अहले बैत की शान व जुबाने कुरान

अहले बैत की शान व जुबाने कुरान :-

एक मर्तबा हसनैन करीमैन बीमार हो गये और अलालत (बीमारी) के बाइस (हसनैन करीमैन) कमज़ोर हो गये और उनके चेहरे मुरझा गये हज़रत मौला अली शेरे खुदा (करमल्लाहु वजहुल करीम) ने कहा कि मेरे

दोनो बेटे सेहतमंद हो जायें तो मैं बतौर शुक्राना तीन रोज़े रखूँगा और खातूने जन्नत सइयदा फातिमा ज़हरा (रज़िअल्लाहु तआला अन्हा) व हज़रत इमाम हसन व इमाम हुसैन (रज़िअल्लाहु तआला अन्हुम) और आपकी खादिमा फ़िज़्ज़ा (रजिअल्लाहु तआला अन्हा) ने भी यही कहा और तीन रोजों की मन्नत मान ली फिर जब हसनैन करीमैन सेहतमंद हो गये तो मन्नत (नज़र) पूरी करने के लिये पाँच अफ़ाद हज़रत मौला अली, सइयदा फातिमा, इमाम हसन व इमाम हुसैन (अलैहिमुस्सलाम) और आपकी खादिमा फ़िज़्ज़ा ने तीन दिन के रोज़ों का क़सद किया ताकि मन्नत (नज़र) पूरी हो जाये।

जब इन पाँच अफराद ने पहले दिन रोज़ा रखा तो घर में खाने को कुछ न था हज़रत मौला अली (करमल्लाहु बजहुल करीम) ने एक यहूदी से तीन साअ जौ उधार ली और घर पर लाये खातूने जन्नत सइयदा फातिमा (रजिअल्लाहु तआला अन्हा) ने उसमें से एक साअ जौ को पीसा और अफ़्तार के लिये रोटियाँ पकाई और शाम को अफ़्तार के वक़्त पाँचों अफराद ने रोटियाँ और नमक अपने सामने रखा कि ऐन वक़्त पर एक मिस्कीन दरवाज़े पर आया और आवाज़ दी या अहलल बैति अल्लाह की कसम मैं भूका हूँ मुझे खाना खिलाओ अल्लाह तआला तुम्हें जन्नत के दस्तर ख़्वान से खिलायेगा हज़रत मौला अली, सइयदा फातिमा और हसन व हुसैन (अलैहिमुस्सलाम) और फ़िज़्ज़ा जो कि अबरार (नेकोकार, परहेज़गार लोग) थे उन्होंने वो सारी रोटियाँ मिस्कीन को दे दी और खुद पानी से अफ़्तार किया और दिन रात भूके रहे और उस दिन उन्होंने ख़ालिस पानी के सिवा कुछ न खाया।

दूसरे दिन फिर रोज़ा रख लिया और एक साअ जौ की रोटियाँ पकाई गईं लेकिन दूसरे दिन भी यही कैफियत रही कि छैन अफ़्तार के वक़्त दरवाज़े पर एक यतीम ने दस्तक दी और कहा मैं यतीम हूँ और भूका हूँ मुझे खाना खिलाओ अबरार ने सारी रोटियाँ यतीम कोदेदीं और पाँचों अफराद ने पानी से अफ़्तार किया और फिर तीसरे दिन का रोजा रख लिया तीसरे दिन भी यही कैफियत रही कि छैन वक़्ते अफ़्तार एक कैदी ने दरवाज़े पर आवाज़ लगाई ऐ अहले बैत में असीर (कैदी) हूँ और भूका हूँ मुझे खाना खिलाओ और अबरार ने सारी रोटियाँ उस कैदी को दे दी और खुद पानी से अफ़्तार किया।

इन पाँच अफ़ाद हज़रत मौला अली, सइयदा फातिमा, इमाम हसन व इमाम हुसैन (अलैहिमुस्सलाम) और फ़िज़्ज़ा (रज़िअल्लाहु तआला अन्हा) को अल्लाह तआला ने अबरार के लकब से याद फरमाया और अल्लाह तआला को इन पाँच अफराद का तीन दिन का ये अम्र इतना पसन्द आया कि अल्लाह तआला ने जिबरईल अलैहस्सलाम को भेजा और फरमाया कि तीन दिन की रोटियों का सङ्का मिस्कीन, यतीम और कैदी को देना और खुद पानी से अफ़्तार करने का बदला और इनाम ये है कि मैने उन्हें जन्नत और उसकी दायमी नेअमतों का मालिक व वारिस बना दिया और अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त ने सू० दहर की आयात इन पाँच अफराद के हक में नाज़िल फरमाई-

बेशक नेक लोग मुखलिस इताअत गुज़ार (शराबे तहूर के) ऐसे जाम पियेगें जिसमें (खुश्बू, रंगत और लज़्ज़त बढ़ाने के लिये) काफूर की मिलावट होगी (काफूर जन्नत) का एक चश्मा है जिससे (खास) बन्दे पिया करेंगे और जहाँ चाहेंगे उसे छोटी-छोटी नहरों की शक्ल में (दूसरों को पिलाने के लिये) बहा कर ले जाया करेंगे ये अल्लाह तआला के खास बन्दे है जो उस दिन से डरते है जिसकी सख़्ती खूब फैल जाने वाली है और (अपना) खाना अल्लाह तआला की मुहब्बत में मोहताज को यतीम को और कैदी को खिला देते है और कहते हैं हम तो सिर्फ अल्लाह तआला की रज़ा के लिये खिला रहे है तुम से कोई बदला या शुक्र गुज़ारी नहीं माँगते हमें तो अपने रब से उस दिन का ख़ौफ़ रहता है जो (चेहरों को) निहायत सियाह (और) बदनुमा कर देने वाला है पस अल्लाह तआला उन्हें (ख़ौफ़े इलाही के सबब) उस दिन की सख़्ती से बचा लेगा और उन्हें रौनक व ताज़गी और (दिलों में) मशर्रत (खुशी) बख़्शेगा इस बात के बदले कि उन्होंने सब्र किया (रहने को) जन्नत और (पहनने को) रेशमी पोशाक अता करेगा ये लोग उसमें तख़्तों पर तकिया लगाये बैठे होंगे न वहाँ धूप की तपिश पायेंगे न सर्दी की शिद्दत और (जन्नत के दरख़्तों के) साये उन पर झुक रहे होंगे और उन्हें वहाँ (शराबे तहूर के) ऐसे जाम पिलाये जायेंगे उसमें एक चश्मा है जिसका नाम सलसबील है और उनके इर्द गिर्द खिदमत गुज़ार लड़के हमेशा घूमते रहेंगे और जब वो उन्हें देखेंगे तो बिखरे हुये मोती गुमान करेंगे और जब (बहिश्त पर) नज़र डालेंगे तो वहाँ (कसरत से) नेअमतें और (हर तरफ) बड़ी सल्तनत देखेंगे उन (के जिस्मों) पर बारीक रेशम के सब्ज़ कपड़े होंगे और उन्हें चाँदी के कंघन पहनाये जायेंगे और उनका रब उन्हें पाकीज़ा शराब पिलायेगा बेशक ये तुम्हारा सिला होगा और तुम्हारी मेहनत ठिकाने लगी। (सू०-दहर-5-22)

तसरीहः-इमाम जलालुद्दीन सयूती दुर्रे मन्सूर में रकम तराज़ हैं कि मजकूरा आयात पंज अफ्राद हज़रत मौला अली, खातूने जन्नत सइयदा फातिमा ज़हरा और इमाम हसन व इमाम हुसैन (अलैहिमुस्सलाम) और फ़िज़्ज़ा (रजिअल्लाहु तआला अन्हा) के हक में नाज़िल हुई (दुर्रे मन्सूर-6/823) (तफ्सीर कुरतबी-10/139)

अल्लाह तआला ने तीन दिन की रोटियों की कुर्बानी की जज़ा जन्नत व उसकी दायमी अज़ीम उन नेअमतों का मालिक व वारिस बना दिया जो हर एक को मयस्सर न होगी तो अब ज़रा सोचो और मुवाज़ना (अंदाज़ा) करो कि करबला में दस दिन की कुर्बानियों की जज़ा और खानबादा-ए-रसूल के सब्र व तहम्मुल और मकामे रज़ा पर इस्तिकामत की जज़ा क्या होगी बेटे अली अकबर और अली असगर की कुर्बानी की जज़ा क्या होगी तीन दिन की शिदते भूक प्यास और जिस्मे अक़दस पर नेज़ों और तलवारों की बेशुमार ज़रबें और तीरों से खाये ज़ख़्मों की जज़ा क्या होगी।

भाई अब्बास और भतीजे कासिम और भाँजे औन व मुहम्मद की कुर्बानी की जज़ा क्या होगी और कसीर मसाइबो आलाम व इन्तिहाई तकलीफों की जज़ा क्या होगी अल्लाह तआला ने ज़िक्रे हुसैन और ज़िक्रे कर्बला को बुलन्द और कायम व दायम कर दिया ज़िक्रे हुसैन सिर्फ ज़मीन पर ही नहीं बल्कि आसमानों पर भी मुनक़्क़िद होता है और कयामत तक ज़मीनो आसमान पर ज़िक्रे हुसैन और ज़िक्रे करबला होता रहेगा करबला से पहले हुसैन ज़ाकिर था और करबला के बाद हुसैन (अलैहस्सलाम) मजकूर हो गया और अर्श ता फर्श मजलिसे ज़िक्रे शहादतैन मुनक़्क़िद होती रहेगी।

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