Imam Husain A.S

हज़रत सैय्यदना इमाम आली मक़ाम हुसैन अलैहिस्सलाम

विलादत बासआदत आप रज़िअल्लाह तआला अन्हु की विलादत मुबारक पाँच शाबानुल मुबारक सन् चार हिजरी मे सनीचर के दिन मदीना तय्यबा मे हुई, हुज़ूर पुर नूर मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने आपका नाम हज़रत हारुन अलैहिस्सलाम के छोटे बेटे शब्बीर के नाम पर रखा, जिसका अरबी तर्जुमा “हुसैन” बनता है, आप अलैहिस्सलाम की कुन्नियत अबु अब्दुल्लाह और अलक़ाबात ज़की, शहीदे अज़ीम, सैय्यद शबाब अहले जन्नत, सिब्ते रसूल, रिहानुर्रसूल मशहूर है!

 

हुज़ूर पुर नूर रसूले करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की चच्ची मोहतरमा हज़रत अब्बास बिन अब्दुल मुत्तलिब रज़िअल्लाह तआला अन्हु की ज़ौजा उम्मुल फ़ज़ल बिन्त अलहारिस रज़िअल्लाह तआला अन्हा एक दिन बारगाहे अक़दस मे हाज़िर हुईं और अर्ज़ किया कि मैने एक निहायत ही परेशानकुन ख़्वाब देखा है हुज़ूर पुर नूर सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने कहा के बेझिझक कहीये, तो उन्होंने अर्ज़ किया कि मैने देखा आपके जिस्म अनवर का एक टुकड़ा काटकर मेरे गोद मे रख दिया गया, ये सुनकर सरकारे दो आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम मुस्कुराए और फ़रमाया कि तुमने बहुत अच्छा ख़्वाब देखा है, इसकी ताबीर ये है की इन्शाअल्लाह तआला फ़ातिमा ज़हरा (रज़िअल्लाह तआला अन्हा) के घर बेटा पैदा होगा जो तुम्हारी गोद मे खेलेगा, चुनांचे ऐसा ही हुआ, इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम पैदा हुए और हज़रत उम्मुल फ़ज़ल की गोद मे दिये गए!

इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम हज़रत इमाम हसन अलैहिस्सलाम से ग्यारह माह दस दिन छोटे थे, आपके पैदाइश के सातवें दिन हुज़ूर सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने दो मेण्ढे लेकर क़ुरबान करवाया और आपका अकीक़ा किया

 

हज़रत उम्मुल फ़ज़ल रज़िअल्लाह तआला अन्हा फ़रमाती हैं कि एक दिन बारगाहे अक़दस मे हाज़िर हुईं तो देखा कि हुज़ूर पुर नूर सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के गोद मे शहज़ादा हुसैन है और आप रो रहें हैं, मैने अर्ज़ किया कि मेरे माँ बाप आप पर क़ुरबान हो क्या हुआ? तो फ़रमाया जिब्रील अमीन मेरे पास आएँ थे और उन्होंने ये बताया कि मेरी उम्मत मेरे इस फ़रज़न्द को शहीद करदेगी, मैने अर्ज़ किया कि इस हुसैन को? फ़रमाया हाँ! मेरे पास जिब्रील अमीन इनके मक़तल की सुर्ख मिट्टी लाए हैं!

 

जैसा कि पहले बयान हो चुका है कि आप अलैहिस्सलाम की शहादत की ख़बर आपके पैदाइश के साथ दी जा चुकी थी, फिर ये ख़बर अहले बैत अतहार सहाबाकिराम मे फैल गई, हज़रत उम्मुल मोमिनीन सैय्यदा आएशा सिद्दीक़ा रज़िअल्लाह तआला अन्हा से मरवी है कि रसूल अल्लाह सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने फ़रमाया, मुझे जिब्रील अमीन ने ख़बर दी के मेरे बाद मेरा ये फ़रज़न्द हुसैन (अलैहिस्सलाम) सर ज़मीने “तुफ़” मे शहीद कर दिये जाएंगे और इनके मक़तल की मिट्टी भी दिया है! (तुफ़ कूफ़ा के क़रीब उस जगह का नाम है जिसे “करबला” कहते है) (इब्ने साद,तिबरानी)

हज़रत इब्ने अब्बास रज़िअल्लाह तआला अन्हु फ़रमाते है कि हमे इसमे कोई शक न था, और सब अहले बैत बहुत अच्छी तरह जानते थे कि हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम करबला मे शहीद कर दिये जाएंगे!

इस मौज़ू पर बकसरत रिवायत पाई जाती है, हत्ता के मालूम होता है कि हज़रत सैय्यदना अली मुरतज़ा रज़िअल्लाह तआला अन्हु को अहले बैत अतहार के उतरने की जगह मक़ामे शहादत, ऊँटो के बाँधने; कजावे रखने तक की जगह बता दिया गया था!

हज़रत उम्मे सलमा रज़िअल्लाह तआला अन्हा के रिवायत के मुताबिक़ तो उनको वो मिट्टी भी अता फ़रमाई गई थी जिसे बवक़्ते शहादत ख़ून बन जाना था!

 

फ़ज़ाएले इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम हज़रत इमाम हुसैन रज़िअल्लाह तआला अन्हु के यूँ तो बेहद और बेशुमार फ़ज़ाएल हैं लेकिन यहाँ चन्द फ़ज़ाएल व शुमाएल को मुसन्निफ़ नक़्ल करने की सआदत हासिल करता है!

हज़रत साद बिन अबि वक़ास रज़िअल्लाह तआला अन्हु से मरवी है जब आयते करीमा  تَعَالَوْا نَدْعُ أَبْنَاءَنَا وَأَبْنَاءَكُمْ  नाज़िल हुई तो रसूल अल्लाह सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने हज़रत अली, हज़रत फ़ातिमा, हज़रत हसन और हज़रत हुसैन रज़िअल्लाह तआला अन्हुमा को बुलाया और बारगाहे रब्बुल इज़्ज़त मे अर्ज़ किया “ऐ अल्लाह ये मेरी अहले बैत है” (सही मुस्लिम शरीफ़)

 

हज़रत अनस रज़िअल्लाह तआला अन्हु से मरवी है कि हसन व हुसैन रज़िअल्लाह तआला अन्हुमा से बढ़कर कोई रसूल अल्लाह सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के मुशाबहे नही था (बुख़ारी शरीफ़)

 

हज़रत अबु सईद ख़ुदरी रज़िअल्लाह तआला अन्हु से मरवी है कि रसूल अल्लाह सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने फ़रमाया कि हसन व हुसैन नौजवानाने जन्नत के सरदार हैं (तिरमज़ी शरीफ़)

 

हज़रत लैला बिन्त मुर्रह रज़िअल्लाह तआला अन्हा से मरवी है कि रसूल अल्लाह सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया हुसैन मुझसे और मै हुसैन से हूँ जो हुसैन से मोहब्बत करे अल्लाह तआला उससे मोहब्बत फ़रमाए, हुसैन मेरे जिगर के टुकड़ों मे से एक टुकड़ा है! (तिरमाज़ी शरीफ़)

 

हज़रत अबु ज़र ग़फ़्फ़री रज़िअल्लाह तआला अन्हु से मरवी है कि रसूल अल्लाह सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने फ़रमाया मेरे अहले बैत की मिसाल तुम मे इस तरह है जैसे सैय्यदना नूह अलैहिस्सलाम की कश्ती थी कि जो उसपर सवार हो गया निजात पा गया, जो पीछे रह गया हलाक हो गया! (रवाह अहमद)

 

सन् साठ हिजरी मे यज़ीद तख़्ते हुकूमत पर बैठा तो इस वक़्त मदीना तय्यबा मे वलीद बिन उत्बा बिन अबु सुफ़ियान मक्का मुकर्रमा मे अम्र बिन सैद बिन आस बसरा मे उबैद उल्लाह बिन ज़ियाद और कूफ़ा मे नोमान बिन बशीर गवर्नर थे, यज़ीद ने हुक़ूमत सभांलते ही गवर्नरे मदीना वलीद बिन उत्बा को ख़त तहरीर करवाया कि बिला ताख़ीर हुसैन इब्ने अली, अब्दुल्लाह बिन अम्र और उबैदउल्लाह बिन ज़ुबैर रज़िअल्लाह तआला अन्हुमा से मेरी ख़लाफ़त की बैअत ले लो, वलीद ने मरवान की तरग़ीब पर इन हज़रात को पैग़ाम भेजा, तो हज़रत हुसैन अलैहिस्सलाम वलीद के पास तशरीफ़ लाएँ वलीद ने मरवान की मौजूदगी मे यज़ीद का ख़त आपके ख़िदमत मे पेश किया आपने ख़त पढ़कर जवाब दिया कि ये बात मुनासिब नही कि मै कोई ख़ुफ़िया बात करूँ दुसरे लोगों को तलब करो जब वो आएंगे तो उनमे मै भी हूँगा, ये कहा और उठ खड़े हुए, मरवान चिल्लाया की इनको जाने ना देना वरना फ़िर ये हाथ ना आएंगे अगर बैअत करे तो ठीक वरना क़त्ल कर देना, हज़रत इमाम आली मक़ाम ने सख़्ती के साथ मरवान को डाँट दिया और घर तशरीफ़ लेगएँ, मरवान वलीद को मलामत करने लगा, तो वलीद ने कहा ऐ मरवान सुन मुझे अल्लाह तआला कि कसम अगर हुसैन रज़िअल्लाह तआला अन्हु यज़ीद की बैअत ना करें और मुझे पूरी दुनिया व जहान के माल वा दौलत का मालिक बनाकर कहा जाए कि हज़रत हुसैन अलैहिस्सलाम को क़त्ल करदो तो मै सारा माल व दौलत ठुकरा दूँगा मगर क़त्ले हुसैन का जुर्म नही करूँगा, हज़रत अब्दुल्लाह बिन ज़ुबैर रज़िअल्लाह तआला अन्हु को जब यज़ीद की तख़्त नशीनी और तल्बे बैअत का इल्म हुआ तो दानाई से काम लेते हुए रात के वक़्त मदीना मुनव्वरा से मक्का मुकर्रमा के तरफ़ रवाना हो गए, सुबह को वलीद को मालूम हुआ तो उसने तअक़्क़ुब मे आदमी रवाना किये, लेकिन हज़रत अब्दुल्लाह बिन ज़ुबैर रज़िअल्लाह तआला अन्हु जा चुके थे!

इस वाक़ये के दूसरे दिन चार शाबानुल मोअज़्ज़म सन् साठ हिजरी को इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम अपने अज़ीज़ो अक़ारिब के साथ रात के वक़्त मक्का मुकर्रमा के तरफ़ रवाना हो गएँ, ये मशवरह मोहम्मद बिन हनीफ़ा रज़िअल्लाह तआला अन्हु ने दिया था, मरवान ने ये तमाम वाक़ेआत यज़ीद को लिखा तो उसने वलीद बिन उत्बा को माज़ूल करके अम्र बिन सईद अल अशरक को गवर्नरे मदीना बना दिया!

मक्का मुकर्रमा के तरफ़ आते हुए रास्ते मे हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की मुलाक़ात हज़रत अबदुल्लाह बिन मतीअ रज़िअल्लाह तआला अन्हु से हुई सूरते हाल से मुत्तिला होकर अब्दुल्लाह ने अर्ज़ किया कि हुज़ूर आप मक्का मुक़र्रमा मे ही क़याम करे, आप कूफ़ा हरगिज़ हरगिज़ कस्द ना फ़रमाए ये बड़े ही बद अहद लोग है किसी से वफ़ा नही करते, इन्होंने आप के वालिद माजिद को शहीद किया और आपके भाईजान से नाज़ेबा सुलूक़ किया, वो आपके ख़ैरख़्वाह नही हो सकते हज़रत इमाम आली मक़ाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने हज़रत अब्दुल्लाह का शुक्रिया अदा किया और मक्का मे दाख़िल हो गए! उसी वक़्त उन्हें कूफ़ा वालों की तरफ़ से बुलावे पर बुलावा आना शुरू हो गया!

बेशुमार ख़ुतूत और पैग़ामात इमाम हुसैन रज़िअल्लाह तआला अन्हु को मिल रहे थे जिनमे कूफ़ा वाले उन्हे कूफ़ा पहुँचने की दावत दे रहे थे और हलफ़ उठा उठा कर इल्तिजाए कर रहे थे कि आप रज़िअल्लाह तआला अन्हु कूफ़ा तशरीफ़ लाकर बैअत लीजिये, हम फ़ासिक़ व फ़ाजिर यज़ीद की बैअत नही करेंगे! इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम मक्का की फिज़ा को साज़गार नही समझ रहे थे क्योंकि मक्का के अक्सर लोग अब्दुल्लाह बिन ज़ुबैर रज़िअल्लाह तआला अन्हु के हामी थे! चुनाँचे आप रज़िअल्लाह तआला अन्हु अहले कूफ़ा के मुसलमान पैग़ामात को रद्द न कर सके और कूफ़ा जाने का इरादा फ़रमाया उनके ख़ैरख़्वाहों ने मशवरा किया कि कूफ़े के लोग क़ाबिले एतिमाद नही है, आप रज़िअल्लाह अन्हु कूफ़ा न जाएँ!

हज़रत सैय्यदा ज़ैनब रज़िअल्लाह तआला अन्हा ने भी अपने प्यारे भाई को वही मशवरह दिया और फ़िर अर्ज़ किया कि पहले किसी को भेजकर अच्छी तरह हालात का अन्दाज़ा कर लें! इमाम हुसैन रज़िअल्लाह तआला अन्हु को यह मशवरह बहुत पसन्द आया और उन्होंने अपने चचाज़ाद भाई मुस्लिम बिन अक़ील रज़िअल्लाह तआला अन्हु को अपना नाएब और सफ़ीर बना कर कूफ़ा रवाना किया, जब हज़रत मुस्लिम कूफ़ा पहुँचे तो अहले कूफ़ा ने उनका पुर्तपाक ख़ैरमक़दम किया और कूफ़ा के हज़ारो लोगों ने उनके हाथ पर इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की बैअत करली! हालात साज़गार पाकर मुस्लिम बिन अक़ील रज़िअल्लाह तआला अन्हु ने इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम को पैग़ाम दिया कि आप रज़िअल्लाह तआला अन्हु कूफ़ा तशरीफ़ ले आएँ! जब मुस्लिम बिन अक़ील रज़िअल्लाह तआला अन्हु के क़ासिद अब्दुल्लाह बिन सनान के ज़रिये इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम को कूफ़े के लोगों की अक़ीदत का हाल मालूम हुआ तो उन्होंने मक्का से सफ़र की तैयारी शुरु कर दी! हज़रत अम्र बिन अब्दुर्रहमान, अब्दुल्लाह बिन अब्बास, अब्दुल्लाह बिन उमर रज़िअल्लाह तआला अन्हुमा और दूसरे ख़ैरख़्वाहों ने उन्हें बहुत रोका लेकिन उन्होंने फ़रमाया कि दावते हक़ देने से मै बाज़ न रहूंगा और जो लोग हक़ की तलाश मे है, उन्हें मायूस ना करूंगा, मक्का मे ख़ूंरेज़ी मुझे पसन्द नही क्योंकि मै नही चाहता कि मेरी वजह से काबे की बेहुरमती हो! मशीयते इलाही के सामने मेरा सर झुका हुआ है और मै कूफ़ा ज़रूर जाऊंगा! उसके बाद आठ ज़िलहिज्जह सन् साठ हिजरी को आप अपने अहले बैत और मोतक़िदीन के साथ मक्का से कूफ़ा के तरफ़ रवाना हुए!

हज़रत सैय्यदा ज़ैनब रज़िअल्लाह तआला अन्हा अपने दो बेटों हज़रत औन और हज़रत मोहम्मद समेत हुसैनी काफ़िले मे शामिल हो गयीं, उनके शौहर अब्दुल्लाह बिन जाफ़र रज़िअल्लाह तआला अन्हु मक्का मे ही थे और उनलोगों के हमराय थे जो इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के सफ़रे कूफ़ा से मुत्तफ़िक़ नही थे! जब इमम हुसैन चलने लगें तो हज़रत ज़ैनब ने अपने शौहर से जाने की इजाज़त माँगी, हज़रत अब्दुल्लाह बिन जाफ़र बहन भाईयों की मोहब्बत से आगाह थे उन्होंने हज़रत ज़ैनब और अपने बच्चों को उनके साथ जाने की इजाज़त दे दिया और अपने बच्चों को ये हिदायत की कि ख़ुदा न करे मामू पर कोई मुसीबत आए तो उनके लिए अपनी जाने क़ुरबान कर देना! उसके बाद वो मक्का मुकर्रमा वापस चले गए!

इधर इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम कूफ़ा के सफ़र पर रवाना हुए उधर कूफ़े मे हालात का पासा पलट गया पहले-पहल तो कूफ़ियो ने मुस्लिम बिन अक़ील का दम भरा और हुसैन रज़िअल्लाह तआला अन्हु पर जाने क़ुरबान करने के हलफ़ उठाए लेकिन जब यज़ीद ने नोमान बिन बशीर को कूफ़ा की इमारत से माज़ूल करके उबैद उल्लाह बिन ज़ियाद को वहा का हाकिम बनाकर भेजा और उसने सख़्ती से काम लिया तो अहले कूफ़ा मुस्लिम बिन अक़ील का साथ छोड़ गए! उबैद उल्लाह बिन ज़ियाद ने उन्हें गिरफ़्तार करके निहायत बेदर्दी से शहीद करा दिया!

शहादत से पहले हज़रत मुस्लिम बिन अक़ील ने मोहम्मद बिन अशअस से फरमाया तुम मेरे बचाने पर क़ादिर नही हो लेकिन किसी तरह मेरा ये पैगाम हुसैन रज़िअल्लाह तआला अन्हु तक पहुंचा देना कि वह कूफ़ा वालों पर हरग़िज़ हरग़िज़ एतिबार ना करें और जहाँ तक पहुंच चुके हो वहीं से लौट जाएं!

मोहम्मद बिन अशअस ने मुस्लिम बिन अक़ील की वसीअत पूरी की और अपने एक क़ासिद के ज़रिये इमाम हुसैन रज़िअल्लाह तआला अन्हु को मुस्लिम बिन अक़ील रज़िअल्लाह तआला अन्हु का पैगाम भेजवा दिया! लेकिन उस वक़्त तीर कमान से निकल चुका था मुस्लिम बिन अक़ील को शहीद करने के बाद उनके दो छोटे छोटे बच्चों मोहम्मद और इब्राहीम को भी पत्थर दिल उबैदउल्लाह ने पकड़वा कर शहीद करवा दिया!

हज़रत इमाम हुसैन रज़िअल्लाह तआला अन्हु ज्यो ज्यो कूफ़ा की तरफ़ बढ़ते उन्हें तशवीशनाक ख़बरे मिलती जब वह तअलबा के मुकाम पर पहुंचे तो बनु असद के एक शख़्स ने जो कूफ़ा से आ रहे थें उन्हे मुस्लिम उनके बच्चों और हानी की शहादत कि ख़बर दी! मुस्लिम बिन अक़ील बहुत बहादुर थे और हक़ीक़त ये थी की वो इमाम हुसैन के एक मज़बूत बाज़ू थे उनकी शाहादत की ख़बर सुनकर जनाब इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम को सख़्त सदमा पहुँचा मुस्लिम बिन अक़ील के भाईयों ने कहा ख़ुदा की कसम जबतक अपने भाई का बदला ना लेंगे या क़त्ल ना हो जाएंगे उसवक़्त तक वापस ना लौटेंगे! इमाम हुसैन ने फ़रमाया जब तुम लोग न होगे तो हमारी ज़िन्दगी किस काम की, उस वक़्त इमाम हुसैन के काफ़िले मे बेशुमार लोग रास्ते मे शामिल हो गए थे आपने सब साथियों को जमा किया और फ़रमाया “कूफियों ने हमारे साथ गद्दारी की है! उनसे मदद की उम्मीद नही! तुम लोगों की मोहब्बत व अक़ीदत का मै शुक्रगुज़ार हूँ लेकिन मै नही चाहता कि तुम लोग मेरी वजह से अपनी जाने ख़तरे मे डालो! इसलिए तुममे से जो शख़्स जाना चाहे वह खुशी से जा सकता है मेरी तरफ़ से उसपर कोई इलज़ाम नही है! यह ऐलान सुनकर तमाम लोग अपने घरो को लौट गए जो मक्का से आए थे!

दो मोहर्रम सन् इक्सठ हिजरी को इमाम हुसैन का काफ़िला करबला के रेगिस्तान मे उतरा, हुर बिन यज़ीद तमीमी के एक हज़ार सोलह सवार हुकूमते शाम की तरफ़ से ज़ीहशम के मुक़ाम से इस काफ़िले के इर्द गिर्द मंडला रहे थे!

तीन मोहर्रम को अम्र बिन सअद चार हज़ार फ़ौज के साथ करबला पहुंचा! यह इमाम हुसैन का अज़ीज़ था लेकिन रे की हुकूमत के लालच मे उसने अपने ज़मीर को कुचल दिया था, नमालूम किस ख़्याल के ज़ेरे असर करबला पहुंचकर इमाम हुसैन से गुफ़्तगू की तरह डाली, उन्होंने फ़रमाया मुझे मेरे हाल पर छोड़ दो, मै मक्का या मदीना चला जाऊंगा!

अम्र बिन सअद ने इमाम हुसैन रज़िअल्लाह तआला अन्हु का जवाब इब्ने ज़ियाद को लिखकर भेजा, उसने हुक्म भेजा कि हुसैन रज़िअल्लाह तआला अन्हु पहले मेरी इताअत करे फिर देखा जाएगा! उसके बाद फिर दूसरा हुक्म भेजा कि हुसैन और उसके साथियों पर पानी बंद कर दो!

अम्र बिन सअद ने इस हुक्म की तामील मे सात मोहर्रम सन् इक्सठ हिजरी को फ़ुरात पर पहरा बिठा दिया लेकिन नौ मोहर्रम तक जंग टालता रहा कि शायद मुफ़ाहमत की कोई सूरत निकल आए! इधर इब्ने ज़ियाद बेताब हो गया उसने शिम्र ज़िलजोशन के हाथ कहला भेजा कि मैने तुम्हे हुसैन रज़िअल्लाह तआला अन्हु की ख़ैरख़्वाही के लिये नही भेजा! अगर उनसे बैअत नही ले सकते तो फ़ौज शिम्र के हवाले करदो! अब अम्र बिन सअद की अक़्ल व होश जवाब दे गयी और वह नवास-ए-रसूल सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के साथ जंग करने को आमादह हो गया!

नौ और दस मोहर्रम सन् इक्सठ हिजरी को दर्मियानी रात इमाम हुसैन रज़िअल्लाह तआला अन्हु और उनके जाँनिसारों की इस आलम मे आख़िरी रात थी!  इमाम आली मक़ाम ने अपने साथियों को जमा किया और फ़रमाया “मेरे दोस्तों! मै तुम्हारा ममनून हूँ कि तुमने निहायत साबित क़दमी से मेरा साथ दिया, तुम्हारे जैसे नेक और वफ़ादार साथी मैने कही नही देखे और अपने अहले ख़ानदान से ज़्यादा नेकोकार और सिलारहमी करने वाले कोई दूसरा घराना नही देखा, ख़ुदावन्द तआला तुमको जज़ाए ख़ैर दे! कलके दिन मेरे दुश्मनों और मेरे दर्मियान आख़िरी फ़ैसला हो जाएगा मै तुम लोगों को बखुशी वापस जाने की इजाज़त देता हूँ रात का वक्त है, मेरे अहले ख़ानदान को वापस लेलो और अपने ऊँटों पर सवार होकर अपने घरों को लौट जाओ ताकि ख़ुदा यह मुसीबत आसान कर दे!”

सैय्दुश्शोहदा के मुठ्ठी भर साथियों ने यह तक़रीर सुनी, मौत सामने नज़र आ रही थी लेकिन जिस शुजाअत, वफ़ादारी बहादूरी और साबित क़दमी का मुज़ाहरा उन्होंने किया ताक़यामत इन्सान और जिन्नात सलामती भेजते रहेंगे! इमाम मज़लूम के साथ वफ़ादारी ने उन्हे हयाते जावेद अता करदी सबने एक आवाज़ मे रिक़्क़त भरे लहजे मे कहा; “ऐ फ़रज़न्दे रसूल सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम हमारे माँ बाप आप पर क़ुरबान क्या हम आपको खंजरों और तीरों का निशाना बना जाएं और हम ज़िन्दा रहें, ख़ुदा हमे उस दिन के लिए बाक़ी न रखे!”

इन मुक़द्द्स लोगों के जवाब से जनाब इमाम आली मक़ाम की आँख छलक गई! बेइख़्तियार दुआ के लिए हाथ उठाया और फ़रमाया ‘ऐ अल्लाह इन्हें जज़ाए ख़ैर दे, आज इन्होंने मेरे बेक़सी मे मेरा साथ दिया है हश्र के दिन भी इन्हें मेरा साथी बनाना! इसके बाद इमाम हुसैन और उनके साथी हथियारों की सफ़ाई मे लग गएं!

ज़ैनब क़ुबरा रज़िअल्लाह तआला अन्हा को होने वाले वाक़ेआत का अंदाज़ा हो गया था! सख़्त बेचेन थी लेकिन सब्र से काम ले रहीं थीं! जब इमाम हुसैन रज़िअल्लाह तआला अन्हु की तलवार साफ़ की जाने लगी तो उन्होंने चन्द इबरत अंगेज़ अशआर पढ़े! “ऐ काश आज का दिन देखने के लिए मै ज़िन्दा न रहती हाय मेरे नाना सलल्ललाहो अलैहे वसल्लम, मेरी माँ फ़ातिमा रज़िअल्लाह तआला अन्हा, मेरे बाप अली रज़िअल्लाह तआला अन्हु, मेरे भाई हसन रज़िल्लाह तआला अन्हु सब दाग़े मुफ़ारक़त दे गए, ऐ भाई अब हमारे सिर्फ़ आप ही तो है हम आपके बग़ैर कैसे ज़िन्दा रहेंगे!

इमाम हुसैन ने फ़रमाया ज़ैनब ज़रा चैन रखो इस जवाब से हज़रत ज़ैनब की आह ज़ारी और शिद्दत से हो गई फ़रमाया मेरे माँ जाए (भाई) आप के बदले मे मै अपनी जान देना चाहती हूँ!

इमाम हुसैन रज़िअल्लाह तआला अन्हु अपनी प्यारी बहेन की दिलदोज़ बाते और फ़रियाद सुनकर अश्क़बार हो गएं लेकिन बहुत ही हौसले से फ़रमाया “ऐ बहेन सब्र करो ख़ुदा से तसक़ीन हासिल करो ख़ुदा के ज़ात के सिवा सारी कायनात के लिए फ़ना है, हमारे लिए हमारे नाना ख़ैरूल बशर की ज़ाते अक़दस नमूना है, तुम उन्हीं के उसवाए हुसना की पैरवी करना! “ऐ बहेन तुम्हे ख़ुदा की कसम है अगर मै राहे हक़ मे काम आ जाऊँ तो मेरे बाद सब्र से काम लेना!

इस वसीयत के बाद हज़रत इमाम हुसैन ख़ेमे से बाहर तशरीफ़ लाएँ और सुबहे सादिक़ तक तमाम मुक़द्दस मेहमानाने करबला तसबीह वा तहलील मे मसरूफ़ रहे!

शबे आशूरा ख़त्म हुई और आशूरा का सूरज क़यामते सुग़रा अपने दामन मे लिए हुए नमुदार हुआ! इमाम हुसैन समेत बहत्तर मुक़द्दस लोग एक तरफ़ थे और हज़ारो बदबख़्त संग दिलों की फ़ौज दूसरी तरफ़, लड़ाई से पहले जनाब हुसैन अलैहिस्सलाम और उनके चंद साथियों ने निहायत दिलदोज़ तक़रीरे की जिनमे दुशमनों को तरग़ीब दी की वो अपनी आक़बत ख़राब ना करे लेकिन सिवाए एक मर्द मोमिन हुर बिन यज़ीद तमीमी के उन बदबख़्तों पर कोई असर ना हुआ! बाज़ रिवायतों मे हुर बिन यज़ीद तमीमी का बेटा भी इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के झंडे तले आकर अपनी आक़बत सवार गया! जिस वक़्त इमाम हुसैन रज़िअल्लाह तआला अन्हु तक़रीर फ़रमा रहे थें शिद्दते ग़म से हज़रते ज़ैनब और दूसरी ख़्वातीन अहले बैत की चीख़े निकल गई, आपने अब्बास रज़िअल्लाह तआला अन्हु और अलीअकबर रज़िअल्लाह तआला अन्हु को उन्हे ख़ामोश कराने के लिए भेजा और फ़रमाया कि मेरी उम्र की कसम अभी उनको बहुत रोना है! इसके बाद जंग के लिए बाहर निकलने लगे, दोनो तरफ़ से एक एक आदमी निकलता और अपने हरीफ़ से लड़ता! हुसैनी फ़ौज के कुछ मुजाहिदों ने जामे शहादत नोश फ़रमाया और बहुत से इराक़ी भी जहन्नम वासिल हुए, इसके बाद आम लड़ाई शुरू हुई! हुर बिन यज़ीद तमीमी और दूसरे जानिसाराने अहले बैत पामर्दी से लड़े, दुशमनों की सफ़े दरहम बरहम करदी लेकिन दोनो जमातों की तादाद मे कोई निसबत ना थी! दोपहर तक ये तमाम मरदाने हक़ दादे शुजाअत देते हुए दोशे रसूल के सवार पर क़ुरबान होगए! उसके बाद जवानाने अहले बैत की बारी आई, सबसे पहले शबीहे पैग़म्बर अली अकबर बिन हुसैन मैदान मे आए, उस बहादुरी से लड़े की अपने दादा साहिबे ज़ुल्फ़िक़ार हज़रत अली रज़िअल्लाह तआला अन्हु की याद ताज़ा करदी! जब उन्होंने कई दुशमनों को वासिले जहन्नम कर दिया तो सैकड़ो लईनो ने उन्हे घेरे मे लेकर शहीद कर दिया! हज़रत ज़ैनब रज़िअल्लाह तआला अन्हा ने अपने इस भतीजो को बड़े नाज़ नख़रो से पाला था ख़ेमे से जब उन्होंने हज़रत अली अकबर को ख़ाक़ व ख़ूं मे लोटते हुए देख़ा, तो बेताब हो गई थी ‘इब्ने अख़ाह (भतीजा) कहते हुए दीवानावार ख़ैमे से बाहर दौड़ी और भतीजे के लाश से चिपट गईं जनाब इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने उन्हे वहाँ से ख़ैमे मे भेजा और जवान बेटे की लाश उठाकर ख़ेमे के सामने ले आएँ! हज़रत अली अकबर के बाद अब्दुल्लाह बिन मुस्लिम बिन अक़ील, अहमद बिन इमाम हसन, अबु बक़र बिन इमाम हसन, अब्दुल्लाह बिन इमाम हसन, अब्दुर्र्हमान बिन अक़ील, जाफ़र बिन अक़ील, उमर बिन अली, क़ासिम बिन इमाम हसन, उस्मान बिन अली रज़िअल्लाह तआला अन्हुमा और दूसरे अज़ीज़ सिवाए सात लोगों के एक एक करके बहुत बहादुरी से लड़ते हुए शहादत का जाम नोश फ़रमाते गए!

अब हज़रत ज़ैनब ने अपने कमसिन बेटों औन और मोहम्मद को मैदाने जंग मे भेजने के लिये अपने महबूब भाई से इजाज़त चाही, उन्होंने इन जिगर के टुकड़ों को लड़ाई मे भेजने मे पसोपेश किया! हज़रत ज़ैनब रोती हुई भाई के गले से लग गईं और कहा भाई मेरा दिल मत तोड़ो औन और मोहम्मद को पाल पोसकर इसी लिये बड़ा किया है कि अपने मामू पर जाननिसार करे इससे बढ़कर मुसीबत का दिन कभी नही आएगा! इधर हज़रत ज़ैनब ने उन्हें रुख़सत करते हुए नसीहत किया कि मेरे फ़रज़न्दों अपने नाना अली और अपने दादा जाफ़र तय्यार रज़िअल्लाह तआला अन्हुमा की रूहों को शरमिन्दा न करना और मैदाने जंग मे पीछे मुड़कर ना देखना! हज़रत औन और मोहम्मद ने दुश्मनाने दीन पर एक ज़बरदस्त हमला किया, देखने मे बच्चे थे लेकिन बिन्ते हैदर ज़ैनब कुबरा का दूध पिया था बड़ो से बढ़कर बहादुरी दिखाई कई बदबख़्त उनकी तलवारों का शिकार हुए! आख़िर मे उन्होंने घेरे मे लेकर तलवारों और नेज़ों की बारिश कर दी! और हज़रत ज़ैनब रज़िअल्लाह तआला अन्हा के दोनों लख़्ते जिगर ने सफ़रे आख़िरत तय फ़रमाया! सैय्यदा ज़ैनब और सैय्यदना इमाम हुसैन के क़लबो जिगर के टुकड़े उड़ गए लेकिन आसमान की तरफ़ नज़र की और ख़ामोश होगए! हज़रत औन और मोहम्मद की शहादत के बाद ख़ानदाने नबूवत सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के मुजाहिदीन ने एक एक करके जामे शहादत नोश फ़रमाया! अब हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम अकेले रह गए! हज़रत ज़ैनुल आबिदीन बीमार थे और लड़ाई करने के क़ाबिल नही थे उन्हें अल्लाह और अपनी बहन के सुपुर्द किया और सबको ख़ुदा हाफ़िज़ कह कर फ़रज़न्दाने रसूल अल्लाह सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम अपने आख़िरी सफ़र पर रवाना हुए! प्यास का ग़लबा था, अपने जिगर के टुकड़ों और जाँनिसारों की शहादत से दिल तूटा हुआ था लेकिन इस क़यामत का हमला किया कि दुशमनों के बादल के बादल छ्ट गए! शेरे ख़ुदा हैदरे कर्रार के फ़रज़न्द जिस तरफ़ रुख़ करते सफ़ो की सफ़े उलटकर रख देते! यज़ीदी बार बार नरग़ा करते थे, लेकिन हुसैनी तलवार ज्यो ही चमकती भाग खड़े होते! रसूल के कंधो का सवार अब ज़ख़्मों से चूर चूर हो गया था! हर तरफ़ से नेज़ों, तलवारों, ख़ंजरों, तीरों की बारिश हो रही थी, इतने मे हुसैन बिन नुमैर ने एक नेज़ा फ़ेका जो गले मुबारक से उतर गया मुँह मुबारक से ख़ून का फव्वारा फूट पड़ा! अपने चुल्लू मे थोड़ा सा ख़ून लेकर आसमान की तरफ़ उछाला और फ़रमाया “मौला! जो कुछ तेरे महबूब के औलादों के साथ हो रहा है, तुझी से इसकी फ़रियाद करता हूँ!

अपने जलीलुलक़द्र भाई की प्यारी बहन हज़रत ज़ैनब रज़िअल्लाह तआला अन्हा दिल पर हाथ रखे आफ़ताबे इमामत की हालत देख रहीं थी! जब उन्हे ख़ून की कुल्लियाँ करते देखा तो दौड़ी हुई मैदाने जंग के क़रीब एक टीले पर खड़ी होकर पुकारने लगी “ऐ अम्र बिन सअद क्या क़यामत है अबु अब्दुल्लाह क़त्ल किये जा रहें है और तुम देख रहे हो!

अम्र बिन सअद की आँखो पर लालच ने पर्दा डाल दिया था लेकिन क़राबतदार था नदामत की वजह से हज़रत ज़ैनब की तरफ़ से मुँह फेर लिया!

जनाबे इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की हालत अब लम्हा ब लम्हा ग़ैर होती जा रही थी! दुश्मनों ने हर तरफ़ से घेर लिया था जुरआ बिन शरीक तमीमी ने हाथ और गर्दन पर तलवार चलाई, सनान ने नेज़ा मार कर आप रज़िअल्लाह तआला अन्हु को ज़मीन पर गिरा दिया फिर सनान बिन अनस और कुछ रिवायतों के मुताबिक़ शिम्र ज़िलजोशन ने उस गर्दन पर खंजर फेर दिया जिस पर शहंशाहे कुलकायनात इमामुल अम्बिया रहमते आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम बोसे दिया करते थे! शहादत के वक़्त हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के जिस्म अनवर पर तीस ज़ख़्म तलवार के, तैंतीस ज़ख़्म नेज़े के और लातादाद ज़ख़्म तीरों के थे! इमाम आली मक़ाम की शहादत दस मोहर्रमुल हराम सन् इक्सठ हिजरी यौमुल जुमा को नमाज़ के हालत मे हुई!

 

ख़ुद को ख़ुदा कि राह मे करता है जो क़ुरबान

राहे वफ़ा मे देता है जो हर लम्हा इम्तिहान

मिटता नही कभी भी वो हक़ परस्त इंसान

बाद मरने के भी रहता है कामियाबो कामरान

जिन्दा मिसाल देता हूँ अफ़ज़ल सी मैं यहाँ

रहकर यज़ीद ज़िन्दा ज़िल्लत का हुआ सामान

मिटकर भी हो गए हुसैन शादाबो शादमान” (अलैहिस्सलाम)

 

हज़रत जलालउद्दीन सियूती रहमतउल्लाह अलैह (तारीख़ अल ख़ुलेफ़ा) मे फ़रमाते है कि सैय्यदना इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की शहादत के बाद इंसान तो इंसान रूहे ज़मीन व आसमान ने भी ख़ून के आंसू बहाए, आपके शहादात के बाद सात दिन तक अंधेरा सा रहा दिवारों पर धूप का रंग ज़र्द पड़ गया था! उस दिन बहुत से सितारे भी तूटे, आपके शाहादत के दिन सूरज को गिरहन लग गया था और मुसलसल छः माह तक आसमान के किनारे सुर्ख़ रहे! ये सुर्ख़ी रफ़्ता रफ़्ता तो जाती रही, लेकिन ‘अफ़क’ की सुर्ख़ी जिसको ‘शफ़क’ कहते है आजतक मौजूद है! ये सुर्ख़ी शहादते हुसैन अलैहिस्सलाम से क़ब्ल मौजूद नही थी! आप अलैहिस्सलाम के शहादत के दिन जो भी पत्थर बैतुल मुक़द्दस मे उठाए जाते उसके नीचे ताज़ा ख़ून निकलता था! इराक़ी फ़ौज के पास जिस कद्र भी कसनभ (ज़ाफरान के तरह क़ीमती घास) मौजूद था, वो सारे का सारा राख़ बन गया! लशकरे अशकिया ने अपने लिए ऊँट ज़िबह किया तो उसका गोश्त आग की तरह सुर्ख़ हो गया! गोश्त को पकाया गया तो इतना शदीद कड़वा था कि मुँह मे ना रख़ा जा सका! एक बदबख़त ने इमाम आली मकाम के शान मे गुस्ताख़ियाँ किया तो बहुक्मे इलाही आसमान से एक तारा तूटा और वो शख़्स अन्धा हो गया!

(बड़ी शर्म और अफ़सोस की बात है आज कुछ लोग और जमातें ऐसी पैदा हो गईं हैं कि वो इमाम आली मुक़ाम की मोहब्बत मे रोना हराम और बिदअत बताते हैं, लेकिन उन यज़ीदियों को ये नही मालूम की मोहब्बत का कनेक्शन दिल से होता है, और अपने और अपने महबूब की मोहब्बत मे आँसू अपने आपही आँखों से जारी हो जाते हैं, लेकिन ये बातें ये क्या जाने कि जिनके दिल पर ख़ुदा की तरफ़ से ख़ारजियत और मुनाफ़िक़त की मोहरें लगा दी गई हैं ये तो वाक़्याए करबला को भी झुठलाने मे लगे हुए हैं, और अपने आपको मुसलमान और ईमान वाला कहते हैं और अपनी जमातों को हक़ पर साबित करने की कोशिश मे लगे रहते हैं, ऐसे दुश्मनाने अहले बैत नबवी और वक़्त के यज़ीदियों से मै यही कहना चाँहूगा कि                                                                                                                                                                                                                                      

 

ख़ुद को छुपा के लेकर कहाँ जाएगा यज़ीद

मिटना है तेरी क़िस्मत ज़िल्लत है तेरा नसीब

जबजब तू अपने सर को उठाएगा हक़ीर

तबतब जहाँ मे पैदा होगा मेरा सफ़ीर

औलादे नबी से जो तू टकराया लईन

मैहशर मे सुकून तुझे और दुनिया मे भी कही

ख़ूने रसूल दुनिया मे फैलेगा बनके नूर

होगा जहाँ मे हसनैन की औलाद का ज़हूर”                                                                                                                                

 

अहलेबैत नबवी सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की मोहब्बत अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त ने हर एक मोमिन पर फर्ज़ क़रार दिया है, बल्कि ये तो ईमान का जुज़ है अहलेबैत पाक की मोहब्बत के बग़ैर कोई पहाड़ के बराबर भी इबादत करेगा और वो सोचेगा उसकी इबादत और रियाज़त ख़ुदा की बारगाह मे क़ुबूल होगी, तो ये उसकी भूल है बल्कि ऐसी इबादत जो बुग़्ज़ और इनादे अहले बैत के साथ करेगा उसकी इबादतों और तमाम नेक आमालों को क़यामत मे अल्लाह रब्बे क़ुद्दूस मुँह पर लपेट कर मार देगा इसकी सच्चाई हर मोमिन बख़ूबी जानता है और ये अहदिसे मुबारका से पूरी पुख़्तगी के साथ साबित है-

हज़रत अब्दुल्लाह बिन मसऊद रज़िअल्लाह तआला अन्हु जो एक जैय्यद सहाबी और सैकड़ों हदीसे पाक के ‘रावी’ है, आप फ़रमाते है कि, अहले बैत नबवी सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की मोहब्बत (हरम मे किये जाने वाली सौ दिन की इबादत से अफ़ज़ल है) और यही वजह है कि ख़ुलेफाए राशिदीन, सहाबाकिराम, और वक़्त के इमामों का दिल हमेशा इससे लबरेज़ रहा है!

हज़रत हाफ़िज़ बिन कसीर अलैहरहमा जो निहायत मोहतात मेअर्रिख़ और बलन्द पाए मोहक़िक्क है फ़रमाते है कि हज़रत अबुबक़्र सिद्दीक़ रज़िअल्लाह तआला अन्हु हसनैन करीमैन से हद दर्जे मोहब्बत करते थे बल्कि बेहद ताज़ीम और ऐहतिराम बजा लाते थे और यही अमल हज़रत उमर फ़ारूक़ और हज़रत उस्मान ग़नी रज़िअल्लाह तआला अन्हुमा का था!

हज़रत इमाम शाफ़ई रज़िअल्लाह तआला अन्हु की मोहब्बत का आलम तो ये था कि जब माहे मोहर्रम शुरू होता तो आप पर एक लरज़ा तारी हो जाता और अहले बैत पाक की मोहब्बत मे इस क़द्र रोते कि रोते रोते बेहोश हो जाते हत्ता की आप पर राफ़्ज़ियत का फ़तवा लागा दिया गया इसके जवाब मे आपने लोगों से यही कहा कि अगर अहले बैत नबवी के इश्क़ मे रोना राफ़्ज़ियत है तो जानलो मुझसे बड़ा राफ़्ज़ी दुनिया मे कोई नही! और यही हाल अलसुन्नत वलजमात के सब इमामों का था!

अल्लाह तबारको तआला की ये बहुत बड़ी मशीयत रही है कि इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की शहादत से लेकर अबतक आपके नाम पर जितने अश्क़ बहाए गए है दुनिया के तारीख़ों के औराख़ों पर बफज़ले ख़ुदा ये भी बहुत बड़ा रिर्काड रहा है और सुबहो क़यामत तक रहेगा बल्कि मेरा तो ये भी मानना है कि जिस दिन लोगों के दिलों से उस क़यामते सुग़रा (इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की शहादत का दिन) के नक़्श मिट जाएंगे उनपर अल्लाह तबारको तआला क़यामते कुबरा मुसल्लत कर देगा और उसका दिन भी मोर्हरम की दस तारीख़ और यौमे जुमा होगा! अल्लाह तबारको तआला हम सबको इस नमक हरामी से महफ़ूज़ फ़रमाए आमीन!

 

हज़रत इमाम आली मक़ाम हुसैन अलैहिस्सलाम के ख़ानवादे मे जितने लोग बचे उनको बड़े ज़ुल्मोसितम के साथ बन्दी बनाकर करबला से कूफ़ा और कूफ़े से शाम यज़ीद पलीद के दरबार मे यज़ीदी फ़ौज ले गई और फिर लोगों की लानत और मलामत के बाद यज़ीद बत्कार ने उन्हे इस ख़ौफ़ से कि कही उसकी हुकूमत और जब्री बादशाहत पर कोई आँच न आ जाए मदीना मुनव्वरा भेज दिया!

 

इमाम आली मुक़ाम हज़रत हुसैन अलैहिस्सलाम और आपकी अहले बैत पर ज़ुल्मो सितम करने वालों का इबरतनाक अन्जाम हुआ उनपर ख़ुदा की तरफ़ से ऐसे ऐसे इबरतनाक आज़ाब हुए कि जिनके देखने वालों के दिल काँप उठे! यज़ीद पलीद मर्ज़े कौलन्ज मे ऐसा मुब्तिला हुआ कि एक बूंद पानी भी उसके गले मे जाता तो तीर के तरह गले को छलनी कर देता इसी बीमारी मे वो दुनिया से तड़प तड़प कर मरा और उसका इबरत नाक हश्र हुआ!

इस सवानेह अज़ीम और दर्द अन्दोज़ वाक़ेआ की सबसे बड़ी रावी ख़ुद जनाब सैय्यदा ज़ैनब सलामउल्लाह अलैहा और हज़रत सैय्यदना ज़ैनुल आबिदीन अलैहिस्सलाम रहें है!

 

 

यज़ीद पलीद की मज़ीद बदबख़्ती तमाम इस्लामी मुअतबर तारीख़ों मे मसलन तारीख़ इब्ने असीर, तारीख़ तबरी, तारीख़ इब्ने ख़लदून से पता चलता है कि सन् तिरसठ (63) हिजरी मे यज़ीद पलीद के हुक्म से मदीना तय्यबा की ज़बरदस्त तौहीन की गई जो शहादत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के बाद अज़ीमतर बुराईयों मे से एक थी! यज़ीद पलीद ने बदबख़्त और बत्कार मुस्लिम बिन उकबा को एक बड़े लश्कर के साथ मदीना तय्यबा पर चढ़ाई करने का हुक्म दिया और साथ मे ये भी हुक्म दिया कि लोगों को बेदर्दी के साथ क़त्ल करो और उन पर जितना चाहे ज़ुल्मों सितम करो और मदीना मुनव्वरा व रौज़ा-ए-सरकार दो आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्ल्म की ख़ूब बेअदबी करो तुम्हे पूरी इजाज़त दी जाती है! मुस्लिम बिन उकबा बत्कार ने यज़ीद पलीद के हुक्म की पूरी तामील किया और अपने बेदीन होने का मुज़ाहिरा पेश किया! उसने तीन दिन तक हरम-ए-नबी की बेहुरमती किया, तीन हज़ार सात आदमियों को बेशुमार औरतों और बच्चों को सात सौ हाफ़िज़ों को बेशुमार मुहाजिरीनो अंसारो ताबेईन को शहीद करवा दिया और सत्तानवे (97) अफ़रादे क़ुरैश को भी बड़े बेदर्दी से शहीद करवा दिया! फ़िस्को फ़साद और ज़िना को जाएज़ क़रार दिया और तो और रौज़ा-ए-अनवर और मिंबर शरीफ़ के दरमियानी जगह कि जहाँ के मुताल्लिक़ हदीसे सहिया मे है कि वो जन्नत के बाग़ों मे से एक बाग़ है वहाँ उनके घोड़ें पेशाब और लीद करते थें! बदज़ात और बेदीन मुस्लिम बिन उकबा लोग़ों को यज़ीद पलीद की बैअत पर इस तरह आमादह करता था कि वो हर हाल में यज़ीद का हर हुक्म माने चाहे वो अल्लाह तआला की नाफ़रमानी ही क्यों न हो! हज़रत अब्दुल्लाह बिन ज़मआ रज़िअल्लाह तआला अन्हु ने इसकी मुख़ालफ़त करते हुए लोग़ों को क़ुरआन और हदीस की रौशनी मे बैअत के माईने बताएं तो फ़ौरन ही उन बदबख़्तों ने उनके सर को तन से जुदा कर दिया! जब यज़ीद पलीद के उन बदबख़्त नआक़बत अन्देश लश्करियों ने पूरी तरह मदीना मुनव्वरा और रौज़ा-ए-अक़दस की इज़्ज़त और अज़मत को पामाल कर लिया तो यज़ीद फ़ासिख़ो फाजिर के हुक्म से मक्के का रुख़ किया लेकिन अभी आधी दूर पहुँचे थे की इनका सिपहसालार मुस्लिम बिन उकबा नामुराद मर गया! जब यज़ीद को इस की ख़बर मिली तो उसने हुस्सैन बिन नुमैर बदबख़्त (क़ातिलाने अहले बैत) को सिपहसालार बना कर मक्का रवाना किया और वहाँ पहुँचकर उसका मुहासरह कर लिया और ख़ाने काबा पर पत्थरों की बारिश करवाई इसी दरमियान हज़रत अब्दुल्लाह बिन ज़ुबैर रज़िअल्लाह तआला अन्हु ने इनपर चढ़ाई करदी और इनसे आमादा-ए-जंग हुएं जब ये मरदूर आपको शिकस्त ना दे सके तो इन्होंने ख़ाने काबा पर आग के गोले बरसाना शुरु कर दिया जिससे ग़िलाफ़े काबा जल गया और उस मेण्ढे की सींग जो हज़रत इस्माईल अलैहिस्सलाम के जगह ज़िबह किया गया था और जिसे हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने बतौरे यादगार हरम-ए-काबा मे लटका दिया था वो भी जल गयी, इसी दरमियान इन बदबख़्त दुनियादारों को इनके पेशवा यज़ीद पलीद की मौत की ख़बर मिली जिसको सुनकर ये बदबख़्त वहाँ से भाग निकले ये वाक़ेआ माहे मुक़द्दस रबिउल अव्वल सन् 64 हिजरी का है जिस महीने के सदक़े मे अल्लाह तआला ने इन बदबख़्त यज़ीदियों के शर से हरम-ए-पाक को निजात अता किया!

 

 

मुआविया बिन यज़ीद का ख़ुत्बा और ख़लाफ़त से दस्तबर्दारी मशहूर है कि यज़ीद के मरने के बाद जब बनु उमय्या ने चाहा कि उसके बेटे मुआविया बिन यज़ीद को ख़लीफ़ा बनाया जाये और उनकी वलीअहदी के लिये लोगों से बैअत भी लेने लगें तो मुआविया बिन यज़ीद ने उससे दस्तबर्दारी अख़्तियार की और मिंबर पर चढ़कर एक ख़ुत्बा दिया जिसको अल्लामा दमेरी रहमतउल्लाह अलैह ने अपनी किताब हयातुल हैवान मे क़लमबन्द किया है जो इस तरह है- फिर यज़ीद बिन मुआविया के बाद उसका बेटा मुआविया बिन यज़ीद तख़्त नशीन हुआ वो अपने वालिद से ज़्यादा बेहतर थें दीनदारी और दानिशमंदी दोनो सिफ़अतों से मुतसफ़ थें उनसे बैअत उस दिन ली गयी जिस दिन उनके बाप का इन्तक़ाल हुआ! मुआविया बिन यज़ीद चालीस रोज़ तक मस्नदे ख़लाफ़त पर रहें उसके बाद ख़ुद ही दस्तबर्दार हो गयें! जब वो दस्तबर्दार हुएं तो मिंबर पर तशरीफ़ लाकर ख़ामोश बैठे रहें फिर उम्दा अन्दाज़ मे हम्दो सना और दरूदशरीफ़ पढ़ने के बाद फ़रमाया ”ऐ लोगों मुझे हुकूमत व ख़लाफ़त की ख़्वाहिश नही है इसलिए कि ये अहेम ज़िम्मेदारी है और तुम लोग मुझसे राज़ी भी नही हो! हमने भी और तुमने भी मोतअदद बार आज़माया लेकिन जो तक़दीर मे था हो के रहा! हमारे दादा अमीर मुआविया रज़िअल्लाहु अन्हु इस ख़लाफ़त के बारे मे आगे बढ़े झगड़ा किया कि आख़िरकार इस ख़लाफ़त का मुस्तहक़ कौन है और झग़ड़ा किससे किया जो आफ़ताबे नबूवत सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम का क़रीबी रिश्तेदार मर्तबा और इस्लाम मे सबक़त की वजह से अकाबिर मुहाजिरीन मे बाइज़्ज़त सबसे दिलेर व बहादुर साहिबे इल्मो फ़ज़ल, चचाज़ाद भाई, दामादे नबी, जनाबे रसूलअल्लाह सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने अपनी छोटी साहबज़ादी फ़ातिमा रज़िअल्लाह अन्हा का ख़ुद ही इनका शौहर बनने के लिये इन्तख़ाब किया, इस उम्मत के नौजवानों मे सबसे ज़्यादा अफ़ज़ल और जन्नत के नौजवानों के सरदार हसन व हुसैन रज़िअल्लाह तआला अन्हुमा के वालिद मोहतरम थें!

जैसे कि तुम लोग ख़ूब वाक़िफ़ हो मेरे दादा अमीर मुआविया रज़िअल्लाहु अन्हु से ऐसे शख़्स से बरसरेपैकार हुए और तुम लोगों ने भी इनका साथ दिया यहाँ तक कि मेरे दादा उमूर के मालिक बन गयें लेकिन जब वक़्त मुक़र्ररह आ गया मौत ने उन्हें अपना लिया तो वो अपने अमल और किरदार के साथ मुरतहन हो गयें! कब्र मे अकेले दफ़्न कर दिये गये जो उन्होंने किया था उसका बदला उन्हे मिल गया! उसके बाद ख़लाफ़त फिर मेरे अब्बा जान यज़ीद के पास आगई वो तुम्हारे मामलात के मुन्तज़िम बना दिये गये वो अपनी बदकिरदारी और फुज़ूल ख़र्ची के वजह से जो ख़लाफत के शायानेशान नही थी ख़्वाहिशात से मग़लूब हो गये! गुनाहो का इरतिकाब करने लगे अहकामे इलाही मे जरी हो गये! जो कोई औलादे रसूल सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की इज़्ज़त करता तो वो उनके पीछे पड़ जाते! आख़िरकार मामला यहाँ तक पहुँचा कि उम्र ने वफ़ा न की बहुत कम ज़िन्दा रहे! मरने के बाद उनके असरात ख़त्म हो गये! अपने साथ अपने अमल लेकर दुनिया से रुख़सत हो गये! क़ब्र के हलीफ़ बन गये! बदआमाली मे घिर गये! वो ख़ुद ही अपने नुकसानात मे दब गये! जो उन्होंने किया था उसका सिलह उन्हें मिल गया! फिर वो उस वक़्त नादिम हुए जबकि नदामत और तोबा का वक़्त जा चुका था तो हम भी उनके पैहम रन्जोअलम से शरीके कार हो गये! हाय अफ़सोस उन्होंने जो कहा और किया और जो उनके बारे मे तबसिरे किये जाते है अब आया जो उन्होंने किया था उनको सज़ा दी गयी या जज़ा दी गयी मुझे मालूम नही ये मेरा तसव्वुर है वहेम व गुमान है फिर बाद मे ग़ैरत ने उनका गला घोट दिया! उसके बाद मुआविया बिन यज़ीद देर तक रोते रहें साथ मे लोग भी रोने लगे, कुछ देर के बाद मुआविया बिन यज़ीद ने फ़रमाया ”अब इस वक़्त मै तुम्हारा तीसरा वाली हूँ जिस पर नाराज़ होने वाले लोगों की अकसरियत है मै तुम्हारे बोझ को उठा नही सकता और ना ख़ुदावंद क़ुद्दूस मुझे ये समझता है कि मै तुम्हारे ख़लाफ़त का मुस्तहेक़ था या गिरआँबार अमानत का हक़दार था! तुम्हारे ख़लाफ़त की अमानत एक अहमियत रखती है इसकी हिफ़ाज़त करो और जिसे तुम इसका मुस्तहक़ समझो उसको ये अमानत सुपुर्द करदो मैने तुम्हारे ख़लाफ़त का कुलादह अपनी गर्दन से उतार दिया है! अब मै दस्तबर्दार हो रहा हूँ! इतने मे मरवान अल हकम ने कहा जो मिंबर के नीचे बैठा हुआ था कि यही उमर रज़िअल्लाहु अन्हु की सुन्नत है तो मुआविया बिन यज़ीद ने कहा क्या तुम मुझे मेरे दीन से हटाना चाहते हो! मुझे धोके मे डालना चाहते हो! ख़ुदा की कसम मै तुम्हारी ख़लाफ़त की हलावत नही चख सका तो इसकी कड़वाहट को कैसे बर्दाश्त कर सकता हूँ! तुम मेरे पास उमर फ़ारूक़ रज़िअल्लाहु अन्हु जैसे लोग लाओ जिस वक़्त उन्होंने मजलिसे शोरा की तशकील दी थी और उन्होंने ऐसी तजवीज़ रख दी थी कि कोई ज़ालिम भी अदना स शुबह नही कर सकता था और ना ही उनकी अदालत को मशकूक गरदाँ सकता था! ख़ुदा की कसम ख़लाफ़त अगर ग़नीमत की चीज़ थी तो उसका मज़ा मेरे अब्बा जान ने तावउन या गुनाह की शक्ल में चख लिया और अगर ख़लाफ़त बुरी चीज़ है तो इसके मज़रात जो मेरे अब्बा जान को पहुँच चुकि है बस वही काफ़ी है! इतना कहकर मुआविया बिन यज़ीद नीचे उतर आयें और मुसलसल रोते रहें और इस तरह ख़लाफ़त से दस्तबर्दार हुएं!

 

 

तुरबत मुबारक हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम का जिस्म मुबारक करबला मुअल्ला और सरे अनवर जन्नतुल बक़ी शरीफ़ मे आपके वालिदा सैय्यदा फ़ातिमा ज़हरा के पहलू मे दफ़्न किया गया!

रौज़ाअक़दस हज़रत सैय्यदना इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम (करबला मुअल्ला)

 MAULA HUSAIN AS

 

अर्ज़े करबला

एक बार सबा से पूछा मैने यही

करबोबला कि ख़ाक सी मिली ख़ुशबू तुझे कहीं

बोली बड़ी हैरत से मुझसे वो यही

करबोबला कि ख़ाक सी पाई ख़ुशबू कहीं

उस ख़ाक से मिलती है मुझे ख़ुशबू बतूल की

उस ख़ाक मे बसी है जैसे महक रसूल की

उस ख़ाक मे ही हैदर की ख़ुशबू समाई है

दुनिया मे मिस्ल ख़ुशबू की ऐसी पाई है

उस ख़ाक मे समाया है हसनैन का चमन

उस ख़ाक की ख़ुशबू है ख़ुशबूपंजतन

करती हूँ मै दुआ बस ये रब्बे करीम से

करना मुझे कभी जुदा उस ख़ाके अज़ीम से

 

सैय्यदना इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की अज़वाज औलाद‌—

(1) हज़रत लैला बिन्त अबि मुर्रह अरवाह बिन मसऊद सक़्फ़ी (इनके बत्ने अक़दस से हज़रत अली अकबर रज़िअल्लाह तआला अन्हु पैदा हुएँ!

(2) हज़रत शहर बानो बिन्त शहनशाहे ईरान यज़्द जर्द बिन ख़ुसरू परवेज़ बिन नौशेरवां शहज़ादी ईरान थी (इनके बत्ने अक़दस से हज़रत इमाम अली औस्त उर्फ ज़ैनुल आबिदीन रज़िअल्लाह तआला अन्हु हैं!

(3) हज़रत उम्मे इसहाक़ बिन्त हज़रत तलहा रज़िअल्लाह तआला अन्हु (इनके बत्ने अक़दस से हज़रत सैय्यदा फ़ातिमा क़ुबरा और हज़रत सैय्यदा फ़ातिमा सुग़रा रज़िअल्लाह तआला अन्हा है!

(4) हज़रत रबाब बिन्त अमरूल क़ैस बिन अदि-इनके बत्ने अक़दस से हज़रत सैय्यदा सुक़ैना उर्फ सकीना रज़िअल्लाह तआला अन्हा हुईं और हज़रत अब्दुल्लाह उर्फ अली असग़र रज़िअल्लाह तआला अन्हु हुएँ!

(5) हज़रत उम्मे जाफ़र (इनके बत्ने अक़दस से हज़रत ज़ाफर पैदा हुएँ)!

(6) हज़रत हफ़्सा बिन अब्दुर्रहमान ये हज़रत सैय्यदना अबु बक्र रज़िअल्लाह ताला अन्हु की पोती और हज़रत आयशा रज़िअल्लाह ताला अन्हा की सगी भतीजी हैं (इनके बत्ने अक़दस से हज़रत मोहम्मद रज़िअल्लाह तआला अन्हु पैदा हुएँ)!

(7) बिन्त अबु मसऊद अन्सारी रज़िअल्लाह अन्हा!

इस तरह हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के पाँच शहज़ादे हुए यानी (1) हज़रत अली अकबर (2) हज़रत अली औस्त ज़ैनुल आबिदीन (3) हज़रत अब्दुल्लाह अली असग़र (4) हज़रत मोहम्मद और (5) हज़रत जाफ़र (रज़िअल्लाहु अन्हुमा) और तीन शहज़ादियाँ हुई यानी (1) हज़रत फ़ातिमा क़ुबरा (2) हज़रत फ़ातिमा सुग़रा (3) और हज़रत सुकैना (रज़िअल्लाहो अन्हमा)

हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के तमाम शहज़ादे कर्बला मे शहादत के दर्जे पर फ़ाऐज़ हुए सिवाए इमाम ज़ैनुल आबिदीन रज़िअल्लाह तआला अन्हु के और हज़रत इमाम हसन अलैहिस्सलाम की औलादों में सिवाय हज़रत हसन मुसन्ना और हज़रत ज़ैद रज़िअल्लाह तआला अन्हुमा के सब करबला में शहीद कर दिए गएँ! इस तरह रूहे ज़मीं पर आज जितने भी हसनी हुसैनी सादात मौजूद हैं वो इमाम आली मुकाम हसन और हुसैन अलैहिस्सलाम के तीन शहज़ादों से है यानी (1) हज़रत इमाम ज़ैनुल आबिदीन बिन इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम (2) हज़रत ज़ैद बिन इमाम हसन अलैहिस्सलाम और (3) हज़रत इमाम हसन मुसन्ना (जद् सादात क़ुत्बिया) बिन इमाम हसन अलैहिस्सलाम से हैं!

 

 

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