मदीने की बेहुर्मती से यज़ीद की प्यास अभी नहीं बुझी, उसने अपनी फौज को हुक्म दिया कि अब मक्का मुअज़्जमा और कबतुल्लाह को भी ताराज कर डालों।
मा बदे करबला यज़ीद की फौज हिसीन दिन नमीर की सरकरदगी में मक्का पहुंची और पहुंचते ही फौरन काबा का मुहासरा कर लिया। और इस कद्र संगबारी की कि हर हर तरफ़ सहने काबा में पत्थर ही पत्थर नज़र आने लगे। मस्जिदे हराम के कई सुतून शहीद कर डाले, खान-ए-काबा में आग लगा दी।
64/रोज़ तक बराबर मक्का वालों को कत्ल करते रहे। काबा का गिलाफ जल गया, दीवारें फट गईं और जो दुबा हजरत इस्माईल अलैहिस्सलाम की जगह जिबह हुआ था उसकी दोनों सींगें काबा में रखी हुई थीं जल गई और उसका चमड़ा भी जल गया। हजरत सैय्यदना इब्राहीम अलैहिस्सलाम के कई तबलंकात जल गये। काबा कई रोज़ तक बेगिलाफ रहा। अभी यजीदी मक्का में कत्ल द गारत में मस्रूफ थे कि यज़ीद की मौत की खबर आई। फौजें मुन्तशिर हो गई। (जज़्बुल-कुलूब, इने असीर जिल्द 1, स. 31 ता 313, तबरी स. 2 ता 3. अल-बिदाया वन्निहाया स. 219)
इमाम हुसैन व दीगर शुहदाए करबला की शहादत से उसकी प्यास नहीं बुझी। यज़ीद ने फिर से बीस हज़ार फौज पैदल और सवार मिला कर मुस्लिम बिन उक्बा की सरकरदगी में मदीना मुनव्बरा की जानिब रवाना कर दी। यह कह कर अगर अहले मदीना ख़ामोशी से मेरी बैअत कबूल कर लें तो बेहतर है। वरना बिला ख़ौफ़ व ख़तर अहले मदीना को कत्ल कर देना और उनका माल व अस्बाब लूट लेना और किसी तरह की रिआयत न करना। यज़ीदी फौजें पूरी जाह व जलाल के साथ मदीना मुनव्वरा पर हमला आवर हुई।
अहले मदीना यज़ीद की फौजों की ताब न ला सके और अल-अमां अल-अमां पुकारने लगे। मदीना मुनव्वरा पर गलबा पाते ही ऐलान कर दिया कि कत्ले आम शुरू कर दो, और मदीने की औरतों को मैंने तुम पर हलाल कर दिया।
इतना ही ऐलान करना था कि बस यज़ीदी फौजें, अहले मदीना पर टूट पड़ी और अहले मदीना का माल लूटना शुरू कर दिया। इमाम जहरी की रिवायत के मुताबिक 97 सरदाराने कुरैश और सात सौ हाफिजे कुरआन, सत्तरह सौ मुहाजिरीन व अन्सार और दस हजार अहले मदीना कत्ल कर दिए गये जिसमें बच्चे और औरतें भी शामिल हैं।
यज़ीद की फौजों ने मदीना मुनव्वरा की मुकद्दस ख्वातीन के साथ बिल-जब इस्मतदरी की, मदीना में जिना मुबाह कर दिया गया जिसका नतीजा यह हुआ कि एक हज़ार औरतों के पेट से नाजाइज़ बच्चे पैदा
हाफिज़ इने कसीर कहते हैं कि :
कहा जाता है कि उन्हीं दिनों में एक हज़ार औरतें ज़िना से हामिला हुई।
यज़ीद के हुक्म के मुताबिक तीन दिन तक शहर मदीना में जिना को मुबाह किए रखा। शहर के बाशिन्दों का क़त्ले आम किया गया। गज़ब यह कि वहशी फौजों ने घरों में घुस-घुस कर औरतों की इस्मतदरी की। मस्जिदे नबवी शरीफ़ के अन्दर यज़ीदियों ने घोड़े बांधे कई रोज़ तक मस्जिदे नबवी शरीफ घोड़ों के पेशाब और लीद से आलूदा रही।
यजीदियों के कमीना पन की मिसाल शायद ही तारीखे आलम में मिल सके कि जब मदीने में लौटते हुए हज़रत सैय्यदना अबू सईद खुद्री रजिं अल्लाहु अन्हु के मकान के करीब पहुंचे तो उनके मकान में दाखिल हो गये।
और उनके यहां जब कुछ न पाया तो आपकी दाढ़ी शरीफ के बाल नोच डाले और उन्हीं बालों को लेकर चले गये। (करबला के बाद स. 75)
He (Ibn Sa’d) said: Hajjáj Ibn Muhammad informed us on the authority of Ibn Jurays, he on the authority of Mujŕhid respecting Allah’s words (“and from it created its mate”) (AI-Qur’an, 4:1); He said:
He (Allah) created Eve out of Adam’s short rib, while he was asleep. Then he awoke and repeated Iththa, which signifies woman in Nabataean language.
He (Ibn Sa`d) said: Muhammad Ibn `Abd Allah al-Asadi informed us: Sufyŕn Ibn Sa’id al-Thawri informed us on the authority of his father, he on the authority of a mawlá of Ibn `Abbas, he on the authority of Ibn `Abbas; he said:
She was named Eve because she was the mother of all human being. (Cf. Genesis, 3:20)
He (lbn Sa`d) said: Hishám Ibn Muhammad Ibn al-Sa’ib al-Kalbi informed us on the authority of his father, he on the authority of Abu Salih, he on the authority of Ibn ‘Abbas; he said:
Adam was cast down in India and Eve at Juddah. Then he came in her search and reached Jam’a; then Eve joined him, and so the place was known as al-Muzdalifah, and they had come together at Jam’a so it was known as Jam’a.
हज़रत अली अलैहिस्सलाम के घराने का जिक्र, कुरआन और हदीस में मौजूद है। आप अहलेबैत अलैहिस्सलाम की अजमत को पता नहीं क्यों लेकिन कभी छिपाने की कोशिश की गईं, कभी दबाने की कोशिश की गई लेकिन कहते हैं कि हक कभी नहीं छिपाया जा सकता। आइए देखते हैं कि अहलेबैत और हज़रत अली अलैहिस्सलाम के बारे में कुरआन और रसूलुल्लाह सल्लललाहु अलैहे वसल्लम ने क्या-क्या फरमाया है।
आयत ए मुबाहला
वैसे तो सारा का सारा कुरआन ही रसूलुल्लाह और अहलेबैत की शान बयान कर रहा है लेकिन लोग दलील नहीं मानते हालाँकि अगर आप सूरः आल ए इमरान की आयत ६१ पढ़कर देखेंगे तो पाएंगे कि अल्लाह ने इन्हें दलील से ऊपर रखा है। ये आयत, आयत ए मुबाहला कहलाती है। हक छिपाने वाले कुछ मौलवी साहब को भी मजबूरन ये आयत तो बताना ही पड़ती है क्योंकि ये कुरआन का हिस्सा है लेकिन वह तफ्सौर ना बताकर अपना बचाव कर ही लेते हैं।
इस आयत में अल्लाह रब उल इज्जत फरमाता है, जिसका तर्जुमा है “फिर जब तुम्हारे पास कुरआन आ चुका, उसके बाद भी अगर तुमसे कोई हुज्जत बाजी करे तो उन्हें कहो कि हम और तुम अपने-अपने बेटों लाएँ और हम अपनी औरतों को बुला लाएँ, तुम अपनी औरतों को बुला लाओ. हम अपनी जानों को बुलाएँ और तुम अपनी जानों को और सब मिलकर दिल से दुआ करें कि जो झूठा हो उस पर खुदा की लानत हो”
अब हम देखते हैं कि आखिर ऐसी क्या बात हुई जो बात मुबाहला तक पहुँची। हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम के बारे में नजरान के नसारा को हज़रत मुहम्मद सल्लललाहु अलैहे वसल्लम ने बहुत समझाया कि उनको खुदा का बेटा ना कहो, हज़रत आदम अलैहिस्सलाम की भी मिसाल दी, मगर उन लोगों ने नबी की एक ना सुनी, आख़िर में खुदा के ही हुक्म से बात कसम और लानत की दुआ पर आकर ठहरी। ऊपर आयत में दोबारा देख सकते हैं।
यहाँ पर गौर करने वाली बात है अल्लाह ने बेटों को साथ लाने का हुक्म दिया और शिया-सुन्नी दोनों मसलक इस बात पर सहमत हैं कि रसूलुल्लाह के बेटे नहीं थे यानी हुए भी तो अल्लाह को प्यारे हो गए. फिर वह कौन हैं जिन्हें रसूलुल्लाह सल्लललाहु अलैहे वसल्लम ने बेटा माना और वह नबी सल्लललाह अलैहे वसल्लम की जान हैं?
बहरहाल, जिस दिन मुबाहला होने वाला था, अस्हाब तैयार होकर रसूलुल्लाह के पास आए कि शायद आप साथ ले लें लेकिन आपने सुबहसुबह ही हज़रत सलमान फारसी रजिअल्लाहु अन्हो को चार लकड़ी
और एक कम्बल देकर उस मैदान की तरफ़ रवाना किया और छोटा-सा सायबान तैयार करने का हुक्म दिया और खुद इस शान से निकले की हज़रत हसन अलैहिस्सलाम का हाथ थामा, हज़रत हुसैन अलैहिस्सलाम को गोद में लिया, जनाब फातिमा सलामुल्लाह अलैहा अपने बाबा के पीछे हो गईं और हज़रत अली अलैहिस्सलाम उनके पीछे हो गए।
यानी बेटों की जगह नवासों को, इमाम हसन और इमाम हुसैन और औरतों की जगह फातिमा सलामुल्लाह अलैहा को और जानों की जगह हज़रत अली अलैहिस्सलाम को लेकर मुबाहला की तरफ़ चल दिए. इसलिए हम मौला अली को नफ्स ए रसूल भी कहते हैं।
आपने निकलने के पहले ये दुआ भी की खुदाया हर नबी के अहलेबैत होते हैं और ये मेरे अहलेबैत हैं, इनको हर बुराई से दूर और पाक व पाकीज़ा रखना। आपको इस शान से तश्-रीफ़ लाता देख, नसारा का सरदार, आप सल्लललाहु अलैहे वसल्लम और अहलेबैत की तरफ़ देखकर कहने लगा, ” खुदा की कसम, मैं ऐसे नूरानी चेहरे देख रहा हूँ कि अगर ये पहाड़ को अपनी जगह से हट जाने के लिए कहें तो यकीनन वह हट जाएगा इसलिए खैरियत इसी में है कि मुबाहला ना किया जाए वरना कयामत तक के लिए हमारी नस्ल ही ख़त्म हो जाएगी।
आखिर उन लोगों ने सारी बातें मान लीं तब रसूलुल्लाह सल्लललाहु अलैहे वसल्लम ने फरमाया कि अगर ये बात ना मानते तो ये मैदान आग में तब्दील हो जाता, इनकी शक्लें सुअर और बन्दरों की तरह हो जाती और यहाँ सब तबाह हो जाता।
जी हाँ आप अपने घर में रखे कुरआन में खुद देख सकते हैं, एक ऐसी आयत जिसकी तफ्सीर बताने से कुछ मौलवी साहब घबराते हैं।
आयत ए मवद्दत
सूरः शूरा की आयत २३ को आयत ए मवद्दत भी कहते हैं। इस आयत में अल्लाह फरमाता है –
जिसका तर्जुमा है “यही (इनआम) है जिसकी खुदा अपने बन्दों को खुशख़बरी देता है, जो ईमान लाए और नेक काम करते रहे। तुम (ऐ रसूल!) कह दो, मैं इस (तब्लीग ए रिसालत) का अपने क़राबत दारों (अहलेबैत) की मुहब्बत के सिवा कोई सिला नहीं माँगता और जो शख्स नेकी हासिल करेगा हम उसके लिए उसकी खूबी में इजाफा कर देंगे बेशक खुदा बख्शने वाला कद्रदान है।”
इस आयत से साफ़ है कि रसूलुल्लाह ने इस उम्मत से कोई सिला नहीं माँगा सिवाय अपनी अहलेबैत से मुहब्बत के लेकिन आज इस आयत की तफ्सीर को भी कुछ हज़रात छिपाना चाहते हैं, वजह साफ़ है अगर इस आयत को खोल खोलकर बयान करेंगे तो उम्मत समझने लगेगी कि रसूलुल्लाह ने बस एक ही सिला माँगा था और बदले में लोगों ने मुहब्बत ना दी तो ना दी बल्कि अहलेबैत अलैहिस्सलाम पर जुल्म की हद कर दी।
आलिम लिखते हैं कि ये आयत तब नाज़िल हुई जब रसूलुल्लाह सल्लललाहु अलैहे वसल्लम, अंसार को फजीलत ए अहलेबैत बता रहे थे और साथ-साथ ये भी बता रहे थे कि आल ए मुहम्मद से मुहब्बत ईमान को कामिल करती है और इनकी मुहब्बत में जान गंवाने वाला भी शहीद है। कर * में मिलता है कि “अल्लाह अहलेबैत से मुहब्बत करने
वालों को और भी ज्यादा नेकी देगा”
आयत ए ततहीर –
सूरः अहजाब की आयत ३३ में अल्लाह रब उल इज्जत , नबी अलैहिस्सलाम की बीवियों को समझाईश दे रहे हैं फिर इसी आयत में आगे अहलेबैत के लिए फरमाते हैं –
” ऐ पैगम्बर के अहलेबैत ! खुदा तो बस ये चाहता है कि तुमको (हर तरह की) बुराई से दूर रखे और जो पाक व पाकीज़ा रखने का हक़ है , वैसा पाक व पाकीज़ा रखे। “
यहाँ भी शिया – सुन्नी के बीच कोई इख्तिलाफ़ नहीं है , सब मानते हैं कि चादर ए ततहीर में पाँच लोग हैं जिनके लिए खास तौर पर ये आयत आई हज़रत मुहम्मद सल्लललाहु अलैहे वसल्लम , हज़रत अली अलैहिस्सलाम , हज़रत फातिमा सलामुल्लाह अलैहा , हज़रत हसन अलैहिस्सलाम और हज़रत हुसैन अलैहिस्सलाम ।
आलिमों ने अपने अपने हिसाब से अहलेबैत को समझाया है , कुछ ने इन पाँच को अहलेबैत माना कुछ ने रसूलुल्लाह की बीवियों और बच्चों को शुमार किया और कुछ ने कयामत तक पैदा होने वाली हर हसनी – हुसैनी औलाद को अहलेबैत में शुमार माना बहरहाल इसमें इख्तिलाफ़ है लेकिन इसमें भी कोई इतिलाफ़ नहीं की अहलेबैत में पंजतन का मर्तबा ज्यादा बुलंद है।
अल्लाह ने अहलेबैत को हर तरह की गंदगी से , बुराई से दूर रखकर पाक किया । यहाँ पाक करने से मुराद सिर्फ़ जिस्मानी नहीं है बल्कि अहलेबैत अलैहिस्सलाम की रूह और कल्ब भी पाक हैं । ये गलत काम नहीं करते , ना झूठ ही बोलते हैं , ये ऐबों से पाक हैं , बहुत नेक और पाकदामन हैं।
आयत ए विलायत
बहुत सारे लोग ऐसे हैं जिन्होंने ग़दीर को या तो झुठलाने की कोशिश की है या फिर बयान गलत ढंग से करने की कोशिश की है। मेरा अल्लाह, लोगों के हर फैल जानता है और वो कभी नहीं चाहता कि उसके बंदे गुमराह हों। इसलिए मेरे रब ने अपना कलाम हमें दिया, जिसमें सारे जवाब मौजूद हैं तो क्या ऐसा हो सकता है कि इसमें विलायत से कोई बात ना आई हो?
आई है और साफ़ साफ़ इशारा करते हए आई है, जाहिर सी बात है, जहाँ बात विलायत की हो, इशारा मेरे मौला अली अलैहिस्सलाम की तरफ़ ही होगा, आइए कुरआन में देखते हैं कि क्या लिखा है।
जब आप सूरः माइदा की आयत नंबर ५५ पर पहुँचोगे तो पाओगे कि अल्लाह रब उल इज्जत फरमाते हैं –
जिसका तर्जुमा ये है कि, “ऐ ईमानवालों! तुम्हारे सरपरस्त(वली) तो बस यही हैं, खुदा और उसका रसूल और वह मोमिनीन जो नमाज़ अदा करते हैं और हालत ए रुकू में ज़कात देते हैं”
इस आयत के बारे में एक बात बता दूं कि शिया और सुन्नी के हर बड़े आलिम ने तफ्सीर में ये बात मानी है कि ये आयत, हज़रत अली अलैहिस्सलाम की शान में नाज़िल हुई है, लेकिन आज देखता हूँ कि ज्यादातर कुरआन के तर्जुमों में तर्जुमा करने वालों ने इस आयत को सही तरह से नहीं समझाया, कुछ कुरान के तर्जुमों में तो बस इतना लिखा है कि “नमाज़ पढ़ते हैं और ज़कात देते हैं” यानी “हालत ए रुकू”, तर्जुमे से ही गायब कर दिया।
अल्लाह ही जाने ऐसा क्यों किया गया बाकि एक बात मैं ये जानता हूँ कि हालत ए रुकू में, कभी किसी ने ज़कात दी हो, ऐसा तारीख़ में नहीं मिलता सिवाय मौला अली अलैहिस्सलाम के।
आप मौला अली अलैहिस्सलाम ने दौरान ए रुकू, एक माँगने वाले को अपनी अँगूठी ज़कात कर दी थी और उलेमाओं ने लिखा है कि उसके बाद ही ये आयत नाज़िल हुई।
इस आयत में भी साफ़ इशारा है कि हमारा मौला, हमारा वली, हमारा सरपरस्त सिर्फ़ अल्लाह है और अल्लाह ने ही हमें दो सरपरस्त और दिए हैं पहले तो हमारे आका सल्लललाहु अलैहे वसल्लम जो हज़रत अली अलैहिस्सलाम के भी मौला हैं और तीसरे हमारे मौला अली अलैहिस्सलाम।
अल्लाह रब उल इज्जत, हम सबको हक़ पर चलने वाला और हक़ कहने वाला बनाए।
दो गराँकद्र चीजें
रसूलुल्लाह सल्लललाहु अलैहे व आलिही वसल्लम ने फरमाया-” बिला शुबह मैं तुम लोगों में दो गराँकद्र चीजें छोड़े जाता हूँ जो ऐसी हैं कि अगर तुम इन दोनों से तमस्सुक रखोगे (यानी दोनों को मजबूती से थामकर रहोगे) तो मेरे बाद हरगिज़ गुमराह ना होगे। वह हैं अल्लाह की किताब, कुरआन और मेरी इतरत, अहलेबैत।
रसूलुल्लाह सल्लललाहु अलैहे वसल्लम ने ये भी फरमाया कि “अल्लाह की किताब और मेरे इतरत अहलेबैत अलैहिस्सलाम एक दूसरे से ता-कयामत जुदा ना होंगे हता के हौज़ ए कौसर पर भी मेरे पास दोनों इकट्ठे ही आएँगे। अगर तुम इन दोनों से तमस्सुक रखोगे, इन दोनों को थामकर रखोगे तो मेरे बाद तुम्हारे गुमराह न होने का कोई इम्कान ही ना बचेगा और साबित कदम रहोगे।”
इस्लाम में कई फिरके हैं, सब एक दूसरे से नफ़रत भी कर रहे हैं और लड़ भी रहे हैं लेकिन मैं आपको बता दूँ इस्लाम का रास्ता एक है, फिरकापरस्ती छोड़कर लोगों को ये दो चीजें थामना चाहिए. इनसे तमस्सुक रखना ही फलाह ए दुनिया ओ आख़िरत है।
सफीना ए नूह
मुहम्मद मुस्तफा सल्लललाहु अलैहे वसल्लम ने फरमाया की “मेरी अहलेबैत अलैहिस्सलाम की मिसाल, सफीना फ नूह की मिसाल के मानिंद है, जो उसमें सवार हुआ उसने निजात पाई और जो उससे पीछे रह गया वह गर्क हो गया”
अगर आप कुरआन की रौशनी में देखें तो सफीना ए नूह, ना ही सितारों को देखकर चल रहा था, ना ही कोई अपने मुताबिक चला रहा था
वसी-ए-रसूल
बल्कि वह कश्ती तो अल्लाह की निगरानी में चल रही थी।
इस हदीस से ये भी साबित होता है कि अहलेबैत ज़रिया ए निजात हैं, उनके तरीकों पर चलने वाला और उनसे मवद्दत करने वाला बच जाएगा लेकिन उनके खिलाफ़ रहने वाला दोनों आलम में डूब जाएगा।
बाब ए हिता
रसूलुल्लाह सल्लललाहु अलैहे वसल्लम ने ये भी फरमाया कि “मेरे अहलेबैत की मिसाल बनी इस्राईल के बाब ए हिता यानी दरवाजा ए बख्शिश की मानिंद है, जो भी इसमें दाखिल हुआ उसकी मगफिरत हो गई।”
जाहिर-सी बात है कि गुमराहों के लिए बख्शिश नहीं यानी अल्लाह ने अहलेबैत अलैहिस्सलाम को “गुमराही से बचाने वाला बनाया है” और ज़रिया ए मगफिरत भी। अगर ये एक बात लोग समझ लें तो फिरके की गुंजाइश नहीं रहेगी लेकिन ये भी हक़ है, जो कौम हज़रत हुसैन अलैहिस्सलाम के पुकारने पर एक नहीं हुई वह एक नहीं होगी।
लेकिन हिदायत अल्लाह के हाथ में है और हमें हक़ आम करना चाहिए।
हदीस ए अमान
नबी सल्लललाहु अलैहे वसल्लम ने फरमाया कि “सितारे ज़मीन वालों के लिए गर्क होने से अमान हैं और मेरे अहलेबैत अलैहिस्सलाम, मेरी उम्मत के लिए इखतिलाफ़ से अमान हैं यानी साफ है, जब कोई गिरोह उनसे इखतिलाफात करेगा तो गिरोह एइब्लीस से होगा।”
इस हदीस से भी साफ़ साबित हो रहा है, अहलेबैत का दुश्मन शैतान के गिरोह से है और अहलेबैत के गुलाम और आशिक़, कामयाब होंगे।
मन कुन्तो मौला
हज़रत मुहम्मद सल्लललाहु अलैहे वसल्लम ने फरमाया कि मैं जिसजिस का मौला हूँ, अली भी उसका मौला है। यहाँ मौला के मायने सरपरस्त से ही हैं।
हज़रत अली अलैहिस्सलाम को अल्लाह ने विलायत भी अता की और आप तमाम वलियों के सरदार हैं। आपकी विलायत को मानना भी ज़रूरी है क्योंकि आप अलैहिस्सलाम की मुहब्बत ही मोमिन और मुनाफिक के बीच का फर्क बताने वाली है।
इल्म ए रसूल का दरवाज़ा
तमाम फिरकों के ओलेमा ने यह हदीस नक्ल की है कि सरकार ए दो जहाँ मुहम्मद सल्लललाहु अलैहे वसल्लम ने फरमाया, “मैं इल्म का शहर हूँ और अली उसका दरवाज़ा है”
यानी इल्म के शहर में जाना है तो बाब, अली हैं और याद रखें तालिब ए इल्म, दरवाजे से ही दाखिल होता है, खिड़कियों से दाखिल होने की कोशिश करने वाला चोर होता है।
हिकमत ए रसूल का दरवाज़ा
रसूल ए खुदा सल्लललाहु अलैहे वसल्लम ने फरमाया कि ” मैं हिकमत का घर हूँ और अली उसका दरवाजा” यानी हिकमत भी हज़रत अली अलैहिस्सलाम के ज़रिए ही मिलती है।
हज़रत अली और अलामत ए इश्क ए रसूल
सहाबा रजिअल्लाहु अन्हो ने पूछा-या रसूलुल्लाह! आपकी मुहब्बत की अलामत क्या है?
आप हज़रत सल्लललाहु अलैहे वसल्लम ने हज़रत अली के कन्धे पर मारते हुए इशारा किया यानी ये मेरी मुहब्बत की अलामत है।
यानी जिसके दिल में मौला अली अलैहिस्सलाम का बुग्ज़ भी हो और इश्क एनबी का दावा भी हो, तो ये दावा झूठा है।
हज़रत अली अलैहिस्सलाम और कुरआन
रसूलुल्लाह सल्लललाहु अलैहे वसल्लम ने फरमाया कि “अली, कुरआन के साथ है और कुरआन, अली के साथ है और ये दोनों एक दूसरे से जुदा ना होंगे। हता कि इकट्ठे ही हौज़ ए कौसर पर वारिद होंगे।”
हज़रत अली अलैहिस्सलाम और हक़
कुछ मुहद्दिसीन ने अम्मा सलमा रजिअल्लाहु अन्हा से रिवायत कर के
लिखा है कि रसूलुल्लाह सल्लललाहु अलैहे वसल्लम ने फरमाया की अली हक़ के साथ है और हक़ अली के साथ है।
जिस वक्त अहले हरम का काफिला मदीने के करीब पहुंचा तो हज़रत सैय्यदा जैनब के हुक्म पर काफिला बैरूने शहर रोका गया। हज़रत सैय्यदा जैनब रज़ि अल्लाहु अन्हा ने एक शख्स को शहर में भेजा कि जाकर मदीने में ऐलान कर दे कि अहले हरम वापस आ गये हैं। तो सबसे पहले हज़रत जाबिर इने अब्दुल्लाह ने उस काफिले का खैर मकदम किया।
अहले मदीना जमाअत दर जमाअत हाज़िर होने लगे। मदीने में कोई ऐसी पर्दादार औरत न थी जो आह व फुगां करते हुए बाहर न निकल आई हो। लोगों का इज़्देहाम हो गया। हर तरफ रोने की आवाजें बुलन्द थीं। हज़रत इमाम जैनुल आबेदीन रजि अल्लाहु अन्हु ने तमाम रूदादे सफर पर रौशनी डाली। जिसे अहले मदीना सुन कर तड़प गये और बेखुद हो गये जिन-जिन हालात का मुकाबला अहले बैत को करना पड़ा सब पर रौशनी डाली गई।
यह मुकद्दस काफिला मदीने में दाखिल हुआ हजरत सैय्यदा ज़ैनब का यह हाल था कि घुटनों के बल चल कर मदीने में दाखिल हुईं। मदीने के ज़र्रे-ज़र्रे से जो हज़रत इमाम हुसैन रज़ि अल्लाहु अन्हु को वाबस्तगी थी वह न किसी तफ़सील की मुहताज है न तशरीह की। यह मदीना ही तो है जहां हज़रत इमाम हुसैन रज़ि अल्लाहु अन्हु और हज़रत सैय्यदा जैनब रज़ि अल्लाहु अन्हा पैदा हुए, पले बढ़े और जवान हुए यह वही मदीना है अब जहां सिर्फ हज़रत सैय्यदा जैनब थीं और हज़रत इमाम हुसैन रज़ि अल्लाहु अन्हु न थे। हज़रत उम्मे कुल्सूम रज़ि अल्लाहु अन्हा की यह हालत थी कि ज़ार व कतार रो रही थीं और अर्ज करती जा रही थीं : ऐ नाना जान! हम आपके दरे पाक में हसरत भरे दिलों से लोट आए हैं।
तमाम माओं की गोदें सूनी हो गईं। हम सब व रज़ा पर हर हाल में कायम हैं। ऐ नाना! हम आपकी चहेती और लाडली बेटियां हैं, ऐ नाना! आज हम पर यह जुल्म हुआ कि हम ऊंटों पर बेहिजाब व बेपर्दा सवार की गई।
हज़रत सैय्यदा ज़ैनब रज़ि अल्लाहु अन्हा का यह हाल था कि आप घुटनों के बल दूध पीते बच्चे की तरह घसीटती हुई मदीने में दाखिल हुई इसी तरह रौज़-ए-रसूल तक गईं क्योंकि खड़े होने की सकत न थी। नाना जान के मज़ारे अक्दस से लिपट कर हज़रत सैय्यदा जैनब बेहोश हो गईं, कोई क्या बताए कि वह क्या मन्ज़र रहा होगा। हज़रत सैय्यदा जैनब ने अपने नाना से क्या कहा।
भाई के ईफ़ाए वादा का तकिरा किया या उम्मत की शिकायत की। अपने बाजुओं के नील दिखाए या भाई का खून आलूद पैरहन पेश किया।
रौज़-ए-रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम हिलने लगा बाज मुअरेखीन का ख्याल है कि मदीना में कई दिन तक मातम रहा। हज़रत इमाम जैनुल आबेदीन रज़ि अल्लाहु अन्हु नाना के रौजे पर हाज़िर हुए और दस्तबस्ता अर्ज़ करने लगे : “ऐ नाना जान! दुश्मनों ने हमारा सब कुछ लूट लिया, हमारे वालिदे मोहतरम को बड़ी तौहीन व तहकीर के साथ कत्ल कर दिया।
और आपके जिगर के टुक्ड़े हजरत सैय्यदना इमाम हुसैन रजि अल्लाहु अन्हु बड़ी बेदर्दी से शहीद हुए। दुश्मनों ने उनका सरे मुबारक काट कर नोक नेज़ह पर बुलन्द किया। लेकिन वह सरे मुबारक नेज़े पर ऐसा चमकता था जैसे आसमान में चौदहवीं का चांद चमकता है।
ऐ नाना! दुश्मनों ने हम पर मज़ालिम के पहाड़ तोड़े, हमारे माल व असबाब को छीन लिया। और हमारे खेमों को लूट लिया हमारा कोई मुआविन व मददगार न था। उन्होंने हमारी तौहीन करने के लिए ऊंटों की नंगी पीठों पर सवार करके शहर-शहर, करिया-करिया घुमाया और दमिश्क में लाकर यज़ीद के दरबार में खड़ा कर दिया।
यजीद ने कहा कि मैंने तुमसे अपना मक्सद हासिल कर लिया और तुम्हारे पिद्र मुअज़म के कत्ल से मुझे खुशी हुई। क्योंकि बद्र व उहद का बदला लिया है, ऐ नाना जान! उसने तो मुझे भी कत्ल करना चाहा था मगर मेरी फूफी हजरत सैय्यदा ज़ैनब रज़ि अल्लाहु अन्हा चिल्ला उठी और शोर मचाया तो यज़ीद ने कहा उसे छोड़ दो यह आज़ादों में से है।
ऐ नाना जान! कल क्यामत में उस से हमारा हक लीजिए और हथ में कल फैसला के दिन फैसला कीजिए।
उसके बाद सरे इमाम हुसैन रज़ि अल्लाहु अन्हु को पहलूए सैय्यदा खातूने जन्नत में दफन किया गया। हज़रत इमाम जैनुल आबेदीन रज़ि अल्लाहु अन्हु ने वापसी करबला के बाद मदीना मुनव्वरा को अपना मसकन बनाया। और आबादी से अलग थलग रहने लगे।
बिन अब्दुल मलिक ने 75 हिज. में आपको ज़हर दिलवा दिया।
वलीद 57/साल की उम्र पाक में 18 मुहर्रमुल-हराम बरोज़ मंगल पहलूए सैय्यदना हज़रत इमाम हसन रजि अल्लाहु अन्हु जन्नतुल-बकी में दफन हुए। (मिरातुल-असरार)
हज़रत इमाम हुसैन रज़ि अल्लाहु अन्हु का शहीद होना था कि यज़ीद ने खुल्लम खुल्ला जना, लेवातत, हराम कारी, भाई बहन का बियाह, सूद व शराब खोरी को फरोग देना शुरू किया।