
हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने एक मर्तबा पछनियां लगवाई।जो ख़ूने मुबारक निकला हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने एक सहाबा से फ्रमाया कि इसे गिरा आओ। वह सहाबी ख़ूने मुबारक को लेकर एक दीवार के पीछे गये और दायें बायें देखकर उस ख़ून मुबारक को पी गये। जब वापस आये तो हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया उस ख़ून का क्या कर आये? अर्ज़ किया उसे दीवार के पीछे गायब कर आया हूं। फ़रमायाः लेकिन किस जगह? उन्होंने अर्ज़ किया या रसूलल्लाह! मुझे आपका ख़ूने मुबारक ज़मीन पर गिराना या ज़मीन में दबाना अच्छा मालूम नहीं हुआ। मैं नहीं चाहता कि हुजूर अकदस के ख़ूने मुबारक पर किसी का पांव पड़े। इसलिये मैंने तो उसे पी लिया है। हुजूर ने फ़रमाया जा तूने अपने आपको दोज़ख़ से बचा लिया। (अल – अनवारुल मुहम्मदिया सफा १४० )
: सबक सहाबए किराम के दिलों में हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का बेहद अदब और एहतराम था। इसी अदब और एहतराम के पेशे नज़र वह हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का ख़ून पी गये। हालांकि हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने पी जाने का इरशाद नहीं फ़रमाया था। मालूम हुआ कि जो काम हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के अदब और एहतराम के पेशे नज़र किया जाये वह अगरचे हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने न भी फ़रमाया हो तो वह भी अच्छा और दौज़ख़ से बचने वाला होता है। यह भी मालूम हुआ कि हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की ज़ाते बाबरकात बेमिस्ल और बेनज़ीर है। एक हमारा खून भी है कि कपड़े या कि जिस्म को लग जाये तो कपड़ा और जिस्म नापाक हो जाता है। एक वह ख़ून मुबारक भी है कि जिस जिस्म से लग गया वह जहन्नम से आज़ाद हो गया ।

