Hazrat Hakeem Luqman r.a

हकीम लुक़मान (रहमतुल्लाह अलैह) का नाम तो बचपन से सुनते चले आ रहे हैं, क्योंकि अल्लाह तआला ने उनके नाम से क़ुरानकरीम में एक सूरत नाज़िलफरमाई है। जिसकी क़यामत तक तिलावत होती रहेगी इंशाअल्लाह। लेकिन बहुत कम लोग इस बात को जानते हैं कि हज़रत लुक़मान कौन थे। अल्लाह तआला ने उनके नसब, खानदान और ज़माना के बारे में तो अपने कलाम पाक में कोईज़िक्र नहीं किया, लेकिन उनके हकीमाना अकवाल काज़िक्र फरमाया है। ताहम कदीम तारिख इस बात की गवाही देती है कि इस नाम का एक शख्स सरज़मीन अरब पर मौजूद था, लेकिन उनकी शख्सियत और नसब के बारे में इख्तिलाफ पाया जाता है। एक रिवायत के मुताबिक वह हज़रत अय्यूब अलैहिस्सलाम के भांजे या खालाज़ाद भाई जबकि दूसरी रिवायत से हज़रत दाउद अलैहिस्सलाम का हमज़माना मालूम होता है।

अकसर तारीखदाँ की राय है कि हकीम लुक़मान अफरिकी नसल थे और अरब में उनकी आम्द बहैसियत गुलाम हुई थी। बहुत से उलमा का कहना है कि हकीम लुक़मान नबी नहीं थे और न उन पर वही नाज़िलहुई। क्योंकि क़ुरान व हदीस में किसी भी जगह कोई एसा इशारा मौजूद नहीं है जो हकीम लुक़मान के नबी या रसूल होने पर दलालत करता हो। गरज़ ये किअल्लाह तआला ने हकीम लुक़मान को नबूवत अता नहीं की मगर हिकमत व दानाई अता फरमाई। रिवायात में आता है कि आप सूरत व शकल के एतेबार से अच्छे नहीं थे, जैसा कि मशहूर ताबई हज़रत सईद बिन मुसैयिब (रमतुल्लाह अलैह) ने एक हबशी से कहा था कि तु इस बात से दिलगीर न हो कि तु काला हबशी है, इसलिए कि हबशियों में तीन आदमी दुनिया के बेहतरीन इंसान हुए हैं। हज़रत बिलाल हबशी (रज़ियल्लाहु अन्हु), हज़रत ऊमर फारूक (रज़ियल्लाहु अन्हु) का गुलाम मेहजा और हकीम लुक़मान(रहमतुल्लाह अलैह)। गरज़ ये कि हकीम लुक़मान के हालाते ज़िन्दगी और ज़माना में इख्तिलाफ के बावजूद पूरी दुनिया को एक मशहूरशख्सियत तसलीम करती है। जाहेलियत के चंद शोरा ने भी इनका तजकिरा किया है।

अल्लाह तआला ने सूरह लुक़मान में हज़रत लुक़मान की उन क़ीमती नसीहतों काज़िक्र फरमाया है जो उन्होंने अपने बेटे को मुखातब करके बयान फरमाई थीं। यह हकीमाना अक़वाल अल्लाह तआला ने इसलिए क़ुरान करीम में नक़ल किए हैं ताकि क़यामत तक आने वाले इंसान उनसे फायदा उठाकर अपनी ज़िन्दगी को खूब से खूबतर बना सकें और एक अच्छा मुआशरा वजूद में आसके।

हकीम लुक़मान अपने बेटे को नसीहत करते हुए फरमाते हैं- लोगों के सामने (तकब्बुर से) अपने गाल मत फैलाओ। यानी लोगों से मुलाकात और उनसे गुफतगू के वक्त उनसे मुंह फेर कर बात न करो जो उनसे एराज करने और तकब्बुर करने की अलामत और अखलाके शरीफाना के खिलाफ है। अल्लाह तआला अपने नबी के मुतअल्लिक क़ुरान पाक (सूरह अल कलम 4) में इरशाद फरमाता है ‘‘और यक़ीनन तुम अखलाक के आला दर्जा पर हो।”हज़रत आइशा (रज़ियल्लाहु अन्हा) से जब आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के अखलाक के मुतअल्लिक सवाल किया गया तो हज़रत आइशा ने फरमाया आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का अखलाक क़ुरानी तालीमात के एैन मुताबिक था (सही बुखारी व सही मुस्लिम)। हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया मुझे बेहतरीन अखलाक की तकमील के लिए भेजा गया है (मुसनद अहमद) गरज़ ये कि हकीम लुक़मान की अपने बेटे की नसीहत को अल्लाह तआला ने क़ुरान करीम में ज़िक्र करके पूरी इंसानियत को यह पैगाम दिया कि तमाम इंसानों के साथ अच्छे अखलाक पेश करने चाहिए। और साथ में यह भी रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया जो बन्दा दरगुजर करता है अल्लाह तआला उसकी इज्ज़त बढ़ाता है और जो बन्दा अल्लाह के लिए आजज़ी इखतियार करता है अल्लाह तआला उसका दर्जा बुलंद करता है। (सही मुस्लिम)

हकीम लुक़मान अपने बेटे को नसीहत करते हुए फरमाते हैं कि ज़मीन पर इतराते हुए मत चलो। यानी ज़मीन को अल्लाह तआला ने सारे अनासिर से पस्त उफतादा बनाया है, तुम इसी से पैदा हुए, इसी पर चलते फिरते हो, अपनी हक़ीक़त को पहचानो, इतराकर न चलो जो काफिरों का तरीक़ा है, इसके बाद अल्लाह तआला फरमाता है यक़ीन जानो अल्लाह किसी इतराने वाले शैखी बाज़ को पसंद नहीं करता। हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया जिस शख्स के दिल में ज़र्रा बराबर भी तकब्बुर होगा वह जन्नत में नहीं जाएगा। एक शख्स ने अर्ज़ किया या रसूलल्लाह! आदमी चाहता है कि उसका कपड़ा अच्छा हो और जूता अच्छा हो। आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया अल्लाह तआला जमील है, जमाल को पसंद करता है। किब्र और गुरूर तो हक नाहक करना और लोगों को छोटा समझना है। (मुस्लिम किताब अल इमान, बाब तहरीम अलकबीर)यानी अपनी वुसअत के मुताबिक अच्छा कपड़ा पहनना किब्र और गुरूर नहीं बल्कि लोगों को हकीर समझना तकब्बुर और गुरूर है।

हकीम लुक़मान अपने बेटे को नसीहत करते हुए फरमाते हैं ‘‘और अपनी चाल में मयाना रवी इखतियार करो”यानी इंसान को दरमियानी रफतार से चलना चाहिए, रफतार न इतनी तेज़ हो कि भागने के करीब पहुंच जाए और न इतनी आहिस्ता कि सुस्ती में दाखिल हो जाए। यहां तक कि अगर कोई शख्स जमाअत की नमाज़ को हासिल करने के लिए जा रहा हो तो उसको भी हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने भागने से मना फरमा कर इतमिनान व सुकून के साथ चलने की ताकीद फरमाई है।

हकीम लुक़मान की अपने बेटे को एक और अहम नसीहत ‘‘अपनी आवाज़ आहिस्ता रखो”आहिस्ता से मुराद यह नहीं कि इंसान इतना अहिस्ता बोले कि सुनने वाले को दिक्कत पेश आए बल्कि मुराद यह है कि जिनको सुनाना मकसूद है, उन तक आवाज़ वज़ाहत के साथ पहुंच जाए लेकिन इससे ज्यादा चीखचीख कर बोलना इस्लामी आदाब के खिलाफ है। गरज़ ये कि हमें इतनी ही आवाज़ बुलंद करनी चाहिए जितनी उसके मुखातिबों को सुनने और समझने के लिए ज़रूरी है, ‘‘बेशक सबसे बुरी आवाज़ गधे की आवाज़ है।

आखिर में आदाबे मुआशरत से मुतअल्लिक चार नसीहतें ज़िक्र की गई। पहला ‘‘लोगों से गुफतगू और मुलकात में मुतकब्बिराना अंदाज से रूख फेर कर बात करने से मना किया गया है।”दूसरा‘‘ज़मीन पर इतराकर चलने से मना किया गया है।”तीसरा‘‘दरमयानी रफतार से चलने की हिदायत दी गई।”और चौथा ‘‘बहुत ज़ोर से शोर मचाकर बोलने से मना किया गया है।”इन तमाम ही नसीहतों का खुलासा यह है कि हर वक्त हम दूसरों का ख्याल रखें, किसी शख्स को भी चाहे वह मुसलमान हो या काफिर हम उसको जानते हों या न जानते हों लेकिन हमारी तरफ से कोई तकलीफ किसी भी इंसान को नहीं पहुंचनी चाहिए। मगर हम इन उमूर में कोताही से काम लेते हैं, हालांकि इन उमूर का तअल्लूक हुक़ूक़ुल इबाद से है और हुक़ूक़ुल इबाद में हक तलफी इंसान के बड़े बड़े नेक आमाल को खत्म कर देगी। लिहाज़ा हमें चाहिए कि हम हकीम लुक़मान (रहमतुल्लाह अलैह) की इन क़ीमती नसीहतों पर अमल करके एक अच्छे मुआशारा की तशकील दें।

 

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