अर-रहीकुल मख़्तूम  पार्ट 73 ग़ज़वा बनू कुरैज़ा पार्ट 1



ग़ज़वा बनू कुरैज़ा

जिस दिन अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम खंदक़ से वापस तशरीफ़ लाए, उसी दिन जुहर के वक़्त, जबकि आप हज़रत उम्मे सलमा रज़ियल्लाहु अन्हा के मकान में गुस्ल फ़रमा रहे थे, हज़रत जिब्रील तशरीफ़ लाए और फ़रमाया-

‘क्या आपने हथियार रख दिए, हालांकि अभी फ़रिश्तों ने हथियार नहीं रखे और मैं भी क़ौम का पीछा करके बस वापस चला आ रहा हूं। उठिए और अपने साथियों को लेकर बनू कुरैज़ा का रुख कीजिए। मैं आगे-आगे जा रहा हूं। उनके क़िलों में भूकम्प पैदा करूंगा और उनके दिलों में रौब और आतंक डालूंगा।’

यह कहकर हज़रत जिब्रील फ़रिश्तों को साथ लेकर रवाना हो गए।

इधर अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने एक सहाबी से मुनादी कराई कि जो आदमी ‘सुनने और मानने’ पर क़ायम है, वह अस्र की नमाज़ बनू कुरैज़ा ही में पढ़े। इसके बाद मदीना का इन्तिज़ाम हज़रत इब्ने उम्मे मक्तूम को सौंपा और हज़रत अली को लड़ाई का फरेरा देकर आगे भेज दिया। वे बनू कुरैज़ा के क़िलों के क़रीब पहुंचे, तो बनू कुरैज़ा ने अल्लाह के रसूल सल्ल० पर गालियों की बौछार शुरू कर दी।

इतने में अल्लाह के रसूल सल्ल० भी मुहाजिरों और अंसार के साथ रवाना हो चुके थे। आप बनू कुरैज़ा के क़रीब ही ‘अना’ नामी एक कुएं पर ठहर गए। आम मुसलमानों ने भी लड़ाई का एलान सुनकर तुरन्त बनी कुरैज़ा के इलाक़े का रुख किया।

रास्ते में अस्र की नमाज़ का हुक्म हो गया, तो कुछ ने कहा कि हम, जैसा कि हमें हुक्म दिया गया है, बनू कुरैज़ा पहुंच कर ही अस्र की नमाज़ पढ़ेंगे, यहां तक कि कुछ ने अस्र की नमाज़ इशा के बाद पढ़ी, लेकिन कुछ दूसरे साथियों ने कहा कि आप (सल्ल०) का अभिप्राय यह नहीं था, बल्कि यह था कि हम जल्द से जल्द चल पड़ें। इसलिए उन्होंने रास्ते ही में नमाज़ पढ़ ली। अलबत्ता (जब अल्लाह के रसूल सल्ल० के सामने यह विवाद आया तो) आपने किसी भी फ़रीक़ को सख्त सुस्त नहीं कहा।

बहरहाल अलग-अलग टुकड़ियों में बंटकर इस्लामी फ़ौज बनू कुरैज़ा के क़रीब पहुंची और नबी सल्ल० के साथ जा शामिल हुई। फिर बनू कुरैज़ा के क़िलों का घेराव कर लिया। इस फ़ौज़ की कुल तायदाद तीन हज़ार थी और

उसमें तीन घोड़े थे ।

जब घेराव कड़ा हो गया तो यहूदियों के सरदार काब बिन असद ने उनके सामने तीन प्रस्ताव रखे-

1. या तो इस्लाम कुबूल कर लें और मुहम्मद के दीन में दाखिल होकर अपनी जान, माल और बाल-बच्चों को बचा लें। काब बिन असद ने इस प्रस्ताव को रखते हुए यह भी कहा कि अल्लाह की क़सम ! तुम लोगों पर यह बात स्पष्ट हो चुकी है कि वह वाक़ई नबी और रसूल हैं और वही हैं जिन्हें तुम अपनी किताब में पाते हो ।

2. या अपने बीवी-बच्चों को खुद अपने हाथों से क़त्ल कर दें, फिर तलवार सौंत कर नबी सल्ल० की ओर निकल पड़ें और पूरी ताक़त से टकरा जाएं, इसके बाद या तो जीत जाएं या सबके सब मारे जाएं।

3. या फिर अल्लाह के रसूल सल्ल० और सहाबा किराम रजि० पर धोखे से सनीचर के दिन पिल पड़ें, क्योंकि उन्हें इत्मीनान होगा कि आज लड़ाई नहीं होगी ।

लेकिन यहूदियों ने इन तीनों में से कोई भी प्रस्ताव नहीं माना, जिस पर उनके सरदार काब बिन असद ने (झल्लाकर कहा, तुममें से किसी ने मां की कोख से जन्म लेने के बाद एक रात भी होशमंदी से नहीं गुज़ारी है।

इन तीनों प्रस्तावों को रद्द कर देने के बाद बनू कुरैज़ा के सामने सिर्फ़ एक ही रास्ता रह जाता था कि अल्लाह के रसूल सल्ल० के सामने हथियार डाल दें और अपनी क़िस्मत का फ़ैसला आप पर छोड़ दें, लेकिन उन्होंने चाहा कि हथियार डालने से पहले अपने कुछ मुसलमान मित्रों से सम्पर्क बना लें। संभव है, पता लग जाए कि हथियार डालने का नतीजा क्या होगा।

चुनांचे उन्होंने रसूलुल्लाह सल्ल० के पास सन्देश भेजा कि आप अबू लुबाबा को हमारे पास भेज दें। हम उनसे मश्विरा करना चाहते हैं। अबू लुबाबा उनके मित्र थे और उनके बाग़ और बीवी-बच्चे भी उसी इलाक़े में थे ।

जब अबू लुबाबा वहां पहुंचे, तो मर्द लोग उन्हें देखकर उनकी ओर दौड़ पड़े और औरतें और बच्चे उनके सामने धाड़े मार-मारकर रोने लगे। इस स्थिति को देखकर हज़रत अबू लुबाबा पर काफ़ी प्रभाव पड़ा।

यहूदियों ने कहा, अबू लुबाबा ! क्या आप उचित समझते हैं कि हम मुहम्मद (सल्ल०) के फ़ैसले पर हथियार डाल दें ?

उन्होंने कहा, हां। वरना साथ ही हाथ से हलक़ की ओर इशारा भी कर दिया

जिसका मतलब यह था कि ज़िब्ह कर दिए जाओगे। लेकिन उन्हें फ़ौरन एहसास हुआ कि यह अल्लाह और उसके रसूल सल्ल० के साथ खियानत है।

चुनांचे वह रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के पास वापस जाने के बजाए सीधे मस्जिदे नबवी पहुंचे और अपने आपको मस्जिद के एक खम्भे से बांध लिया और क़सम खाई कि उन्हें अब रसूलुल्लाह सल्ल० ही अपने मुबारक हाथों से खोलेंगे और वे आगे कभी बनू कुरैज़ा की धरती में दाखिल न होंगे।

इधर अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम महसूस कर रहे थे कि उनकी वापसी में देर हो रही है। फिर जब सविस्तार बातें मालूम हुईं तो फ़रमाया, अगर वह मेरे पास आ गए होते मैं उनके लिए मरिफ़रत की दुआ कर दिए होता, लेकिन जब वह वही काम कर बैठे हैं, तो अब मैं भी उन्हें उनकी जगह से खोल नहीं सकता, यहां तक कि अल्लाह उनकी दुआ कुबूल फ़रमा ले |

उधर अबू लुबाबा के इशारे के बावजूद बनी कुरैज़ा ने यही तै किया कि अल्लाह के रसूल सल्ल० के सामने हथियार डाल दें और वह जो फ़ैसला मुनासिब समझें, करें, हालांकि बनू कुरैज़ा एक लम्बी मुद्दत तक घेराव सहन कर सकते थे, क्योंकि एक ओर उनके पास भारी मात्रा में खाने-पीने का पर्याप्त सामान था, पानी के सोते और कुंएं थे, मज़बूत और सुरक्षित क़िले थे और दूसरी ओर मुसलमान खुले मैदान में खून में जमाव पैदा करने वाले जाड़े और भूख की सख्तियां सह रहे थे और ग़ज़वा खंदक़ की शुरुआत से भी पहले से बराबर लड़ाइयों में लगे रहने की वजह से थकन से चूर-चूर थे, लेकिन बनू कुरैज़ा की लड़ाई एक मानसिक लड़ाई थी। अल्लाह ने उनके दिलों में रौब डाल दिया था और उनके हौसले टूटते जा रहे थे 1

फिर मनोबल का टूटना उस वक़्त अपनी सीमा को पहुंच गया, जब हज़रत अली बिन अबी तालिब रज़ि० और हज़रत ज़ुबैर बिन अव्वाम ने पेशक़दमी फ़रमाई और हज़रत अली रज़ि० ने गरजकर यह एलान कर दिया कि ईमान के फ़ौजियो ! ख़ुदा की क़सम ! अब मैं भी या तो वही चखूंगा जो हमज़ा ने चखाया या उनका क़िला जीत कर रहूंगा।

चुनांचे हज़रत अली रज़ि० का यह संकल्प सुनकर बनू कुरैज़ा ने जल्दी से अपने आपको अल्लाह के रसूल सल्ल० के हवाले कर दिया कि आप जो फ़ैसला मुनासिब समझें, करें ।

रसूलुल्लाह सल्ल० ने हुक्म दिया कि मर्दों को बांध दिया जाए। चुनांचे मुहम्मद बिन मस्लमा अंसारी रज़ि० की निगरानी में इन सबके हाथ बांध दिए गए


Hasan Basri رحمۃُ اللہ علیہ ka Mu‘awiya ke liye halakat ki bad-dua aur unke muta‘alliq rai.

Jaleel-ul-qadr tabi‘i, Imam-ul-Auliya Hazrat Hasan Basri رحمۃُ اللہ علیہ ka Mu‘awiya ke liye halakat ki bad-dua aur unke muta‘alliq rai

Jab Imam Hasan Basri ko yeh khabar mili ke Sahabi-e-Rasool Hazrat Hujr bin ‘Adi رضی اللہ عنہ ko Mu‘awiya ne qatl karwa diya, to Imam ne farmaya: Hujr aur unke rafeeqon ke qatil ke liye halakat hai.

Mazeed Mu‘awiya ke bare mein farmate hain:
“Mu‘awiya ne chaar aise kaam kiye hain ke in mein se koi ek kaam bhi koi kare to uske liye halakat hai:

1. Mu‘awiya ka ummat par talwar uthana aur bina shura khilafat sambhal lena, halanke ummat mein jaleel qadr Sahaba maujood the.


2. Mu‘awiya ka apne bete Yazeed ko wali-e-‘ahd banana, halanke woh sharabi aur nashabaaz tha, resham ke kapde pehenta tha aur tambura bajata tha.


3. Mu‘awiya ka Sumayya ke bete Ziyad ko apne baap Abu Sufyan ka beta qarar dena.


4. Mu‘awiya ka Hazrat Hujr bin ‘Adi aur unke sathiyon ko be-qasoor qatl kar dena — aur Hujr ke qatl par to Mu‘awiya ke liye do-guni halakat hai.



Hawala:
(al-Isti‘ab — Imam Ibn ‘Abd al-Barr, Bab Hujr, Hadith no. 487, jild 1, safha 331)
(Tareekh al-Rusul wal-Muluk — Imam Tabari, sanah 51 Hijri ka bab, jild 5, safha 279)

Hazrat ameer-ul-momineen Ali alaihissalam ka zuhd aur taqwa



Antarah bin Abdul Rahman bayan karte hain ke main apne ek kaam se sakht sardi ke mausam mein Ameer-ul-Momineen Ali alaihissalam ke paas gaya,
mai ne dekha ke aap sakht sardi ke bawajood ek phata hua aur purana sa makhmali kapra odhe hue thay, aur aap tharthar kaanp rahe thay.

Main ne arz ki:
“Aey Ameer-ul-Momineen! Yeh kya haal bana rakha hai? Allah ne bait-ul-maal mai aap aur aap ke ahl-e-khanah ka haq muqarrar kiya hai.”

Ameer-ul-Momineen Ali alaihissalam ne farmaya
“Main bait-ul-maal mai se kuch bhi le kar tumhara nuksaan nahi karunga, yeh mera wahi kapra hai jo mai apne saath Madinah se laya tha.”

Reference:

(1) Al-Amwaal — Abu Ubaid, jild 1, safha 386, Hadith number 683
Sheikh Abu Ishaq al-Huwaini ne is hadith ko Hasan qarar diya hai.

(2) Al-Amwaal —  jild 1, safha 609, Hadith number 1002
Sheikh Shakir Dheeb ne is hadith ko Hasan qarar diya hai.