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मुआविया के इल्ज़ामात और अली अलैहिस्सलाम के जवाबात

*मुआविया के इल्ज़ामात और अली अलैहिस्सलाम के जवाबात*


1️⃣ मुआविया का पहला इल्ज़ाम:
*“अली ने उस्मान के क़ातिलों की मदद की, और उन्हें सज़ा नहीं दी।”*

*मौला अली अलैहिस्सलाम का जवाब:*
मौला अली अलैहिस्सलाम ने नहजुल बलाग़ा के कई ख़ुत्बों और खतूत में इस इल्ज़ाम का जवाब दिया
उन्होंने फ़रमाया:
*“उस्मान के क़त्ल में मैं न शरीक था, न राज़ी। मगर जब लोगों ने मुझ पर जब्र किया और मुझसे ख़िलाफ़त की बैअत ली, तो उस वक्त हालात ऐसे थे कि बग़ावत का दरवाज़ा खुला हुआ था। अगर मैं तुरंत इंसाफ़ के नाम पर किसी पर हाथ डालता, तो पूरी उम्मत में फसाद फैलता।”*
(नहजुल बलाग़ा – ख़ुत्बा 173, शरह इब्ने अबिल हदीद, जिल्द 3, सफ़ा 207)

उन्होंने आगे फ़रमाया:
*“मुआविया! तू उस्मान का वारिस नहीं है कि उसके क़तिलों से बदला मांगे। अगर इंसाफ़ ही तेरा मक़सद है, तो पहले अपने गुनाहों की जवाबदेही कर।”*
(नहजुल बलाग़ा – खत 14)


2️⃣ *मुआविया का दूसरा इल्ज़ाम:*
“अली ने बग़ावत की आग भड़काई और उस्मान के खिलाफ़ माहौल तैयार किया।”

*अली अलैहिस्सलाम का जवाब:*

*“अगर मैंने लोगों को उस्मान से नाराज़ किया, तो तू ही बता, जब उस्मान पर ज़ुल्म हो रहा था, तू कहाँ था?*
*तू शाम का हाकिम था, और तेरे पास फौजें थीं। क्या तूने उसकी मदद की?”*
(नहजुल बलाग़ा – खत 54)

और फिर अली अलैहिस्सलाम ने फ़रमाया:

*“तूने उस्मान की मौत को ज़रिया बना कर हुकूमत की सीढ़ी तैयार की है। ये इंसाफ़ नहीं, ये तेरा तख़्त का लालच है।”*
(शरह नहजुल बलाग़ा – इब्ने अबिल हदीद, जिल्द 4, सफ़ा 121)



3️⃣ *मुआविया का तीसरा इल्ज़ाम:*
“मैं उस्मान का बदला लेने निकला हूँ, इसलिए मैं बाग़ी नहीं।”

*अली अलैहिस्सलाम का जवाब:*

*“तू उस्मान का बदला नहीं, बल्कि अपने बाप अबू सुफ़ियान की दुश्मनी का बदला ले रहा है। तूने उस्मान का नाम ढाल बना लिया है, ताकि हुकूमत तुझ तक पहुँच जाए।”*
(नहजुल बलाग़ा – ख़ुत्बा 33)


फिर फ़रमाया:
*“अगर तुझे इंसाफ पसंद तो है, तो पहले ख़ुद का जायज़ा ले – तू उस उम्मत के खिलाफ़ तलवार उठा रहा है जिसके खिलाफ़ तू पहले कुफ़्फ़ार के साथ खड़ा था।”*
(तारीख़ तबरी, जिल्द 4, सफ़ा 521)



4️⃣ *अली अलैहिस्सलाम का ख़ुत्बा “अल-क़ासिया”:*

इस मशहूर ख़ुत्बे में मौला अली ने मुआविया और बनू उमय्या की हुकूमत की हवस को यूँ बयान किया:

*“मैं जानता हूँ कि वो लोग जो मेरे खिलाफ़ उठे हैं, वो दुनिया के चाहने वाले हैं। उन्होंने हक़ को नहीं, हुकूमत को मक़सद बनाया है। अगर मैं नर्मी दिखाऊँ, तो इस्लाम का निज़ाम ढह जाएगा।”*
(नहजुल बलाग़ा – ख़ुत्बा 192, अल-क़ासिया)



5️⃣ *अली अलैहिस्सलाम की बाद-अज़-जंग तक़रीर:*

*जंग के बाद मौला ने फरमाया:*

*“ख़ुदा की क़सम! अगर मेरे पास इतने सच्चे और सब्र वाले लोग होते जितने मुआविया के पास मक्कार हैं, तो दुनिया में कोई बाग़़ी नहीं बचता।”*
(नहजुल बलाग़ा – ख़ुत्बा 97)



*उलमा के तवारीखी इक़रारात:*

*इमाम तबरी लिखते हैं:*
*“मुआविया ने अली के खिलाफ़ बग़ावत की, और ये फसाद इंसाफ़ के नाम पर सियासत थी।”*
(तारीख़ तबरी, जिल्द 4, सफ़ा 523)

*इब्ने अबिल हदीद:*
*“अली हक़ पर थे, और मुआविया की तलवार सिर्फ़ दुनिया के लिए थी।”*
(शरह नहजुल बलाग़ा, जिल्द 2, सफ़ा 354)



*अल-बलाज़ुरी:*
*“अली के साथ वो थे जो रसूलुल्लाह के साथ रहे, और मुआविया के साथ वो थे जो ताज़ व तख़्त के दीवाने थे।”*
(अंसाबुल अशराफ, जिल्द 3, सफ़ा 111)



*नतीजा*

*मुआविया के तमाम इल्ज़ाम हक़ीक़त में सियासी बहाने थे। उसने इंसाफ़ का नाम लेकर ख़िलाफ़त की बुनियाद हिला दी, उम्मत में फित्ना पैदा किया, और इस्लामी इत्तिहाद को दो हिस्सों में बाँट दिया।*

मौला अली अलैहिस्सलाम के जवाबात और उनके अमल ने साबित कर दिया कि:
*“अली अलैहिस्सलाम हक़ पर थे – उनके साथ ईमान था, उनके खिलाफ़ तलवार उठाने वाला हर गिरोह बाग़ी था, जहन्नम की तरफ बुलाने वाला  था ।”*


1️⃣ मुआविया ने उस्मान के क़त्ल को बहाना बनाया, मगर मक़सद हुकूमत था।

2️⃣ अली अलैहिस्सलाम ने हर इल्ज़ाम का जवाब हिकमत और शरई दलीलों से दिया।

3️⃣ रसूलुल्लाह ﷺ की हदीसें और सहाबा की गवाही – दोनों ने साबित किया कि मुआविया की फौज बाग़ी थी।

4️⃣ जंग-ए-सिफ़्फ़ीन की बुनियाद नफ्स, सियासत और बुग़्ज़-ए-अहले-बैत पर थी, न कि दीनी मक़सद पर।

5️⃣ इस जंग ने आगे चलकर उमय्यद ताग़़ूतियत की राह खोली, जो इस्लामी अद्ल के निज़ाम के खिलाफ़ एक काली शुरुआत थी।

जंग-ए-सिफ़्फ़ीन – हक़ और बातिल का टकराव

*जंग-ए-सिफ़्फ़ीन – हक़ और बातिल का टकराव*


जंग-ए-सिफ़्फ़ीन इस्लामी तारीख़ की वो जंग है जिसने उम्मत-ए-मुसलिमा को दो हिस्सों में बाँट दिया। ये जंग 37 हिजरी (सन् 657 ई.) में हज़रत अली अलैहिस्सलाम और मुआविया इब्ने अबी सुफ़ियान के दरमियान हुई। हकीकत में ये जंग हुकूमत की हवस, नस्लपरस्ती, और बुग़्ज़-ए-अहले-बैत का नतीजा थी।


*पस-ए-मंज़र:*
हज़रत उस्मान बिन अफ़्फान के क़त्ल के बाद मुसलमानों ने इत्तेफ़ाक़ से हज़रत अली अलैहिस्सलाम की बैअत की (हवाला: तारीख़-ए-तबरी, जिल्द 4, सफ़ा 427; अल-कामिल इब्ने असीर, जिल्द 3, सफ़ा 220).
लेकिन मुआविया, जो उस वक्त शाम का गवर्नर था, बैअत से इंकार कर बैठा। उसने बहाना बनाया कि “पहले उस्मान के क़ातिलों से इंसाफ़ करो”, जबकि असल में वो ख़िलाफ़त हासिल करने की साज़िश में था।

इब्ने असीर लिखते हैं:
*“मुआविया ने उस्मान के क़ातिलों का बहाना बना कर अपनी गवर्नरी बचाने और हुकूमत पर क़ब्ज़ा करने की कोशिश की।”*
(अल-कामिल फ़ी तारीख़, जिल्द 3, सफ़ा 226)


*मुआविया का बुग़्ज़ और लालच:*
मुआविया और उसके बाप अबू सुफ़ियान इस्लाम के पुराने दुश्मन थे। अबू सुफ़ियान वही था जिसने बद्र, उहुद, और अहज़ाब में इस्लाम के ख़िलाफ़ जंगें लड़ीं। इस्लाम के बाद भी उनके दिलों में अहले बैत के लिए नफरत बाक़ी रही।

इमाम इब्ने अबिल हदीद (शरह नहजुल बलाग़ा, जिल्द 1, सफ़ा 159) लिखते हैं:
*“बनू उमय्या का बुग़्ज़ रसूलुल्लाह ﷺ और अहले बैत के खिलाफ़ दिलों में हमेशा रहा, और मुआविया ने उसी अदावत की बुनियाद पर अली अलैहिस्सलाम से जंग की।”*



*अली अलैहिस्सलाम की हिकमत:*
हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने कई बार मुआविया को खत लिखे और कहा:
*“तू उस्मान के क़ातिलों का बहाना बना रहा है, मगर हक़ में तेरा कोई हिस्सा नहीं। तू गवर्नर था, और उस्मान की मदद तुझ पर वाजिब थी, जो तूने नहीं की।”*
(नहजुल बलाग़ा, ख़त 6, ख़त 14, ख़त 54)

मगर मुआविया ने ये बातें सुनने से इंकार किया। वो शाम में बैठकर अपने क़बीले वालों से हुकूमत की तलब में मदद मांगता रहा।


*जंग का आग़ाज़:*
जब तमाम कोशिशें नाकाम हुईं, तो सिफ़्फ़ीन (जो आज के इराक़ और शाम की सरहद पर है) में दोनों फौजें आमने-सामने हुईं।

अली अलैहिस्सलाम की फौज में सहाबा-ए-किराम जैसे अम्मार बिन यासिर, मालिक अश्तर, खुज़ैमा ज़ुल-शहादतैन, अबू अयू़ब अंसारी और बहुत से मुहाजरीन-अंसार मौजूद थे।

मुआविया की तरफ़ ज़्यादातर शामी और बनू उमय्या के लोग थे – न तो सहाबा, न तबी’ईन।

इब्ने कसीर (जो सुन्नी आलिम हैं) भी मानते हैं:
*“हज़रत अली की फौज में रसूलुल्लाह के साथ रहने वाले सहाबा थे, जबकि मुआविया की फौज में ऐसा कोई नहीं था।”*
(अल-बिदाया वन् निहाया, जिल्द 7, सफ़ा 241)



*अम्मार बिन यासिर की शहादत:*
रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया था:
*“अम्मार को बाग़ी गिरोह क़त्ल करेगा, जो जहन्नम की तरफ बुलाने वाला होगा।”*
(बुख़ारी हदीस 2812)



*क़ुरआन को नुकीलों पर उठाना:*
जब मुआविया की हार तय हो गई तो उसने अम्र इब्ने आस के मशवरे पर क़ुरआन को नेजो पर बाँध दिए।
ये धोखा था ताकि लोग रुक जाएँ और हक़ की फतह अधूरी रह जाए।

इब्ने अबिल हदीद लिखते हैं:
*“मुआविया ने क़ुरआन को हथियार बनाया ताकि तलवार से हारने के बाद चालाकी से जीत सके।”*
(शरह नहजुल बलाग़ा, जिल्द 2, सफ़ा 327)


*हुकूमत की हवस और बग़ावत का हुक्म:*
सुन्नी इस्लाम में  खलीफा राशिद  मौला अली अलैहिस्सलाम  के खिलाफ़ तलवार उठाना खुली बग़ावत है।

कुरआन में अल्लाह तआला फ़रमाता है:
*“अगर मोमिनों के दो गिरोह लड़ पड़ें, तो उनके दरमियान सुलह कराओ। लेकिन अगर उनमें से एक गिरोह दूसरे पर ज़ुल्म करे, तो जो ज़ालिम है उससे लड़ो, यहाँ तक कि वो हुक्म-ए-ख़ुदा की तरफ़ लौट आए।”*
(सूरह अल-हुजुरात, आयत 9)

इस आयत की तफ़्सीर में इमाम फख़रुद्दीन राज़ी लिखते हैं:
*“इस आयत के मुताबिक़ जो गिरोह अली के खिलाफ़ लड़ा, वो ‘बाग़ी’ था।”*
(तफ़्सीर कबीर, जिल्द 6, सफ़ा 491)


नतीजा:

जंग-ए-सिफ़्फ़ीन का अंजाम ये हुआ कि हक़ की जंग को मुआविया ने फरेब से रोका, मगर वो अली अलैहिस्सलाम की हिकमत और इमानदारी का मुकाबला न कर सका।
उसका मकसद न उस्मान का इंसाफ़ था, न उम्मत की भलाई — बल्कि ख़ालिस तख़्त व ताज की हवस थी।

ख़ुलासा:

मुआविया इब्ने अबी सुफ़ियान ने अली अलैहिस्सलाम के खिलाफ़ बग़ावत की, जो शरीअत में हराम है।

उसके साथ कोई बड़े सहाबी न थे — सब शामी या उमय्यद लोग थे।

अली अलैहिस्सलाम के साथ हक़ था, जैसा कि रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:
*“अल अलीयो म’अल हक़ वल हक़्क़ो म’अल अली।”*
अली हक़ के साथ हैं और हक़ अली के साथ

*अम्मार बिन यासिर की शहादत ने साबित कर दिया कि मुआविया की फौज ही बाग़ी गिरोह थी।*
*मुआविया की हुकूमत की तलब ने बाद में उमय्यद मलकियत की बुनियाद रखी – जो इस्लामी शूरा-ए-ख़िलाफ़त के नक़्शे को मिटाने वाला निज़ाम साबित हुआ।*




(शेयर ज़रूर करें तमाम मवाली ए हैदर ए क़रार अलैहिस्सलाम को)

Nāsibi / Nawāsib..

Nāsibi / Nawāsib..

والنواصب والناصبیة وأهل النصب : المتدینون ببغضة علي رضي اللہ عنه
Nāwasib, Nāsibiyya aur Ahle Nasb wo log hain Jo Bugze Ali RadiyAllahu anh’ me Dīn dāri Zāhir Kartey hain.
[Al-Qāmus ul Muhīt, Safah 138, Imam Firozābadi, al-mutawaffa 817 AH].

[Al-Muhkam wal-Muhīt, Jild 8, Safah 345, Imam Abul Hasan Ali bin Isma`il bin Sīdha, al-mutawaffa 458 AH].

[Līsan ul Arab, Jild 1, Safah 762, Imam Ibn Manzūr, al-mutawaffa 761 AH].

[Tāj ul-urus, Jild 4, Safah 277, Allama Sayyid Murtadha  al-Hussaini al-Zubaidi Naqshbandi, al-mutawaffa 1205 AH].

[Tawdhīh ul Afkār, Jild 1, Safah 102, Allama Muhammad bin Isma’il San’ani, al-mutawaffa 1182 AH].

النصب ، وھو بغض علي رضي اللہ عنه ، وتقدم غیرہ علیه
Sayyiduna Ali ke sāth Bugz aur unpar dusro ko muqaddam karna Nāsibiyyat hai.
[Tadrīb ur Rāwi, Safah 388, Imam Suyuti, al-mutawaffa 911 AH].

النواصب ، الذین یؤذون أھل البیت بقول أو عمل
Nāsibi wo log hain Jo Qaul o amal se Ahle bayt ko taklīf pohochate hain.
[Majmua Fatawa Shaykh ibn Taymiyyah, Jild 3 Safah 154, Ibn Taymiyyah, al-mutawaffa 728 AH ].

النصب وھو الإنحراف عن علي وأل بیته
Sayyiduna Ali aur unki Ahle Bayt se Kanni katrāna Nāsibiyat hai.
[Fathul Bāri Sharh Sahīh al Bukhāri, Jild 10, Safah 420, Imam Ibn Hajr al-Asqalani, al-mutawaffa 852 AH].

Unki (Ahle Bayt ) ki Mahabbat Musalmano ka deen hai aur isse mehroom Nāsibi Khariji Jahannami hai.
[Fatawa Ridhwiya Jild 22 Safah 421, Aala Hadhrath Imam Ahmad Ridha, al-mutawaffa 1340 AH]

Ahle Bayte Kiram RadiyAllahu anhum Muqtadāyāne Ahle Sunnat hain, jo inse Mahabbat na rakhe Mal’un o Mardūd Khārji hai.
[Bahāre Shari`at, Jild 1, Safah 262, Sadrush Shari’ah Mufti Amjad Ali Ādhami al-mutawaffa 1367 AH]

Nāsibi / Nawāsib..

والنواصب والناصبیة وأهل النصب : المتدینون ببغضة علي رضي اللہ عنه
Nāwasib, Nāsibiyya and Ahle Nasb are those people who express their religious practices under the Hatred of Sayyiduna Ali RadiyAllahu anh’.

[Al-Qāmus ul Muhīt, Pg.138, Imam Firozābadi, al-mutawaffa 817 AH].

[Al-Muhkam wal-Muhīt, vol. 8, pg. 345, Imam Abul Hasan Ali bin Isma`il bin Sīdha, al-mutawaffa 458 AH].

[Līsan ul Arab, Vol. 1, Pg. 762, Imam Ibn Manzūr, al-mutawaffa 761 AH].

[Tāj ul-urus, vol. 4, pg. 277, Allama Sayyid Murtadha al-Hussaini al-Zubaidi Naqshbandi, al-mutawaffa 1205 AH].

[Tawdhīh ul Afkār, vol.1, pg. 102, Allama Muhammad bin Isma’il San’ani, al-mutawaffa 1182 AH].

النصب ، وھو بغض علي رضي اللہ عنه ، وتقدم غیرہ علیه
Hating Sayyiduna Ali Karram Allahu wajahul karīm & presenting others higher than him is Nāsibiyyat.
[Tadrīb ur Rāwi, Pg. 388, Imam Suyuti, al-mutawaffa 911 AH].

النواصب ، الذین یؤذون أھل البیت بقول أو عمل
Nāsibi are those people who hurt the Ahlul bayt by their Statement or action.
[Majmua Fatāwa ibn Taymiyah, Vol. 3, Pg.154, Ibn Taymiyah, al-mutawaffa 728 AH ].

النصب وھو الإنحراف عن علي وأل بیته
Disconnecting with Sayyiduna Ali & Ahlul bayt (RadiyAllahu anhum) is Nāsibiyyat.
[Fathul Bāri Sharh Sahīh al Bukhāri, Vol.10, pg. 420, Imam Ibn Hajr al-Asqalani, al-mutawaffa 852 AH].

The love of Ahlul bayt is the Faith of Muslims & the one who isn’t blessed with their love is a Nāsibi, Khāriji, Jahannami.
[Fatāwa Ridhwiya, Vol. 22, Pg. 421, Aala hadhrath Imam Ahmad Ridha, al-mutawaffa 1340 AH].

Ahle Bayte Kiram RadiyAllahu anhum are The Imams of Ahlus sunnati wal Jama’h, and the one who doesn’t love them is a Mardūd & Mal’un Khāriji.
[Bahāre Shari’at, Vol. 1, Pg. 262, Sadrush Shari’ah Mufti Amjad Ali Ādhami al-mutawaffa 1367 AH].

सात चीज़ों की नसीहत फरमाई

*☪️हज़रत अबुज़र رضي الله تعالا عنه बयान करते है के मुजे हुज़ुर नबी ए करीम ﷺ ने सात चीज़ों की नसीहत फरमाई :-*

         *(1)  “ग़रीब  और  मिस्कीन  के  करीब  रेहना  और  उन  से  मुहब्बत  करना।”*
        *(2)  “माल  व  दौलत  में  अपने  से  कमतर  की  तरफ  देखना,  न  के  अपने  से  ज़ियादा  मालदार  की  तरफ।”*
        *(3)  “सिला  रहमी  करना  अगरचे  वोह  मुंह  मोड़े।”*
        *(4)  “किसी  से  किसी  चीज़  का  सवाल  न  करना।”*
       *(5)  “हक  बात  केहना  अगरचे  (सामने  वाले  को)  कड़वी  मालूम  हो।”*
       *(6)  “अल्लाह  تبارك و تعالا  के  मामले  में  किसी  की  परवाह  न  करना।”*
       *(7)  “ला  हव्ला  वला  कुव्वत  इल्ला  बिल्लाह (لا حول ولا قوات إلى بالله)   पढ़ते  रेहना।”*

       *👉🏿”येह  सब  चीज़े  अर्श  के  नीचे  एक  खज़ाना  है  उसमें  से  है।”*

*🌻(मुस्नदे अहमद शरीफ, हदीस नं.20906)🌻*