फज़ीलते नसब

बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम

हसब व नसब के दो अल्फ़ाज़ हमारे रोज़मर्रा का मामूल हैं, हसब से मुराद वोह फ़ज़ीलत और बुज़ुर्गी है जो किसी फ़र्द को माल व दौलत, मन्सब व मर्तबे नैज़ आबा’ व अजदाद की बुज़ुर्गी की वजह से हासिल हुई हो । नसब किसी फ़र्द के आबा’ व अजदाद के सिलसिले का नाम है जो उस फ़र्द के हसब को बराहे रास्त मुतासिर करता है । इन माअनों से साफ ज़ाहिर है के हसब की इस्लाह और दुरूस्तगी पर शख़्स क़ादिर है मगर नसबी सिलसिले में कमी या बैशी किसी दुनियावी ताक़त का रोग नहीं वोह तो परवरदीगार का एक अतिया / शरफ़ है जो इन्फ़ेरादी कोशिशों से बालातर है।

परवरदीगार आलम ने तख़्लीक़े क़ाएनात के बाद जब इंसान की ख़ल्क़त की तो उसे ‘अशरफ़ुल-मख़्लूक़ात के लक़ब से नवाज़ा। यह ऐज़ाज़ व शरफ़ इंसान को इसलिए हासिल हुआ क्योंके इसमें इस्तदलाल, ता’म्मुल, तफ़क्कुर व जहानत का माद्दा दूसरी मख़्लूक़ात से आ’ला दर्जे पर है। यह शरफ़ इंसान की कोशिशों का नतीजा नहीं बल्के अल्लाह अज़वजल जल्ला – जलालहू का अतिया है । बर ख़िलाफ़ इसके दुनियावी ओहदे इंसान अपनी कोशिशों और आ’ला ख़िदमात की बुनियाद पर हासिल कर सकता है । गोया इनाम व नेअमतें हासिल करने का दरवाज़ा हर शख़्स के लिए खुला है मगर शरफ़ हासिल करने का दारोमदार रज़ा ए इलाही पर है। इरशादे रब्बानी है,

وَتُعِزُّ مَن تَشَاءُ وَتُذِلُّ مَن تَشَاءُ

(सुरह आले- ईमरान, आयत: 26)

तर्जुमा: और तु जिसे चाहे इज़्ज़त अता फरमा दे और जिसे चाहे ज़िल्लत दे ।

ईमरान की बीवी ने अर्ज़ किया: ऐ मेरे रब ! जो मेरे पेट में है मैं उसे ( दीगर ज़िम्मेदारियों से) आज़ाद करके ख़ालिस तेरी नज़र करती हूँ सो तु मेरी तरफ से (यह नज़राना) क़बूल फरमा ले, बेशक तु खुब सुनने खुब जानने वाला है।

मज़कूरा बाला तमाम आयात से यह बात वाज़ेह होती है के अल्लाहरब्बुल-इज़्ज़त की जाते वाहिद ही शरफ़ व फ़ज़ीलत का सरचश्मा है और शरफ़ बख़्शने वाली ज़ात अक़दस भी वही है ।

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