाने पर थोडा पेट खाली रह जाए, तो उन फ़िलिस्तीन वालो को याद करो, जिनको दो तीन दिन में एक बार खाना मिलता है ….
ऐहतियात के बाद अगर ख़ाना थोड़ा बच जाए, तो कुछ टाइम बाद ख़ुद खा लें , गरीब को दे दें या जानवर को खिला दें।


