Month: April 2019
शुगर का देसी इलाज…
गिलोय की बेल के पत्ते खाने से शुगर का स्तर कम हो जाता है… हमारी एक हमसाई की शुगर का स्तर हमेशा 250 से ज़्यादा रहता था… वो हमारे घर से हर रोज़ गिलोय के पत्ते ले जाया करती थीं… उन्होंने लगातार तीन माह निहार मुंह गिलोय का पत्ता चबाकर पानी पी लिया… अब उनकी शुगर नियंत्रित हो गई… शुगर के अलावा बुख़ार, हड्डियों के दर्द, कैंसर, पेट और आंखों आदि की बीमारी में गिलोय बेहद फ़ायदेमंद है…
हमारे घर गिलोय की बहुत-सी बेलें हैं… बहुत लोग इसके पत्ते ले जाते हैं… गिलोय की बेल तक़रीबन हर जगह पाई जाती है… एक बार लगाने पर ये कई साल तक पत्तों से भरी रहती है… गिलोय की बेल किसी भी नर्सरी में मिल सकती है… पार्क में भी मिल सकती है… सड़क किनारे खड़े पेड़ों पर भी ये बेल ख़ूब देखी जा सकती है… हो सके, तो इसे अपने घर में ज़रूर लगाएं… इसे गमले में भी उगाया जा सकता है…
गिलोय का वैज्ञानिक नाम तिनोस्पोरा कार्डीफ़ोलिया है… इसे मधुपर्णी, अमृता, तंत्रिका, कुंडलिनी गुडूची भी कहा जाता है… फ़ारसी में इसे गिलाई कहते हैं… अंग्रेज़ी में गुलंच, मराठी में गुलबेल, कन्नड़ में अमरदवल्ली, तेलगू में गोधुची, तमिल में शिन्दिल्कोदी और गुजराती में गालो में आदि नामों से जाना जाता है… गिलोय में ग्लुकोसाइन, गिलो इन, गिलोइनिन, गिलोस्तेराल और बर्बेरिन नामक एल्केलाइड पाए जाते है… मान्यता है कि देव और दानवों के युद्ध के दौरान जहां-जहां अमृत कलश की बूंदे गिरीं, वहां-वहां गिलोय की बेल उग आई…
रजब की फ़ज़ीलत…
माहे-रजब में दिन में रोज़ा रखने और रात में इबादत करने का सवाब सौ साल के रोज़े रखने के बराबर होता है… हो सके, तो इबादत करें… पता नहीं अगली मर्तबा ये मौक़ा मिले या न मिले…अल्लाह हम सबको राहे-हक़ पर चलने की तौफ़ीक़ अता करे… आमीनरजब इस्लामी साल का सातवां महीना है. यह बड़ा अज़मत वाला महीना है और इसमें नेकियों का सवाब दोगुना हो जाता है. रसूलुल्लाह सल्ललाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया कि रजब अल्लाह का महीना है, शाबान मेरा महीना है और रमज़ान मेरी उम्मत का महीना है. इस महीने में अल्लाह तआला अपने बंदों पर बेशुमार रहमते और मग़फ़िरत की बारिश करता है. इस माह में बंदों की इबादतें और दुआएं क़ुबूल की जाती हैं.
रजब को ताजीम यानी आदर का माह कहा जाता है. इस महीने की ताज़ीम करे, गुनाहों से दूर रहें, तौबा अस्तग़फ़ार करते रहें, अल्लाह तआला की इबादत करें, सदक़ा और ख़ैरात ज़्यादा ज़्यादा करें.हज़रत सैयदुना अल्लामा सफ़्फ़ुरी रहमतुल्लाह अलैह रमाते हैं- रजब-उल-मुरज्जब बीज बोने का, शाबान-उल-मुअज़्ज़म आब-पाशी (यानि पानी देने) का और रमज़ान-उल-मुबारक फ़सल काटने का महीना है. लिहाज़ा जो रजब-उल-मुरज्जब में इबादत का बीज नहीं बोता और शाबान-उल-मुअज़्ज़म में आंसुओं से सैराब नहीं करता, वह रमजान-उल-मुबारक में फ़सले-रहेमत क्यूं कर काट सकेगा? मज़ीद फ़रमाते हैं : रजब-उल-मुरज्जब जिस्म को, शाबान-उल-मुअज़्ज़म दिल को और रमज़ान-उल-मुबारक रूह को पाक करता है. (Nuzhat-ul-Majalis, jild 1, safha 209)अल्लाह तआला के नज़दीक 4 महीने खुसूसियात के साथ हुरमतवाले हैं. जुल कदा, जुल हिज्जाह, मुहर्रम और रजब. हज़रत सैयदुना अनस रज़िअल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि रसूलुल्लाह सल्ललाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- जिसने माहे-हराम (यानी हुरमतवाले महीने में) में तीन दिन जुमेरात, जुमा और हफ़्ता (यानि सनीचर) का रोज़ा रखा, उसके लिए दो साल की इबादत का सवाब लिखा जाएगा. (Al Mu’jam-ul-Awsat lit-Tabrani, jild 1, safha 485, Hadees 1789)
हज़रत सैयदुना अनस बिन मालिक रज़िअल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि रसूलुल्लाह सल्ललाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया- जन्नत में एक नहर है, जिसे रजब कहा जाता है, जो दूध से ज़्यादा सफ़ेद और शहद से ज़्यादा मीठी है. जो कोई रजब का एक रोज़ा रखे, तो अल्लाह तआला उसे इस नहर से सैराब करेगा. (Shu’ab-ul-Iman, jild 3, safha 367, Hadees 3800)ताबई बुज़ुर्ग हज़रत सैयदुना अबु क़िलाला रज़िअल्लाहु अन्हु फ़रमाते हैं- रजब के रोज़ादारों के लिए जन्नत में एक महल है. (Shu’ab ul-Imaan, jild 3, safha 368, Hadees 3802)
हज़रत नूह अलैहिस्सलाम ने भी रजब का रोज़ा रखाहज़रत सैयदुना अनस रज़िअल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि रसूलुल्लाह सल्ललाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- जिसने रजब का एक रोज़ा रखा, तो वह एक साल के रोज़ों की तरह होगा. जिसने सात रोज़े रखे, उसपर जहन्नुमम के सातों दरवाज़े बंद कर दिए जाएंगे. जिसने आठ रोज़े रखे, उसके लिए जन्नत के आठों दरवाज़े खोल दिए जाएंगे. जिसने दस रोज़े रखे, वह अल्लाह से जो कुछ मांगेगा अल्लाह तआला उसे अता फ़रमाएगा. और जिसने 15 रोज़े रखे, तो आसमान से एक मुनादी निदा (यानी ऐलान करने वाला ऐलान) करता है कि तेरे पिछले गुनाह बख़्श दिए गए, तू अज़ सर-ए-नौ अमल शुरू करके तेरी बुराइयां नेकी से बदल दी गईं. और जो ज़्यादा करे, तो अल्लाह उसे ज़्यादा दे. और रजब में नूह अलैहि सलाम कश्ती में सवार हुए, तो ख़ुद भी रोज़ा रखा और हमराहियों को भी रोज़े का हुक्म दिया. उनकी कश्ती 10 मुहर्रम तक 6 माह बरसरे-सफ़र रही. (Shu’ab-ul-Iman, jild 3, safha 368, Hadees 3801)
परहेज़गारी से एक रोज़ा रखने की फ़ज़ीलतहज़रत शेख़ अब्दुल हक़ मुहद्दिस देहलवी रहमतुल्लाह अलैह नक़ल करते हैं कि सुल्ताने-मदीना सल्ललाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- माहे रजब हुरमत वाले महीनों में से है और छठे आसमान के दरवाज़े पर इस महीने के दिन लिखे हुए हैं. अगर कोई शख़्स रजब में एक रोज़ा रखे और उसे परहेज़गारी से पूरा करे, तो वह दरवाज़ा और वह (रोज़ेवाला) दिन उस बंदे के लिए अल्लाह तआला से मग़फ़िरत तलब करेंगे और अर्ज़ करेंगे- या अल्लाह तआला इस बंदे को बख़्श दे और अगर वह शख़्स बग़ैर परहेज़गारी के रोज़ा गुज़ारता है, तो फिर वह दरवाज़ा और दिन उसकी बख़्शीश की दरख़्वास्त नहीं करेंगे और उस शख़्स से कहते हैं- ऐ बंदे तेरे नफ़्स ने तुझे धोका दिया. (Ma-Sabata bis-Sunnah, safha 234, fazail Shahr-e-Rajab-lil Khallal, safha 3-4)रसूले-अकरम ने फ़रमाया है कि रजब का महीना ख़ुदा के नज़दीक अज़मत वाला महीना है. इस माह में जंग करना हराम है. रिवायत है कि रजब में एक रोज़ा रखने वाले को ख़ुदा की ख़ुशनूदी हासिल होती है . ख़ुदा का ग़ज़ब उससे दूर हो जाता है और जहन्नुम के दरवाज़े में एक दरवाज़ा उसके लिए बंद हो जाता है.इमाम मूसा काजिम (अस ) फ़रमाते हैं कि रजब माह में एक रोज़ा रखने से जहन्नुम की आग एक साल की दूरी तक हो जाती है. जो इस माह में तीन रोज़े रखे, तो उसके लिए जन्नत वाजिब हो जाती है .इमाम जाफ़र सादिक़ (अलैहिस्सलाम) से रवायत है कि रसूले-अकरम ने फ़रमाया कि रजब मेरी उम्मत के लिए अस्तग़फ़ार का महीना है. इसलिए इस माह ख़ुदा से ज़्यादा से ज़्यादा मग़फ़िरत चाहो. ख़ुदा बड़ा मेहरबान है.रसूले-अकरम फ़रमाते हैं कि रजब को असब भी कहते हैं, क्योंकि इस माह में ख़ुदा कि रहमत बहुत ज़्यादा बरसती है. इसलिए इस माह कसरत से अस्तग़फ़ार भेजो. जो इस माह के आख़िर में एक रोज़ा रखेगा, ख़ुदा उसको मौत की सख़्तियों, मौत के बाद की हौल्नकी और क़ब्र के अज़ाब से महफूज़ रखेगा.जो इस माह के आख़िर में दो रोज़े रखेगा, वह पुले-सरात से आसानी से गुज़र जाएगा.जो तीन रोज़े रखेगा, उसे क़यामत की सख़्तियों से महफूज़ रखा जाएगा और उसको जहन्नुम की आज़ादी का परवाना अता होगा.
Rajab is the seventh month in the Islamic lunar calendar. Rasul ul Allah (S.A.W) says that the month of Rajab is the month of great virtue. There is a reward of worship in this month.
10 Raka’ah on the first of it (month of Rajab) and in each Raka’ah recite Surah Al-Faatihah once, Surah Al Ikhlaas thrice and Surah Al Kafiroon thrice and after you do your Salaam (at the end of each 2 units) raise your hands and say:
la ilaha illa allahu wahdahu la shareka lahu, lahu almulku wa lahu alhamdu,yuhye wa yumetu,wa huwa hayyun la yamutu,biyadihi alkhayruwa huwa `ala kull shay‘in qaderun.Rasool maqbool (S.A.W) farmate hain keh mah rajab ki be shumar fazilat hai aur is mah mubarak ki ibadat buhat afzal hai.
Rajab ka Mahina
Rasool maqbool (S.A.W) farmate hain keh mah rajab ki be shumar fazilat hai aur is mah mubarak ki ibadat buhat afzal hai.
1-Is mahina ki 4 tareekh ko jung safeen pesh aayi.
2-Is mahina ki 27 tareekh raat ko mehboob khuda Hazrat Muhammad (S.A.W) ne Miraj Shareef ki. Jis mein aasmani sair Jannat aur Dozakh ka mulahiza karna aur didar nabi se musharraf hona tha.
3-Is mah mein Allah Tala apne bandon par rehmat o maghfarat undelta hai.
5-Is mein ibadatein maqbool aur duayein mustjab hoti hai.
6-Hazur Aqdas (S.A.W) ka irshad garami hai keh jab mah Rajab ka chand dekho to pehle aik martaba yeh dua parho.
rajab ki fazilat
Rajab ka Wazifa
1-Rozana 1000 martaba parhein
Ya Hayyu ya Qayyumu2-Pure mah mein 3 roze.
3-Rozanah aadha ghantah darood shareef.
4-Rozanah do rikat nafal
Do rikat nafal is tarah parhein keh Surah Fatiha ke baad Surah Ikhlas 21 martaba parhein. Namaz se farigh hone ke baad 10 martaba Darood Pak parhein aur phir Dua karein to Allah Tala is ki duya qabool farmaye ga aur jab doosron ke dil murda ho jayein gay to is ka dil zinda rakhe ga.
Rajab ki Namaz
Mah Rajab ki pehli shab qabal namaz isha 20 rikat namaz 10 salam se parhe har rikat mein baad Surah Fatiha k Sura Kafaroon teen 3 martaba aur Suarah Ikhlas 3, 3 dafa parhe . Insha allah tala is namaz key parne wale ko Allah Pak Qiyamat key din shahidon mein shamil kare ga aur hazar darjah is key buland kare ga.
Hajat Qabool Hoga
Pehli shab baad namaz Isha 4 rikat namaz do salam se parhe. Har rikat mein baad Surah Fatiha k Surah Nashrah aik bar Surah Ikhlas aik bar, Surah Falaq aik bar, Surah Naas aik bar parhe. Jab do rikat ka salam pher de to Karmah Toheed 33 martaba aur Darood Shareef 33 dafa parh kar jo bhi hajat ho Allah Pak se talab kare. Insha allah tala har hajat qabool hogi.
Sehat Ata Farmaye Ga
Mah rajab ki pehli shab baad namaz Isha 2 rikat namaz parhe aur har rikat mein baad Surah Fatiha key Surah Iklas 5, 5 martab parhe baad salam key Surah Ikhlas 100 martaba parhni hai.
Insha allah tala is namaz ki barkat se Allah Pak ise sehat ata farmaye ga. Bimar ki sehat key liye yeh namaz buhat afzal hai.
Pehli Jumma ki Namaz
Mah rajab key pehle jumma ko Zuhar aur Asar key darmiyan 4 rikat namaz aik salam se parhe har rikat mein baad Surah Fatiha key Aayat ul Kursi 7 martaba Surah Ikhlas 5 martaba parhe baad salam k 25 maraba yeh parhe
Phir 100 martaba yeh astaghfar parhe.
Bad azan 100 martaba Darood Shareef parh kar jo bhi Dua kare kha woh dunyawi ya dini ho Insha Allah tala dargah e ilahi mein zaroor qabool hogi.
Mah rajab key kisi jumma ki shab ko baad namaz isha do rikat namaz parhe har do rikat mein baad Surah Fateha key Aayatul Kursi 11 martaba, Zulzal 11 martab, Surah Takasur 11 martaba parhe. Baad salam key Dargah Ilahi mein apne gunahon ki maghfarat talab kare. Insha Allah Tala is namaz parhne wale key tamam k tamam gunah muaf farma kar Allah Pak is ki bakhshish farmaye ga.
Baad azan 100 martaba Darood Shareef parh kar jo bhi dua kare khua woh dunyawi ya dini ho Insha Allah Tala dargah ilahi mein zaroor qabool hogi.
7, 15, 27 Tareekh ki Shab
Mah rajab ki 7, 15 aur 27 tareekh ki shab baad namaz isha 20 rikat namaz 10 salam se parhe . Har rikat mein baad surah fatiha key surah ikhlas 1 bar parhe . Haq tala is namaz key parhne wale ko dunyawi aur dini tamam aafaton se mehfooz rakhe ga aur pul sarat ka rastah is par se aasan hoga.
15 Tareekh ki Namaz
15 tareekh ki shab ko baad namaz isha 20 rikat namaz 10 salam se parhni hai. Har rikat mein Surah Fatiha key baad Surah Ikhhlas 1,1 dafa parhe . Insha Allah Tala Allah Pak is namaz ka be had sawab ata farmayein gay aur is namaz key parhne wale key guanah aise jharein gay jaise darakht key sukhe patte jharte jate hain
रमज़ान और शबे-क़द्र
रमज़ान महीने में एक रात ऐसी भी आती है जो हज़ार महीने की रात से बेहतर है जिसे शबे क़द्र कहा जाता है. शबे क़द्र का अर्थ होता है ” सर्वश्रेष्ट रात ” ऊंचे स्थान वाली रात ” लोगों के नसीब लिखी जानी वाली रात, शबे-क़द्र बहुत ही महत्वपूर्ण रात है जिस के एक रात की इबादत हज़ार महीनों की इबादतों से बेहतर और अच्छा है। इसी लिए इस रात की फज़ीलत कुरआन मजीद और प्रिय रसूल मोहम्मद( सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की हदीसों से प्रमाणित है।निम्नलिखित महत्वपूर्ण वाक्यों से क़द्र वाली रात की अहमियत मालूम होती है।(1) इस पवित्र रात में अल्लाह तआला ने कुरआन करीम को लोह़ महफूज़ से आकाश दुनिया पर उतारा फिर 23 वर्ष की अविधि में अवयशक्ता के अनुसार मोहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) पर उतारा गया। जैसा कि अल्लाह तआला का इरशाद है। ” हम्ने इस (कुरआन) को कद्र वाली रात में अवतरित किया है।.. ” (सुराः कद्र)(2) यह रात अल्लाह तआला के पास बहुत उच्च स्थान रखता है।इसी लिए अल्लाह तआला ने प्रश्न के तरीके से इस रात की महत्वपूर्णता बयान फरमाया है और फिर अल्लाह तआला स्वयं ही इस रात की फज़ीलत को बयान फरमाया कि यह एक रात हज़ार महीनों की रात से उत्तम है। ” और तुम किया जानो कि कद्र की रात क्या है ? क़द्र की रात हज़ार महीनों की रात से ज़्यादा उत्तम है।” (सुराः कद्र)(3) इस रात में अल्लाह तआला के आदेश से अन्गीनित फरिश्ते और जिबरील आकाश से उतरते है। अल्लाह तआला की रहमतें, अल्लाह की क्षमा ले कर उतरते हैं, इस से भी इस रात की महत्वपूर्णता मालूम होती है। जैसा कि अल्लाह तआला का इरशाद है। ” फ़रिश्ते और रूह उस में अपने रब की अनुज्ञा से हर आदेश लेकर उतरते हैं। ” (सुराः कद्र)(4) यह रात बहुत सलामती वाली है। इस रात में अल्लाह की इबादत में ग्रस्त व्यक्ति परेशानियों, ईश्वरीय संकट से सुरक्षित रहते हैं। इस रात की महत्वपूर्ण, विशेष्ता के बारे में अल्लह तआला ने कुरआन करीम में बयान फरमाया है। ” यह रात पूरी की पूरी सलामती है उषाकाल के उदय होने तक। ” (सुराः कद्र)(5) यह रात बहुत ही पवित्र तथा बरकत वाली है, इस लिए इस रात में अल्लाह की इबादत की जाए, ज़्यादा से ज़्यादा अल्लाह से दुआ की जाए, अल्लाह का फरमान है। ” हम्ने इस (कुरआन) को बरकत वाली रात में अवतरित किया है।…… ” (सुराः अद् दुखान)(6) इस रात में अल्लाह तआला के आदेश से लोगों के नसीबों (भाग्य) को एक वर्ष के लिए दोबारा लिखा जाता है। इस वर्ष किन लोगों को अल्लाह तआला की रहमतें मिलेंगी? यह वर्ष अल्लाह की क्षमा का लाभ कौन लोग उठाएंगे? इस वर्ष कौन लोग अभागी होंगे? किस को इस वर्ष संतान जन्म लेगा और किस की मृत्यु होगी? तो जो व्यक्ति इस रात को इबादतों में बिताएगा, अल्लाह से दुआ और प्राथनाओं में गुज़ारेगा, बेशक उस के लिए यह रात बहुत महत्वपूर्ण होगी। जैसा कि अल्लाह तआला का इरशाद है। ” यह वह रात है जिस में हर मामले का तत्तवदर्शितायुक्त निर्णय हमारे आदेश से प्रचलित किया जाता है। ” (सुराः अद् दुखानः5 )(7) यह रात पापों , गुनाहों, गलतियों से मुक्ति और छुटकारे की रात है।मानव अपनी अप्राधों से मुक्ति के लिए अल्लाह से माफी मांगे, अल्लाह बहुत ज़्यादा माफ करने वाला, क्षमा करने वाला है। खास कर इस रात में लम्बी लम्बी नमाज़े पढ़ा जाए, अधिक से अधिक अल्लाह से अपने पापों, गलतियों पर माफी मांगा जाए, अल्लाह तआला बहुत माफ करने वाला, क्षमा करने वाला है। जैसा कि मोहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) का कथन है। ” जो व्यक्ति शबे क़द्र में अल्लाह पर विश्वास तथा पुण्य की आशा करते हुए रातों को तरावीह (क़ियाम करेगा) पढ़ेगा, उसके पिछ्ले सम्पूर्ण पाप क्षमा कर दिये जाएंगे” ( बुखारी तथा मुस्लिम)यह महान क़द्र की रात कौन सी है ?यह एक ईश्वरीय प्रदान रात है जिस की महानता के बारे में कुछ बातें बयान की जा चुकी हैं। इसी शबे क़द्र को तलाशने का आदेश प्रिय रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने अपने कथन से दिया है। ” जैसा कि आइशा (रज़ी अल्लाहु अन्हा) वर्णन करती हैं कि ” रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फरमाया ” कद्र वाली रात को रमज़ान महीने के अन्तिम दस ताक रातों में तलाशों ” ( बुखारी तथा मुस्लिम)एक हदीस में रमज़ान करीम की चौबीसवीं रात में शबे क़द्र को तलाशने का आज्ञा दिया गया है। और प्रिय रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने इस मुबारक रात की कुछ निशानियाँ बताया है। जिस के अनुसार वह रात एकीस रमज़ान की रात थीं जैसा कि प्रिय रसूल के साथी अबू सईद अल खुद्री (रज़ी अल्लाहु अन्हु) वर्णन करते हैं। प्रिय रसूल के दुसरे साथी अब्दुल्लाह बिन अनीस (रज़ी अल्लाहु अन्हु) की रिवायत से पता चलता कि वह रात तेईस रमज़ान की रात थीं और अब्दुल्लाह बिन अब्बास (रज़ी अल्लाहु अन्हुमा) तथा उबइ बिन कअब (रज़ी अल्लाहु अन्हु) की रिवायत से पता चलता कि वह रात सत्ताईस रमज़ान की रात थीं और उबइ बिन कअब (रज़ी अल्लाहु अन्हु) तो कसम खाया करते थे कि शबे क़द्र सत्ताईस रमज़ान की रात है, तो उन के शागिर्द ने प्रश्न किया कि किस कारण इसी रात को कहते हैं? तो उन्हों ने उत्तर दिया, निशानियों के कारण, प्रिय रसूल मोहम्मद (रज़ी अल्लाहु अन्हु) ने भी शबे क़द्र को अन्तिम दस ताक वाली(21,23,25,27,29) रातों में तलाश ने का आदेश दिया है। शबे क़द्र के बारे में जितनी भी हदीस की रिवायतें आइ हैं। सब सही बुखारी, सही मुस्लिम और सही सनद से वारिद हैं। इस लिए हदीस के विद्ववानों ने कहा है कि सब हदीसों को पढ़ने के बाद मालूम होता है कि शबे क़द्र हर वर्ष विभिन्न रातों में आती हैं। कभी 21 रमज़ान की रात क़द्र वाली रात होती, तो कभी 23 रमज़ान की रात क़द्र वाली रात होती, तो कभी 25 रमज़ान की रात क़द्र वाली रात होती, तो कभी 27 रमज़ान की रात क़द्र वाली रात होती, तो कभी 29 रमज़ान की रात क़द्र वाली रात होती और यही बात सही मालूम होता है। इस लिए हम इन पाँच बेजोड़ वाली रातों में शबे क़द्र को तलाशें और बेशुमार अज्रो सवाब के ह़क़्दार बन जाए।शबे क़द्र की निशानीःप्रिय रसूल मोहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने इस रात की कुछ निशानी बयान फरमाया है जिस के माध्यम से इस महत्वपूर्ण रात को पहचाना जा सकता है।(1) यह रात बहूत रोशनी वाली होगी, आकाश प्रकाशित होगा , इस रात में न तो बहुत गरमी होगी और न ही सर्दी होगी बल्कि वातावरण अच्छा होगा, उचित होगा। जैसा कि मोहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने निशानी बताया है जिसे सहाबी वासिला बिन अस्क़अ वर्णन करते है कि रसूल ने फरमाया ” शबे क़द्र रोशनी वाली रात होती है, न ज़्यादा गर्मी और न ज़्यादा ठंढ़ी और वातावरण संतुलित होता है और सितारे को शैतान के पीछे नही भेजा जाता।” ( तब्रानी )(2) यह रात बहुत संतुलित वाली रात होगी। वातावरण बहुत अच्छा होगा, न ही गर्मी और न ही ठंडी होगी। हदीस रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) इसी बात को स्पष्ट करती है ” शबे क़द्र वातावरण संतुलित रात होती है, न ज़्यादा गर्मी और न ज़्यादा ठंढ़ी और उस रात के सुबह का सुर्य जब निकलता है तो लालपन धिमा होता है।” ( सही- इब्नि खुज़ेमा तथा मुस्नद त़यालसी )(3) शबे क़द्र के सुबह का सुर्य जब निकलता है तो रोशनी धिमी होती है, सुर्य के रोशनी में किरण न होता है । जैसा कि उबइ बिन कअब वर्णन करते हैं कि रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फरमाया ” उस रात के सुबह का सुर्य जब निकलता है तो रोशनी में किरण न होता है।” ( सही मुस्लिम )हक़ीक़त तो यह है कि इन्सान इन रातों की निशानियों का परिचय कर पाए या न कर पाए बस वह अल्लाह की इबादतों, ज़िक्रो- अज़्कार, दुआ और कुरआन की तिलावत,कुरआन पर गम्भीरता से विचार किरे । इख्लास के साथ, केवल अल्लाह को प्रसन्न करने के लिए अच्छे तरीक़े से अल्लाह की इबादत करे, प्रिय रसूल मोहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की इताअत करे, और अपनी क्षमता के अनुसार अल्लाह की खूब इबादत करे और शबे क़द्र में यह दुआ अधिक से अधिक करे, अधिक से अधिक अल्लाह से अपने पापों , गलतियों पर माफी मांगे जैसा कि आइशा (रज़ी अल्लाहु अन्हा) वर्णन करती हैं कि, मैं ने रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) से प्रश्न क्या कि यदि मैं क़द्र की रात को पालूँ तो क्या दुआ करू तो आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फरमाया ” अल्लाहुम्मा इन्नक अफुव्वुन करीमुन, तू हिब्बुल-अफ्व,फअफु अन्नी” अर्थात: ऐ अल्लाह ! निःसन्देह तू माफ करने वाला है, माफ करने को पसन्द फरमाता, तो मेरे गुनाहों को माफ कर दे।”अल्लाह हमें और आप को इस महिने में ज्यादा से ज़्यादा भलाइ के काम, लोगों के कल्याण के काम, अल्लाह की पुजा तथा अराधना की शक्ति प्रदान करे और हमारे गुनाहों, पापों, गलतियों को अपने दया तथा कृपा से क्षमा करे। आमीन…
हज का तरीक़ा
हज सर्वश्रेष्ठ उपासनाओं और महान आज्ञाकारिताओं में से है, और वह इस्लाम के स्तंभों में से एक स्तंभ है, जिसके साथ अल्लाह तआला ने मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को भेजा है और जिसके बिना बंदे का धर्म संपूर्ण नहीं हो सकता.तथा दो चीज़ों के बिना किसी इबादत द्वारा अल्लाह तआला की निकटता प्राप्त नहीं होती और न ही वह इबादत स्वीकार होती है-एक : अल्लाह सर्वशक्तिमान के लिए निःस्वार्थता (इख़्लास) है इस प्रकार कि उसके द्वारा उसका उद्देश्य अल्लाह की प्रसन्नता प्राप्त करना और आख़िरत का दिन हो, वह उसके द्वारा दिखावा, पाखंड और सांसारिक लाभ का इच्छुक न हो.दूसरा : करनी और कथन में नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का अनुपालन करना, और नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का अनुपालन करना आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की सुन्नत की जानकारी के बिना संपूर्ण नहीं हो सकती.इसीलिए उस व्यक्ति पर, जो किसी इबादत हज या उसके अलावा के द्वारा अल्लाह की उपासना करना चाहता है, यह अनिवार्य है कि वह उसके अंदर नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के तरीक़े को सीखे ताकि उसका कार्य सुन्नत के अनुसार हो.
हज के प्रकारहज के तीन प्रकार हैं : तमत्तुअ, इफ्राद, क़िरान
तमत्तुअ : यह है कि हज करने वाला हज के महीनों में (और हज के महीने शव्वाल, ज़ुल-क़ादा, और ज़ुल-हिज्जा हैं. केवल उम्रा का एहराम बांधे. जब मक्का पहुंच जाए तो उम्रा के लिए तवाफ़ और सई करे, अपने सिर के बाल मुंडा ले या उन्हें छोटे करवा ले और अपने एहराम से हलाल हो जाए (अर्थात एहराम के कपड़े उतार दे और एहराम की पाबंदी ख़त्म कर दे). जब तर्विया अर्थात आठ ज़ुल-हिज्जा का दिन आए, तो केवल हज का एहराम बांधे और उसके सभी कार्यों को करे. तमत्तुअ करने वाला संपूर्ण उम्रा करता है और संपूर्ण हज करता है.
इफ्राद : हज करने वाला केवल हज का एहराम बांधे (अर्थात केवल हज की नीयत करे). जब मक्का पहुंच जाए, तो तवाफ़े-क़ुदूम (आगमन का तवाफ़) करे और हज के लिए सई करे, तथा सिर के बाल न मुंडाए और न उसे छोटा करवाए, और अपने एहराम से हलाल न हो, बल्कि वह मोहरमि बाक़ी रहे यहां तक कि वह ईद के दिन जमरतुल अक़बा को कंकरी मारने के बाद हलाल हो, और यदि हज की सई को हज का तवाफ़ करने के बाद तक विलंब कर दे तो कोई आपत्ति की बात नहीं है.
क़िरान: हज करने वाला उम्रा और हज का एक साथ एहराम बांधे (अर्थात नीयत करे) या पहले उम्रा का एहराम बांधे फिर उसका तवाफ़ आरंभ करने से पहले उस के साथ हज को भी सम्मिलित कर ले, (इस प्रकार कि वह इस बात की नीयत करे कि उसका तवाफ़ और उसकी सई उसके हज और उम्रा की है).क़िरान हज करने वाले का काम इफ्राद हज करने वाले के काम के समान है, केवल इतना अंतर है कि क़िरान करने वाले पर हदी (जानवर की क़ुर्बानी) अनिवार्य है और इफ्राद हज करने वाले पर हदी अनिवार्य नहीं है.हज के इन तीनों प्रकार में सबसे श्रेष्ठ तमत्तुअ हज है, इसी का नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अपने सहाबा रज़ियल्लाहु अन्हुम को आदेश दिया था और इसी पर बल दिया था, यहां तक कि यदि मनुष्य क़िरान हज या इफ्राद हज की नीयत करे तब भी उसके लिए महत्वाकांक्षिक बात यह है कि वह अपने एहराम को उम्रा में परिवर्तित कर दे फिर वह हलाल हो जाए ताकि वह तमत्तुअ हज्ज करने वाला हो जाए, चाहे यह तवाफ़े- क़ुदूम और सई करने के बाद ही क्यों न हो, क्योंकि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने जब हज्जतुल वदाअ के साल तवाफ़ और सई कर लिया और आपके साथ आपके सहाबा भी थे, तो आपने हर उस व्यक्ति को जिसके पास हदी नहीं थी, अपने एहराम (हज की नीयत) को उम्रा में बदलने और बाल कटवाकर हलाल हो जाने का आदेश दिया और फरमाया : “यदि मैं अपने साथ हदी को न लाया होता, तो उसी तरह करता जिसका मैं ने तुम्हें आदेश दिया है.”
एहरामयहां एहराम की उन सुन्नतों को किया जाएगा जैसे स्नान करना, सुगंध लगाना और नमाज़ पढ़ना.फिर अपनी नमाज़ से फ़ारिग़ होने के बाद या अपनी सवारी पर बैठने के बाद एहराम बांधे (अर्थात हज की इबादत में प्रवेश करने की नीयत करे)फिर यदि वह तमत्तुअ करने वाला है तो : “लब्बैका अल्लाहुम्मा बि- उम्रह” कहे.यदि वह हज क़िरान करने वाला है तो : “लब्बैका अल्लाहुम्मा बि-हज्जतिन व उम्रह” कहे.और यदि वह इफ्राद हज करने वाला है तो : “लब्बैका अल्लाहुम्मा हज्जा” कहे.फिर कहे : अल्लाहुम्मा हाज़िही हज्जतुन ला रियाआ फ़ीहा वला सुमअह (ऐ अल्लाह यह ऐसा हज है जिसमें कोई दिखावा और पाखंड नहीं है).फिर वही तल्बिया पढ़े जो नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने पढ़ी थी और वह यह है :“लब्बैका, अल्लाहुम्मा लब्बैक, लब्बैका ला शरीका लका लब्बैक, इन्नल हम्दा वन्नेमता लका वल मुल्क, ला शरीका लक”(मैं उपस्थित हूं, ऐ अल्लाह मैं उपस्थित हूं, मैं उपस्थित हूं, तेरा कोई साझी नहीं, मैं उपस्थित हूं, हर प्रकार की स्तुति और सभी नेमतें तथा राज्य तेरा ही है, तेरा कोई साझी नहीं.)तथा आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के तल्बिया में से ये शब्द भी हैं- “लब्बैका इलाहल हक़्क़” (ऐ सत्य पूज्य मैं उपस्थित हूं). तथा इब्ने उमर रज़ियल्लाहु अन्हु तल्बियह में इन शब्दों की वृद्धि करते थे- “लब्बैका व सा’दैक, वल-ख़ैरो बि-यदैक, वर्रग़्बाओ इलैका वल अमल”. पुरूष इसे ऊंचे स्वर में कहेगा, परंतु महिला इतनी आवाज़ में कहेगी कि अपनी बग़ल वाली को सुना सके, लेकिन यदि उसके बग़ल में कोई पुरूष है जो उसका महरम नहीं है, तो वह धीमी स्वर में तल्बिया पढ़ेगी.यदि एहराम बांधने का इरादा रखने वाला आदमी किसी ऐसी रुकावट के पेश आने से डर रहा है जो उसे उसके हज के कामों को पूरा करने से रोक सकती है (जैसे- बीमारी, दुश्मन, या क़ैद इत्यादि) तो उसके लिए उचित यह है कि वह एहराम बांधते समय शर्त लगा ले और कहे-:“इन हबसनी हाबिसुन फ-महिल्ली हैसो हबस्तनी”(यदि मुझे कोई रुकावट पेश आ गई तो मैं वहीं हलाल हो जाऊंगा जहां तू मुझे रोक दे.)अर्थात् यदि कोई रुकावट जैसे बीमारी या विलंब या कोई रुकावट ने मुझे अपने हज के कामों को पूरा करने से रोक दिया, तो मैं अपने एहराम से हलाल हो जाऊंगा, क्योंकि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने ज़बाअह बिंत ज़ुबैर को जबकि उन्हों ने एहराम बांधने का इरादा किया और वह बीमार थीं तो आपने उन्हें आदेश दिया कि वह शर्त लगा लें और फरमाया- तुम्हारे लिअ अपने पालनहार पर वह चीज़ है जिसे तुम मुस्तसना (अपवाद) कर दो.” इसे बुख़ारी (हदीस संख्या : 5089) और मुस्लिम (हदीस संख्या: 1207) ने रिवायत किया है. अतः जब भी वह शर्त लगा ले और उसे वह रुकावट पेश आ जाए जो उसे उसके हज के कामों को पूरा करने से रोक दे तो वह अपने एहराम से हलाल हो जाएगा और उसके ऊपर कोई चीज़ अनिवार्य नहीं है.किंतु जो व्यक्ति किसी ऐसी रुकावट के पेश आने से डर महसूस नहीं कर रहा है जो उसे उसके हज के कामों को पूरा करने से रोक सकती है, तो उसके लिए शर्त लगाना उचित नहीं है, क्योंकि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने शर्त नहीं लगाई और न तो हर एक को शर्त लगाने का आदेश ही दिया है, आपने ज़बाआ बिंत ज़ुबैर को उनके बीमारी से ग्रस्त होने के कारण इसका आदेश दिया था.मेहरिम को चाहिए कि अधिक से अधिक तल्बियह पढ़े, विशेष रूप से स्थितियों और ज़माने के बदलने के समय उद्हारण के तौर पर जब किसी ऊंचाई पर चढ़े, यी नीची जगह उतरे, या रात या दिन आए. तथा उसके बाद अल्लाह तअला से उसकी प्रसन्नता और स्वर्ग का प्रश्न करे और उसकी दया व कृपा के द्वारा नरक से पनाह मांगे.उम्रा के अंदर तल्बिया कहना एहराम से लेकर तवाफ़ शुरू करने तक धर्म संगत है.और हज में एहराम बांधने से लेकर ईद के दिन जमरतुल अक़बह को कंकरी मारने तक धर्म संगत है.
मक्का में प्रवेश करने के लिए स्नान करनामोहरिम के लिए उचित है कि जब वह मक्का के निकट पहुंच जाए तो उसमें प्रवेश करने के लिए यदि उसके लिए आसान है तो स्नान कर ले, क्योंकि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने मक्का में प्रवेश करने के समय स्नान किया. इसे मुस्लिम (हदीस संख्या : 1259) ने रिवायत किया है.फिर जब मस्जिदुल हराम में प्रवेश करे तो अपने दाहिने पैर को पहले रखे और कहे- “बिस्मिल्लाह वस्सलातो वस्सलामो अला रसूलिल्लाह, अल्लाहुम्मग़ फिर्ली ज़ुनूबी वफ़-तह् ली अब्वाबा रहमतिक, अऊज़ो बिल्लाहिल अज़ीम वबि-वज्हेहिल करीम वबि-सुल्तानिहिल क़दीम मिनश्शैतानिर्रजीम” (मैं अल्लाह के नाम से – प्रवेश करता हूं – तथा दुरूद व सलाम हो अल्लाह के पैगंबर पर, ऐ अल्लाह ! तू मेरे लिए मेरे गुनाहों को क्षमा कर दे और मेरे लिए अपनी दया के द्वारों को खोल दे, मैं महान अल्लाह, उसके दानशील चेहरे और उसके प्राचीन राज्य की शरण में आता हूं शापित शैतान से), फिर हज्रे-अस्वद (काले पत्थर) की ओर जाए ताकि तवाफ़ शुरू करे.फिर तवाफ़ करने और दो रक्अत नमाज़ पढ़ने के बाद सई करने के स्थल पर आए और सफ़ा व मर्वा के बीच सई करे.जहां तक तमत्तुअ करने वाले का संबंध है तो वह उम्रा के लिए सई करेगा, लेकिन इफ्राद और क़िरान करने वाले हज के लिए सई करेंगे, तथा वे दोनों तवाफ़े-इफ़ाज़ा के बाद तक सई को विलंब भी कर सकते हैं.
सिर के बाल मुंडाना या छोटे करवानाजब वह सात चक्कर अपनी सई पूरी कर ले तो यदि वह पुरुष है तो अपने सिर को मुंडाए, या उसके बालों को छोटा करवाए, तथा ज़रूरी है कि उसका सिर मुंडाना सिर के सभी बालों के लिए हो, इसी तरह बालों को सिर के सभी ओर से छोटा करवाया जाएगा. जबकि सिर के बालों को मुंडाना उन्हें छोटा करवाने से सर्वश्रेष्ठ है. क्योंकि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने “सिर के बालों को मुंडाने वालों के लिए तीन बार दुआ की और बालों को छोटा करवाने वालों के लिए एक बार दुआ फ़रमाई.” इसे मुस्लिम (हदीस संख्या : 1303) ने रिवायत किया है।हां, यदि हज का समय इतना निकट हो कि सिर के बालों के उगने भर के लिए समय न हो तो सर्वश्रेष्ठ बालों को छोटा करवाना ही है, ताकि हज में मुंडाने के लिए उसके सिर में बाल बाक़ी रहें, इस प्रमाण के आधार पर कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने हज्जतुल वदाअ़ के अवसर पर अपने साथियों (सहाबा) को उम्रा के लिए बाल छोटे करवाने का आदेश दिया था, इसलिए कि उन लोगों का आगमन ज़ुल-हिज्जा के चौथे दिन की सुबह को हुआ था. जहां तक महिला की बात है तो वह अपने बालो से उंगली के एक पोर के बराबर काट लेगी.इन कामों के कर लेने से उम्रा संपूर्ण हो जाएगा और इसके बाद वह पूरी तरह हलाल हो जागा, और वह उसी तरह करेगा जिस तरह कि बिना एहराम वाले लोग कपड़े पहनते हैं, सुगंध लगाते हैं.जहां तक क़िरान और इफ्राद हज करने वालों का संबंध है तो वे दोनों न सिर के बाल मुंडाएंगे न छोटे करवाएंगे और न ही वे दोनों अपने एहराम से हलाल होंगे (एहराम नहीं खोलेंगे), बल्कि वे दोनों अपने एहराम पर बाक़ी रहेंगे यहां तक कि ईद के दिन जमरतुल अक़बह को कंकरी मारने और सिर मुंडाने या सिर के बाल छोटे करवाने के बाद हलाल होंगे.फिर जब तर्वियह अर्थात ज़ुल-हिज्जा का आठवां दिन होगा तो तमत्तुअ हज करने वाला चाश्त के समय मक्का में अपने स्थान से ही हज का एहराम बांधेगा, और उसके लिए अपने हज का एहराम बांधते समय वही चीज़ें करना मुस्तहब (ऐच्छिक) है जो उसने अपने उम्रा का एहराम बांधते समय किया था जैसे- स्नान करना, सुगंध लगाना और नमाज़ पढ़ना, चुनांचे वह हज का एहराम बांधने की नीयत करेगा और तल्बियह कहेगा, वह कहेगा- “लब्बैका अल्लाहुम्मा हज्जा” (ऐ अल्लाह मैं हज्ज की नीयत से उपस्थित हूं).और यदि वह किसी ऐसी रुकावट के पेश आने से डर रहा है जो उसे उसके हज को पूरा करने से रोक सकती है तो वह शर्त लगा ले और कहे-“इन हबसनी हाबिसुन फ-महिल्ली हैसो हबस्तनी”(यदि मुझे कोई रुकावट पेश आ गई तो मैं वहीं हलाल हो जाऊंगा जहां तू मुझे रोक दे.)और यदि उसे किसी ररुकावट के पेश आने का भय न हो तो शर्त न लगाए. तथा उसके लिए ऊंचे स्वर में तल्बियह कहना मुस्तहब है यहां तक कि वह ईद के दिन जमरतुल अक़बह को कंकरी मारना शुरू कर दे.
मिना जानाफिर वह मिना जाए और वहां ज़ुहर, अस्र, मग़रिब, इशा और फ़ज्र की नमाज़ें क़स्र करके पढ़े, दो नमाज़ों को एक साथ न पढ़े, क्योंकि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम मिना में क़स्र करते थे, दो नमाज़ों को एकत्र करके नहीं पढ़ते थे.” क़स्र कहते हैं : चार रक्अत वाली नमाज़ों को दो रक्अत करके पढ़ना, तथा मक्का वाले और उनके अलावा अन्य लोग मिना, अरफ़ह और मुज़दलिफ़ा में नमाज़ को क़स्र करके पढ़ेंगे, क्योंकि हज्जतुल वदाअ़ में नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम लोगों को नमाज़ पढ़ाते थे और आपके साथ मक्का वाले भी थे और आपने उन्हें नमाज़ पूरी करने का आदेश नहीं दिया, यदि नमाज़ पूरी पढ़ना उनके ऊपर अनिवार्य होता तो आप उन्हें इसका आदेश देते जिस तरह कि आपने उन्हें मक्का पर विजय के साल इसका आदेश दिया था. लेकिन क्योंकि मक्का की आबादी बढ़ गई और वह मिना को भी सम्मिलित हो गई और वह ऐसे हो गई कि मानो वह उसका एह मुहल्ला है इसलिए मक्का वाले उसमें नमाज़ क़स्र नहीं करते हैं.
अरफ़ह जानाजब अरफह (नौ ज़ुल-हिज्जा) के दिन सूरज उग आए तो वह मिना से अरफ़ह की ओर प्रस्थान करेगा और ज़ुहर के समय तक यदि उसके लिए आसान है तो नमिरह में पड़ाव करेगा (नमिरह: अरफा से तुरंत पूर्व एक जगह है), नहीं तो कोई बात नहीं है, क्योंकि नमिरह में पड़ाव करना सुन्नत है अनिवार्य नहीं है. जब सूरज ढल जाए (अर्थात ज़ुहर की नमाज़ का समय शुरू हो जाए) तो ज़ुहर और अस्र की नमाज़ें दो-दो रक्अत पढ़ेगा और उन दोनों के बीच जमा तक़दीम करेगा (अर्थात दोनों को ज़ुहर के समय में पढ़ेगा जैसाकि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने किया ताकि अरफ़ह में ठहरने और दुआ करने का समय लंबा हो जाए.फिर नमाज़ के बाद ज़िक्र (जप), दुआ और अल्लाह सर्वशक्तिमान से रोने गिड़गिड़ाने (विनती करने) के लिए फ़ारिग़ हो जाए और उसे जो पसंद हो अपने दोनों हाथों को उठाकर क़िब्ला की ओर मुंह करके दुआ करे यद्यपि अरफ़ात की पहाड़ी उसके पीछे हो, क्योंकि सुन्नत क़िब्ला की ओर मुंह करना है पहाड़ी की ओर नहीं, नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पहाड़ी के पास ठहरे थे और फ़रमाया था- “मैं यहां ठहरा हूं और पूरा अरफ़ह ठहरने की जगह है.”तथा उस महान ठहरने के स्थान पर आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम अक्सर यह दुआ पढ़ते थे- “ला इलाहा इल्लल्लाहु वह्दहू ला शरीका लहू, लहुल मुल्को व लहुल हम्द, वहुवा अला कुल्ले शैइन क़दीर” (अल्लाह के अलावा कोई सत्य पूज्य नहीं, वह अकेला है, उसका कोई साझी नहीं, उसी के लिए बादशाहत (राज्य) है और उसी के लिए सभी प्रशंसा है और वह हर चीज़ पर शक्तिवान है.)यदि उसे उकताहट और आलस्य लगे और वह अपने साथियों के साथ लाभदायक बातचीत के द्वारा या लाभदायक किताबों को पढ़कर विशेषकर जिनका संबंध अल्लाह सर्वशक्तिमान की दानशीलता और उसके व्यापक उपहारों से है, ताकि उस दिन में आशा का पहलू मज़बूत हो तो ऐसा करना अच्छा है. इसके बाद वह फिर से अल्लाह सर्वशक्तिमान से रोने, गिड़गिड़ाने और दुआ करने में व्यस्त हो जाए और दिन के अंतिम समय को दुआ में बिताने का इच्छुक और लालायित बने, क्योंकि सर्वश्रेष्ठ दुआ अरफ़ह के दिन की दुआ है.
मुज़दलिफ़ा जानाजब सूरज डूब जाए तो अरफ़ह की ओर रवाना हो. जब अरफ़ह पहुंच जाए तो एक अज़ान और दो इक़ामत से मग़रिब और इशा की नमाज़ पढ़े.और यदि उसे इस बात का भय हो कि वह मुज़दलिफ़ा आधी रात के बाद पहुंचेगा तो वह रास्ते में ही नमाज़ पढ़ लेगा, उसके लिए इशा की नमाज़ को आधी रात के बाद तक विलंब करना जाइज़ नहीं है.और वह मुज़दलिफ़ा में रात बिताएगा, जब फ़ज्र स्पष्ट हो जाए तो अज़ान और इक़ामत के साथ फ़ज्र की नमाज़ सवेरे पढ़ेगा फिर मश्अरूल हराम का क़सद करेगा (और वह मुज़दलिफ़ा में मौजूद मस्जिद का स्थान है) तो अल्लाह की एकता का वर्णन करेगा और तक्बीर कहेगा और अपनी पसंदीदा दुआ करेगा यहां तक भली भांति रोशनी हो जाए (इस से अभिप्राय यह है कि सूरज उगने से पूर्व दिन की रोशनी स्पष्ट हो जाए)। यदि उसके लिए मश्अरूल हराम तक जाना आसान न हो तो वह अपने स्थान पर ही दुआ करेगा क्योंकि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का फ़रमान है- मैं यहां ठहरा हूं और पूरा मुज़दलिफ़ा ठहरने की जगह है. ज़िक्र करने और दुआ करने की हालत में वह अपने दोनों हाथों को उठाए हुए क़िब्ला की ओर मुंह किए होगा.
मिना की तरफ़ प्रस्थानजब अच्छी तरह रोशनी फैल जाए तो सूरज उगने से पहले वह मिना की ओर प्रस्थान करेगा, और वादी मुहस्सर (मुज़दलिफ़ा और मिना के बीच एक वादी है) में तेज़ी से चलेगा मिना पहुंचकर जमरतुल अक़बह को कंकरी मारेगा और वह मक्का के निकट सबसे अंतिम जमरह है (वह मक्का से सबसे निकट जमरह है) वह एक के बाद एक लगातार सात कंकरियां मारेगा, हर कंकरी लगभग लूबिया के दाने के बराबर होगी, हर कंकरी के साथ तक्बीर कहेगा (जमरतुल अक़बह को कंकरी मारते समय सुन्नत यह है कि आदमी जमरह की ओर मुंह करे और मक्का को अपने बायें ओर और मिना को अपने दाहिने ओर कर ले). कंकरी मारने से फ़ारिग़ होने के बाद अपने हदी (क़ुर्बानी के जानवर) को ज़बह करे, फिर अपने सिर को मुंडाए या उसके बालों को छोटा करवाए यदि वह पुरुष है, रही बात महिला की तो वह अपने बालों से एक उंगल (पोर) के बराबर बाल काट लेगी. (इसके द्वारा मोहरिम को पहला तहल्लुल प्राप्त हो जाएगा, अतः उसके लिए अपनी पत्नी से संभोग करने के अलावा एहराम की हालत में निषिद्ध हर चीज़ हलाल हो जाएगी) फिर वह मक्का जाए और हज का तवा और सई करे. (फिर उसे दूसरा तहल्लुल प्राप्त हो जाएगा तो उसके लिए हर वह चीज़ हलाल हो जाएगी जो एहराम के कारण उसके लिए हराम थी).सुन्नत यह है कि जब वह कंकरी मारने और सिर मुंडाने के बाद तवाफ़ के लिए मक्का जाने का इरादा करे तो ख़ुशबू लगाए, क्योंकि आइशा रज़ियल्लाहु अन्हा का फ़रमान है कि “मैं नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को आपके एहराम बांधने के समय तथा आपके हलाल होने के समय काबा का तवाफ़ करने से पूर्व ख़ुशबू लगाती थी.” इसे बुख़ारी (हदीस संख्या : 1539) और मुस्लिम (हदीस संख्या : 1189) ने रिवायत किया है.फिर तवाफ़ और सई करने के बाद मिना लौट आए और वहां ज़ुल-हिज्जा की ग्यारहवीं और बारहवीं तारीख़ की रात गुज़ारे और दोनों दिनों में सूरज ढलने के बाद तीनों जमरात को कंकरी मारे, सर्वश्रेष्ठ यह है कि वह कंकरी मारने के लिए पैदल चलकर जाए और यदि वह सवारी कर लेता है तो कोई पाप की बात नहीं है. वह सर्व प्रथम पहले जमरह को कंकरी मारेगा और वह मक्का से सबसे दूर का जमरह है और वही मस्जिदे ख़ैफ़ के निकट है, एक के बाद एक लगातार सात कंकरियां मारे और हर कंकरी के बाद अल्लाहु अकबर कहे, फिर थोड़ा आगे बढ़कर अपनी पसंद के अनुसार लंबी दुआ करे, यदि उसके लिए देर तक ठहरना कष्टदायक हो तो जितना भी उसके लिए आसान हो दुआ करे चाहे थोड़ा ही सही, ताकि सुन्नत पर अमल हो जाए.फिर मध्य जमरह (अल-जमरतुल वुस्ता) को एक के पीछे एक सात कंकरियां मारे और हर कंकरी के साथ अल्लाहु अकबर कहे, फिर बायें ओर हो जाए और क़िब्ला की ओर मुंह करके अपने दोनों हाथों को उठाकर खड़ा हो और यदि उसके लिए आसान हो तो लंबी दुआ करे, नहीं तो जितना उसके लिए आसान हो उतना ही ठहरे, और उसके लिए दुआ के लिए ठहरने को त्याग करना उचित नहीं है क्योंकि यह सुन्नत है, जबकि बहुत से लोग अज्ञानता के कारण या लापरवाही में उसे छोड़ देते हैं, और जब भी किसी सुन्नत को नष्ट कर दिया जाए तो उसको करना और लोगों के बीच उसको प्रकाशित करना अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है ताकि उसे छोड़ा न जाए और वह मिटने न पाए.फिर जमरतुल अक़बह को एक के बाद एक सात कंकरियां मारे और हर कंकरी के साथ अल्लाहु अकबर कहे, फिर वहां से चला जाए और उसके बाद दुआ न करे.जब बारहवें दिन सभी जमरात को कंकरी मार ले तो यदि चाहे तो जल्दी करे और मिना से बाहर निकल जाए, और यदि चाहे तो विलंब करे और वहां तेरह ज़ुलहिज्जा की रात बिताए और सूरज ढलने के बाद तीनों जमरात को कंकरी मारे जैसा कि पीछे गुज़र चुका. जबकि विलंब करना सर्वश्रेष्ठ है, और ऐसा करना अनिवार्य नहीं है सिवाय इसके कि बारह ज़ुलहिज्जा को सूरज डूब जाए और वह मिना ही में हो, तो ऐसी स्थिति में उसके लिए विलंब करना अनिवार्य है यहां तक कि वह अगले दिन सूरज ढलने के बाद तीनों जमरात को कंकरी मार ले, किंतु यदि बारह ज़ुल-हिज्जा को उसके ऊपर मिना में सूरज उसकी इच्छा के बिना डूब जाए, उदाहरण के तौर पर उसने प्रस्थान कर दिया हो और सवारी पर बैठ गया हो, किंतु गाड़ियों की भीड़ इत्यादि के कारण विलंब हो जाए तो ऐसी स्थिति में उसके लिए विलंब करना अनिवार्य नहीं है, क्योंकि सूरज डूबने तक उसका विलंब होना उसकी इच्छा के बिना हुआ है.फिर जब वह मक्का से निकल कर अपने देश जाने का इरादा करे तो वह बाहर न निकले यहां तक कि विदाई तवाफ़ कर ले, क्योंकि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का फ़रमान है- “कोई व्यक्ति कूच न करे यहां तक कि उसका अंतिम काम अल्लाह के घर (काबा) का तवाफ़ हो.” इसे मुस्लिम (हदीस संख्या : 1327) ने रिवायत किया है, तथा एक रिवायत के शब्द यह हैं कि “लोगों को आदेश दिया गया है कि उनका अंतिम काम अल्लाह के घर का तवाफ़ करना हो सिवाय इसके कि मासिक धर्म वाली औरत के लिए रुख़्सत दी गई है.” इसे बुख़ारी (हदीस संख्या : 1755) और मुस्लिम (हदीस संख्या : 1328) ने रिवायत किया है.चुनांचे मासिक धर्म और प्रसव वाली औरत पर विदाई तवाफ़ अनिवार्य नहीं है, तथा उन दोनों के लिए विदाई के लिए मस्जिदुल हराम के द्वार के पास खड़ा होना उचित नहीं है, क्योंकि ऐसा करना नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से वर्णित नहीं है.तथा वह विदाई तवा को अल्लाह के घर का अंतिम काम बनाए, जब वह यात्रा के लिए कूच करने का इरादा करे, तो यदि वह विदाई तवाफ़ के बाद साथियों की प्रतीक्षा के लिए या अपनी सवारी को लादने के लिए ठहर जाए या रास्ते में कोई आवश्यकता की चीज़ ख़रीद ले तो उस पर कोई पाप नहीं है, और वह तवा को नहीं लौटाएगा सिवाय इसके कि वह अपने सफ़र को स्थगित करने की नीयत कर ले, उदाहरण के तौर पर वह दिन के आरंभ में सफ़र करना चाहता है तो वह विदाई तवाफ़ कर ले फिर वह सफ़र को उदाहरण के तौर पर दिन के अंत तक निलंबित कर दे, तो ऐसी स्थिति में उसके लिए तवाफ को लौटाना अनिवार्य है ताकि वह उसका अल्लाह के घर का अंतिम काम हो जाए.
लाभदायक जानकारीहज या उम्रा का एहराम बांधने वाले पर निम्नलिखित बातें अनिवार्य हैं-1. अल्लाह तअला ने अपने धर्म के जो प्रावधान उसके ऊपर अनिवार्य किए हैं जैसे कि जमाअत के साथ नमाज़ को उसके समय पर पढ़ना, उसका पालन करना.2. अल्लाह तअला ने उसे जिन कामुक बातों, गुनाहों और उल्लंघनों से रोका है उनसे दूर रहे क्योंकि अल्लाह तअला का फ़रमान है-﴿فمن فرض فيهن الحج فلا رفث ولا فسوق ولا جدال في الحج ﴾ [ البقرة: 197]“अतः जिसने इन महीनों में हज को फ़र्ज़ कर लिया, तो हज में संभोग और कामुक बातें, फिस्क़ व फुजूर (अवज्ञा और पाप) तथा लड़ाई-झगड़ा (वैध) नहीं है.” (सूरतुल बक़रा : 197)3. मुसलमानों को अपने कथन या कर्म से, चाहे वह मशाइर के पास हो या उसके अलावा में, कष्ट पहुंचाने से बाज़ रहे.4. एहराम की हालत में निषिद्ध सभी चीज़ों से बचना.(क) – अपने बाल या नाख़ून से कोई चीज़ न काटे, जहां तक कांटे को निकालने की बात है तो उसमें कोई पाप की बात नही है, भले ही ख़ून निकल आए.(ख) – अपना एहराम बांधने के बाद अपने शरीर, या कपड़े, या खाने या पीने की चीज़ में ख़ुशबू न लगाए और न ही ख़ुशबूदार साबून से सफ़ाई सुथराई करे, रही बात उस बाक़ी बचे सुगंध के प्रभाव की जो उसने अपने एहराम से पहले इस्तेमाल की थी तो उसमें कोई हानि नहीं है.(ग) – शिकार को न मारे।(घ) – अपनी पत्नी से संभोग न करे.(ङ) – तथा कामुकता के साथ स्पर्श या चुंबन या आलिंग्न वग़ैरह न करे.(च) – स्वयं अपना या किसी दूसरे का विवाह न करे, तथा किसी औरत से अपनी या किसी अन्य की मंगनी न करे.(छ) – दस्ताने न पहने. रही बात दोनों हाथों को कपड़े (चीथड़े) से लपेटने की तो इसमें कोई बात नहीं है.ये सातों निषिद्ध चीज़ें पुरुष और स्त्री दोनों के लिए निषिद्ध हैं.जबकि निम्नलिखित चीज़ें पुरूष के लिए विशिष्ट हैं:- अपने सिर को किसी चिपकने वाली (सिर से मिली या चिपकी हुई) चीज़ से न ढांपे, रही बात छत्री, गाड़ी की छत और खैमा से साया करने, सिर पर सामान उठाने की, तो इसमें कोई गुनाह नहीं है.- वह क़मीज, पगड़ी, टोपी (हैट) पायजामा और मोज़ा न पहने, सिवाय इसके कि यदि वह इज़ार (तहबंद) न पाए तो पायजामा पहन ले या यदि जूते न पाए तो मोज़े पहन ले.- तथा कोई ऐसी चीज़ न पहने जो उन चीज़ों के अर्थ में हो जिनका पीछे उल्लेख किया गया है, चुनांचे वह बुरक़ा, कंटोप, बनियान इत्यादि न पहने.- तथा उसके लिए जूते, अंगूठी, चश्मा, हेड-फून पहनना जाइज़ है, तथा वह अपने हाथ में घड़ी पहने, या उसे अपनी गर्दन में लटका ले, तथा बेल्ट बांधना ताकि उसमें अपने ख़र्च का पैसा रख सके.- तथा उसके लिए ऐसी चीज़ के द्वारा सफ़ाई करना जाइज़ है जिसमें सुगंध न हो, या अपने सिर या शरीर को धोना और खुजलाना जाइज़ है और यदि ऐसा करने से बिना इच्छा के कोई बाल गिर जाए तो उसके ऊपर कोई चीज़ नहीं है.तथा महिला नक़ाब नहीं पहनेगी, नक़ाब उस कपड़े को कहते हैं जिस से वह अपना चेहरा छिपाती है जिसमें उसकी दोनों आंखों के लिए सूराख बना होता है, तथा वह बुरक़ा भी नहीं पहनेगी.सुन्नत यह है कि वह अपने चेहरे को खोले रखे सिवाय इसके कि उसे उसके गैर मह्रम मर्द देख रहे हों तो ऐसी स्थिति में उसके ऊपर एहराम की हालत और उसके अलावा में भी चेहरा छिपाना अनिवार्य है.
















