हज़रत अली Alaihissalam का नसब पर फख्र करना

हज़रत अली का नसब पर फख्र करना

गज़वा ए अहज़ाब (ग़ज़्वा ए ख़न्दक़) में रिजज़:- मैं अली हूँ और अब्दुल-मुत्तलिब का बेटा हूँ। जवान मर्द के लिए भागने से मौत बेहतर है।

ग़ज़वा ए बनी कुरैज़ा में इरशाद:- ख़ुदा की क़सम मैं या तो अपने चचा

हज़रत हम्ज़ा की तरह शहीद हो जाऊँगा या कुफ़्फ़ार का यह क़िला फ़तह करके रहूँगा।

ग़ज़वा ए खैबर में फख्र व मुबाहात के तौर पर फरमाया:- मैं वोह हूँ के जिसका मेरी माँ ने नाम हैदर रखा है। हैदर के माअने है चीरने-फ़ाड़ने वाला। मैं शेरे-नर और शुजाअत का असद हूँ।

ग़ज़वा ए बद्र के वक़्त हज़रत अली का अमीर मुआविया के ख़ानदान का ज़िक्रः- हज़रत मोहम्मद बाक़र अलैहिस्सलाम का यह फरमान “कामिल बहाई” में मौजूद है के मैं वही अमीरूल-मो’मेनीन अली इब्ने अबि तालिब हूँ जिसने अमीर मुआविया के अजदाद, नाना उत्बा, मामू वलीद और अमीर मुआविया तुम्हारे भाई हंज़ला के परखच्चे उड़ा कर जंगे बद्र में इस्लाम को काफ़िरों पर यानी तुम्हारे अजदाद पर फ़तह नसीब कराई थी।

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